Sunday, 23 August 2026

अंबेडकर

1927 में ब्रिटिश सरकार ने भारत के शासन को सुधारने के लिए एक कमीशन बनाया। इसका नाम साइमन कमीशन पड़ा क्योंकि इसके अध्यक्ष सर जॉन साइमन थे। इसमें 7 ब्रिटिश सांसद थे— और कोई भी भारतीय इसका सदस्य नहीं था। इसलिए कांग्रेस, मुस्लिम लीग और कई अन्य दलों ने इसका बहिष्कार किया। पूरे देश में “सायमन गो बैक” के नारे लग रहे थे।

लेकिन एक फलाना आदमी था जिसने इस अंग्रेज़ी कमिशन का बहिष्कार नहीं किया। वो बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल की तरफ से प्रांतीय समिति का मेंबर बना और इस कमीशन के सामने आया। 23 अक्टूबर 1928, पूना में सर जॉन साइमन और अन्य सदस्यों के सामने उसने साफ कहा:---
"हम लोग "दा-ललित" हैं। और "दा-ललित" "हैंड-डू" समुदाय का हिस्सा नहीं है। बल्कि अलग और स्वतंत्र है। हम शिक्षा, पैसा और समाज में उनसे पिछड़े हैं। "हैंड-डू" नहीं हैं हम। इसलिए हमें उन (हैंड-डू) लोगों से मौसमलाम लोगों से भी ज्यादा राजनीतिक सुरक्षा चाहिए।"

सोर्स : फलाने की किताब Dr /B /R /AM : राइटिंग्स एंड स्पीचेस वॉल्यूम 2 में वो मेमोरेंडम और गवाही छपी हुई है। व्हाट्सप्प यूनिवर्सिटी, या औंध-भोक्त कह कर अपना दिल हल्का ना करें। क्योंकि जितना तुमको ज्ञान है, उतना मैं समाज में बांट कर भूल चुका हूँ।

(कुछ शब्द बिगाड़ दिए हैं क्योंकि बात की रीच कम हो जाती है सच लिखने से।)

चलो जो है, जो था, वो भी ठीक है। पर मुकेश जोशी का कहना है कि जब तुमने खुद को हैंड-डू माना ही नहीं, तो अब हैंड-डू रहकर, खुद को हैंड-डू जातियों की पैदाइश बता कर R-रकक्षण की मलाई लेने का क्या तुक है । तुम कह दो कि तुम हैंड-डू नहीं हो, तुम्हारी जाति, स्वतः ख़त्म हो जाएगी। और तुम्हारा तथाकथित चोचन भी । तुम्हें सदियों तलक क्यों चोचित ही बने रहना है। 💀

और एक बात। इसी साइमन कमिशन की वजह से लाला लाजपत राय की मौत हुई थी। इसी की कड़ी में भगत सिंह राजगुरु सुखदेव को फांसी हुई थी। 

मगर फलाने थे कि इन अंग्रेज़ो की चापलूसी में कोर्ट पहने, टाई लगाए, पलकें बिछाए खड़े रहते थे। 💀💀
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मुकेश जोशी ✍️
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कड़वा सच लिखना ही मेरा शौक है। सच सुनने का हौसला हो तो मुकेश जोशी को फॉलो करें। 🔥

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