मुल्तान का भव्य सूर्य मंदिर, कश्मीर का मार्तंड सूर्य मंदिर, महोबा का सूर्य मंदिर, कोणार्क का सूर्य मंदिर, सूदूर पूर्वोत्तर के भुवन पहाड़ी पर बसे शिव मंदिर, 52 शक्तिपीठ, चार धाम और द्वादश ज्योतिर्लिंग, तमिलनाडु और दक्षिण के हम्पी आदि क्षेत्रों के भव्य मन्दिर से लेकर जावा, सुमात्रा, अंकोरवाट और बोरोबदूर के भव्य मंदिर ये सब हमारे लिए केवल मूर्तिपूजा के केंद्र नहीं थे बल्कि विश्व के सर्वोत्कृष्ट सभ्यता के हस्ताक्षर थे।
हमारे ये मंदिर हिंदू एकात्मता और सहभागिता के भी सेंटर थे क्योंकि इनके निर्माण के लिये क्षत्रिय राजाओं ने लिए भूमि और संरक्षण दिये थे, ब्राह्मणों ने इसमें प्रतिष्ठित ईश्वर के लिए स्तुति और वंदनायें रची थी और कठोरता से शुचिताओं का पालन करते हुए इसकी पवित्रता को अक्षुण्ण रखा था। वैश्यों ने इसके निर्माण के लिए धन दिया था और आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए धर्मशालाएं बनवाई, प्याऊ लगवाए थे और शूद्रों ने इन मंदिरों को वो वास्तु दी थी कि दुनिया आज भी विस्मित होकर दांतों तले अंगुली दबाए हैरान खड़ी है।
इसीलिए जब नोबेल विनर नायपॉल मार्तंड सूर्य मंदिर के ध्वंस स्तंभों के पास जाकर व्यथित हो गए थे तो वो व्यथा केवल एक मंदिर टूटने की व्यथा नहीं थी बल्कि वो व्यथा थी स्थापत्य के एक बेजोड़ नमूने के टूटने की जिसके पीछे उस समय के अभियंताओं का श्रेष्ठ मस्तिष्क और कारीगरों की श्रेष्ठ कला सम्मिलित थी। वो व्यथा थी उस मन्दिर में प्रांगण में उकेरी कर मूर्ति और चित्रों को रौंदे जाने की जो किसी मूर्तिकार और चित्रकार के जीवन भर का समर्पण था। वो व्यथा थी ज्ञान के उस केंद्र के ध्वंस का जिसे भारत भर के न जाने कितने ही ब्राह्मणों ने अपने तप और अनुष्ठान से सींचा था। वो व्यथा थी उस अर्थ तंत्र के तोड़े जाने की जो उस मन्दिर के कारण वहां बना हुआ था। वो व्यथा थी उस स्थल के ध्वंस की जो भारत की सांस्कृतिक एकबद्धत्ता का प्रमाण था। वो व्यथा थी कृतज्ञता ज्ञापन के उस प्रतीक के ध्वंस का जिसे हमारे पूर्वजों ने सृष्टि के संचालक और प्रकृति के रक्षक सूर्य नारायण की आराधना के लिए बनाया हुआ था।
और इसलिए जब वी एस नायपॉल ने भारत को एक "आहत सभ्यता" नाम दिया था तो उसकी वजह यही थी कि बर्बर आक्रांताओं के हमलों ने भारत की सभ्यता को ही लहूलुहान कर दिया था जिससे भारत को उबारना हमारे जैसों के जीवन का ध्येय है।
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