Monday, 26 October 2026

सदा न संग सहेलियाँ,

सदा न संग सहेलियाँ, सदा न राजा देश।
सदा न जुग में जीवणा, सदा न काला केश॥
सदा न फूलै केतकी, सदा न सावन होय।
सदा न विपदा रह सके, सदा न सुख भी होय॥
सदा न काहू की रही, गल प्रीतम की बांह।
ढलते ढलते ढल गई, तरवर की सी छाँह॥

 लोहे का जंग चोर का संग और बदचलन का रंग, इज्जत की धज्जियां उड़ा देते हैं।
 खारा पानी, कड़वे बोल-बोलने वाली रानी और ढलती जवानी, सुकून छीन लेते हैं। 
कायर का साथ, चुगलखोर की बात और बड़चलन से ताल्लुकात मुसीबत ही खड़ी करते हैं।
 कपटी भाई खोटी लुगाई और फटी रजाई नींद उड़ा देते हैं। उम्मीदों का बोझ, पैर की मोच और घटिया सोच कभी आगे नहीं बढ़ने देते।
 पुराना मर्ज औकात से बड़ा कर्ज और घुटने का दर्द चाल धीमी कर देते हैं।
 आँख में जाला, घर में साला और दिवार में आला खोखला कर देते हैं।
 सड़े हुए विचार, बिना break की कार और दगाबाज यार सिर्फ तबाही की तरफ ले जाते हैं।

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