Saturday, 24 October 2026

गोरोचन

गोरोचन का महत्त्व और उपाय 
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गोरोचन आज के जमाने में एक दुर्लभ वस्तु हो गई है. गोरोचन गाय के शरीर से प्राप्त होता है. कुछ विद्वान का मत है कि यह गाय के मस्तक में पाया जाता है, किंतु वस्तुतः इसका नाम ‘गोपित्त’ है, यानी कि गाय का पित्त. हल्की लालिमायुक्त पीले रंग का यह एक अति सुगंधित पदार्थ है, जो मोम की तरह जमा हुआ सा होता है. अनेक औषधियों में इसका प्रयोग होता है. यंत्र लेखन, तंत्र साधना तथा सामान्य पूजा में भी अष्टगंध-चंदन निर्माण में गोरोचन की अहम भूमिका है।

गोरोचन का नियमित तिलक लगाने से समस्त ग्रहदोष नष्ट होते है। आध्यात्मिक साधनाओं के लिए गारोचन बहुत लाभदायी है।

कहते यह भी हैं कि गोरोचन ( गाय की नाभि से निकलता है हैं, जिसका शुद्ध नाम है. (गौ पित्त)  आज कल बाजार मॆ दस बीस रुपये मॆ नकली गोरोचन बहुत बिक रहा है , असली गोरोचन से हम लोग बहुत दूर होते है ,गोरोचन गाय के अंदर बहुत ही कम मात्रा में होता है, इसका रंग हल्का स्लेटी कलर मॆ कुछ मटमेले रंग जैसा होता है और यह गोल तिकोने अथवा छोटे छोटे दाने के आकार का होता है , लोग इसे इस्तेमाल करने के लिए इसका पाउडर भी बना लेते हैं।

तांत्रिक लोग इसे विशेष कर दूसरो को वशीकरण अथवा सम्मोहन के लिये इस्तेमाल करते है, आइये जानते हैं

गोरोचन के विशेष लाभ 
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गोरोचन का प्रयोग अधिकाँश वशीकरण व सम्मोहन के लिये तिलक के रूप में बहुत ज्यादा उपयोग किया जाता है। सिध्द गोरोचन से तिलक करने से इष्टदेव की कृपा होती है और पितृ दोष समाप्त होता है और देव कृपा बनी रहती है। 

👉 सवा दो ग्राम शुद्ध गोरोचन और सवा दो ग्राम काली गंधक को पीले रेशमी कपड़े में बाँधकर लाभ के चौघडिया मे शुक्रवार के दिन चाँदी डिब्बी में गल्ले अथवा तिजोरी में रखने से व्यापार अपूर्व तेजी से चलने लगता है।

👉 शुद्ध गोरोचन पीले कपड़े में बाँधकर अपने पास रखने से सम्मोहन शक्ति बढ़ती है और निरंतर धन का आवागमन होता रहता है और कर्ज से मुक्ति मिलती है।

👉 पूर्णमासी के दिन सिध्द गोरोचन को पीस कर चन्दन और केसर मिलाकर तिलक करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर हो होती है,और गजब की सम्मोहन शक्ति बढ़ती है ।

👉 यदि व्यर्थ ही समाज के लोग आपसे नफरत करते है और आपको हानि पहुँचाना चहाते है आपके सभी काम धंधो मे रुकावटे पेदा करते है तो आप पूर्णमासी के दिन सवा दो ग्राम गोरोचन और 1 ग्राम काली सल्फर और ग्राम कामिया सिंदूर तीनो को बारीक पीसकर किसी भी सम्मोहन मंत्र से अभिमंत्रित करके अपने मस्तक पर तिलक लगाये फिर देखो वही समाज आपका कितना सम्मान करता है ये तिलक सेल्समैन और बड़े उध्योग पतियो के लिये बहुत ही लाभदायक है ।

👉 शुद्ध गोरोचन कस्तूरी और काली गंधक को किसी किसी रेशमी रूमाल में बाँधकर अपने पास रखने से गजब की आकर्षण शक्ति बढ़ती है दुश्मन भी सर झुकाकर चलता है और व्यापार में वृध्दि होती है. 

👉 यदि बार बार किसी के रिश्ते मे रुकावटे आती है शादी नहीं हो रही है तो शुक्ल पक्ष मे गुरुवार को सवा दो ग्राम गोरोचन किसी पीले कपड़े मे या चाँदी के ताबीज मे शुभ या लाभ के चौघडिया मे सीधी बाजू अथवा गले मे धारण कराये तो 6 महीने रिश्ता पक्का हो जायेगा ।

👉 यदि कोई लड़का लड़का लड़की एक दूसरे प्रेम करते है और शादी करना चहाते मगर किसी कारण से आपसी बात नही बन पा रही है तो सवा दो ग्राम गोरोचन और एक ग्राम ब्लेक सल्फर दोनो को पूर्णमासी के दिन किसी सम्मोहन मंत्र से अभिमंत्रित करके बारीक पीसकर आधा चाँदी के ताबीज भरके गले मे धारण करे और शेष बचे हुये पाउडर से मस्तक पर तिलक करे और शुक्रवार बुधवार पूर्णमासी को अवश्य मिलते रहे तो कुछ ही समय मे दोनो एक दूसरे के जीवन साथी बन जाते है ।

👉 सवा दो ग्राम शुद्ध गोरोचन और सवा ग्राम केशर को पीस कर पूर्णमासी के दिन वशीकरण मंत्र से अभिमँत्रित कर आधा चूर्ण चाँदी के ताबीज में धारण करने से अथवा तिलक करने से जबर्दस्त वशीकरण होता है ।

👉यदि बार बार आपकी नौकरी मे रुकावट आ रही हो बार बार इंटरव्यू मे फेल हो रहे तो सवा ग्राम गोरोचन पीले रेशमी कपड़े मे गुरुवार को सूर्योदय के वक्त अपनी सीधी भुजा पर बाँधे सुबह सुबह शाम 15 /15 बूँद गोरोचन कल्प आधा कप पानी मे डालकर पिये 6 महीने मे सभी समस्याये समाप्त हो जायेगी ।

👉 अगर आपका व्यापार कुछ दिन चलने के बाद स्वतः बंद हो जाता है या व्यापार में कम चलता है अन्य कोई बाधा आ रही है तो आप पूर्णमासी के दिन शुद्ध गोरोचन किसी सम्मोहन मंत्र से अभिमंत्रित करके तिलक करते हैं,तो आपका व्यापार मॆ बहुत ही तेजी के साथ प्रगति होती है । 

👉 यदि कोई शत्रु अनावश्यक परेशान करता है सवा ग्राम शुद्ध गोरोचन एक ग्राम ब्लेक सल्फर शत्रु की फोटो के साथ शनिवार को रात्रि 9 बजे पीपल की जड़ के नीचे दवादे कुछ ही समय में शत्रुता स्वयं समाप्त हो जायेगीं ।

👉 अगर आप किसी भूत प्रेत की बाधा से परेशान हैं तो आप दुर्गा शप्तशती के सिध्द मंत्र - सर्वबाधा विनिर्मुक्तौ — से शुद्ध गोरोचन को अभिमंत्रित कर किसी ताबीज मॆ डालकर अपने गले मॆ धारण करे तो निशिचित रूप से सभी ब्याधियो का नाश हो जाता है । सुबह शाम 15 / 15 बूंद गोरोचन कल्प आधा कप पानी डालकर पिलाये 24 घंटे लाभ दिखाना शुरू हो जायेंगा ।

👉 यदि घर परिवार मे कोई व्यक्ति बार बार बीमार पड़ जाता है काफी इलाज कराने पर भी बीमारी पीछा नही छोड़ती है सवा दो ग्राम शुद्ध गोरोचन चाँदी या स्वर्ण के ताबीज मे शुक्रवार शुक्ल पक्ष मंगल बार को अमृत के चौघडिया मे रोगी के गले मे धारण कराये धीरे धीरे रोग स्वत चला जायेगा ।

👉 अगर बार बार आपको व्यापार मे हानि हो रही है तो पूर्णमासी के दिन सवा दो ग्राम गोरोचन और सवा दो ग्राम लाभ के चौघडिया मे अपने गल्ले के अंदर रखे ।

👉 इससे धीरे धीरे आपका व्यापार बहुत तेजी के साथ गतिमान हो जायेगा. अगर घर मॆ पति पत्नी के बीच बहुत ज्यादा ग्रह क्लेश रहता है तो दोनो किसी सिध्द वशीकरण करण मंत्र से गोरोचन को अभिमंत्रित कर इसका तिलक करे तो धीरे धीरे गृह क्लेश समाप्त हो जाता है यदि ग्रह क्लेश ज्यादा है सुबह शाम 15 / 15 बूंद गोरोचन कल्प आधा कप पानी डालकर पिलाये 24 घंटे लाभ दिखाना शुरू हो जायेंगा ।

👉 सिध्द गोरोचन का प्रयोग आप तिलक के रूप मे करने हजारो समस्याओ को हल कर देता है इससे गजब की सम्मोहन शक्ति बढ़ती है ।

👉 अगर कोर्ट कचहरी मे पति पत्नी के बीच तलाक का केस चल रहा है और आप नही चहाते कि दोनो के बीच मे तलाक हो तो आप सवा दो ग्राम गोरोचन 1 ग्राम काला सल्फर और 1 कामिया सिंदूर तीनो को पूर्णमासी के दिन बारीक पीसकर तिलक बनाले और किसी भी सिध्द सम्मोहन मंत्र से अभिमंत्रित करके कोर्ट जाते वक्त तिलक लगाये निश्चित रूप से तलाक रुक जायेगा अगर कामिया सिंदूर उपलब्ध ना हो तो काला सल्फर और गोरोचन भी काफी लाभदायक होता है ।

👉 यदि आपकी गाड़ी का बार बार एक्सीडेंट होता है या गाड़ी ठीक से नही चलती है तो शुक्ल पक्ष मंगल बार को सवा दो ग्राम गोरोचन किसी लाल रेशमी रूमाल लाभ के चौघडिया चर लग्न मे गाड़ी के अंदर रखे इससे ना तो कभी गाड़ी का एक्सीडेंट होगा और ना वह गाड़ी कभी आपको हानि पहुँचायेगी । 

👉 अगर निरंतर व्यापार मे घाटा हो रहा हो तो पूर्णमा के सवा दो ग्राम गोरोचन और सवा ग्राम ब्लेक सल्फर लेकर 31बार श्री शूक्त के द्वारा अभिमंत्रित करके किसी लाल या पीले रेशमी रूमाल मे बाँधकर गुरुवार को गल्ले मे तो व्यापार मे बहुत प्रगति होती है और बँधा हुआ व्यापार भी खुल जाता है ।

👉 अगर कोई व्यक्ति घर से रूठ कर भाग गया हो तो आपके किसी बगैर धुले कपड़े सवा ग्राम गोरोचन गुरुवार को रखकर किसी भारी भारी पत्थर के नीचे दवा दे वह व्यक्ति अगर जिंदा है तो बहुत जल्दी घर वापस आ जायेगा ।

👉 अगर परिवार मे कोई व्यक्ति अकारण ही क्लेश करता है मारपीट तोड़ फोड़ करता है बात बात पर गुस्सा करता है गाली ग्लौज करता है जिससे घर परिवार मे कोई बड़ा हादसा होंने कि उम्मीद बनी रहती है तो ऐसे व्यक्ति को आप गोरोचन कल्प की 15/15 बूँद सुबह शाम आधा कप पानी डालकर खाली पेट दे आप 24 घँटे मे उस व्यक्ति के जबर्दस्त परिवर्तन देखेगे ।

👉 यदि बच्चे का पढ़ाई में मन नहीं खेल कूद में लगा रहता है सवा ग्राम शुद्ध गोरोचन शुक्ल पक्ष में सोमवार के दिन चाँदी के ताबीज में उसके गले में धारण कराये यदि बच्चा ज्यादा ही मंद बुध्दि है तो आप उसे गोरोचन कल्प की 10 /10 बूँद सुबह शाम आधा कप पानी डालकर खाली पेट दे आप 24 घँटे मे उस व्यक्ति के जबर्दस्त परिवर्तन देखेगे ।

👉 यदि बार बार कोई व्यक्ति घर में झगड़ा या मारपीट करता है उसे सुबह शाम 15 / 15 बूंद गोरोचन कल्प आधा कप पानी में दे और 24 घंटे में चमत्कारी प्रभाव देखें ।

कोई भी प्रयोग करने से पूर्व संबंधित विद्वान से संपर्क अवश्य करे ।
।। जय माँ शारदे ।।
साभार पं देवशर्मा
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शिव प्रसाद

पाठकों की इच्छा से पुनः....
श्रावण मासीय शिव तत्व विमर्श के अन्तर्गत शिव निर्माल्य एवं नैवेद्य ग्रहण विमर्श....

शिव नैवेद्य के विषय में शिवपुराणादि शास्त्र- ग्रन्थों में विस्तार से निरूपण है; इसके पूर्व अनेक विशिष्ट पण्डित भी विचारकर इस विषय में शास्त्रीय सिद्धान्त प्रकाशित कर चुके हैं, तथापि इस समय कुछ लोग शास्त्रीय सिद्धान्त की अनभिज्ञता के कारण इस विषय में भ्रम में पड़े हुए हैं; इसलिये इस विषय में शास्त्रीय सिद्धांतों की यथावत जानकारी देना कर्तव्य समझता हूँ ।

शिवनैवेद्य-ग्रहण की प्रशंसा–

शिवपुराण-विद्येश्वरसंहिता के २२वें अध्याय में शिव- नैवेद्य की प्रशंसा स्पष्टरूप से लिखी है-

दृष्ट्वापि शिवनैवेद्यं यान्ति पापानि दूरतः । 
भुक्ते तु शिवनैवेद्ये पुण्यान्यायान्ति कोटिशः ॥ ४ ॥
अलं यागसहस्त्रेण ह्यलं यागार्बुदैरपि । 
भक्षिते शिवनैवेद्ये शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ ५ ॥
आगतं शिवनैवेद्यं गृहीत्वा शिरसा मुदा । 
भक्षणीयं प्रयत्नेन शिवस्मरणपूर्वकम् ॥ ७ ॥
न यस्य शिवनैवेद्यग्रहणेच्छा प्रजायते । 
स पापिष्ठो गरिष्ठः स्यान्नरकं यात्यपि ध्रुवम् ॥ ९। 
शिवदीक्षाऽन्वितो भक्तो महाप्रसादसंज्ञकम् । 
सर्वेषामपि लिङ्गानां नैवेद्यं भक्षयेच्छुभम् ॥११।।

श्लोकार्थ सहज हैं। इनमें शिवनैवेद्य-भक्षण की प्रशंसा तथा उसके त्याग की निन्दा है। शिवनैवेद्य-भक्षण करने से पाप नष्ट हो जाते हैं, पुण्य की प्राप्ति होती है। जिसकी शिवनैवेद्य के ग्रहण में इच्छा नहीं होती, वह महापापी नरक को प्राप्त होता है- यह इन वाक्यों का संक्षिप्त तात्पर्य है। जिनकी शिव-मन्त्र में दीक्षा हुई है, उन सबके लिये लिङ्ग का नैवेद्य भक्षण करने की विधि है। जिनकी अन्य देवता की दीक्षा है, उनके लिये निषेध कहा है। 

अन्यदीक्षायुतनृणां शिवभक्तिरताऽऽत्मनाम् । 
शृणुध्वं निर्णयं प्रीत्या शिवनैवेद्यभक्षणे ॥
शालग्रामोद्भवे लिङ्गे रसलिङ्गे तथा द्विजाः । 
पाषाणे राजते स्वर्णं सुरसिद्धप्रतिष्ठिते ॥ 
काश्मीरे स्फाटिके रात्ते ज्योतिर्लिङ्गेषु सर्वशः । 
चान्द्रायणसमं प्रोक्तं शम्भोर्नैवेद्यभक्षणम् ॥ 
ब्रह्महाऽपि शुचिर्भूत्वा निर्माल्यं यस्तु धारयेत् । 
भक्षयित्वा द्रुतं तस्य सर्वपापं प्रणश्यति ॥
      (शिवपुराण- विद्येश्वरसंहिता अध्याय २२/ १२-१५)

जिनकी अन्य देवता की दीक्षा है और श्रीशिव में भक्ति है- उनके लिये शिवनैवेद्य-भक्षण का यह निर्णय है-

जिस स्थान में शालग्रामशिला की उत्पत्ति होती है, वहाँ के उत्पन्न लिङ्ग में, पारद (पारा) के लिङ्ग में, पाषाण, रजत तथा स्वर्ण से निर्मित लिङ्ग में, देवता तथा सिद्धों के प्रतिष्ठित लिङ्ग में, केशर से निर्मित लिङ्ग में, स्फटिक-लिङ्ग में, रत्ननिर्मित लिङ्ग में, समस्त ज्योतिर्लिङ्गों में श्रीशिव का नैवेद्य- भक्षण चान्द्रायण-व्रत के समान पुण्यजनक है। ब्रह्महत्या करनेवाला पुरुष भी यदि पवित्र होकर शिवनिर्माल्य भक्षणकर उसे धारण करे तो उसका सारा पाप नष्ट हो जाता है।

इन वाक्यों से यह स्पष्ट है कि जिनकी शैवी दीक्षा नहीं है वे भी उपर्युक्त लिङ्गों के नैवेद्य का भक्षण कर सकते हैं, परन्तु #पार्थिवलिङ्ग प्रभृति के, अर्थात् जिनके नाम श्लोकों में नहीं आये हैं, नैवेद्य का भक्षण न करें। शैवी-दीक्षा वाले तो सभी लिङ्गों के नैवेद्य ग्रहण करें।

अब प्रश्न उठता है कि तब किस शिव निर्माल्य के निषेध का विचार शास्त्रों में है?

शिवनिर्माल्य की अग्राह्यता के प्रतिपादक वचन ये हैं-

अग्राह्य शिवनैवेद्यं पत्रं पुष्पं फलं जलम् । 
शालग्रमशिलासङ्गात् (स्पर्शात्) सर्वं याति पवित्रताम् ॥ (शिवपुराण-विद्येश्वरसंहिता २२ । १९)
अनर्हं मम नैवेद्यं पत्रं पुष्पं फलं जलम् । 
मह्यं निवेद्य सकलं कूप एवं विनिःक्षिपेत् ।।
                                 (पाद्ये शिवोक्तिः)
विसर्जितस्य देवस्य गन्धपुष्पनिवेदनम् । 
निर्माल्यं तद्विजानीयाद् वर्ज्यं वस्त्रविभूषणम् ।। 
अर्पयित्वा तु ते भूयश्चण्डेशाय निवेदयेत् ।
                                 (स्कान्दे सूतोक्तिः)
धराहिरण्यगोरत्नताम्ररौप्यांशुकादिकान्। 
विहाय शेषं निर्माल्यं चण्डेशाय निवेदयेत् ।।
( निर्णयसिन्धु में उद्धृत)

इन वाक्यों से यह सिद्ध होता है कि भूमि, वस्त्र, भूषण, स्वर्ण, रौप्य, ताम्र आदि छोड़कर श्रीशिव के चढ़े हुए पत्र, पुष्प, फल, जल-ये सब निर्माल्य अग्राह्य हैं, इन निर्माल्यों को चण्डेश्वर के प्रति निवेदन करना चाहिये । यद्यपि ये निर्माल्य स्वयं अग्राह्य हैं तथापि शालग्राम-शिला-स्पर्श से पवित्र - ग्रहण के योग्य हो जाते हैं ।

इन वचनोंसे यह स्पष्ट हो गया कि श्रीशिव के जो निर्माल्य या नैवेद्य चण्डेश्वर के भाग हैं, उनका ग्रहण निषिद्ध है; जो निर्माल्य या नैवेद्य चण्डेश्वर के भाग नहीं हैं, उनके ग्रहण में कोई दोष नहीं है उनको ग्रहण करना चाहिये । इसलिये शिवपुराण-विद्येश्वरसंहितामें स्पष्ट कहा है- जिनमें चण्ड का अधिकार है, मनुष्य उन निर्माल्यों या नैवेद्यों का भक्षण न करें-

चण्डाधिकारो यत्रास्ति तद्भोक्तव्यं न मानवैः ।
                                               (२२।१६)
यह भी उसी में कहा है कि जिनमें चण्ड का अधिकार नहीं है, उनका भक्तिपूर्वक भक्षण करना चाहिये-
चण्डाधिकारो नो यत्र भक्तिव्यं तच्च भक्तितः ।
             (शिवपुराण-विद्येश्वरसंहिता २२।१६)

शिवनिर्माल्य-निषेध का परिहार―

निम्नप्रकार के लिङ्गों में चण्डका अधिकार नहीं है, इसलिये इन लिङ्गों के निर्माल्य ग्राह्य तथा भक्ष्य हैं-

बाणलिङ्गे च लौहे च सिद्धलिङ्गे स्वयंभुवि । 
प्रतिमासु च सर्वासु न चण्डोऽधिकृतो भवेत् ॥
                     (शि० पु० वि० सं० २२ । १७)

बाणलिङ्ग (नर्मदेश्वर), लौह (स्वर्णादिधातुमय ) लिङ्ग, सिद्धलिङ्ग (जिन लिङ्गों की उपासना से किसी ने सिद्धि प्राप्त की है, या जो सिद्धों द्वारा प्रतिष्ठित हैं), स्वयम्भूलिङ्ग (केदारेश्वर प्रभृति) - इन लिङ्गों में तथा शिव की प्रतिमाओं (मूर्त्तियों) में चण्ड का अधिकार नहीं है।

लिङ्गे स्वायम्भुवे बाणे रत्नजे रसनिर्मिते । 
सिद्धप्रतिष्ठिते चैव न चण्डाधिकृतिर्भवेत् ।।
                         ( निर्णयसिन्धुमें उद्धृत)

इस वाक्य में 'रत्ननिर्मित तथा पारदनिर्मित लिङ्ग में भी चण्ड का अधिकार नहीं है' -- इतना अधिक कहा गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि इन शिवलिङ्गों का निर्माल्य या नैवेद्य ग्रहण करने में दोष नहीं।

शिवनिर्माल्य-निषेध की विशेष व्यवस्था–

पूर्वप्रदर्शित जिन लिङ्गों में चण्ड का अधिकार है उनके विषय में भी विशेष व्यवस्था है और वह इस-प्रकार है--

लिङ्गोपरि च यद् द्रव्यं तदग्राह्य मुनीश्वराः । 
सुपवित्रं च तज्ज्ञेयं यल्लिङ्गस्पर्शबाह्यतः ।।
                     (शि०पु०वि०सं० २२।२०)

जो वस्तु लिङ्ग के ऊपर रक्खी जाती है, वह अग्राह्य है। जो वस्तु लिङ्गस्पर्श से रहित है अर्थात् जिस वस्तु को अलग रखकर श्रीशिवजी को निवेदित किया जाता है लिङ्ग के ऊपर नहीं चढ़ाया जाता--यह अत्यन्त पवित्र है।

लिङ्गार्चनतन्त्र - द्वादशपटल में भी शिवलिङ्ग के ऊपर चढ़ायी हुई वस्तुओं को अग्राह्य बताया है--

यत्किञ्चिदुपचारं हि लिङ्गोपरि निवेदयेत् । 
तन्निर्माल्यं महेशानि अग्राह्य परमेश्वरि ।।

इन वाक्यों के साथ एकवाक्यता करने से पता लगता है कि जितने शिवनिर्माल्य के निषेध परक वाक्य हैं, सभी लिङ्ग के ऊपर चढ़ायी हुई वस्तुओं का निषेध करते हैं।

शिवनिर्माल्य की व्यवस्था का सारांश–

समस्त सामान्य वचनों के साथ विशेष वचनों की एकवाक्यता करने से यह सिद्ध होता है कि -

नर्मदेश्वर लिङ्ग, धातुमय लिङ्ग, रत्न-लिङ्ग, पुराणप्रसिद्ध लिङ्गों के ऊपर चढ़ाये हुए निर्माल्य का ग्रहण तथा भक्षण करना शास्त्रविधिसम्मत है। अन्य लिङ्गों के ऊपर चढ़ाये हुए नैवेद्य तथा निर्माल्यों का ग्रहण करना शास्त्रसम्मत नहीं है। शिवनिर्माल्य-ग्रहण तथा शिव-नैवेद्य-भक्षण के निमित्त जो प्रायश्चित्त शास्त्र में कहे गये हैं, वे भी इन निषिद्ध नैवेद्य तथा निर्माल्यों के विषय में ही हैं। जिन शिव-नैवेद्य तथा शिव- निर्माल्य का ग्रहण और भक्षण शास्त्रविधिसम्मत है, उनके ग्रहण तथा भक्षण के निमित्त प्रायश्चित्त नहीं हो सकता। निषिद्ध कर्मों के लिये शास्त्रों में प्रायश्चित्त कहे गये हैं, विहित कर्म करने से प्रायश्चित्त की प्राप्ति ही नहीं है। पापों को हटाने के लिये प्रायश्चित्त किया जाता है। विहित कर्म के अनुष्ठान से पाप नहीं होता, अपितु अविहित कर्म के अनुष्ठान, निषिद्ध कर्म के आचरण और इन्द्रियों का निग्रह न करने से पापों की उत्पत्ति होती है; उन्हीं पापों की शुद्धि के लिये शास्त्रों में प्रायश्चित्त का उपदेश किया गया है-

विहितस्याननुष्ठानान्निन्दितस्य च सेवनात् । अनिग्रहाच्चेन्द्रियाणां नरः पतनमृच्छति ॥
तस्मात्ते नेह कर्तव्यं प्रायश्चित्तं विशुद्धये । एवमस्यान्तरात्मा च लोकश्चैव प्रसीदति ॥
         ( याज्ञवल्क्यस्मृति ३ । २१९-२२०)

निर्णयसिन्धु तृतीय परिच्छेद पूर्वभाग में भी श्रीशिव निर्माल्य के विषय में इसी प्रकार व्यवस्था की है। नर्मदेश्वर- लिङ्ग, धातुमयलिङ्ग, रत्नलिङ्ग तथा स्वयम्भू और सिद्धलिङ्ग (जो पुराणप्रसिद्ध लिङ्ग हैं) इन लिङ्गों में चण्ड का अधिकार न होने से इनके ऊपर चढ़ाये हुए नैवेद्य तथा निर्माल्य सभी के भक्ष्य तथा ग्राह्य हैं, यह पहले कहा जा चुका है। जो वस्तुएँ शिवलिङ्ग पर चढ़ायी नहीं गयी हों, किन्तु किसी भी लिङ्ग को निवेदित की गयी हों, वे वस्तुएँ शैवी दीक्षा वाले मनुष्यों के लिये ग्राह्य हैं। जिन्हें शैवी दीक्षा नहीं है उनके लिये #पार्थिवलिङ्ग को निवेदित को छोड़कर और सभी लिङ्गों को निवेदित की हुई वस्तुएँ तथा शिवप्रतिमा को निवेदित किये हुए प्रसाद ग्राह्य हैं। जिन शिवनिर्माल्यों के लिये निषेध है, वे भी शालग्राम-शिला के संसर्ग से ग्राह्य हो जाते हैं, यह शास्त्रमर्यादा है।

शिवनिर्माल्य-धारण के प्रायश्चित्तका निर्णय–

'प्रायश्चित्तविवेक', 'तिथितत्त्व' तथा 'निर्णयसिन्धु' आदि ग्रन्थों में यह वचन उद्धृत है-

स्पृष्ट्वा रुद्रस्य निर्माल्यं सवासा(वाससा)आप्लुतः शुचिः ।

अर्थात् रुद्र के निर्माल्य को स्पर्श करनेक्षवाला पुरुष सचैल स्नान से शुद्ध होता है।

रघुनन्दन भट्टाचार्य ने तिथितत्त्व-शिवरात्रिप्रकरण में इस सामान्य वचन की अन्य विशेष वचन के साथ एकवाक्यता की है–

निर्माल्यं यो हि मद्भक्त्या शिरसा धारयिष्यति । अशुचिर्भिन्नमर्यादो नरः पापसमन्वितः ॥ 
नरके पच्यते घोरे तिर्यग्योनौ च जायते ॥
                                   ( स्कन्दपुराण)

इस वचन में जो अशुचि अवस्था में शिवनिर्माल्य को धारण करते हैं, उनके लिये पाप कहा है। इस वाक्य के अनुरोध से पूर्वप्रदर्शित सामान्य वाक्य भी अशुचिविषयक समझना चाहिये । इन दोनों वाक्यों को मिलाकर यह अभिप्राय निकलता है-

अशुचि-अवस्था में शिवनिर्माल्य को नहीं धारण करना चाहिये । जो अशुचि-अवस्था में शिवनिर्माल्य को धारण करता है वह पापी होता है; इस पाप की शुद्धि के लिये सचैलस्नान प्रायश्चित्त है।

स्नानादि से शुद्ध होकर शिवनिर्माल्य को धारण करने से ब्रह्महत्या जैसे पापतक नष्ट हो जाते हैं- यह शिवपुराण तथा स्कन्दपुराण के वाक्यों में कहा है-

ब्रह्महापि शुचिर्भूत्वा निर्माल्यं यस्तु धारयेत् । 
भक्षयित्वा द्रुतं तस्य सर्वपापं प्रणश्यति ॥ (विद्येश्वरसंहिता २२ । १५)
ब्रह्महापि शुचिर्भूत्वा निर्माल्यं यस्तु धारयेत् । 
तस्य पापं महच्छीत्रं नाशयिष्ये महाव्रते ॥ 
          (तिथितत्त्व में उद्धृत स्कन्दपुराण )

शिवनिर्माल्य-धारण की इस विधि के साथ अविरोध सम्पादन करने के लिये- इस विधि के अनुरोध से भी - पूर्वोक्त शिवनिर्माल्य-धारण का प्रायश्चित्त अशुचि के विषय में ही समझना उचित है।

शिवनिर्माल्य-विषयक अन्य वाक्यों की व्यवस्था

ऊपर शिव-निर्माल्य-ग्रहण के अनुकूल तथा प्रतिकूल शास्त्र-वाक्यों का तात्पर्य शास्त्रीय आप्तवचनों से निर्णय करके दिखाया गया है। इस विषय में इस प्रकार के जितने भी अन्य शास्त्र-वाक्य हैं, उन सभी के तात्पर्य का पूर्वप्रदर्शित मीमांसक- पद्धति से निर्णय करना शास्त्रमर्मज्ञ पुरुषों का कर्तव्य है। 

मनुस्मृति

मनुस्मृति (१)

अब जबकि मनुस्मृति के विरुद्ध युद्ध छेड़ ही दिया गया है और उसे संविधान के द्वैत में खड़ा कर ही दिया गया है तो अब यह उतना ही जरूरी हो गया है कि चुनौती स्वीकार ही कर ली जाये और उन बंदों को भी आईना दिखाया जाये जो बड़े आधुनिक, जातिप्रथा विरोधी और समतावादी समाज के होने का दावा करते हैं। 

ये लोग तो तभी हार गये थे जब इन्होंने एक पुस्तक को जलाया था। भारत में तर्क-वितर्क की, खंडन-मंडन की, शास्त्रार्थ की इतनी लंबी परम्परा चली आई है। ध्यान यह भी दें कि चाहे मनुस्मृति को जलाया जाये चाहे रामचरितमानस को जलाया जाये या गीता को- कभी भी उस समाज ने जो इनका आदर करता है, कोई फतवा जारी नहीं किया, कोई सर तन से जुदा का आह्वान नहीं किया, किसी को ‘खुदा का दुश्मन’ नहीं घोषित किया। भारत की संस्कृति में वैसा कोई Index Librorum Prohibitorum (Index of Forbidden Books) नहीं रहा जैसा चर्च के इतिहास में रहा? 1242 में पेरिस में पोप नवम ग्रेगरी ने तालमुद और यहूदी पुस्तकों को जलाने के आदेश दिये थे। 1244 में पूरे यूरोप में ये पुस्तकें चर्च के आदेश से जलाई गईं। Impia Judaeorum Perfidia (1244) इसकी पुष्टि करता है। बाद में पोप इनोसेंट चतुर्थ के समय भी यही हुआ। 1121 में Theologia Summi Boni पुस्तक चर्च के आदेश से जलाई गईं। जॉन वाइक्लिफ की किताब De Civili Dominio सहित उसका बाइबिल अनुवाद जला दिया गया। सन 1520 में पोप लियो दशम् की धर्माज्ञा Exsurge Domine के द्वारा मार्टिन लूथर किंग की पुस्तकें On the Babylonian Captivity of the Church और The Freedom of a Christian सहित बहुत सी पुस्तकें जलवाई गईं। टिंडेल की अनूदित बाइबिल से लेकर गैलीलियो की डॉयलॉग तक कितनी ही पुस्तकों को जलाया गया। मैं पुस्तकालयों और विश्वविद्यालयों को जलाने की असंख्य औपनिवेशिक घटनाओं का कोई उल्लेख नहीं कर रहा हूँ। 

तो जब मनुस्मृति को जलाया गया वह कोई क्रांतिकारी काम नहीं था। वह औपनिवेशिक तौरतरीकों का अनुसरण था। भारत में असहमति पर शास्त्रार्थ और संवाद होता था। याज्ञवल्क्य का किन किन से नहीं हुआ। कभी उषस्ति चाक्रायण से। कभी गार्गी वाचक्नवी से। कभी मैत्रेयी से।प्रह्लाद की बहस इन्द्र से होती थी। ढेरों उदाहरण हैं। 

सभ्यता यही है और असल असभ्यता बुक बर्निंग है। आज तो मैं ऐसे ऐसे मूर्खों को मनुस्मृति के विरुद्ध बोलते देखता हूँ जिन्होंने मनुस्मृति को पढ़ा भी नहीं है पर उसके विरुद्ध नित्य टी वी चैनलों पर जहर उगलना उनके लिए जरूरी बन गया है। 

जॉर्ज बुहलर (सैक्रेड बुक्स ऑफ ईस्ट सीरीज) और पांडुरंग वामन काणे (हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र) ने मनुस्मृति के प्रक्षेपों का विस्तृत अध्ययन किया। उन्होंने सुझाया कि मूल मनुस्मृति संभवतः एक संक्षिप्त “मानव धर्मसूत्र” पर आधारित थी, जिसे बाद में विस्तारित और संशोधित किया गया। स्वामी दयानंद सरस्वती ने “सत्यार्थ प्रकाश” में मनुस्मृति के कई अंशों को प्रक्षिप्त बताया, खासकर वे जो वेदों से असंगत हैं। उन्होंने सिद्ध किया कि मूल मनुस्मृति वैदिक सिद्धांतों पर आधारित थी। डॉ. सुरेंद्र कुमार ने “विशुद्ध मनुस्मृति” नामक ग्रंथ में प्रक्षिप्त श्लोकों को हटाकर मूल ग्रंथ को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया। लेकिन ध्यान देने की बात है कि प्रक्षेपों के निष्कासन की जगह सम्पूर्ण मनुस्मृति को जलाया जा रहा है और एक आदिग्रंथ के विरुद्ध मूर्ख घृणा का एक माहौल बनाया जा रहा है। 

मनुस्मृति की 50 से अधिक पांडुलिपियां उपलब्ध हैं, और इनमें श्लोकों की संख्या (2684 से 2964 तक) और सामग्री में भिन्नताएं हैं।

और भारत में कई पब्लिकेशन हैं जो भारतीय ग्रंथों में मनमाना कुछ भी घुसेड़ कर अपना एजेंडा पूरा कर रहे हैं। 2016 और 2023 में ऐसे पब्लिशर्स के विरुद्ध कार्रवाई भी हुई। 

शताब्दियों से यह स्ट्रेटेजी चली आई है। होमर की इलियड और ओडेसी में 15 से 20% का प्रक्षेप माना जाता है। स्वयं बाइबिल में ये प्रक्षेप माने जाते हैं। शैतानी छंदों पर विवाद अलग हो चुका है। 

लेकिन जो बुद्धिमान होते हैं वे गेहूँ को भूसी से अलग कर लेते हैं। उन्हें दूध का दूध पानी का पानी करना आता है। वे नीर-क्षीर विवेक से सम्पन्न होते हैं। हंसो हि क्षीरं क्षिपन्ति जलं च त्यजन्ति। प्रक्षेपों को पहचानना कठिन नहीं है। पाठ्यगत असंगतियों ( textual inconsistencies) और अंतर्विरोधों ( contradictions) से समझ आ जाता है। छंदों के और छंदक्रम के उचित निर्वहन न होने से समझ आ जाता है। भाषाशास्त्रीय और शैलीगत विरोधों से समझ आ जाता है। अलग अलग पांडुलिपियाँ भेद खोलती हैं। cross-textual तुलनाएँ बता देती हैं। सैद्धान्तिक या विचारधारात्मक प्रदूषण ( doctrinal and ideological anomalies) बता देते हैं। टीकाएँ बताती हैं। बाहरी ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं। 

पर यह सब पढ़े लि़खों का नसीब। अनपढ़ों और अर्धसाक्षरों का समय पुस्तकों का अपमान करता ही है। 

पर ये लोग कभी बताएँगे कि जब संविधान भी एक पुस्तक है, तब उसके प्रावधानों पर बहस से इतना कतराते क्यों हैं? 

बौद्धिकता से डर लगता है तो अपने बौद्धिक आलस्य के चलते किसी पुस्तक की रक्षा करते हैं और उसी आलस्य के चलते किसी दूसरी पुस्तक को पढ़े और समझे बिना जलाते भी हैं।

मनुस्मृति (२)

मनुस्मृति की कोई स्पर्धा संविधान से नहीं है। जब मनुस्मृति बनी तब संविधान का अस्तित्व ही नहीं था। 

मनुस्मृति की कोई स्पर्धा संविधान से हो भी नहीं सकती। संविधान भारत के लिए है, मनुस्मृति मानवता के लिए है। वह सभी वर्णों के लिए है और वह धर्म बताने के लिए है। जैसे वेद भारत ही के लिए नहीं है, वेदाधृत मनुस्मृति भी भारत भर के लिए नहीं है। मनु वेद को मनुष्य का शाश्वत नेत्र कहते हैं - पितृदेवमनुष्यमाणां वेदश्चक्षु: सनातनम्‌। संविधान ‘हम भारत के लोग’ के लिए है, मनुस्मृति नहीं। उसमें धर्म की परिभाषा ही इतनी व्यापक है-

धृति: क्षमा दमोऽस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्‍यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्‌।। (मनुस्‍मृति ६.९२)

एक अन्य स्थान पर मनु धर्म यह बताते हैं -:

वेदाभ्यास:, तपः, ज्ञानम्‌, इन्द्रियाणां च संयम: । धर्मक्रिया, आत्मचिन्ता च नि: श्रेयसकरं परम्‌॥

मनु नहीं कहते In God we trust. वो अल्लाह की कल्पना को भी धर्म के लिए आवश्यक नहीं बताते। 

संविधान भारत को राज्यों का संघ कहता है-इस तरह वह भारत की उत्पत्ति कथा का आधार बताता है। India that is Bharat में इस देश की सांस्कृतिक जड़ों का संकेत है। 

पर मनुस्मृति इस जगत् की उत्पत्ति की बात करती है: 

आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम्‌ । अप्रतर्क्यमविज्ञेय॑ प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥

यानी यह सब दृश्यमान जगत्‌ सृष्टि-उत्पत्ति से पूर्व प्रलयकाल में तम अर्थात्‌ मूल प्रकृति रूप में एवं अन्धकार से आच्छादित था, स्पष्ट-प्रकट रूप में जाना जाने योग्य कुछ नहीं था, सृष्टि का कोई लक्षण-चिह्न उस समय नहीं था, न कुछ अनुमान करने योग्य था, सब कुछ अज्ञात था, मानो सब ओर, सब कुछ सोया-सा पड़ा था॥

मनुस्मृति मानवता का टेक्स्ट है, संविधान का वृत्त सीमित है। उसे सृष्टि की व्युत्पत्ति से मतलब नहीं। दोनों का contextual template ही अलग अलग है। 

फिर मनुस्मृति आत्मार्पित नहीं है। वह तो महर्षियों के द्वारा मनु से जिज्ञासा करने का परिणाम है। संविधान एक आलोड़न की स्थिति में लिखा गया है। देश विकट परिवर्तनों, उद्विग्नताओं और उथलपुथल से गुजर रहा था तब हमारा संविधान बन रहा था। पर मनुस्मृति एक अद्भुत प्रतिभाशाली व्यक्ति की एकाग्रता, अविचलितता और ध्यानस्थता के कारण संभव हुई, यह मनुस्मृति के पहले शब्द ‘मनुमेकाग्रमासीनभिगम्य’ से स्पष्ट है। 

संविधान अधिनियमित है, मनुस्मृति नहीं है। इसलिए संविधान को सुविधा है कि उसमें कोई भी संशोधन एक औपचारिक सामूहिक प्रक्रिया के माध्यम से हो। मनुस्मृति में तो जैसा हम देख चुके हैं कोई भी ऐरा गैरा नत्थू खैरा आकर कुछ भी जोड़ जाता है। और सिर्फ जोड़ने की बात नहीं, टीका की भी बात है।टीका अर्थविस्तार करे तो समझ आता है पर वह अर्थ-संकुचन करे तो मुश्किल होती है। सायण ने वेद का यज्ञपरक अन्वय किया तो वही काम मेधातिथि ने मनुस्मृति के साथ किया। लेकिन न तो वेद अनुष्ठानमूलक थे और न वेदाश्रित मनुस्मृति। यज्ञ के आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक अभिप्राय थे। जब वेद का अर्थ ही ज्ञानमूलक है तो उनके यज्ञ कर्मकांडमूलक कैसे हो सकते थे? जो मनु यह कह रहे थे कि चारों वर्णों, चारों आश्रमों, तीनों लोकों और तीनों कालों का ज्ञान वेद से है -: 

चातुवर्ण्य त्रयो लोकाश्चत्वारश्चाश्रमा: पृथक्‌।
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्व वेदात्‌ प्रसिद्धयति ॥

जो समस्त व्यवहारों का साधक वेद को बता रहे थे: 

बिभर्ति सर्वभूतानि वेदशास्त्रं सनातनम्‌ । तस्मादेतत्‌ परं मन्ये यज्जन्तोरस्य साधनम्‌॥

उनकी मनुस्मृति के सर्वशुद्ध पाठ के लिए वेदानुकूलता एक बड़ा आधार है। इसलिए जो लोग मनुस्मृति पर किये गये कटाक्षों की उपेक्षा यह मान करते हैं कि वे तो मात्र एक स्मृति पर ही हैं, वे नहीं समझते कि ऐसे लोगों को यदि यहीं स्तंभित नहीं किया गया तो एक दिन ये वेद पर भी आयेंगे। उनका निशाना मनुस्मृति नहीं है, हिन्दुत्व है। आपकी पवित्र पुस्तकें आपके किले हैं। आप यह सोचकर असावधान रहेंगे कि यह तो सिर्फ एक किला गया और ‘दिल्ली दूर अस्त’ तो एक दिन आप कहीं के नहीं रहेंगे। आप सोचते हैं कि दूसरों के पास एक एक पुस्तक है और आपके पास पूरी एक लाइब्रेरी है तो आप एक दो तीन पुस्तकों का जलना अफोर्ड कर सकते हो, एक दिन आपका विद्या के प्रति यही लापरवाह नज़रिया आपके सामने वह स्थिति लायेगा जब इस लाइब्रेरी की पुस्तकें दीमकें खा चुकी होंगी। 

अब मध्यकाल की तरह पुस्तकालय जलाये नहीं जाते। अब वही काम एक क्रमिक तरह से दीमकें करती हैं। 
(क्रमशः) 
मनुस्मृति (३)

मनुस्मृति एक ऐसी पुस्तक है जिसके विरुद्ध औपनिवेशिक काल में एक smear campaign चला। हम उसकी चर्चा बाद में करेंगे पर यह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ही थी जिसने सबसे पहले मनुस्मृति के पृष्ठों पर से धूल झाड़ी और उसे हिन्दू विधि संहिता के एकमात्र आधार के रूप में प्रयुक्त करना शुरू किया। 

इस कंपनी के द्वारा कमीशन की गई और जॉन बेकन द्वारा बनाई सर विलियम जोंस की एक विशालकाय प्रतिमा लंदन के सेंट पॉल कैथेड्रल में है। इसमें उसका हाथ जिस पुस्तक पर टिका बताया गया है, वह Menu’s Institutes के नाम से यह मनुस्मृति ही है।हालाँकि मनु का नाम देवनागरी में लिखा गया है। 

सर जोन्स ने मनुस्मृति का सन 1776 में अनुवाद किया था और उसे पढ़कर ही समझ आता है कि क्यों किसी समय बाइबिल के अंग्रेज़ी में अनुवाद का चर्च इतना विरोध करता था।मनुस्मृति को आर्डिनेंस के रूप में बताना ही बहुत बड़ी त्रुटि थी। स्मृति मेमोरी थी, पर अध्यादेश कभी नहीं थी। सर जोन्स कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे और उनकी मन:निर्मिति ने मनुस्मृति के एतदनुसार प्रयोग में बड़ी भूमिका अदा की। वे मनु को भारत के जस्टिनियन की तरह देखते थे। 

उन्होंने कहा कि मनु ने ब्रह्मा के द्वारा सिखाये गये एक लाख छंदों के कानूनों को primitive world को समझाया। हालाँकि मनुस्मृति का एक सहज पाठ ही बताता है कि यह प्रिमिटिव संसार की नहीं, एक विकसित समाज की रचना है। और जब मनुस्मृति लिखी गई तब यूरोप सहित शेष विश्व में कानून/व्यवस्था नामक किसी चीज का अता पता न था। बहरहाल जोन्स बताते हैं कि नारद और भृगुपुत्र सुमति ने उसका संक्षिप्तीकरण किया। फिर वे 2585 रह गये। सर जोन्स मेधातिथि, गोविंदराज, कुल्लुकभट्ट और धरणीधर की टीकाओं का उल्लेख भी करते हैं। सर जोन्स स्वयं भी कहते हैं कि जिस पंडित के साथ उन्होंने इसे पढ़ा उसने अपना नामोल्लेख न किये जाने की प्रार्थना की। वे पंडितों के द्वारा किये गये असहयोग का भी उल्लेख करते हैं और यह बताते हैं कि उन्होंने इस पुस्तक के फारसी अनुवाद को बनारस के चीफ़ नेटिव मजिस्ट्रेट से प्राप्त किया। वे स्वयं यह कहते हैं कि फारसी अनुवाद बहुत ही rude और loosely rendered है। कि यह त्रुटियों से भरपूर है जो संभवतः जल्दबाज़ी और अज्ञान का परिणाम है। 

हमने मनु की एकाग्रता का उल्लेख किया है। मनुमेकाग्रमासीनभिगम्य। इस एकाग्रता में कहीं ईश्वर का उल्लेख नहीं है। पर सर विलियम जोन्स जब इसका अनुवाद करते हैं तो कहते हैं कि: ‘With his attention fixed on one object, the Supreme God’. अब एकाग्रता के लिए सुप्रीम गॉड को सोचे बिना ईसाई दिमाग आगे बढ़ ही नहीं सकता था, इसलिए जब जोन्स के उस अनाम पंडित से पूछा गया होगा तो उसने कह दिया होगा- सर्वोच्च ईश्वर। क्योंकि इन्हें लगा होगा कि बहुदेववाद से एकाग्रता कहाँ आ सकती है। मनु तो धर्म तक की गुणमूलक परिभाषा देते हैं जिसमें सुप्रीम गॉड का होना भी अनिवार्य नहीं। पर जोन्स की मनोरचना में वह बात आ ही नहीं सकती थी। 

यों इस पहले शब्द से त्रुटिपूर्ण अनुवाद की एक श्रृंखला शुरू होती है तो वह चलती ही जाती है।

तो जो इंग्लैंड 🏴󠁧󠁢󠁥󠁮󠁧󠁿 से शिक्षित होकर लौटे सज्जन मनुस्मृति की प्रतियाँ जलाये, वे कौन से अनुवाद को पढ़े थे? क्या उन्हें संस्कृत और विशेषतः क्लासिकल संस्कृत का ज्ञान था? 

या जो अब misinformation और disinformation का अभियान चलाये हुए हैं, उनकी संस्कृत के संस्कारों से कितनी अभिज्ञता है। क्या सेलेक्टिव quoting के उनके खेल को हम नहीं जानते? हमने कैरेक्टर एसेसिनेशन के बारे में खूब सुना है पर किसी पुस्तक के ऐसे एसेसिनेशन को देखिए।ये एक आम सनातनी हिन्दू के मन में Guilt by association भरने की वैसी ही कोशिश है जैसे कभी स्वस्तिक और आर्य के नाम से हिटलर और फासिज्म और नाजिज्म सब हिन्दुओं पर मढ़ दिये गये थे। हिटलर स्वयं अपनी क्रिश्चियन प्रेरणाओं पर गर्व करता रहा पर हमारे एजेंडेबाजों को तो यह ज़्यादा पुसाया कि सनातन की लिंक कैसे तो भी उससे स्थापित की जाये। 

आम भारतीय के मन का मनु के विरुद्ध ही मैनिपुलेशन करना और मनुस्मृति के खिलाफ एक तरह की outrage baiting करना और दलितों के विक्टिमहुड नैरेटिव को मनुस्मृति के कारण बताना निरक्षरता के चलते नहीं हुआ, नीयत के चलते हुआ। इसके ज़रिए भारत की सामाजिक एकता को फ्रेक्चर करने कोशिश औपनिवेशिक समय में भी की गई और अभी भी उसी एकता से भयभीत होकर ये हरकतें हो रही हैं। जो मनु धर्म में अपरिग्रह देखता हो, उसे शोषणकर्ता बताओ। एक मूवी 2012 में आई थी- शूद्रा। उसमें मनु को बाहर से आया आक्रमणकारी बताया था। उसमें वही atrocity porn था कि जिसमें ऊँ नम: शिवाय का उच्चारण करने पर एक पाँच वर्ष के दलित बच्चे को सजा दी जाती है और जो देखा जाये तो भक्ति आंदोलन की उपलब्धियों को झुठलाने की बेहूदा कोशिश भर थी। 

और ये भी पता करें कि वे कौन थे जिन्होंने महिलाओं को संपत्ति के अधिकार के मामले में प्रिवी कौंसिल की आलोचना इस बात पर की थी कि उसने मनुस्मृति या याज्ञवल्क्यस्मृति की जगह प्रथा को महत्व दिया। उन्होंने कहा था :

“प्रिवी काउंसिल ने जो निर्णय दिया है, उसके लिए मैं बहुत खेद व्यक्त करता हूँ। इसने हमारे कानून में सुधार का मार्ग अवरुद्ध कर दिया है। प्रिवी काउंसिल ने पहले के एक मामले में कहा था कि प्रथा कानून पर हावी होगी, जिसके परिणामस्वरूप हमारी न्यायपालिका के लिए हमारे प्राचीन संहिताओं की जांच करना और यह पता लगाना असंभव हो गया कि हमारे ऋषियों और स्मृतिकारों ने कौन से कानून बनाए थे। मुझे इस बारे में जरा भी संदेह नहीं है कि यदि प्रिवी काउंसिल ने यह निर्णय नहीं दिया होता कि प्रथा पाठ पर हावी होगी, तो कोई वकील, कोई न्यायाधीश याज्ञवल्क्य और मनुस्मृति के इस पाठ को खोज निकालना बहुत संभव पाता और महिलाएँ आज लाभ ले रही होतीं। “

ये वही थे जिन्होंने उसे जलाया था। जब हिंदू कोड बिल उन्होंने बनाया तो बहुत हद तक मनुस्मृति ही उनके काम आई थी। 

(क्रमशः)

मनुस्मृति इन दिनों चर्चा में है। इस संबंध में एक पुरानी पोस्ट साझा कर रही हूँ: 

शब्दों के जाल में फंसे हिन्दू ग्रन्थ 

अंग्रेजों ने भाषांतरण के द्वारा हिन्दू धर्म की अवधारणाओं को संकुचित करने का कार्य किया है तथा दुर्भाग्य से उसी भाषांतरण के आधार पर आगे के कार्य हुए या कहें यही अंग्रेजी भाषांतरण ही सन्दर्भ ग्रन्थ बन गए एवं संस्कृत ग्रन्थ नेपथ्य में चले गए. 
मनुस्मृति के श्लोकों एवं उनके अंग्रेजी भाषांतरण से इसे और अच्छी तरह से समझा जा सकता है. प्रथम भाग में श्लोक संख्या 7, जो जगत की उत्पत्ति के विषय में है, उसमें लिखा है कि 
योऽसावतीन्द्रियग्राह्य: सूक्ष्मोऽव्यक्त: सनातन:
सर्वभूतमयोऽचिन्त्य: स एव स्वयमुद्बभौ 
जो व्यक्ति संस्कृत नहीं भी समझता है वह भी इसमें अतीन्द्रिय शब्द से यह समझ जाएगा कि यह इन्द्रियों से सम्बन्धित है. अर्थात हमारे भावों/senses/अनुभूतियों से सम्बन्धित है, अर्थात यहाँ अनुभूतियों से सम्बन्धित कुछ है. इसका हिन्दी में अर्थ चौखम्बा प्रकाशन से प्रकाशित मनुस्मृति में इस प्रकार दिया गया है 
जो भगवान (परमात्मा) अतीन्द्रिय (नेत्र आदि इन्द्रियों से अग्राह्य एवं योग से ग्राह्य), सूक्ष्मरूप, अव्यक्त, नित्य और सब प्राणियों की आत्मा (अतएव) अचिन्त्य हैं; वे ही परमात्मा स्वयं प्रकट हुए. 
विलियम जोन्स इसके भाषांतरण में लिखते हैं 
HE, whom the mind alone can perceive, whose essence eludes the external organs, who has no visible parts, who exists from eternity, even He, the soul of all beings, whom no being can comprehended, shone forth in person. 
इन्होनें इन्द्रियों को external organs कहा है. बाहरी अंग और इन्द्रियों में अंतर है. बाहरी अंग होते हैं हाथ, पैर, उंगली आदि अंग होते हैं, तो वहीं नेत्र, नाक, जीभ, कान और त्वचा इन्द्रियाँ होती हैं. इन्द्रियों को अंग्रेजी में sence-organs लिखा जा सकता है, परन्तु external organs इन्द्रियों के अर्थ को मात्र बाहरी अंगों तक सीमित कर रहा है. 
वहीं बहलर ने इसका भाषांतरण किया है:
He who can be perceived by the internal organ (alone), who is subtle, indiscernible, and eternal, who contains all created beings and is inconceivable, shone forth of his own (will). 
बह्लर ने लिखा है कि जो मात्र आतंरिक अंग से ही अनुभव किया जा सकता है. आतंरिक अंग क्या होते हैं? या इन्द्रियाँ आंतरिक अंग हैं? 
मनुस्मृति की और विस्तार से व्याख्या करने वाली पुस्तक Manusmriti Explanation में अतीन्द्रिय का अर्थ दिया गया है “unperceivable by external senses” तथा सूक्ष्म का अर्थ लिखा है कि “who is perceivable by subtle understanding only” 
परन्तु बहलर और विलियम जोन्स ने इन्द्रियों का अर्थ समझे बिना “अंग अर्थात organs” के रूप में भाषांतरित कर दिया है. 
हिन्दू धर्मग्रंथ बहुत अधिक शब्दजाल का शिकार हुए हैं. यदि भाषांतरण किसी भी हिन्दू ग्रन्थ का आप अंग्रेजी में पढ़ रहे हैं, तो उसका संस्कृत भी साथ में पढ़ना अनिवार्य है, एवं साथ ही किसी योग्य गुरु से ही उनका अर्थ समझा जाए तो ही बेहतर होगा. क्योंकि ऐसे भाषांतरण को पढ़कर ही लोग हिंदूधर्म पर किताबें लिखकर भाषांतरित पुस्तकों का संदर्भ देते हैं और अर्थ का अनर्थ और विस्तारित करते हैं!
*विश्लेषण भाषांतरण और शब्दों के आधार पर है

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मनुस्मृति के विरोधी एक दिन इतना मनुस्मृति-मनुस्मृति कर देंगे कि लोग इसे पढ़कर चर्चा करने लगेंगे, जो कि करनी भी चाहिए! जितना डराया जा रहा है, जब उसमें से डरने वाला बहुत कुछ नहीं निकलेगा, तो कई दुकानें बंद होंगी! 
ग्रंथ से डरना कैसे, चर्चा होनी चाहिए!



 दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति नें मनुस्मृति की पढ़ाई बन्द करने का आदेश दिया है, क्योंकि उसमें स्त्री, शूद्रों की निन्दा है। इससे तीन बातें स्पष्ट हुई-(१) कुलपति जी ने मनु स्मृति नहीं पढ़ी है, (२) मनु स्मृति किस विषय के किस स्तर पर पाठ्यक्रम में है, इसका उनको पता नहीं है, (३) अपने विषय के पाठ्यक्रम का भी पता नहीं है, या उसका निर्धारण कैसे होता है, यह पता नहीं है। उसके एक विवाद के समाधान के लिए यह लिखा है। मुख्य बात है कि मनु स्मृति के अतिरिक्त अन्य १७ स्मृति भी प्रकाशित हैं। कोई भी स्मृति आज का संविधान या कानून नहीं है, वह राजा, प्रजा का आचार व्यवहार का शास्त्र है। कोई भी शासन स्मृति के अनुसार नहीं चलता था। स्मृति के सिद्धान्त के अनुसार हर राज्य ने शासन के अपने नियम बनाये थे। मिथिला में याज्ञवल्क्य स्मृति प्रचलित थी, पर शासन या न्याय के नियम अलग थे। रामायण में राम के वनवास या चरण पादुका के शासक होने का कहां उल्लेख है। महाभारत में द्यूत क्रीड़ा मनुस्मृति का स्पष्ट विरोध है। पत्नी या छोटे भाई को किसी स्मृति में सम्पत्ति नहीं कहा है, जिसे दाव पर लगाया जा सके, वह भी एकतरफा। युधिष्ठिर के जीतने पर क्या मिलता, यह तय नहीं हुआ था। मनुस्मृति के कारण या किसी भी अन्य देश के नियम के कारण आज तक विश्व में जाति के कारण संघर्ष नहीं हुआ है। जाति संघर्ष वर्तमान भारतीय संविधान का आविष्कार है।




 मनुस्मृति के अतिरिक्त अन्य स्मृतियाँ (जैसे याज्ञवल्क्य, नारद, पाराशर स्मृति आदि) भी मौजूद हैं।

 * संविधान नहीं, आचार शास्त्र: स्मृतियाँ आधुनिक अर्थों में देश का "संविधान" या कानून (law of the land) नहीं थीं। वे मुख्यतः धर्मशास्त्र के ग्रंथ थे जो राजा, प्रजा, और विभिन्न सामाजिक वर्गों के लिए आदर्श आचार-व्यवहार, कर्तव्य, और दंड-विधान का वर्णन करते थे।

 * सैद्धांतिक ग्रंथ: ये ग्रंथ एक आदर्श व्यवस्था का खाका खींचते थे, लेकिन वास्तविक शासन हमेशा इनके अनुरूप नहीं चलता था। हर राज्य और काल में स्थानीय परंपराओं, राजनीतिक ज़रूरतों और राजा के विवेक के आधार पर अपने नियम-कानून बनाए जाते थे। जैसा आपने मिथिला का उदाहरण दिया, यह इसका सटीक वर्णन है।

 * महाकाव्यों से भिन्नता: रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में वर्णित कई घटनाएँ स्मृतियों के नियमों का उल्लंघन करती हैं। आपका द्यूत क्रीड़ा का उदाहरण बहुत प्रासंगिक है। किसी भी स्मृति में पत्नी को एक वस्तु या संपत्ति नहीं माना गया है जिसे दाँव पर लगाया जा सके। यह दर्शाता है कि स्मृतियों के नियम एक आदर्श थे, जबकि समाज का यथार्थ अक्सर उससे भिन्न और जटिल था।

पति-पत्नी के वैदिक स्वरूप

पति-पत्नी के वैदिक स्वरूप-
भारत में पति तथा पत्नी दोनों का अर्थ स्वामी है, केवल पुल्लिङ्ग-स्त्रीलिङ्ग का अन्तर है।
चण्डी पाठ में पत्नी के विषय में देव-असुर धारणा का अन्तर कहा गया है। असुरों में स्त्री भी अन्य रत्नों की तरह सम्पत्ति थी। भारत में पति-पत्नी बराबर के थे।
(शुम्भ सन्देश) रत्नभूतानि भूतानि तानि मय्येव शोभने॥१११॥
स्त्रीरत्नभूतां त्वां देवि लोके मन्यामहे वयम्। सा त्वमस्मानुपागच्छ यतो रत्नभुजो वयम्॥११२॥
(दुर्गा) यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति। यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति॥१२०॥
(चण्डी पाठ, अध्याय ५)
पत्नी अर्थात् स्वामिनी के विपरीत असुर भाषा के शब्द हैं-
Wife -तवाफ (अरबी) = परिक्रमा करना। तवाफ = निकट रह कर सेवा करना। तवाफ का बहुवचन तवायफ। त लुप्त होने से वाइफ़।
Mistress (Mrs.) = रखैल। आजकल एक सम्मानित शब्द बना है-Live-in relation । 
औरत (अरबी) = गुप्ताङ्ग, लज्जाजनक। 
(सभी के सन्दर्भ-उर्दू हिन्दी शब्दकोष-मुस्तफा खान मद्दाह, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ, तृतीय संस्करण, १९७७)
वेद में पत्नी के ४ रूप कहे गये हैं। इनमें कुछ शब्द केवल प्राचीन अरबी में थे। पतञ्जलि महाभाष्य के अनुसार वेद में सभी द्वीपों के शब्द हैं। अरब में इसकी नकल हुई कि एक पुरुष ४ स्त्री रख सकता है (उसे पत्नी कहना उचित नहीं है)। 
(१) महिषी = महान् अर्थ में, जैसे महिला। प्रायः रानी के लिए महिषी या पट्ट-महिषी का प्रयोग। अभी डाइटिंग फैशन में महिषी (भैंस) कहने पर विवाद होगा। माता तथा पत्नी रूप।
(२) वावाता = स्वामिनी। प्राचीन अरबी में यह शब्द था। अभी यह केन्या में प्रचलित है।
(३) पालागली या तोता-२ पाला (पक्ष) के बीच गली। पिता तथा पति के परिवार के बीच सम्पर्क, दूती। इसके लिए अधिक बोलना पड़ता है। अतः बोलने वाले पक्षी को तोता कहते हैं।
(४) परिवृक्ता-सायण ने इसका अर्थ परित्यक्ता किया है। पर उस अर्थ में वह पत्नी नहीं रहेगी। अन्य ३ रूपों के अतिरिक्त स्वतन्त्र व्यक्तित्व, शिक्षा या व्यवसाय।
चतस्रो जाया उपक्लृप्ता भवन्ति । महिषी वावाता परिवृक्ता पालागली । सर्वा निष्किण्योऽलङ्कृताः । मिथुनस्यैव सर्वत्वाय । (शतपथ ब्राह्मण, १३/४/१/८)
सायण भाष्य-चतस्रो भार्याः उप समीपे क्लृप्ताः स्थिताः भवन्ति । पालागली दूतदुहिता । 
टिप्पणी-पत्न्यश्चायंत्यलङ्कृताः निष्किण्यो महिषी वावाता परिवृक्ता पालागलीति । (कात्यायन श्रौत सूत्र, २०/१२)- प्रथम परिणीता पत्नी, वावाता वक्लमा, परिवृक्ता अवक्लमा, पालागली दूत पुत्री । 
चतस्रश्च जायाः कुमारी पञ्चमी…..(शतपथ ब्राह्मण, १३/५/२/१-८) 
परिवृक्ता च महिषी स्वस्त्या च युधङ्गमः । अनाशुरश्चायामि तोता कल्पेषु सम्मिता ॥१०॥ 
वावाता च महिषी स्वस्त्या च युधङ्गमः । श्वाशुरश्चायामि तोता कल्पेषु सम्मिता ॥११॥ (अथर्व, २०/१२८) 
प्रास्मै गायत्रमर्चत वावातुर्यः पुरन्दरः । याभिः काण्वस्योप बर्हिरासदं यासद् वज्री भिनत् पुरः ॥ (ऋक्, ८/१/८)
आ त्वाद्यः सधस्तुतिं वावातुः सख्युरा गहि । उपस्तुतिर्मघोनांप्रत्वावत्वधातेवश्मिसुष्टुतिम् ॥ (ऋक्, ८/१/१६)
या वा अपुत्रा पत्नी सा परिवृत्ती (परिवृक्ती)- (शतपथ ब्राह्मण, ५/३/१/१३) 
सुवरीति परिवृक्ती । (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/९/४/५)
प्रहेयो वै पालागलो (दूतः) व्वानं वै प्रहित एति । (शतपथ ब्राह्मण, ५/३/१/१)
यैव प्रथमा वित्ता (भार्य्या) सा महिषी । (शतपथ ब्राह्मण, ६/५/३/१) 
महिषी धाय्या । (कौषीतकि ब्राह्मण, १५/४) भुव इति वावाता (पत्नी) । (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/९/४/५) 
तष्टासि तृष्टिका विषा विषातक्यसि । परिवृक्ता यथा सस्यृषभस्य वशेव ॥ (अथर्व, ७/११३/२)
परिवृक्ते पति विद्यमानट् (ऋक्, १०/१०२/११) सं ते वावाता जरतामियं गीः (ऋक्, ४/४/८)
पति के भी ४ रूप कहे गये हैं-
सोमस्य जाया प्रथमं गन्धर्वस्तेऽपरः पतिः। तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः॥ (अथर्व, १४/२/३)
(१) सोम = सौम्य, मित्र जैसा। राजा या विष्णु की तरह उदार।
सोमो वैष्णवो राजेत्याह तस्याप्सरसो विशः (शतपथ ब्राह्मण, १३/४/३/८)
यो वै विष्णुः सोमः सः (शतपथ ब्राह्मण, ३/३/४/२१, ३/६/३/१९)
तत् यत् एव इदं क्रीतो विशति इव तदु हास्य (सोमस्य) वैष्णवं रूपम् (कौषीतकि ब्राह्मण, ८/२)
(२) गन्धर्व = इनका सम्बन्ध अप्सरा से है। प्रेम सम्बन्ध। 
वरुण आदित्यो राजेत्याह तस्य गन्धर्वा विशस्त इम आसत इति। युवानः शोभना उपसमेता भवन्ति (शांखायन श्रौत सूत्र, १६/२/८, आश्वलायन श्रौत सूत्र, १०/७/३, शतपथ ब्राह्मण, १३/४/३/७)
गन्धेन च वै रूपेण च गन्धर्वाप्सरसः चरन्ति (शतपथ ब्राह्मण, ९/४/१/४)
स्त्रीकामा वै गन्धर्वाः (ऐतरेय ब्राह्मण, १/२७)
गन्धर्वाः सप्तविंशतिः (वाज. यजु, ९/७, शतपथ ब्राह्मण, ५/१/४/८)-यहां सायण, महीधर के अनुसार गन्धर्व का अर्थ नक्षत्र है। २७ को अरबी में उलटा लिखने पर ७२ हूर हैं।
(३) अग्नि = अग्रि या अग्रणी। नेता। परिवार चलाने वाला। 
स यत् अस्य सर्वस्य अग्रं असृज्यत तस्मात् अग्रिः, अग्रिः ह वै तं अग्निः इति आचक्षते परोऽक्षम् (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/११, प्रायः यही २/२/४/२ में)
इसी अर्थ में कहा है कि अग्नि! हमें अच्छे मार्ग पर ले चलो-
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् (ईशावास्य उपनिषद्, १६, ऋक्, १/१८९/१, वाज. यजु, ५/३६, ७/४३, ४०/१६, तैत्तिरीय सं, १/१/१४/३, ४/४३/१ आदि) 
(४) मनुष्य = परिवृक्ता की तरह स्वतन्त्र मनुष्य।
पुरुषो (= मनुष्यः) वै प्रजापतेः नेदिष्टम् (शतपथ ब्राह्मण, २/५/१/१) = प्रायः प्रजापति जैसा, पालक।
मनसि एव भवति। न एनं मनुः (मनन शक्तिः इति -सायण) जहाति (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/३/८/३) = मनन शक्ति वाला।
इस अर्थ में मन्तु, मन्तुमस्, मन्यु भी कहा गया है।
युवोः अच्छिद्रा मन्तवो ह सर्गाः (ऋक्, १/१५२/१, मैत्रायणी सं, ४/१४/१० आदि)
आ दत्ते दस्र मन्तुमः, पूषन्नवो वृणीमहे, येन पितृनचोदयः (ऋक्, १/४२/५)
अग्निः इव मन्यो त्विषितः सहस्व (ऋक्, १०/८४/२, अथर्व, ४/३१/२)

दोलायमानं गोविन्दं, मञ्चस्थं मधुसूदनम्।

दोलायमानं गोविन्दं, मञ्चस्थं मधुसूदनम्।
रथस्थं वामनं दृष्ट्वा, पुनर्जन्म न विद्यते॥
१८९० के दो कोषों 'शब्द कल्पद्रुम' तथा 'वाचस्पत्यम्' के अनुसार यह स्कन्द पुराण के उत्कल खण्ड में था। बाद के संस्करणों में इसे निकाय दिया।
गो तथा गोविन्द यज्ञ रूप है, जिससे दिन, मास, वर्ष के चक्र में उत्पादन होता है। समय का चक्र दोलन है।
मधु-कैटभ को मारने वाले मधुसूदन हैं। मधु-कैटभ के मेद से पृथ्वी बनी, अतः इसे मेदिनी कहते हैं। पृथ्वी रूपी मञ्च पर मधुसूदन का स्मरण करें।
हमारा शरीर ही रथ है, जिसमें वामन रूप आत्मा है। इस आत्मा के दर्शन से पुनर्जन्म नहीं होता, मोक्ष मिलता है।
इसी भाव से महाकवि विद्यापति ने प्रसिद्ध गीत लिखा था, जिसकी प्रथम तथा अन्तिम पंक्ति पर ध्यान दें-
पिया (जगन्नाथ, आत्मा) मोरे बालक, हम तरुणी गे।
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धैरज धये रहु, मिलत मुरारी।

जानिये फूलन देवी का असली सच

जानिये जानिये फूलन देवी का असली सच जो उसको बेफजूल वीरांगना माने बैठे हुए हैं,,😊🙏

दीदी जानती हो, आज पच्चीस जुलाई है?
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यह तो सच ही है कि बीहड़ के पानी की तासीर ही कुछ ऐसी है कि बदला गोलियों से लिया जाता है। खैर वह दौर तो नहीं रहा जब बीहड़ का मरद मेहरारू की जगह 315 माउजर साथ लेकर सोता था पर किस्सों में बीहड़ खूब जिंदा है।आज पच्चीस जुलाई है और नारीवादियों का नारीवाद उफान पर है। कारण है कि नारीवाद को बीहड़ में हांफ-हांफ कर जिंदा करने वाली बीहड़ की डकैत फूलन देवी की आज पुण्यतिथि है। 

फूलन को मरे एक अरसा हो गया लेकिन अब फूलन की गैंग बीहड़ से निकलकर कैम्पस और मीडिया मंडी तक पहुंच गई है। जितना कबाड़ा फूलन गैंग की बंदूक ने नहीं  किया उससे ज्यादा उसकी गैंग की कलम कर रही है। हमारा तो उसूल रहा है कि बंदूक की बगावत बंदूक से और कलम की बगावत कलम से होनी चाहिए। सिलसिलेवार उन सभी क्रांतिकारियों को यहां जवाब दिया जा रहा है जिन्हें फूलन में नारीवाद की मिसाल नजर आती है।

डार्लिंग, हालातों ने फूलन को डकैत नहीं बनाया और ना ही वह सच पूरा है जो तुम शेखर कपूर की बेंडिड क्वीन के आईने में देखती हो। लेखिका अरुंधति राय लिखती है कि अगर बलात्कार से कोई महिला डकैत बनती तो आज हजारों महिलाएं बंदूक उठाकर बीहड़ में घूम रही होती। 

बीहड़ के जितने भी बागी हुए है उनमें एक जो बात सबसे कॉमन मिलती है वो यह है कि हर गैंग का सरदार अपनी गैंग में एक लौंडिया जरूर रखता था। निर्भय सिंह गुर्जर तो इस मामले में इतना उस्ताद था कि बिग बॉस फेम सीमा परिहार,सरला जाटव,नीलम गुप्ता उसकी गैंग में हुआ करती थी। पुलिस ने भी अपनी सरकारी रायफल की गोलियां इन लौंडिया के कंधों पर रखकर ही दागी है। एक दौर में मुरैना जिले के नामी बागी हुए रमेश सिंह सिकरवार अपने इंटरव्यू में कहते है कि बीहड़ में बागी को लंगोट का पक्का होना चाहिए क्योंकि पुलिस जब रडार पर लेती है तो सबसे पहले बागी का लंगोट ही खोलती है।

खैर, हुआ यूँ था कि एक डकैत की यौन इच्छा ही फूलन को बीहड़ तक ले आई थी। फूलन उन दिनों अपनी रिश्तेदारी में गई हुई थी। वहां से बाबू सिंह गुर्जर नाम का एक डकैत फूलन को उठाकर बीहड़ में ले जाता है। बाबू सिंह गुर्जर की गैंग में ही एक रंगरूट होता है जिसका नाम विक्रम मल्लाह है। वह फूलन की ही जात का है और फूलन के यौवन पर लट्टू हो जाता है। बागियों की गैंग का एक ओर उसूल होता है कि लौंडिया पर पहला हक गैंग के सरदार का होगा। लेकिन विक्रम मल्लाह को फूलन का बाबू सिंह गुर्जर के साथ हमबिस्तर होना नागवार गुजरता है। फूलन यह बात भी भली भांति जानती है कि विक्रम उस पर लट्टू हुआ पड़ा है। लेकिन फूलन वह सब स्वीकार करती है जो गैंग का उसूल है। बागियों की सल्तनत में क्या ? उसूल और काहे की आजादी। 315 माउजर की 8 MM की नली के आगे या तो मरो या मार डालो। विक्रम मल्लाह एक दिन अचानक मौका देखकर अपने सरदार बाबू सिंह गुर्जर की हत्या कर देता है और खुद गैंग का सरदार बन बैठता है। बाबू सिंह गुर्जर की हत्या के बाद विक्रम को गैंग और फूलन दोनों मिल जाती है। लेकिन फूलन की किस्मत में अब भी हांफना ही बचता है बस मरद बदल जाता है।

वक्त गुजरता है और सलाखों में बन्द एक खूंखार बागी लालाराम वापस गिरोह में लौटता है। विक्रम मल्लाह भी इसी लालाराम का शार्गिद है तो एक बार फिर गैंग का सरदार और फूलन का मरद दोनों बदल जाते है। इस बात से परेशान विक्रम अपनी नई गैंग बना लेता है और ठाकुरों की गैंग से उसकी छिटपुट झड़पें चलती रहती है। एक दिन बड़ी मुठभेड़ में विक्रम मल्लाह ढेर हो जाता है। लालाराम की गैंग फूलन को उठाकर बेहमई गांव ले जाती है जहाँ उसके साथ बलात्कार होता है। 

अब यहां एक और बात समझने की जरूरत है कि फूलन को बेहमई गांव ही क्यों ले जाया जाता है। जबकि लालाराम और राम ठाकुर तो बेहमई गांव के नहीं थे। राम ठाकुर का गांव बेहमई गांव के पास ही दमनपुर है तो इस पूरी कहानी में बेहमई गांव की क्या भूमिका है। नदी के किनारे बसा यह गांव बागियों के छिपने का बढ़िया और सुरक्षित ठिकाना हुआ करता था। जबकि इस गांव के लोग ना तो राम ठाकुर की गैंग में शामिल थे और ना ही फूलन पर उन्होंने कोई अत्याचार किया। बल्कि बेहमई गांव के लोग तो खुद ही इन बागियों से परेशान थे। ये बागी जब मन आये तब ही इस गांव के लोगों को धमकाकर रासन, पैसे और जरूरी सामान ले जाया करते थे। 

बेहमई गांव से फूलन जैसे तैसे बच निकलती है और यहां से देश और बीहड़ दोनों के जातीय समीकरण तेजी से बदलते है। यह ठीक वहीं दौर था जब मान्यवर काशीराम 'तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार' का झंडा उठाये हुए थे और लालू जैसे दोगले समाजवादियों ने भूरा बाल साफ करो कि अमल(अफीम का पानी) पिछड़ों को चटा दी थी।

ये सब कवायद तो संसद का समीकरण बदलने की थी लेकिन संसद से पहले इस समीकरण की चपेट में बीहड़ आ गया। उस वक्त बीहड़ में हर दूसरी गैंग ठाकुरों की थी। हर दूसरी गैंग का सरदार भी ठाकुर ही हुआ करता था। लेकिन बाकी जातियों ने तय कर किया कि अब ठाकुरों की गैंग में रहकर पिट्ठू लादने से अच्छा है कि खुद की गैंग बना ली जाए और फूलन ने इस काम के लिए एक बहाना दे दिया। ठाकुरों की गैंग से परेशान दूसरे रंगरूट फूलन को साथ लेते है और एक दिन बेहमई गांव पहुंच जाते है। वहां फूलन द्वारा एक आवाज दी जाती है कि राम ठाकुर और लालाराम कहाँ है। उसके बाद पूछा जाता है कि इस गांव से राम ठाकुर की गैंग को रसद कौन देता है। मतलब फूलन अपने साथ हुए बलात्कार का बदला लेने नहीं बल्कि उस गांव के लोगों को इस लिए मारने गई थी कि वे राम ठाकुर को रसद देते थे। 

एक रिपार्ट यह भी बताती है कि बेहमई कांड में गोली चलाने का आदेश खुद फूलन ने नहीं दिया था। जबकि फूलन तो गोलीबारी के बीच इतना कांप गई कि उससे बंदूक की एक गोली तक नहीं चली। गोली चलाने का आदेश फूलन के पीछे खड़े गैंग के दूसरे सरदार ने दिया। 

बेहमई गांव में फूलन की गैंग द्वारा की गई ठाकुरों की हत्या ने पूरे देश मे सनसनी ला दी। फूलन एक बड़ी आबादी के लिए आदर्श बन गई। लोकतंत्र में एक वर्ग का आदर्श बराबर एक वोटबैंक का ठेकेदार भी होता है। मीडिया अब तक इस हेड लाइन के साथ गाल बजाता है कि अपने ऊपर हुए अत्याचार का बदला लेने के लिए फूलन ने ठाकुरों को मौत के घाट उतार दिया। 

यहां से राजनीति की चौसर जमती है। ठाकुरों की गैंग फूलन को सलटाने के लिए बीहड़ छान मारती है लेकिन फूलन का जिंदा रहना अब राजनीतिक समीकरणों को जिंदा रखने के लिए जरूरी हो गया था। फूलन के साथ जिस मल्लाहों की गैंग ने बेहमई कांड किया था वह पूरी गैंग अचानक भूमिगत हो जाती है और उत्तर-प्रदेश के बीहड़ों को छोड़कर मध्य-प्रदेश के बीहड़ों में गुजर बसर करती है। मध्य-प्रदेश में उन दिनों दलित और पिछड़ों के मसीहा अर्जुन सिंह शासन कर रहे थे। फूलन का ठाकुरों की किसी गैंग के साथ सीधी मुठभेड़ में गिराया जाना एक वोटबैंक का बड़ा नुकसान था। इसलिए फूलन को भीतर से कितना राजनीतिक संरक्षण मिला इस बात से रत्तीभर भी इनकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन फूलन को बहुत जल्दी समझ आ गया कि इन हालातों में बीहड़ में बसर करना ज्यादा दिन मुमकिन नहीं हो पायेगा। अंततः 14 फरवरी 1981 को फूलन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने आत्मसमर्पण कर देती है। जेल काटने के बाद मुलायम सिंह यादव फूलन को संसद पहुंचा देते है। 

राजनीतिक समीकरण फिर बदलते है और उत्तर प्रदेश के दलित बहुजन समाज पार्टी के पीछे लामबंद होते है। मुलायम को समझ आ जाता है कि अब फूलन का पोलिटिकल माइलेज पहले वाला नहीं रहा क्योंकि दलित वोटबैंक मायावती के पीछे हो लिया था। समाजवादी पार्टी को समझ आया कि कैसे भी ठाकुरों को लपक लिया जाए तो माइलेज का मामला जम जाएगा। चरकनगर की एक राजनीतिक सभा से इसकी शुरुआत होती है जहां मंच पर फूलन और मुलायम सिंह दोनों होते है। फूलन का भाषण होता है वह कहती है कि "ठाकुरों का मेरे ऊपर बहुत उपकार है। जब मैं बीहड़ में चारो तरफ से घिर गई थी तो इसी इलाके के ठाकुर जसवंत सिंह सेंगर की कृपा से मेरी जान बच पाई।"

ओह माय गॉड व्हाट इज दिस? फेमिनिज्म का मेकअप उतार कर थोड़ा पॉलिटिक्स भी समझा करो ना डार्लिंग।

उसके बाद जानती हो क्या हुआ डार्लिंग ? एक कुसमा नाइन नाम की बागी भी हुई थी उसी बीहड़ में। फूलन से कहीं ज्यादा क्रूर और बर्बर। उन दिनों वह फूलन के जानी दुश्मन लालाराम की गैंग की कमांडर हुआ करती थी। एक दिन कुसमा बेहमई कांड का बदला लेने के लिए फूलन की जाति के 13 मल्लाहों को लाइन में लगाकर 325 माउजरों से भून देती है इस ऐलान के साथ कि मैंने ठाकुरों की हत्या का बदला लिया है।

फूलन और कुशमा की आपसी हत्या प्रतिस्पर्धा में ही भदेख रियासत अंतर्गत रोमाई देवरा गांव वीराने में बदल गया और उससे जुड़ी 2500 एकड़ उपजाऊ जमीन आज भी बंजर है ।

जो फूलन ने बोया वह कुसमा ने काट लिया। उधर 20 मारे गए। मैंने कहा था ना कि बीहड़ की तो तासीर ही ऐसी है कि गोली का बदला बस गोली होती है। दिल किया तो तुम्हें कभी कुसमा नाइन की कहानी भी सुना देंगे। 

साभार:- ✍️

दीदी जानती हो, आज पच्चीस जुलाई है?
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यह तो सच ही है कि बीहड़ के पानी की तासीर ही कुछ ऐसी है कि बदला गोलियों से लिया जाता है। खैर वह दौर तो नहीं रहा जब बीहड़ का मरद मेहरारू की जगह 315 माउजर साथ लेकर सोता था पर किस्सों में बीहड़ खूब जिंदा है।आज पच्चीस जुलाई है और नारीवादियों का नारीवाद उफान पर है। कारण है कि नारीवाद को बीहड़ में हांफ-हांफ कर जिंदा करने वाली बीहड़ की डकैत फूलन देवी की आज पुण्यतिथि है। 

फूलन को मरे एक अरसा हो गया लेकिन अब फूलन की गैंग बीहड़ से निकलकर कैम्पस और मीडिया मंडी तक पहुंच गई है। जितना कबाड़ा फूलन गैंग की बंदूक ने नहीं किया उससे ज्यादा उसकी गैंग की कलम कर रही है। हमारा तो उसूल रहा है कि बंदूक की बगावत बंदूक से और कलम की बगावत कलम से होनी चाहिए। सिलसिलेवार उन सभी क्रांतिकारियों को यहां जवाब दिया जा रहा है जिन्हें फूलन में नारीवाद की मिसाल नजर आती है।

डार्लिंग, हालातों ने फूलन को डकैत नहीं बनाया और ना ही वह सच पूरा है जो तुम शेखर कपूर की बेंडिड क्वीन के आईने में देखती हो। लेखिका अरुंधति राय लिखती है कि अगर बलात्कार से कोई महिला डकैत बनती तो आज हजारों महिलाएं बंदूक उठाकर बीहड़ में घूम रही होती। 

बीहड़ के जितने भी बागी हुए है उनमें एक जो बात सबसे कॉमन मिलती है वो यह है कि हर गैंग का सरदार अपनी गैंग में एक लौंडिया जरूर रखता था। निर्भय सिंह गुर्जर तो इस मामले में इतना उस्ताद था कि बिग बॉस फेम सीमा परिहार,सरला जाटव,नीलम गुप्ता उसकी गैंग में हुआ करती थी। पुलिस ने भी अपनी सरकारी रायफल की गोलियां इन लौंडिया के कंधों पर रखकर ही दागी है। एक दौर में मुरैना जिले के नामी बागी हुए रमेश सिंह सिकरवार अपने इंटरव्यू में कहते है कि बीहड़ में बागी को लंगोट का पक्का होना चाहिए क्योंकि पुलिस जब रडार पर लेती है तो सबसे पहले बागी का लंगोट ही खोलती है।

खैर, हुआ यूँ था कि एक डकैत की यौन इच्छा ही फूलन को बीहड़ तक ले आई थी। फूलन उन दिनों अपनी रिश्तेदारी में गई हुई थी। वहां से बाबू सिंह गुर्जर नाम का एक डकैत फूलन को उठाकर बीहड़ में ले जाता है। बाबू सिंह गुर्जर की गैंग में ही एक रंगरूट होता है जिसका नाम विक्रम मल्लाह है। वह फूलन की ही जात का है और फूलन के यौवन पर लट्टू हो जाता है। बागियों की गैंग का एक ओर उसूल होता है कि लौंडिया पर पहला हक गैंग के सरदार का होगा। लेकिन विक्रम मल्लाह को फूलन का बाबू सिंह गुर्जर के साथ हमबिस्तर होना नागवार गुजरता है। फूलन यह बात भी भली भांति जानती है कि विक्रम उस पर लट्टू हुआ पड़ा है। लेकिन फूलन वह सब स्वीकार करती है जो गैंग का उसूल है। बागियों की सल्तनत में क्या ? उसूल और काहे की आजादी। 315 माउजर की 8 MM की नली के आगे या तो मरो या मार डालो। विक्रम मल्लाह एक दिन अचानक मौका देखकर अपने सरदार बाबू सिंह गुर्जर की हत्या कर देता है और खुद गैंग का सरदार बन बैठता है। बाबू सिंह गुर्जर की हत्या के बाद विक्रम को गैंग और फूलन दोनों मिल जाती है। लेकिन फूलन की किस्मत में अब भी हांफना ही बचता है बस मरद बदल जाता है।

वक्त गुजरता है और सलाखों में बन्द एक खूंखार बागी लालाराम वापस गिरोह में लौटता है। विक्रम मल्लाह भी इसी लालाराम का शार्गिद है तो एक बार फिर गैंग का सरदार और फूलन का मरद दोनों बदल जाते है। इस बात से परेशान विक्रम अपनी नई गैंग बना लेता है और ठाकुरों की गैंग से उसकी छिटपुट झड़पें चलती रहती है। एक दिन बड़ी मुठभेड़ में विक्रम मल्लाह ढेर हो जाता है। लालाराम की गैंग फूलन को उठाकर बेहमई गांव ले जाती है जहाँ उसके साथ बलात्कार होता है। 

अब यहां एक और बात समझने की जरूरत है कि फूलन को बेहमई गांव ही क्यों ले जाया जाता है। जबकि लालाराम और राम ठाकुर तो बेहमई गांव के नहीं थे। राम ठाकुर का गांव बेहमई गांव के पास ही दमनपुर है तो इस पूरी कहानी में बेहमई गांव की क्या भूमिका है। नदी के किनारे बसा यह गांव बागियों के छिपने का बढ़िया और सुरक्षित ठिकाना हुआ करता था। जबकि इस गांव के लोग ना तो राम ठाकुर की गैंग में शामिल थे और ना ही फूलन पर उन्होंने कोई अत्याचार किया। बल्कि बेहमई गांव के लोग तो खुद ही इन बागियों से परेशान थे। ये बागी जब मन आये तब ही इस गांव के लोगों को धमकाकर रासन, पैसे और जरूरी सामान ले जाया करते थे। 

बेहमई गांव से फूलन जैसे तैसे बच निकलती है और यहां से देश और बीहड़ दोनों के जातीय समीकरण तेजी से बदलते है। यह ठीक वहीं दौर था जब मान्यवर काशीराम 'तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार' का झंडा उठाये हुए थे और लालू जैसे दोगले समाजवादियों ने भूरा बाल साफ करो कि अमल(अफीम का पानी) पिछड़ों को चटा दी थी।

ये सब कवायद तो संसद का समीकरण बदलने की थी लेकिन संसद से पहले इस समीकरण की चपेट में बीहड़ आ गया। उस वक्त बीहड़ में हर दूसरी गैंग ठाकुरों की थी। हर दूसरी गैंग का सरदार भी ठाकुर ही हुआ करता था। लेकिन बाकी जातियों ने तय कर किया कि अब ठाकुरों की गैंग में रहकर पिट्ठू लादने से अच्छा है कि खुद की गैंग बना ली जाए और फूलन ने इस काम के लिए एक बहाना दे दिया। ठाकुरों की गैंग से परेशान दूसरे रंगरूट फूलन को साथ लेते है और एक दिन बेहमई गांव पहुंच जाते है। वहां फूलन द्वारा एक आवाज दी जाती है कि राम ठाकुर और लालाराम कहाँ है। उसके बाद पूछा जाता है कि इस गांव से राम ठाकुर की गैंग को रसद कौन देता है। मतलब फूलन अपने साथ हुए बलात्कार का बदला लेने नहीं बल्कि उस गांव के लोगों को इस लिए मारने गई थी कि वे राम ठाकुर को रसद देते थे। 

एक रिपार्ट यह भी बताती है कि बेहमई कांड में गोली चलाने का आदेश खुद फूलन ने नहीं दिया था। जबकि फूलन तो गोलीबारी के बीच इतना कांप गई कि उससे बंदूक की एक गोली तक नहीं चली। गोली चलाने का आदेश फूलन के पीछे खड़े गैंग के दूसरे सरदार ने दिया। 

बेहमई गांव में फूलन की गैंग द्वारा की गई ठाकुरों की हत्या ने पूरे देश मे सनसनी ला दी। फूलन एक बड़ी आबादी के लिए आदर्श बन गई। लोकतंत्र में एक वर्ग का आदर्श बराबर एक वोटबैंक का ठेकेदार भी होता है। मीडिया अब तक इस हेड लाइन के साथ गाल बजाता है कि अपने ऊपर हुए अत्याचार का बदला लेने के लिए फूलन ने ठाकुरों को मौत के घाट उतार दिया। 

यहां से राजनीति की चौसर जमती है। ठाकुरों की गैंग फूलन को सलटाने के लिए बीहड़ छान मारती है लेकिन फूलन का जिंदा रहना अब राजनीतिक समीकरणों को जिंदा रखने के लिए जरूरी हो गया था। फूलन के साथ जिस मल्लाहों की गैंग ने बेहमई कांड किया था वह पूरी गैंग अचानक भूमिगत हो जाती है और उत्तर-प्रदेश के बीहड़ों को छोड़कर मध्य-प्रदेश के बीहड़ों में गुजर बसर करती है। मध्य-प्रदेश में उन दिनों दलित और पिछड़ों के मसीहा अर्जुन सिंह शासन कर रहे थे। फूलन का ठाकुरों की किसी गैंग के साथ सीधी मुठभेड़ में गिराया जाना एक वोटबैंक का बड़ा नुकसान था। इसलिए फूलन को भीतर से कितना राजनीतिक संरक्षण मिला इस बात से रत्तीभर भी इनकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन फूलन को बहुत जल्दी समझ आ गया कि इन हालातों में बीहड़ में बसर करना ज्यादा दिन मुमकिन नहीं हो पायेगा। अंततः 14 फरवरी 1981 को फूलन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने आत्मसमर्पण कर देती है। जेल काटने के बाद मुलायम सिंह यादव फूलन को संसद पहुंचा देते है। 

राजनीतिक समीकरण फिर बदलते है और उत्तर प्रदेश के दलित बहुजन समाज पार्टी के पीछे लामबंद होते है। मुलायम को समझ आ जाता है कि अब फूलन का पोलिटिकल माइलेज पहले वाला नहीं रहा क्योंकि दलित वोटबैंक मायावती के पीछे हो लिया था। समाजवादी पार्टी को समझ आया कि कैसे भी ठाकुरों को लपक लिया जाए तो माइलेज का मामला जम जाएगा। चरकनगर की एक राजनीतिक सभा से इसकी शुरुआत होती है जहां मंच पर फूलन और मुलायम सिंह दोनों होते है। फूलन का भाषण होता है वह कहती है कि "ठाकुरों का मेरे ऊपर बहुत उपकार है। जब मैं बीहड़ में चारो तरफ से घिर गई थी तो इसी इलाके के ठाकुर जसवंत सिंह सेंगर की कृपा से मेरी जान बच पाई।"

ओह माय गॉड व्हाट इज दिस? फेमिनिज्म का मेकअप उतार कर थोड़ा पॉलिटिक्स भी समझा करो ना डार्लिंग।

उसके बाद जानती हो क्या हुआ डार्लिंग ? एक कुसमा नाइन नाम की बागी भी हुई थी उसी बीहड़ में। फूलन से कहीं ज्यादा क्रूर और बर्बर। उन दिनों वह फूलन के जानी दुश्मन लालाराम की गैंग की कमांडर हुआ करती थी। एक दिन कुसमा बेहमई कांड का बदला लेने के लिए फूलन की जाति के 13 मल्लाहों को लाइन में लगाकर 325 माउजरों से भून देती है इस ऐलान के साथ कि मैंने ठाकुरों की हत्या का बदला लिया है।

फूलन और कुशमा की आपसी हत्या प्रतिस्पर्धा में ही भदेख रियासत अंतर्गत रोमाई देवरा गांव वीराने में बदल गया और उससे जुड़ी 2500 एकड़ उपजाऊ जमीन आज भी बंजर है ।

जो फूलन ने बोया वह कुसमा ने काट लिया। उधर 20 मारे गए। मैंने कहा था ना कि बीहड़ की तो तासीर ही ऐसी है कि गोली का बदला बस गोली होती है। दिल किया तो तुम्हें कभी कुसमा नाइन की कहानी भी सुना देंगे। 

साभार:- ✍️

राजा_राममोहन_रॉय

"#राजा_राममोहन_रॉय को 31वर्ष की उम्र में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने पेरोल (नौकरी) पर रखा। उसने अपना कैरियर क्लर्क के रूप में शुरू किया, और उत्तरी बंगाल के मुर्शिदाबाद अपीलेट कोर्ट के रजिस्ट्रार थॉमस वुडफोर्ड के प्राइवेट क्लर्क (मुंशी) के पद पर पदोन्नति पाया। अंततः उसे ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा दी गई "राजा" की उपाधि मिली। उसने विलियम केरी से सांठगांठ किया, और उसको ब्रिटिश द्वारा ब्रिटिश भारत में "भारतीयों" के लिए शिक्षा तंत्र के सुधारक के रूप में प्रचारित किया गया। बौद्धिक वेश्याएं प्रत्येक स्थान पर हैं। इस तरह "बंगाल माफिया" ब्रिटिश इंडिया में सांठगांठ करने वाले अन्य लोगों से बाजी मार लिया"। 

: प्रदोष अईच 

यह लेख उद्धृत है प्रदोष aich द्वारा 2015 में लिखी गई एक रिसर्च पुस्तक "TRUTHS" में। पेज 407

इसलिए लिखा गया है कि लोगों को आज भी भ्रम है कि राम मोहन राय कोई राजा थे।
समाज सुधारक थे। 
 
पुस्तक की स्नैप शॉट भी है। 
इस पुस्तक ने विलियम जोन्स, मैक्समूलर मैकाले आदि समस्त फ्रॉडेस्टर का भांडा फोड़ किया है। 

राजा राम मोहन राय कोई राजा नहीं थे। मुंशी थे कचहरी में। 
 यह टाइटल अंग्रेजों ने उन्हें अपना पिट्ठू बनाने के लिए और अपना हित साधने के लिए उन्हें दिया था। 

लेकिन इतिहास में उन्हें समाज सुधारक बताया गया है। 
किस समाज का सुधारक?
जो समाज अनंतकाल से ईसाई लुटेरों के आने के पूर्व तक विश्व की 25% जीडीपी का उत्पादक था। 
क्या सुधार करता वो व्यक्ति?
आज लोग जीडीपी से परिचित हैं। 
आज चीन की जीडीपी भारत की तुलना में पांच गुना है। अमेरिका से थोड़ा पीछे। 
वहां किसी सुधारक की आवश्यकता अनुभव नहीं करता कोई?
न चीनी, और न कोई ईसाई।
क्यों?
यही है #इति_हास्य का #इतिहास। 

आप उपरोक्त हैशटैग को दबाइए तो आपको ऐसे ऐसे लेख मिलेंगे कि आपको भ्रम हो जाएगा कि इस नाम का कोई देवदूत अवतरित हुआ था भारत की धरती पर।

यही होती है नरेटिव बनाने की कला। पढ़े लिखे लोग इन्हीं अफवाहों के शिकार हैं। 
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