हिंदी साहित्य में एक बहुत बड़ा फ्रॉड बड़े प्यार से पाला गया है - राहुल सांकृत्यायन को महापंडित और महान इतिहासकार बताना। सच ये है कि फिरेला आदमी था, साहित्यकार था, पर उनके ख्याली पुलाव को बहुत तरीके से इतिहास बना कर प्रस्तुत किया गया और उन्हें इतिहासकार बना दिया गया।
राहुल सांकृत्यायन के 3 काम थे - डिस्टॉर्ट, डिफेम, और डिवाइड।
1. डिस्टॉर्ट - इतिहास को तोड़ो-मरोड़ो
वोल्गा से गंगा: इसका सबसे बड़ा सबूत है। 6000 BC से 1942 तक का 8000 साल का इतिहास बिना एक भी पुरातात्विक सबूत के लिख दिया।
तथ्य क्या दिया? शून्य।
फुटनोट कितने? शून्य।
शिलालेख, सिक्का, कार्बन डेटिंग? कुछ भी नहीं।
बस क्या था? गप्प। निशा थी, दिवा थी, अमृताश्व ने घोड़ा पाला, पुरुहूत ने लड़ाई की। ये सब वेदों के नामों से उठा कर बनाई गई काल्पनिक कहानियां हैं, जिनके मुंह में लेनिन के भाषण डाल दिए गए।
इसे इतिहास नहीं, वामपंथी फिक्शन कहते हैं।
2. डिफेम - अपनी ही सभ्यता को गाली दो
राहुल का पूरा प्रोजेक्ट एक ही था - वैदिक सभ्यता को विदेशी साबित करो।
अंग्रेजों की बनाई हुई सड़ी हुई आर्यन इनवेजन थ्योरी को उठाया, उस पर लाल रंग पोता और कहा - देखो आर्य वोल्गा से आए, भारत के मूल निवासी तो दस्यु थे।
मतलब हिंदू सभ्यता ही बाहर की है, तो हिंदू का इस जमीन पर हक ही क्या?
आज साइंस इस थ्योरी को कचरे में फेंक चुकी है, पर राहुल के झूठ की दुकान आज भी यूनिवर्सिटियों में चल रही है।
और दूसरा - अकबर महान, महाराणा प्रताप सामंती। चित्तौड़ में 30,000 हिंदुओं का कत्ल करने वाला अकबर इनके लिए सेक्युलर है, क्योंकि उसने जजिया हटाया। ये है इनका इतिहास का पैमाना।
3. डिवाइड - समाज को बांटो
राहुल का इतिहास हमेशा दो हिस्सों में बंटा है - शोषक और शोषित, आर्य और अनार्य, ब्राह्मण और शूद्र।
हर कहानी में एक ही जहर - ब्राह्मण ने तुम्हें लूटा। क्षत्रिय ने तुम्हें मारा। मंदिर ने तुम्हें ठगा।
उद्देश्य इतिहास बताना नहीं, नफरत बोना था। ताकि हिंदू समाज कभी जुड़ ही न पाए। यही वामपंथी डिस्टोरियन का असली काम है - अतीत में आग लगाओ ताकि वर्तमान में वोट सेको।
झूठ की खेती से क्या मिला?
- तिब्बत से ग्रंथ लाए, पर अनुवाद में बुद्ध को जबरदस्ती कम्युनिस्ट बना दिया।
- रूस गए, स्टालिन के अकाल और हत्याओं पर आंख बंद कर ली और _स्तालिन_ नाम की चापलूसी भरी जीवनी लिख दी।
- खुद को घुमक्कड़ कहते रहे, पर घुमक्कड़ी से बड़ा कोई अहंकार नहीं पाला - 150 किताबें लिख कर खुद को ही अंतिम सत्य घोषित कर दिया।
अंतिम बात
राहुल सांकृत्यायन कोई इतिहासकार नहीं थे। वो एक विचारधारा का प्रचारक थे जिसने गप्प को इतिहास की पैकेजिंग में बेचा।
उन्होंने तथ्य नहीं दिए, कल्पना दी।
उन्होंने सबूत नहीं दिए, कहानियां दी।
उन्होंने इतिहास नहीं लिखा, एजेंडा लिखा।
यह बहुत कठिन होता है मेरे लिए किसी के लिए इस तरह से लिखना, लेकिन मैं क्या ही करूं, इतना झूठ, इतना झूठ वामपंथियों ने फैलाया है कि मेरी मजबूरी बन गई उनके मुखौटे उतारना।
राहुल सांकृत्यायन समेत ये वामपंथी स्टॉक होम सिंड्रोम के उदाहरण बनने के अतिरिक्त अपने धर्म संस्कृति के लिए कुछ नहीं बन पाए, जिस मातृ संस्कृति का दूध पीकर पोषित हुए उस ऋण की एक पाई भी नहीं वापस कर पाए, केवल अपने इन्द्रिय आनंद में कीड़े के तरह भोग करते रहे।
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