अव्वल इस्लाम में एक नुक्ता इधर से उधर करने की इजाजत और आजादी दोनों नहीं है। सुधार तो दूर की कौड़ी है लेकिन कुछ जाले मै साफ कर देना चाहता हूँ जो यह नैरेटिव बनाते हैं कि इस्लाम के जाति व्यवस्था हिंदुओं से आयी।
हिंदू संपर्क से पहले ही अरब और शुरुआती इस्लामी दुनिया में जातिवाद और छुआछूत का पूरा ढांचा तय हो चुका था। इस्लाम से पहले का अरब कोई बराबर समाज नहीं था, वो नसब यानी खून से बंटा हुआ था। सबसे ऊपर कुरैश कबीला था जो मक्का का मालिक था और कुरैश के अंदर भी बानू हाशिम को सबसे ऊंचा माना जाता था। उसके नीचे बानू तमीम, बानू असद जैसे दूसरे अरबी कबीले थे और सबसे नीचे मवाली और अबीद यानी गैर-अरबी और गुलाम, जिन्हें अरबी कभी अपने बराबर नहीं मानते थे। ये बंटवारा हिंदू समाज से सीखा हुआ नहीं था, ये रेगिस्तान का अपना कबीलाई सिस्टम था।
इस्लाम के आने के तुरंत बाद जब ईरान, सीरिया, मिस्र जीते गए और वहां के लोग मुसलमान बने तो अरबी मुसलमानों ने उन्हें मवाली कहा, यानी आजाद किया हुआ गुलाम जैसा। मवाली को मस्जिद में आगे की सफ में खड़े नहीं होने दिया जाता था, वो किसी अरबी औरत से निकाह नहीं कर सकता था और इसी के लिए क़ुफ़ यानी बराबरी का सिद्धांत बनाया गया कि अरबी औरत का क़ुफ़ सिर्फ अरबी मर्द ही हो सकता है। उमय्यद दौर में मवाली से मुसलमान होने के बाद भी जजिया जैसा टैक्स लिया जाता था और कहा जाता था कि तुम असली मुसलमान नहीं हो। गवर्नर हज्जाज बिन यूसुफ ने तो बसरा में हुक्म दिया था कि मवाली अरबी की तरह पगड़ी भी न पहनें। ये सब 8वीं सदी की बात है, भारत में इस्लाम के आने से लगभग 300 साल पहले की।
इसी तरह अफ्रीका से लाए गए काले मुसलमानों को जंज कहा जाता था और उनके साथ अछूत जैसा बर्ताव होता था। हजरत बिलाल को आजाद तो कर दिया गया पर उन्हें पूरी जिंदगी गुलाम पृष्ठभूमि से ही जोड़ा गया। 9वीं सदी में इराक में जंज गुलामों ने 14 साल तक विद्रोह किया क्योंकि उन्हें अलग बस्तियों में जानवरों की तरह रखा जाता था। उस दौर की कई अरबी किताबों में उनके लिए बहुत अपमानजनक बातें लिखी मिलती हैं।
इसके साथ ही सैय्यदवाद यानी जन्म से ऊंचा होने का सिद्धांत भी 8वीं सदी में ही बन गया था। पैगंबर के परिवार अहल-ए-बैत को पाक खून वाला माना गया, सैय्यद के लिए जकात लेना हराम बताया गया क्योंकि उसका दर्जा ऊंचा है, सैय्यद लड़की का निकाह गैर-सैय्यद से अमान्य माना गया और सैय्यद को गुलाम नहीं बनाया जा सकता था। ये सब जन्म से ऊंच-नीच का सिद्धांत था और ये अरब में ही बना था, भारत का इसमें कोई लेना-देना नहीं था।
तो निचोड़ ये है कि भारत में आने से पहले ही अरब समाज में तीन चीजें पूरी तरह मौजूद थीं - खून से जाति तय होना कि कुरैश ऊंचा और बाकी नीचे, पेशे और नस्ल से छुआछूत कि मवाली और जंज को अलग रखना और शादी में जाति देखना यानी क़ुफ़ का कानून। भारत में आकर इस्लाम ने जाति नहीं सीखी, उसने अपनी पुरानी अरबी जाति व्यवस्था को यहां सिर्फ नए नाम दे दिए - अशराफ, अजलाफ और अरजाल।
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