यदि आप वामपंथ को नहीं समझते तो आप कमल के सुगन्धित फूलों से भरे ऐसे तालाब में तैर रहे हैं, जिसकी तली में सैंकड़ों मगरमच्छ लेटे हैं।
अभी दो दिन पहले फिर इस तालाब की सतह पर हलचल हुई। जामिया की दीवारों पर लिख दिया गया 'फ़्री कश्मीर', 'फ़्री शरजील इमाम'। सीसीटीवी कैमरों के तार टूटे मिले। लिखने वाले हाथ अँधेरे में हैं पर जो भाषा उन दीवारों पर उतरी, वो उजाले में है। कुछ दिन पहले, जेएनयू में 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' गूँजा था। फिर शाहीन बाग़ आंदोलन के चेहरे, शरजील इमाम, ने 'चिकन नेक' जाम करके असम को भारत से काटने का भाषण दिया।
ये नारे अचानक नहीं उगे। इनकी जड़ों तक पहुँचने के लिए एक ऐसे आदमी को सुनना होगा, जिसने चार दशक से भी पहले ये दृश्य देख लिया था। भारत उससे ज़्यादा परिचित नहीं लेकिन उसकी कहानी का सबसे अहम हिस्सा दिल्ली में ही घटा.....
अमेरिका में उसने 'थॉमस शूमैन' के नाम से व्याख्यान दिया लेकिन उसका असली नाम था 'यूरी अलेक्ज़ेन्ड्रोविच बेज़मेनोव'। वो पहले सोवियत रिफ़ाइनरी परियोजना में अनुवादक बनकर भारत आया, फिर समाचार एजेंसी 'नोवोस्ती' से जुड़कर दिल्ली के सोवियत दूतावास में प्रेस अधिकारी बना। उसके ही शब्दों में, उसका काम था ''भारत में अराजकता से साम्यवाद का रास्ता बनाना।'' इसके लिए मंत्रियों, पत्रकारों, प्रोफ़ेसरों और साहित्यकारों को खरीदना, ब्लैकमेल करना और कठपुतली बनाना।
हिन्दी-उर्दू का माहिर बनाकर भेजे गए बेज़मेनोव के साथ एक भावुक-दुर्घटना घटी। उसे भारत की संस्कृति, आध्यात्म और भोले लोगों से 'प्यार' हो गया। उसकी आत्मा धिक्कारती कि इन्हें पता ही नहीं, इन निर्दोष लोगों के साथ 'क्या किया जा रहा है।' सायबेरिया के 'गुलाग' उसकी आँखों में तैरते। जहाँ लाखों बेगुनाहों को कम्युनिस्टों ने मौत के घाट उतार दिया....
भागना आसान नहीं था, क्योंकि भारत शरण नहीं देता था। उदाहरण सामने था, स्टालिन की बेटी स्वेतलाना। उसे भारतीय कम्युनिस्ट कुँवर ब्रजेश सिंह से प्रेम हुआ पर रूसी प्रधानमंत्री ने शादी की इजाज़त ठुकरा दी क्योंकि रूसी कम्युनिस्टों की नज़र में दूसरे देशों के कम्युनिस्ट ''बराबरी के साथी'' नहीं, बस 'यूज़फ़ुल ईडियट्स' थे। ब्रजेश सिंह की अस्थियाँ लेकर भारत आई स्वेतलाना यहीं रहना चाहती थी पर नहीं रह सकी। आख़िर एक शाम वो अमेरिकी दूतावास पहुँची और उसी रात चुपचाप रोम की उड़ान में निकल गई।
तीन साल बाद बेज़मेनोव एक दिन फ़िल्म देखने निकला और उसके बाद किसी को नहीं दिखा। विग और दाढ़ी लगाकर वो 'हिप्पी' बना, सैलानियों में घुलकर एथेंस पहुँचा और वहाँ से कनाडा निकल गया।
'यूज़फ़ुल ईडियट्स', यही शब्द इस कहानी का प्राण है। ये 'उपयोगी मूर्ख' कैसे दीमक बनकर अपने ही देश को कुतरते हैं, ये जानकर विस्मय, क्षोभ और करुणा के भाव, किसी भी हृदय को मुट्ठी में भींच डालेंगे। आगे बेज़मेनोव के शब्दों में...
''हम भारत को साम्यवादी बनाने आए थे, बिना युद्ध और टैंकों के। मैं एक भारतीय लड़की से विवाह करना चाहता था पर पार्टी का मेरे क्रोमोसोम्स और जींस पर कब्ज़ा था। 'इन्फ़ीरियर रेस' से विवाह की अनुमति नहीं थी।''
''नोवोस्ती का अर्थ है 'न्यूज़' लेकिन ये ख़ुफ़िया एजेंसी के प्रोपेगंडा का मुखौटा था। मुझे उन विदेशी स्टूडेंट्स से दोस्ती करनी थी, जिन्हें साम्यवाद 'सिखाकर' लौटाया जाता, ताकि वो अपने देश में 'राष्ट्रीय आन्दोलनों' के लीडर बनें, अपने ही देश को अस्थिर करें, अपने ही लोगों की हत्याएँ करें। फिर मीडिया इन हत्यारों को 'वामपंथी विद्रोही' और 'फ़्रीडम फ़ाइटर' लिखे और सुरक्षाबलों को 'डेथ स्क्वाड'।''
इस पंक्ति को पढ़िये और जामिया की दीवार देखिये। कश्मीर में जिनके हाथ हमारे जवानों के ख़ून से रँगे हैं, वो वामपंथियों के लिए 'आज़ादी के सिपाही' हैं और जो उन्हें रोकें, वो 'क़ाबिज़ सेना' है। जिस शब्दकोश का नुस्खा बेज़मेनोव ने बताया था, वो कैंपस की दीवारों पर बिना झिझक लिखा जा रहा है। उसने वो तस्वीरें भी दिखाईं, जिनमें वो भारतीय लेखकों और प्रतिनिधिमंडलों के साथ है, एक में 'Springtime Blossom for Mankind, Comrade Lenin' लिखने वाला भारतीय कवि भी हैं। बेज़मेनोव बताता है-
''मेरा काम रूस आने वाले मेहमानों को हलके नशे में रखना था क्योंकि उस नशे में साम्यवाद की हर चीज़ 'प्यारी' लगती है। वो बेचारा मूर्ख दस दिन शैम्पेन पीता, फिर अचानक शराब बंद। वो एक-एक बूँद को तड़पता और यही वो समय है जब दिमाग 'प्रोपेगंडा' के लिए सबसे लचीला होता है।'' उसने अपने व्याख्यान में कई असली फोटो दिखाए और उनके बारे में एक-एक कर बताया....
''इस फ़ोटो में 'दिल्ली विश्वविद्यालय' के राजनीति-विज्ञान के एक प्रोफ़ेसर हैं। वो कहता है-''हमें इनसे कोई सीक्रेट नहीं, इनके स्टूडेंट्स का 'दिमाग' चाहिए था। अब ये दशकों तक पढ़ाएँगे कि साम्यवाद से बेहतर कुछ नहीं और ये पीढ़ी लोगों को साम्यवाद के कारण मरते देखकर भी कहेगी, 'ये सब तो सी.आई.ए. का किया-धरा है।''
उस समय जो फ़सल बोई जा रही थी? उसके पौधे दशकों बाद जेएनयू के उस मंच पर लहलहाए, जहाँ 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' और 'अफ़ज़ल हम शर्मिंदा हैं' जैसे नारे गूँजे। बेज़मेनोव आगे बताता है-
''हमारा काम उन प्रभावशाली लोगों की लिस्ट बनाना था जो 'पब्लिक ओपिनियन' बदल सकते थे। हमसे सहमत को रिश्वत और सत्ता मिलती और विरोधी को क्रांति के दिन हत्या। वियतनाम के 'ह्यू' शहर को याद करो। कुछ हफ़्तों के कब्ज़े में ही हज़ारों लोग चुन-चुनकर मारे गए। सब हैरान थे कि इतने विरोधी लोगों की 'पहचान' इतनी जल्दी कैसे हुई? आपको नहीं पता पर मुझे पता है।''
'टेट' हमले में चार हफ़्ते के कब्ज़े के दौरान ह्यू शहर में हज़ारों लोग मारे गए क्योंकि उनकी सूचियाँ पहले से ही तैयार थीं।
''दिल्ली में मुझे ऐसी ही 'डेथ-लिस्ट' बनानी थी। तब लगा, क्या इन्हें बस इसलिए मारा जाएगा कि ये 'थोड़ा अधिक' बोलते हैं? मेरे पास कार, धन, पद, सत्ता सब था। सब छोड़कर फिर भी मैं निकला। पराजितों के पक्ष में खड़े होने के लिए।''
''सुनत्ज़ु ने कहा था, सर्वश्रेष्ठ युद्ध वो है जो बिना लड़े जीता जाए। ये युद्ध मैदानों में नहीं, दिमागों में लड़ा जाता है। जनता का दिमाग काबू कर लो तो हर सरकार वही करेगी जो तुम चाहो। वो तुम्हें परमाणु बम से नष्ट नहीं करना चाहते, ऐसा कर दिया तो कैडिलैक, कंप्यूटर और नीले जीन्स कहाँ से लाएँगे?''आगे बेज़मेनोव विचारधारा का रहस्य खोलता है-
''शुरुआत होगी 'समानता' से। पर क्या हम सब समान हैं? याद रखना, लोहे की गोलियाँ समान हो सकती हैं, लोग नहीं....लेकिन 'मीठे उदारवादी' संविधान दिखाएँगे और कहेंगे, 'ये शब्द तो हमारे संविधान में लिखा है।' लेकिन दोस्त! आपका संविधान तो मुझे पंद्रह साल की उम्र में ही पढ़ा दिया गया था। अगर मुझसे पूछो तो समानता का एक ही अर्थ है, 'अवसरों की समानता'। बाकी सबको तो ईश्वर भी समान नहीं बना सकता। क्या आपने कभी किसी को समानता की खोज में चीन या रूस का बॉर्डर पार करते देखा है?
बेज़मेनोव बताता है इसका समाधान क्या है? ''समाधान है....अपनी नैतिकता मत त्यागिये, धार्मिक रहिये, स्कूलों में प्रार्थना वापस लाइए, अपने ईश्वर को मत खोइए। ये सच है....आपका सिस्टम पूर्ण नहीं है पर ये कमियाँ उसके सामने कुछ नहीं जो साम्यवादी कम्बोडिया, रूस या वियतनाम में होता है। ये मानवता की स्वतंत्रता और न्याय की अंतिम आशा है। ये देश गया तो कोई उन्हें नहीं रोक पायेगा।''
यहीं बेज़मेनोव का वक्तव्य समाप्त होता है लेकिन उसकी चेतावनी नहीं। 'थॉमस शूमैन' के नाम से उसने तीन किताबें लिखीं, 'लव लेटर टू अमेरिका', 'ब्लैक इज़ ब्यूटीफुल, कम्यूनिज़्म इज़ नॉट' और 'वर्ल्ड थॉट पुलिस'। इनमें सबसे पतली मुश्किल से पचास-पचपन पन्नों की है पर उसका हर पन्ना उसी तालाब की तली का नक्शा है जिसका ज़िक्र शुरू में किया गया है....
ये बीते ज़माने की कहानी नहीं। अपने देश में नक्सली हिंसा में अब तक 3,600 से ज़्यादा सुरक्षाकर्मी और लगभग 13,700 नागरिक मारे गए। इस वक़्त फ़्रांस जल रहा है। स्कूलों से शुरू हुआ आंदोलन आगज़नी बना, लिमोज़ का लगभग डेढ़ सौ साल पुराना टाउन हॉल राख हो गया। जिसके मुख्य आरोपी को पुलिस सूत्रों ने 'धुर-वामपंथी' बताया है। पेरिस में कर्फ़्यू लगा, सरकार ने वामपंथी गुटों पर अराजकता भड़काने का आरोप लगाया है। इटली के तूरिन में वामपंथी अड्डा खाली कराने पर अराजकतावादियों ने सौ से अधिक पुलिसकर्मी घायल कर दिए। शुरुआत, हर जगह एक जायज़ शिकायत से ही होती है, जिसकी पीठ पर सवार होकर लूटपाट और आगजनी भीतर पहुँचती हैं।
बरसों पहले जो बीज बोए गए थे, उन्हें पुराने माली की ज़रूरत नहीं। अब नए माली उन्हें सींचते हैं। कभी बस्तर के जंगल में, कभी लिमोज़ के टाउन हॉल में, कभी जेएनयू के मंच पर, कभी जामिया की दीवार पर। यही बेज़मेनोव की चेतावनी का सबसे डरावना निचोड़ है-''एक बार दिमाग बदल दिया जाए तो फिर एजेंट की ज़रूरत नहीं रहती। मूर्ख खुद को 'क्रांतिकारी' समझकर वो काम मुफ़्त में करते हैं, जिसके लिए कभी शैम्पेन पिलानी पड़ती थी।''
इसलिए, प्रथम वाक्य याद रखना.....यदि आप वामपंथ को नहीं समझते तो आप कमल के सुगन्धित फूलों से भरे ऐसे तालाब में तैर रहे हैं, जिसकी तली में सैंकड़ों मगरमच्छ लेटे हैं। जामिया की दीवारें सावधान कर रही हैं..... तालाब में हलचल है लेकिन मगरमच्छ अब तली में नहीं, किनारे पर बैठे हैं जो धूर्त मुस्कराहट के साथ आपके नौनिहालों को आग के तालाब में.....तैराकी सिखा रहे हैं।
-कुमार पंकज
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