फलानि ग्रहचारेण सूचयन्ति मनिषिणः।
को वक्ता तारतम्यस्य तमेकं वेधसं विना॥
तन्त्रालोक के अनुसार भविष्य के काल का अनुमान ३ दिन, मास, या वर्ष में होता है। उससे सटीक काल का पता नहीं चलता। एक प्रचलित उक्ति है-
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृत कर्मं शुभाशुभम्।
त्रिभिर्मासैः, त्रिभिर्पक्षैः, त्रिभिर्वर्षैः, त्रिभिर्दिनैः॥
ओड़िशा में ६०० वर्ष पूर्व के महात्मा अच्युतानन्द की १५ पोथियां हैं, १ पोथी अनाचार के कारण नष्ट हो गयी। काकटपुर मंगला मन्दिर के पण्डित अमरेश मिश्र के पास ताम्र पोथी थी। उसी मन्दिर में जगन्नाथ मन्दिर के पुजारियों को निर्देश मिलता है कि जगनाथ विग्रह के लिए शंख-चक्र आदि चिह्नों वाला नीम वृक्ष कहां पर है। वहां मैं कुछ आईपीएस अधिकारियों के साथ १९९६ में गया था। उनका उद्देश्य यह जानना था कि मेरे मन में क्या षड्यन्त्र चल रहा है। किन्तु मेरे मन में केवल गणित ज्योतिष सम्बन्धी चिन्ता थी कि कुछ नियमों की कैसे व्याख्या की जाय। वहां पोथी के नाम पर ताम्बा की ५० प्लेट थी-हथेली के आकार की। एक खल्ली से अपने ललाट को छुआ और एक प्लेट निकाल कर उसे छुआ। मेरे मन में जो सन्देह या प्रश्न था उसका उत्तर ५०० वर्ष पुरानी संस्कृत मिश्रित ओड़िया् में उत्कीर्ण हो कर आने लगा। एक बार में ट्वी स्क्रीन की तरह ६ पंक्ति आती थी। पढ़ने के बाद वह समतल हो कर पुनः ६ पंक्ति उत्कीर्ण होती थी। बार बार अक्षर उत्कीर्ण होने से प्लेट गर्म हो जाती थी और उसे पानी में डुबा कर ठण्ढा करना पड़ता था। ३० मिनट का टेप रेकार्डर का कैसेट समाप्त होने पर ५ मिनट और आया। आश्चर्य की बात थी कि प्राचीन गणित सब्दों के साथ आधुनिक गणित के अंग्रेजी /ग्रीक शब्द भी आ रहे थे। मुझ लगा कि मेरे विचार को अच्युतानन्द का समर्थन प्राप्त है और मैं०ने लिखना आरम्भ किया। पूर्णता के लिये प्रतीक्षा करता तो जीवन भर नहीं लिख पाता। बाद में अनुभव हुआ कि मेरे ही विचार उत्कीर्ण हो रहे थे। पर आधुनिक विज्ञान के लिए भी आश्चर्य है कि मन का विचार ताम्र पत्र पर कैसे आया तथा बिना सांचा के कैसे उत्कीर्ण हुआ।
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