Sunday, 19 July 2026

गीता : प्रथम अध्याय श्लोक २१(१२)•

गीता : प्रथम अध्याय श्लोक २१(१२)

सेनयोरुभयोर्मध्ये"—यहाँ "उभयोः" का पहला अर्थ है सम्पूर्णता। अर्जुन आधा सत्य नहीं देखना चाहते। वे केवल कौरव-सेना नहीं देखना चाहते, केवल अपनी सेना भी नहीं देखना चाहते। वे दोनों को एक साथ देखना चाहते हैं। यह भारतीय ज्ञान-परम्परा की एक मौलिक विशेषता है। सत्य कभी एकांगी दृष्टि से नहीं मिलता। उपनिषद् बार-बार कहते हैं कि आंशिक सत्य भी कभी-कभी असत्य जितना ही खतरनाक हो सकता है। इसलिए अर्जुन का पहला आग्रह है—मुझे दोनों दिखाई दें। ध्यान दीजिए, वे अभी निर्णय नहीं माँग रहे; वे पहले पूर्ण दृश्य माँग रहे हैं। यही दर्शन का पहला संस्कार है—निर्णय से पहले समग्र-दर्शन।

"उभयोः" का दूसरा अर्थ है समान गरिमा (equal dignity)। अर्जुन यह नहीं कहते—"हमारी और उनकी सेना।" वे "उभयोः" कहते हैं। इस छोटे-से शब्द में एक विलक्षण निष्पक्षता है। वे दोनों पक्षों को समान भाषिक सम्मान देते हैं। आधुनिक नैतिक दर्शन में इसे principle of equal moral regard कहा जा सकता है। यह अत्यन्त कठिन है। युद्ध के ठीक पहले भी अर्जुन अपने प्रतिपक्ष को भाषिक रूप से अपमानित नहीं करते। वे उन्हें "दुष्ट", "पापी" या "नीच" नहीं कहते। वे केवल कहते हैं—उभयोः। यह उनकी अन्तःसंस्कृति का प्रमाण है।

"उभयोः" मनुष्य की द्विध्रुवीय चेतना (binary awareness) का संकेत है। सामान्यतः संकट के समय मनुष्य का मन एक पक्ष से चिपक जाता है। इसे आधुनिक मनोविज्ञान confirmation bias कहता है—हम केवल वही देखते हैं जो हमारे पक्ष का समर्थन करता है। अर्जुन इसके विपरीत करते हैं। वे अपने मन को बाध्य करते हैं कि वह दोनों पक्षों को देखे। यह अत्यन्त परिपक्व मानसिक प्रक्रिया है। गीता का जन्म इसलिए सम्भव हुआ क्योंकि अर्जुन केवल अपनी कथा नहीं सुनना चाहते थे; वे दूसरी कथा भी देखना चाहते थे।

भारतीय न्यायशास्त्र में किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष दोनों का परीक्षण किया जाता है। कोई भी सिद्धान्त सीधे स्थापित नहीं किया जाता। पहले विरोधी पक्ष को उसकी पूरी शक्ति के साथ प्रस्तुत किया जाता है, फिर उत्तर दिया जाता है। "उभयोः" उसी न्याय-परम्परा का पूर्वाभास है। गीता भी पहले दोनों पक्षों को स्वीकार करती है, फिर समाधान देती है। यह भारतीय बौद्धिक ईमानदारी का अनुपम उदाहरण है।

अर्जुन केवल अपनी सेना की रक्षा के लिए चिन्तित नहीं हैं। उनका दुःख दोनों ओर फैला हुआ है। यही कारण है कि दूसरे अध्याय तक पहुँचते-पहुँचते वे कहेंगे—"एतान्न हन्तुमिच्छामि।" "उभयोः" का बीज उसी करुणा में है। उनके लिए दोनों सेनाओं में केवल सैनिक नहीं खड़े; दोनों ओर उनके अपने लोग खड़े हैं। इसलिए "उभयोः" केवल व्याकरण का द्विवचन नहीं; यह हृदय का द्विवचन है।

ईश्वर किसी एक पक्ष के ईश्वर नहीं होते। कृष्ण पाण्डवों के सारथि अवश्य हैं, पर वे केवल पाण्डवों के भगवान् नहीं हैं। वे भीष्म के भी भगवान् हैं, द्रोण के भी, कर्ण के भी, दुर्योधन के भी। इसीलिए गीता की दृष्टि "उभयोः" है। धर्म का अर्थ किसी एक पक्ष का अन्ध-समर्थन नहीं; धर्म वह दृष्टि है जो दोनों पक्षों को देखकर भी सत्य का निर्णय कर सके। इसलिए "उभयोः" गीता का पहला सार्वभौमिक शब्द है। वह हमें सिखाता है कि न्याय वही कर सकता है जो पहले दोनों को देखने का धैर्य रखता हो।

"उभयोः" आगे चलकर गीता के अनेक द्वन्द्वों का पूर्वरूप है—सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय, मान-अपमान। गीता बार-बार कहेगी—दोनों को एक साथ देखो, किसी एक से चिपको मत। इस प्रकार "उभयोः" केवल दो सेनाओं का सूचक नहीं है; यह गीता के सम्पूर्ण समत्व-दर्शन का प्रथम व्याकरण है। समत्व का अर्थ एक पक्ष को नष्ट करना नहीं, बल्कि दोनों की उपस्थिति में भी अपनी चेतना को संतुलित रखना है। इसलिए यह छोटा-सा शब्द वास्तव में गीता की सबसे बड़ी शिक्षाओं में से एक का मौन बीज है।

उभयोः" का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि यह केवल दो सेनाओं की संख्या नहीं बताता, बल्कि अर्जुन की चेतना की निष्पक्षता (epistemic fairness) को भी प्रकट करता है। यदि अर्जुन चाहते, तो वे कह सकते थे—"हमारी सेना और उनकी सेना।" यह स्वाभाविक भी होता। प्रत्येक योद्धा अपनी सेना को केन्द्र मानकर ही सोचता है। परन्तु अर्जुन ऐसा नहीं करते। वे "हम" और "वे" की भाषा छोड़ देते हैं और "उभयोः" की भाषा ग्रहण करते हैं। यह केवल व्याकरण नहीं बदलता; यह पूरी मानसिक संरचना बदल देता है। "हम-वे" (us vs. them) की भाषा संघर्ष की भाषा है; "उभयोः" की भाषा दर्शन की भाषा है। गीता का जन्म इसलिए सम्भव हुआ क्योंकि अर्जुन ने एक क्षण के लिए योद्धा की भाषा छोड़कर द्रष्टा की भाषा बोलनी आरम्भ कर दी।

आधुनिक सामाजिक मनोविज्ञान में एक शब्द है—depolarization। इसका अर्थ है दो विरोधी पक्षों को इस प्रकार देखना कि वे केवल शत्रु न रह जाएँ, बल्कि एक ही मानवीय परिस्थिति के दो आयाम प्रतीत हों। अर्जुन का "उभयोः" यही करता है। वे अभी किसी पक्ष का नैतिक मूल्यांकन नहीं कर रहे। वे केवल दोनों की उपस्थिति को स्वीकार कर रहे हैं। यह अत्यन्त उच्च मानसिक अवस्था है। अधिकांश संघर्ष इसलिए लम्बे चलते हैं क्योंकि दोनों पक्ष पहले ही क्षण दूसरे पक्ष की मनुष्यता खो देते हैं। अर्जुन ऐसा नहीं करते। उनके लिए दोनों पक्ष अभी भी "उभय" हैं—एक ही वास्तविकता के दो पक्ष।

यहाँ भारतीय दर्शन की एक अत्यन्त सूक्ष्म परम्परा स्मरणीय है। उपनिषद् कहते हैं कि संसार में अधिकांश समस्याएँ एकान्त-दृष्टि (one-sidedness) से उत्पन्न होती हैं। जैन दर्शन इसे अनेकान्तवाद के माध्यम से और भी स्पष्ट करता है। यद्यपि गीता और जैन दर्शन की अपनी-अपनी स्वतंत्र दार्शनिक दिशाएँ हैं, फिर भी "उभयोः" में यह आग्रह अवश्य दिखाई देता है कि किसी भी जटिल सत्य को केवल एक पक्ष से नहीं समझा जा सकता। अर्जुन पहले दोनों को देखना चाहते हैं। निर्णय बाद में होगा।

"उभयोः" में अद्भुत करुणा छिपी है। यदि व्यास केवल "सेनयोर्मध्ये" लिखते, तो दृश्य का वर्णन हो जाता। पर "उभयोः" जोड़कर वे पाठक को भी बाध्य करते हैं कि वह दोनों ओर दृष्टि डाले। एक ओर भीष्म हैं, दूसरी ओर युधिष्ठिर। एक ओर द्रोण हैं, दूसरी ओर धृष्टद्युम्न। एक ओर कृपाचार्य हैं, दूसरी ओर सात्यकि। कवि हमें किसी एक ओर देखने नहीं देता। वह हमारी दृष्टि को दोनों ओर घुमाता है। यह केवल वर्णन नहीं; यह पाठक की दृष्टि का भी शिक्षण (education of perception) है।

John Rawls ने veil of ignorance का सिद्धान्त दिया था—न्याय वही कर सकता है जो पहले स्वयं को किसी एक पक्ष की निश्चित पहचान से कुछ समय के लिए अलग कर सके। अर्जुन का "उभयोः" उसी प्रकार की नैतिक निष्पक्षता की प्रारम्भिक झलक है। वे अभी यह नहीं कह रहे कि कौन सही है; वे पहले यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उन्होंने दोनों को देखा है। न्याय का जन्म दर्शन से होता है, और दर्शन का जन्म समग्र दृष्टि से।

"उभयोः" केवल बाहरी सेनाओं के लिए नहीं है। मनुष्य के भीतर भी दो पक्ष हैं—एक जो संसार की ओर आकर्षित होता है, दूसरा जो आत्मा की ओर। एक जो सम्बन्धों में बँधता है, दूसरा जो सत्य की ओर बढ़ता है। गीता इनमें से किसी एक का निषेध नहीं करती। कृष्ण अर्जुन को संसार छोड़ने के लिए नहीं कहेंगे; वे संसार के बीच योग सिखाएँगे। इसीलिए "उभयोः" गीता की पूरी पद्धति का सूक्ष्म बीज है। यहाँ किसी एक पक्ष को नष्ट नहीं किया जाता; दोनों को समझकर एक उच्चतर संश्लेषण (synthesis) तक पहुँचा जाता है।
अन्ततः "उभयोः" हमें एक अत्यन्त दुर्लभ बौद्धिक सद्गुण सिखाता है—पूर्ण दृष्टि का धैर्य। आज मनुष्य पहले निर्णय करता है, बाद में देखता है। अर्जुन पहले देखना चाहते हैं, फिर निर्णय करेंगे। यही गीता की पद्धति है। इसलिए "उभयोः" केवल द्विवचन नहीं है; यह ज्ञानमीमांसा (epistemology) का एक महान सिद्धान्त है—जो केवल एक पक्ष को देखता है, वह सूचना पा सकता है; जो दोनों पक्षों को देखता है, वही प्रज्ञा प्राप्त कर सकता है। यही "उभयोः" का मौन, किन्तु अमूल्य संदेश है।

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