Tuesday, 25 August 2026

पतिमङ्गलस्तोत्रं

पतिमङ्गलस्तोत्रम् -
*नमः कान्ताय भर्त्रे च शिवचन्द्रस्वरूपिणे। नमः शान्ताय दान्ताय सर्वदेवाश्रयाय च ॥ १॥

हे प्रिय पति! हे शिव और चन्द्रमा के समान स्वरूप वाले पति! आपको नमस्कार है। हे शान्तस्वरूप और जितेन्द्रिय! तथा समस्त देवताओं के आश्रयभूत पति! आपको नमस्कार है।

*नमो ब्रह्मण्यरूपाय सतीप्राणपराय च। नमस्याय च पूज्याय हृदाधाराय ते नमः ॥ २॥

ब्रह्मस्वरूप पति को नमस्कार है। पतिव्रता स्त्री के प्राणों के परम आश्रयभूत पति को नमस्कार है। हे नमस्कार और पूजा के योग्य पति! मेरे हृदय के आधारस्वरूप आपको नमस्कार है।

*पञ्चप्राणाधिदेवाय चक्षुषस्तारकाय च। ज्ञानाधाराय पत्नीनां परमानन्दरूपिणे ॥ ३॥

पाँचों प्राणों के अधिदेवता, नेत्रों के तारक अर्थात् रक्षक, पत्नियों के ज्ञान के आधार तथा परमानन्दस्वरूप पति को नमस्कार है।

*पतिर्ब्रह्मा पतिर्विष्णुः पतिरेव महेश्वरः। पतिश्च निर्गुणाधारी ब्रह्मरूप नमोऽस्तु ते ॥ ४॥

पति ही ब्रह्मा हैं, पति ही विष्णु हैं और पति ही महेश्वर हैं। पति ही निर्गुण ब्रह्म के आधार हैं। हे ब्रह्मस्वरूप पति! आपको नमस्कार है।

*क्षमस्व भगवन् दोषं ज्ञानाज्ञानकृतं च यत्। पत्नीबन्धो दयासिन्धो दासीदोषं क्षमस्व मे ॥ ५॥

हे भगवान्! ज्ञान अथवा अज्ञान से मुझसे जो भी दोष हुआ हो, उसे क्षमा करें। हे पत्नी के बन्धु! हे दया के समुद्र! मेरी दासी के समान सेवा में हुए दोष को क्षमा करें।

*इदं स्तोत्रं महापुण्यं सृष्ट्यादौ यन्मया कृतम्। सरस्वत्या च धरया गङ्गया च पुरा व्रजे ॥ ६॥

यह महापुण्यदायक स्तोत्र सृष्टि के आरम्भ में मेरे द्वारा रचा गया था। पूर्वकाल में सरस्वती, धरा और गङ्गा ने भी व्रज में इसका पाठ किया था।

*सावित्र्या च कृतं पूर्वं ब्रह्मणे चापि नित्यशः। पार्वत्या च कृतं भक्त्या कैलासे शङ्कराय च ॥ ७॥

पूर्वकाल में सावित्री ने ब्रह्मा के लिए इसका पाठ किया था और नित्य ही करती थीं। पार्वती ने भी कैलास पर भक्तिपूर्वक भगवान् शङ्कर के लिए इसका पाठ किया था।

*मुनीनां च सुराणां च पत्नीभिस्तु कृतं पुरा। पतिव्रतानां सर्वासां स्तोत्रमेतच्छुभावहम् ॥ ८॥

पूर्वकाल में मुनियों और देवताओं की पत्नियों ने भी इसका पाठ किया था। यह स्तोत्र सभी पतिव्रता स्त्रियों के लिए कल्याणकारी है।

*इदं स्तोत्रं महापुण्यं या शृणोति पतिव्रता। नरोऽन्यो वापि नारी वा लभते सर्वाञ्छितम् ॥ ९॥

जो पतिव्रता स्त्री इस महापुण्यदायक स्तोत्र को सुनती है, अथवा कोई अन्य पुरुष या स्त्री इसे सुनता है, वह अपने सभी इच्छित मनोरथों को प्राप्त करता है।

*अपुत्रो लभते पुत्रं निर्धनो लभते धनम्। रोगी च मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥ १०॥

पुत्रहीन को पुत्र प्राप्त होता है, निर्धन को धन प्राप्त होता है, रोगी रोग से मुक्त हो जाता है और बन्धन में पड़ा हुआ व्यक्ति बन्धन से मुक्त हो जाता है।

*पतिव्रता च स्तुत्वा च तीर्थस्नानफलं लभेत्। फलं च सर्वतपसां व्रतानां च व्रजेश्वर ॥ ११॥

हे व्रजेश्वर! पतिव्रता स्त्री पति की स्तुति करके तीर्थ-स्नान का फल प्राप्त करती है तथा समस्त तपों और व्रतों का फल भी प्राप्त करती है।

*इदं स्तुत्वा नमस्कृत्वा भुङ्क्ते सा तदनुज्ञया। एष पतिव्रताधर्म एष धर्मः सनातनः ॥ १२॥

इस स्तोत्र की स्तुति करके और पति को नमस्कार करके वह स्त्री पति की अनुमति से भोजन करती है। यही पतिव्रता स्त्री का धर्म है और यही सनातन धर्म है।

इति श्रीब्रह्मवैवर्ते श्रीकृष्णनन्दसंवादे पतिव्रतामाहात्म्ये पतिमङ्गलस्तोत्रं सम्पूर्णम्।

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