Wednesday, 30 September 2026

भारतीय एतिहासिकता और विश्व

भारत में दुर्बल तथा पराधीन मानसिकता है। उसी लेख या पुस्तक को शोध मानते हैं जिसका समर्थन विदेश के विशेषकर ब्रिटेन तथा अमेरिका के लेखक करें। भारतीय पुस्तकों को बिना पढ़े झूठा मान लेते हैं, या उसका उल्टा निष्कर्ष निकालते हैं। (१) इन्द्र पूर्व दिशा के लोकपाल थे, उनके शब्द तथा स्थान नाम आज तक असम से वियतनाम तक प्रचलित हैं। पर उनको पश्चिम से आये आर्यों का नेता कहते हैं। (२) भागवत प्रवचन में कहते हैं कि द्रविड से ज्ञान का आरम्भ हुआ, कर्नाटक में वृद्धि हुई तथा महाराष्ट्र तक प्रसार हुआ। इसी कारण भारत को राष्ट्र तथा उसके खण्ड को महाराष्ट्र कहते हैं। पर अशिक्षित लेखक कहते हैं कि उत्तर के आर्यों ने दक्षिण भारत पर वेद थोप दिया। (३) भारत के खनिज क्षेत्रों में भी बाहर से आये मजदूरों के वंशज देखने से ही अफ्रीकी मूल के लगते हैं। इसमें किसी शोध की आवश्यकता नहीं है। आज तक उनकी उपाधि वही है जो ग्रीक भाषा में खनिजों के नाम हैं।(४) चण्डी पाठ में आक्रमण करने वाले महिषासुर को स्पष्ट कहा है कि जीवित रहना चाहते हो तो पाताल (अमेरिका) लौट जाओ। अमेरिकन इतिहास में भी पढ़ाया जाता है कि यूरोपीय लोगों के पूर्व यहा महिष (Bison) मुख्य पशु था। हिरण्यकशिपु का वंशज बलि भी देव क्षेत्र पर कब्जा छोड़ने के बाद अमेरिका लौट गया था। उसकी राजधानी भोगवती तट पर भोगवती नगरी थी जो आज भी है (बोगोटा तट पर कोलम्बिया की राजधानी बोगोटा)। पर नवरात्र का पाखण्ड करने वाले भी महिषासुर को मूल भारतीय कहते हैं। (५) आज तक विश्व में केवल एक जाति का समाज नहीं हुआ है। केवल ब्राह्मण, केवल मोची, या केवल क्षत्रिय का समाज एक दिन भी नहीं टिक सकता है। पर मतान्धों का प्रचार है कि ब्राह्मण बाहर से आकर भारतीयों को दास बना दिया। बिना किसान के तो भोजन भी नहीं मिलेगा, जीवित रहना ही असम्भव है।
(६) जिस किसी अन्न की चर्चा हो, उसके विषय में प्रचार है कि यह भारत में नहीं होता था। सरकार तथा संघ के प्रचार के अनुसार ५००० वर्ष तक भारतीय बिना अन्न के जीवित रहे। दलित तो पानी भी नहीं पी सके। ये प्रचार करने वाले केवल ३ दिन बिना पानी पिये रह कर दिखायें। (७) संस्कृत विश्वविद्यालय के प्राध्यापक तथा कुलपति भी अशिक्षा तथा भारत के अज्ञान में किसी से कम नहीं हैं। ज्योतिष के प्रायः सभी प्राध्यापक तथा पञ्चाङ्ग निर्माता युधिष्ठिर शक, विक्रमादित्य संवत् तथा शालिवाहन शक का प्रयोग करते हैं। पर अगले ही वाक्य में कहते हैं कि शक-संवत् विदेशी शकों का था। शक तथा संवत् भिन्न-भिन्न हैं, तथा किसी शक राजा ने आजतक कोई शक या संवत् आरम्भ नहीं किया। विक्रमादित्य संवत् की गणना करने के बाद उसके आधार वराहमिहिर, कालिदास तथा ब्रह्मगुप्त को विक्रमादित्य के ६०० वर्ष बाद का कहते हैं। इन लोगों के अनुसार बिना किसी गणित या शासक के विक्रमादित्य संवत् आरम्भ हो गया। (८) प्रयाग के राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के कुलपति गयाचरण त्रिपाठी हर भाषण में कहते थे कि वेद में जगन्नाथ का ही वर्णन है तथा वे ज्ञान के स्रोत हैं। पर 'अन्तरराष्ट्रीय ख्याति' के लिए हरमन कुल्के के साथ मिलकर 'जगन्नाथ कल्ट' नाम की पुस्तक लिखी जिसके अनुसार जगन्नाथ हिन्दू देवता नहीं है, अशिक्षित आदिवासियों के टोटेम हैं, इस कारण उनकी मूर्ति बिना हाथ पैर के अनुसार। इन लेखकों के अनुसार प्रयाग तथा हार्वर्ड में पढ़ने के बाद ही पता चलता है कि मनुष्य के हाथ पैर भी होते हैं। २००४ में डाॅक्टर कर्ण सिंह की अध्यक्षता में त्रिपाठी जी जगन्नाथ को वेद स्वरूप कह रहे थे तो मैंने कहा कि आप बिल्कुल उल्टा अपनी पुस्तक में लिखते है। उन्होंने कही कि पुस्तक में भूल है, उसका सुधार करेंगे। अगले तीन सम्मेलनों में उनको याद दिलाया, पर वे जीवन भर सत्य लिखने का साहस नहीं कर सके।

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