Thursday, 27 August 2026

शूद्र दलित


19वीं शताब्दी में एक अँग्रेज मिशनरी ने दलित वर्ग की कल्पना की। दलित को शूद्र से जोड़ा गया कि शूद्र दलित है, इसके आगे शूद्र को अनार्य से जोड़ा गया कि शूद्र अनार्य है और अनार्य को दलित से जोड़ा गया। 
इस प्रकार दलित सताने का 3000 वर्ष पुराना ऐतिहासिक क्रम बन गया।
बुनकरों का अँग्रेज ने हाथ काटा, उनके उद्योग को नष्ट कर भारत में अपने वस्त्रों का बाजार बनाया। 
इस इतिहास को ढ़कने के लिए एकलव्य के अँगूठा काटने की कहानी प्रचलित की गई, 
गोवा में हथकट्टा खंभा आज भी खड़ा है, उसकी क्रूर कहानी प्रचारित नहीं होने दी गई। 
क्योंकि अँग्रेज और पुर्तगाली रिस्तेदार हैं। अँग्रेजी राज में पुर्तगाली राज ने बेटी व्याही, अँग्रेज को दहेज में मुंबई दे दी। 
न हथकट्टे खंभे का और न बुनकरों के हाथ काटने का इतिहास पढ़ाया और न इस तथ्य को चर्चा में आने दिया गया।
एकलव्य का अँगूठा काटे की कहानी फैलायी गया। 
इनका उद्देश्य स्पष्ट है कि हिन्दू को तोड़- फोड़कर रखना है।
भारत कहने के लिए स्वतंत्र है। 
यहाँ चलती किसकी है? 
सेंट जेवियर की, मैकाले की, कामरेडों की, विदेशी विधर्मियों की। 
इन्हीं के मोहरे नैरेटिव खेला करते हैं। 3000 वर्षों से दलित, शूद्र , अनार्य सताए जाते रहे।
गाँधी वध के बाद 10, 000 पुणे में और पुणे के आसपास नगरों में हजारों ब्राह्मण का नरसंहार हुआ। 
किन लोगों ने किया यह नरसंहार? लोग कहते हैं काँग्रेसी गाँधी भक्तों ने। वे काँग्रेसी कौन लोग थे? 
अज्ञात हैं, उनकी खोज क्यों नहीं की गयी? इंदिरा गाँधी की हत्या काल में 3000 सिक्खों का नरसंहार हुआ उस मुकद्दमा चला, न्याय हुआ। 
पुणे में ब्राह्मण नरसंहार हो या काश्मीर में ब्राह्मण नरसंहार इन दोनों में केस का FIR तक नहीं हुआ।
 क्यों? 
महाराष्ट्र का इतिहास उत्तर भारत में दुहराने की कोशिश हो रही है। उत्तर प्रदेश, बिहार में अबेडकर की महार जाति का बामन मेश्राम जहर उगल रहा है। आत्मरक्षार्थ रणवीर सेना कमर कसने लगी है।

ऐसा लगता है कि भारत को एक बार फिर स्वाधीनता का संघर्ष करना होगा, अँग्रेज के उन मुहरों के खिलाफ संघर्ष करना होगा जो घूम- घूमकर जहर उगल रहे हैं।

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