Saturday, 24 October 2026

शिव प्रसाद

पाठकों की इच्छा से पुनः....
श्रावण मासीय शिव तत्व विमर्श के अन्तर्गत शिव निर्माल्य एवं नैवेद्य ग्रहण विमर्श....

शिव नैवेद्य के विषय में शिवपुराणादि शास्त्र- ग्रन्थों में विस्तार से निरूपण है; इसके पूर्व अनेक विशिष्ट पण्डित भी विचारकर इस विषय में शास्त्रीय सिद्धान्त प्रकाशित कर चुके हैं, तथापि इस समय कुछ लोग शास्त्रीय सिद्धान्त की अनभिज्ञता के कारण इस विषय में भ्रम में पड़े हुए हैं; इसलिये इस विषय में शास्त्रीय सिद्धांतों की यथावत जानकारी देना कर्तव्य समझता हूँ ।

शिवनैवेद्य-ग्रहण की प्रशंसा–

शिवपुराण-विद्येश्वरसंहिता के २२वें अध्याय में शिव- नैवेद्य की प्रशंसा स्पष्टरूप से लिखी है-

दृष्ट्वापि शिवनैवेद्यं यान्ति पापानि दूरतः । 
भुक्ते तु शिवनैवेद्ये पुण्यान्यायान्ति कोटिशः ॥ ४ ॥
अलं यागसहस्त्रेण ह्यलं यागार्बुदैरपि । 
भक्षिते शिवनैवेद्ये शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ ५ ॥
आगतं शिवनैवेद्यं गृहीत्वा शिरसा मुदा । 
भक्षणीयं प्रयत्नेन शिवस्मरणपूर्वकम् ॥ ७ ॥
न यस्य शिवनैवेद्यग्रहणेच्छा प्रजायते । 
स पापिष्ठो गरिष्ठः स्यान्नरकं यात्यपि ध्रुवम् ॥ ९। 
शिवदीक्षाऽन्वितो भक्तो महाप्रसादसंज्ञकम् । 
सर्वेषामपि लिङ्गानां नैवेद्यं भक्षयेच्छुभम् ॥११।।

श्लोकार्थ सहज हैं। इनमें शिवनैवेद्य-भक्षण की प्रशंसा तथा उसके त्याग की निन्दा है। शिवनैवेद्य-भक्षण करने से पाप नष्ट हो जाते हैं, पुण्य की प्राप्ति होती है। जिसकी शिवनैवेद्य के ग्रहण में इच्छा नहीं होती, वह महापापी नरक को प्राप्त होता है- यह इन वाक्यों का संक्षिप्त तात्पर्य है। जिनकी शिव-मन्त्र में दीक्षा हुई है, उन सबके लिये लिङ्ग का नैवेद्य भक्षण करने की विधि है। जिनकी अन्य देवता की दीक्षा है, उनके लिये निषेध कहा है। 

अन्यदीक्षायुतनृणां शिवभक्तिरताऽऽत्मनाम् । 
शृणुध्वं निर्णयं प्रीत्या शिवनैवेद्यभक्षणे ॥
शालग्रामोद्भवे लिङ्गे रसलिङ्गे तथा द्विजाः । 
पाषाणे राजते स्वर्णं सुरसिद्धप्रतिष्ठिते ॥ 
काश्मीरे स्फाटिके रात्ते ज्योतिर्लिङ्गेषु सर्वशः । 
चान्द्रायणसमं प्रोक्तं शम्भोर्नैवेद्यभक्षणम् ॥ 
ब्रह्महाऽपि शुचिर्भूत्वा निर्माल्यं यस्तु धारयेत् । 
भक्षयित्वा द्रुतं तस्य सर्वपापं प्रणश्यति ॥
      (शिवपुराण- विद्येश्वरसंहिता अध्याय २२/ १२-१५)

जिनकी अन्य देवता की दीक्षा है और श्रीशिव में भक्ति है- उनके लिये शिवनैवेद्य-भक्षण का यह निर्णय है-

जिस स्थान में शालग्रामशिला की उत्पत्ति होती है, वहाँ के उत्पन्न लिङ्ग में, पारद (पारा) के लिङ्ग में, पाषाण, रजत तथा स्वर्ण से निर्मित लिङ्ग में, देवता तथा सिद्धों के प्रतिष्ठित लिङ्ग में, केशर से निर्मित लिङ्ग में, स्फटिक-लिङ्ग में, रत्ननिर्मित लिङ्ग में, समस्त ज्योतिर्लिङ्गों में श्रीशिव का नैवेद्य- भक्षण चान्द्रायण-व्रत के समान पुण्यजनक है। ब्रह्महत्या करनेवाला पुरुष भी यदि पवित्र होकर शिवनिर्माल्य भक्षणकर उसे धारण करे तो उसका सारा पाप नष्ट हो जाता है।

इन वाक्यों से यह स्पष्ट है कि जिनकी शैवी दीक्षा नहीं है वे भी उपर्युक्त लिङ्गों के नैवेद्य का भक्षण कर सकते हैं, परन्तु #पार्थिवलिङ्ग प्रभृति के, अर्थात् जिनके नाम श्लोकों में नहीं आये हैं, नैवेद्य का भक्षण न करें। शैवी-दीक्षा वाले तो सभी लिङ्गों के नैवेद्य ग्रहण करें।

अब प्रश्न उठता है कि तब किस शिव निर्माल्य के निषेध का विचार शास्त्रों में है?

शिवनिर्माल्य की अग्राह्यता के प्रतिपादक वचन ये हैं-

अग्राह्य शिवनैवेद्यं पत्रं पुष्पं फलं जलम् । 
शालग्रमशिलासङ्गात् (स्पर्शात्) सर्वं याति पवित्रताम् ॥ (शिवपुराण-विद्येश्वरसंहिता २२ । १९)
अनर्हं मम नैवेद्यं पत्रं पुष्पं फलं जलम् । 
मह्यं निवेद्य सकलं कूप एवं विनिःक्षिपेत् ।।
                                 (पाद्ये शिवोक्तिः)
विसर्जितस्य देवस्य गन्धपुष्पनिवेदनम् । 
निर्माल्यं तद्विजानीयाद् वर्ज्यं वस्त्रविभूषणम् ।। 
अर्पयित्वा तु ते भूयश्चण्डेशाय निवेदयेत् ।
                                 (स्कान्दे सूतोक्तिः)
धराहिरण्यगोरत्नताम्ररौप्यांशुकादिकान्। 
विहाय शेषं निर्माल्यं चण्डेशाय निवेदयेत् ।।
( निर्णयसिन्धु में उद्धृत)

इन वाक्यों से यह सिद्ध होता है कि भूमि, वस्त्र, भूषण, स्वर्ण, रौप्य, ताम्र आदि छोड़कर श्रीशिव के चढ़े हुए पत्र, पुष्प, फल, जल-ये सब निर्माल्य अग्राह्य हैं, इन निर्माल्यों को चण्डेश्वर के प्रति निवेदन करना चाहिये । यद्यपि ये निर्माल्य स्वयं अग्राह्य हैं तथापि शालग्राम-शिला-स्पर्श से पवित्र - ग्रहण के योग्य हो जाते हैं ।

इन वचनोंसे यह स्पष्ट हो गया कि श्रीशिव के जो निर्माल्य या नैवेद्य चण्डेश्वर के भाग हैं, उनका ग्रहण निषिद्ध है; जो निर्माल्य या नैवेद्य चण्डेश्वर के भाग नहीं हैं, उनके ग्रहण में कोई दोष नहीं है उनको ग्रहण करना चाहिये । इसलिये शिवपुराण-विद्येश्वरसंहितामें स्पष्ट कहा है- जिनमें चण्ड का अधिकार है, मनुष्य उन निर्माल्यों या नैवेद्यों का भक्षण न करें-

चण्डाधिकारो यत्रास्ति तद्भोक्तव्यं न मानवैः ।
                                               (२२।१६)
यह भी उसी में कहा है कि जिनमें चण्ड का अधिकार नहीं है, उनका भक्तिपूर्वक भक्षण करना चाहिये-
चण्डाधिकारो नो यत्र भक्तिव्यं तच्च भक्तितः ।
             (शिवपुराण-विद्येश्वरसंहिता २२।१६)

शिवनिर्माल्य-निषेध का परिहार―

निम्नप्रकार के लिङ्गों में चण्डका अधिकार नहीं है, इसलिये इन लिङ्गों के निर्माल्य ग्राह्य तथा भक्ष्य हैं-

बाणलिङ्गे च लौहे च सिद्धलिङ्गे स्वयंभुवि । 
प्रतिमासु च सर्वासु न चण्डोऽधिकृतो भवेत् ॥
                     (शि० पु० वि० सं० २२ । १७)

बाणलिङ्ग (नर्मदेश्वर), लौह (स्वर्णादिधातुमय ) लिङ्ग, सिद्धलिङ्ग (जिन लिङ्गों की उपासना से किसी ने सिद्धि प्राप्त की है, या जो सिद्धों द्वारा प्रतिष्ठित हैं), स्वयम्भूलिङ्ग (केदारेश्वर प्रभृति) - इन लिङ्गों में तथा शिव की प्रतिमाओं (मूर्त्तियों) में चण्ड का अधिकार नहीं है।

लिङ्गे स्वायम्भुवे बाणे रत्नजे रसनिर्मिते । 
सिद्धप्रतिष्ठिते चैव न चण्डाधिकृतिर्भवेत् ।।
                         ( निर्णयसिन्धुमें उद्धृत)

इस वाक्य में 'रत्ननिर्मित तथा पारदनिर्मित लिङ्ग में भी चण्ड का अधिकार नहीं है' -- इतना अधिक कहा गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि इन शिवलिङ्गों का निर्माल्य या नैवेद्य ग्रहण करने में दोष नहीं।

शिवनिर्माल्य-निषेध की विशेष व्यवस्था–

पूर्वप्रदर्शित जिन लिङ्गों में चण्ड का अधिकार है उनके विषय में भी विशेष व्यवस्था है और वह इस-प्रकार है--

लिङ्गोपरि च यद् द्रव्यं तदग्राह्य मुनीश्वराः । 
सुपवित्रं च तज्ज्ञेयं यल्लिङ्गस्पर्शबाह्यतः ।।
                     (शि०पु०वि०सं० २२।२०)

जो वस्तु लिङ्ग के ऊपर रक्खी जाती है, वह अग्राह्य है। जो वस्तु लिङ्गस्पर्श से रहित है अर्थात् जिस वस्तु को अलग रखकर श्रीशिवजी को निवेदित किया जाता है लिङ्ग के ऊपर नहीं चढ़ाया जाता--यह अत्यन्त पवित्र है।

लिङ्गार्चनतन्त्र - द्वादशपटल में भी शिवलिङ्ग के ऊपर चढ़ायी हुई वस्तुओं को अग्राह्य बताया है--

यत्किञ्चिदुपचारं हि लिङ्गोपरि निवेदयेत् । 
तन्निर्माल्यं महेशानि अग्राह्य परमेश्वरि ।।

इन वाक्यों के साथ एकवाक्यता करने से पता लगता है कि जितने शिवनिर्माल्य के निषेध परक वाक्य हैं, सभी लिङ्ग के ऊपर चढ़ायी हुई वस्तुओं का निषेध करते हैं।

शिवनिर्माल्य की व्यवस्था का सारांश–

समस्त सामान्य वचनों के साथ विशेष वचनों की एकवाक्यता करने से यह सिद्ध होता है कि -

नर्मदेश्वर लिङ्ग, धातुमय लिङ्ग, रत्न-लिङ्ग, पुराणप्रसिद्ध लिङ्गों के ऊपर चढ़ाये हुए निर्माल्य का ग्रहण तथा भक्षण करना शास्त्रविधिसम्मत है। अन्य लिङ्गों के ऊपर चढ़ाये हुए नैवेद्य तथा निर्माल्यों का ग्रहण करना शास्त्रसम्मत नहीं है। शिवनिर्माल्य-ग्रहण तथा शिव-नैवेद्य-भक्षण के निमित्त जो प्रायश्चित्त शास्त्र में कहे गये हैं, वे भी इन निषिद्ध नैवेद्य तथा निर्माल्यों के विषय में ही हैं। जिन शिव-नैवेद्य तथा शिव- निर्माल्य का ग्रहण और भक्षण शास्त्रविधिसम्मत है, उनके ग्रहण तथा भक्षण के निमित्त प्रायश्चित्त नहीं हो सकता। निषिद्ध कर्मों के लिये शास्त्रों में प्रायश्चित्त कहे गये हैं, विहित कर्म करने से प्रायश्चित्त की प्राप्ति ही नहीं है। पापों को हटाने के लिये प्रायश्चित्त किया जाता है। विहित कर्म के अनुष्ठान से पाप नहीं होता, अपितु अविहित कर्म के अनुष्ठान, निषिद्ध कर्म के आचरण और इन्द्रियों का निग्रह न करने से पापों की उत्पत्ति होती है; उन्हीं पापों की शुद्धि के लिये शास्त्रों में प्रायश्चित्त का उपदेश किया गया है-

विहितस्याननुष्ठानान्निन्दितस्य च सेवनात् । अनिग्रहाच्चेन्द्रियाणां नरः पतनमृच्छति ॥
तस्मात्ते नेह कर्तव्यं प्रायश्चित्तं विशुद्धये । एवमस्यान्तरात्मा च लोकश्चैव प्रसीदति ॥
         ( याज्ञवल्क्यस्मृति ३ । २१९-२२०)

निर्णयसिन्धु तृतीय परिच्छेद पूर्वभाग में भी श्रीशिव निर्माल्य के विषय में इसी प्रकार व्यवस्था की है। नर्मदेश्वर- लिङ्ग, धातुमयलिङ्ग, रत्नलिङ्ग तथा स्वयम्भू और सिद्धलिङ्ग (जो पुराणप्रसिद्ध लिङ्ग हैं) इन लिङ्गों में चण्ड का अधिकार न होने से इनके ऊपर चढ़ाये हुए नैवेद्य तथा निर्माल्य सभी के भक्ष्य तथा ग्राह्य हैं, यह पहले कहा जा चुका है। जो वस्तुएँ शिवलिङ्ग पर चढ़ायी नहीं गयी हों, किन्तु किसी भी लिङ्ग को निवेदित की गयी हों, वे वस्तुएँ शैवी दीक्षा वाले मनुष्यों के लिये ग्राह्य हैं। जिन्हें शैवी दीक्षा नहीं है उनके लिये #पार्थिवलिङ्ग को निवेदित को छोड़कर और सभी लिङ्गों को निवेदित की हुई वस्तुएँ तथा शिवप्रतिमा को निवेदित किये हुए प्रसाद ग्राह्य हैं। जिन शिवनिर्माल्यों के लिये निषेध है, वे भी शालग्राम-शिला के संसर्ग से ग्राह्य हो जाते हैं, यह शास्त्रमर्यादा है।

शिवनिर्माल्य-धारण के प्रायश्चित्तका निर्णय–

'प्रायश्चित्तविवेक', 'तिथितत्त्व' तथा 'निर्णयसिन्धु' आदि ग्रन्थों में यह वचन उद्धृत है-

स्पृष्ट्वा रुद्रस्य निर्माल्यं सवासा(वाससा)आप्लुतः शुचिः ।

अर्थात् रुद्र के निर्माल्य को स्पर्श करनेक्षवाला पुरुष सचैल स्नान से शुद्ध होता है।

रघुनन्दन भट्टाचार्य ने तिथितत्त्व-शिवरात्रिप्रकरण में इस सामान्य वचन की अन्य विशेष वचन के साथ एकवाक्यता की है–

निर्माल्यं यो हि मद्भक्त्या शिरसा धारयिष्यति । अशुचिर्भिन्नमर्यादो नरः पापसमन्वितः ॥ 
नरके पच्यते घोरे तिर्यग्योनौ च जायते ॥
                                   ( स्कन्दपुराण)

इस वचन में जो अशुचि अवस्था में शिवनिर्माल्य को धारण करते हैं, उनके लिये पाप कहा है। इस वाक्य के अनुरोध से पूर्वप्रदर्शित सामान्य वाक्य भी अशुचिविषयक समझना चाहिये । इन दोनों वाक्यों को मिलाकर यह अभिप्राय निकलता है-

अशुचि-अवस्था में शिवनिर्माल्य को नहीं धारण करना चाहिये । जो अशुचि-अवस्था में शिवनिर्माल्य को धारण करता है वह पापी होता है; इस पाप की शुद्धि के लिये सचैलस्नान प्रायश्चित्त है।

स्नानादि से शुद्ध होकर शिवनिर्माल्य को धारण करने से ब्रह्महत्या जैसे पापतक नष्ट हो जाते हैं- यह शिवपुराण तथा स्कन्दपुराण के वाक्यों में कहा है-

ब्रह्महापि शुचिर्भूत्वा निर्माल्यं यस्तु धारयेत् । 
भक्षयित्वा द्रुतं तस्य सर्वपापं प्रणश्यति ॥ (विद्येश्वरसंहिता २२ । १५)
ब्रह्महापि शुचिर्भूत्वा निर्माल्यं यस्तु धारयेत् । 
तस्य पापं महच्छीत्रं नाशयिष्ये महाव्रते ॥ 
          (तिथितत्त्व में उद्धृत स्कन्दपुराण )

शिवनिर्माल्य-धारण की इस विधि के साथ अविरोध सम्पादन करने के लिये- इस विधि के अनुरोध से भी - पूर्वोक्त शिवनिर्माल्य-धारण का प्रायश्चित्त अशुचि के विषय में ही समझना उचित है।

शिवनिर्माल्य-विषयक अन्य वाक्यों की व्यवस्था

ऊपर शिव-निर्माल्य-ग्रहण के अनुकूल तथा प्रतिकूल शास्त्र-वाक्यों का तात्पर्य शास्त्रीय आप्तवचनों से निर्णय करके दिखाया गया है। इस विषय में इस प्रकार के जितने भी अन्य शास्त्र-वाक्य हैं, उन सभी के तात्पर्य का पूर्वप्रदर्शित मीमांसक- पद्धति से निर्णय करना शास्त्रमर्मज्ञ पुरुषों का कर्तव्य है। 

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