Wednesday, 30 September 2026

इरफान हबीब: मुगलई राज्य हिंदू कत्लेआम

इरफान हबीब: मुगलई डिस्टोरियन जिसने हिंदू कत्लेआम को वर्ग संघर्ष के रूप में स्थापित किया

इरफान हबीब को पढ़ना एक जादू देखना है। हाथ में फारसी स्रोत, मुँह पर मार्क्स का सिद्धांत, और बीच में से मजहब गायब। उसे वर्ग संघर्ष का नाम दे दिया ताकि मामला प्रगतिशील लगे, कत्लेआम रोमांटिक लगे।

उसका सबसे बड़ा काम - मुगल भारत की कृषि व्यवस्था इसी जादू की नींव है। इसमें उसने सिद्ध किया कि मुगल साम्राज्य जागीर संकट और लगान के दबाव से गिरा। पर उसी किताब में मुगल साम्राज्य के शोषण का मजहबी हथियार - जजिया, तीर्थयात्रा कर, मंदिरों की जमीन जब्त कर वक्फ बनाना, जबरन मतांतरण एक फुट नोट  भी नहीं।

क्यों? क्योंकि अगर जजिया का जिक्र कर दे तो मानना पड़ेगा कि किसान सिर्फ आर्थिक रूप से नहीं, धार्मिक रूप से भी निचोड़ा गया। साकी मुस्तइद खान लिख गया है कि जजिया का मकसद हिन्दुओं को अपमानित करना था। इस एक पंक्ति से पूरा वर्ग-संघर्ष का ढांचा गिर जाता है, इसलिए वह पंक्ति किताब में नहीं आती।

हबीब लिखता है मंदिर लूटे गए क्योंकि वे खजाना थे। पर खुद उसी के पढ़े हुए फारसी स्रोत में औरंगजेब का 1669 का फरमान है - काशी, मथुरा, सोमनाथ में काफिरों के विद्यालय और मंदिर तोड़ दो। इसमें खजाने का जिक्र नहीं, कुफ्र का जिक्र है। हबीब फरमान जानता है पर अनुवाद बदल देता है और इसे राजनीतिक विद्रोह दबाना बता देता है।

भारतीय इतिहास कांग्रेस में भगवाकरण के विरुद्ध प्रस्ताव लाकर खुद को धर्मनिरपेक्षता का ठेकेदार बना लिया पर उसी प्रस्ताव में मांग नहीं की कि मुगल काल के फारसी इतिहास में जो हिन्दुओं को काफिर, मुशरिक, हरबी लिखा है उस पर भी चर्चा हो। धर्मनिरपेक्षता एकतरफा हो गई - हिन्दू राष्ट्र की आलोचना करो, दार-उल-इस्लाम की नहीं।

यही धूर्तता है, सच को आधा बोलना। लगान का सच पूरा, जजिया का आधा। जागीर के संकट का सच पूरा, मूर्तिभंजन के जिहाद का आधा। इसी आधे सच से 60 वर्ष तक भारत के बच्चे पढ़ते रहे कि मध्यकाल में भाई-भाई थे बस जागीरदार खराब था। उन्हें बताया ही नहीं कि उसी काल में काशी में विश्वनाथ नहीं था क्योंकि तोड़ दिया गया था, मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि पर ईदगाह थी, नालंदा में किताबें तीन महीने तक जली थीं और सोमनाथ के शिवलिंग को गजनी की मस्जिद की सीढ़ियों में गाड़ दिया गया ताकि रौंदा जा सके।

और जब यह आधा सच पकड़ा जाता है तो दूसरा औजार निकलता है - मिलावट। जो स्रोत में नहीं था वह जोड़ दिया। कहीं भी मंदिर को खजाना नहीं लिखा पर हबीब ने जोड़ा। कहीं गंगा-जमुनी तहजीब नहीं लिखी हबीब ने जोड़ी। अलबरूनी 1030 में किताब-उल-हिंद में हिन्दू को अलग पहचान लिख गया पर हबीब ने लिखा हिन्दू पहचान अंग्रेजों ने बनाई। 1857 के जिहाद वाले फतवे ब्रिटिश संग्रहालय में रखे हैं पर हबीब ने लिखा यह किसान विद्रोह था। धर्मसूत्र का आधा श्लोक उठा कर लिखा ब्राह्मण गोमांस खाते थे, अगली पंक्ति जिसमें गोहत्या को महापाप लिखा है छोड़ दी।

और जब कैंची और मिलावट दोनों पकड़ी जाएं तो तीसरा चेहरा आता है। 28 दिसंबर 2019 कन्नूर विश्वविद्यालय, 80वीं भारतीय इतिहास कांग्रेस का मंच। राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान मौलाना आजाद को उद्धृत कर रहे थे, हबीब उठा और कुर्सी छोड़ कर सीधे राज्यपाल की तरफ बढ़ आया, सहायक की कमीज फट गई, सुरक्षा गार्ड को आना पड़ा। राज्यपाल ने कहा वह सीधे मुझ पर हमला करने आया, यह काम सड़क के गुंडे का है।

किताब में जो काम कैंची करती थी मंच पर वही हाथ करने लगा।  मार्क्स की आड़ में मध्यकालीन मजहबी हुकूमत का वकील जो पहले फाइल से अपराध की धारा गायब करता है और जब न्यायाधीश पकड़ ले तो न्यायाधीश पर ही चढ़ जाता है।

यही पैटर्न है इन डिस्टोरियंस का जिसे वे पूरे भारत में लागू करने का स्वप्न देखते है।

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