अछूतों के गले में हांडी और कमर पर झाड़ू का सच?
यह दावा मुख्यतः डॉ. अंबेडकर की Annihilation of Caste नामक पुस्तक से है।
जिसमें अंबेडकर ने पेशवा काल में पुणे में अछूतों के गले में मिट्टी का बर्तन (थूकने के लिए) और कमर में झाड़ू बांधने का जिक्र किया।
पेशवा अभिलेखों (दफ्तर व डायरियों) में इसका कोई प्राथमिक लिखित प्रमाण नहीं मिला।
पांच जून सन 1936 को प्रख्यात पत्रकार एनसी केलकर ने अंबेडकर को जब अपने लिखे को साबित करने की चुनौती दी तो अंबेडकर ने स्वीकारा किया, "..मेरे पास दस्तावेजी सबूत नहीं, मेरा दावा मौखिक परंपरा पर टिका हुआ है।"
केलकर ने अंबेडकर से सबूत मौखिक नहीं, बल्कि #केसरी अखबार में लेख लिखकर मांगा था।
कथित बौद्धिकों को जब ललकारना चाहिए था तब आपराधिक खामोशी अख्तियार किए हुए बैठा रहा। हमारी हार! हमारी गुलामी की कोई एक वजह तो है नहीं। हजार वजहें हैं।
सबसे बड़ी वजह है, हिंदुओं के अतीत को गन्दला कर हिन्दू चेतना और आत्मसम्मान को असहाय बना दिया। हमने कब हिन्दू होने के आत्मसम्मान का संघर्ष किया?
मूल प्रश्न आज भी कायम है!!
हमने कब हिंदू होने के आत्मसम्मान का संघर्ष किया!!!!
हमने अपनी अस्मिता से हर जगह संघर्ष के बजाय समझौते का रूख क्यों किया!!
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