रथस्थं वामनं दृष्ट्वा, पुनर्जन्म न विद्यते॥
१८९० के दो कोषों 'शब्द कल्पद्रुम' तथा 'वाचस्पत्यम्' के अनुसार यह स्कन्द पुराण के उत्कल खण्ड में था। बाद के संस्करणों में इसे निकाय दिया।
गो तथा गोविन्द यज्ञ रूप है, जिससे दिन, मास, वर्ष के चक्र में उत्पादन होता है। समय का चक्र दोलन है।
मधु-कैटभ को मारने वाले मधुसूदन हैं। मधु-कैटभ के मेद से पृथ्वी बनी, अतः इसे मेदिनी कहते हैं। पृथ्वी रूपी मञ्च पर मधुसूदन का स्मरण करें।
हमारा शरीर ही रथ है, जिसमें वामन रूप आत्मा है। इस आत्मा के दर्शन से पुनर्जन्म नहीं होता, मोक्ष मिलता है।
इसी भाव से महाकवि विद्यापति ने प्रसिद्ध गीत लिखा था, जिसकी प्रथम तथा अन्तिम पंक्ति पर ध्यान दें-
पिया (जगन्नाथ, आत्मा) मोरे बालक, हम तरुणी गे।
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धैरज धये रहु, मिलत मुरारी।
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