Tuesday, 4 November 2025

मनु 36 क्रमशः

मनुस्मृति (३६)

मनु की करुणा का विस्तार पेड़ों तक पर था और वे उनमें अंत:संज्ञा का होना मानते थे। वे अन्तश्चेतना कहने की जगह अन्त:संज्ञा क्यों कहे होंगे, इस पर विमर्श हो सकता है। पर इसमें शक नहीं कि उन्हें पेड़ों की आंतरिक संज्ञा का पता था और यह किसी रूपक की तरह नहीं, किसी मानवीकरण अलंकार की तरह पेड़ों  को सजीव की तरह चित्रित करने वाली बात नहीं थी। plant sentience की मनु ने स्पष्ट घोषणा की है।वे कहते हैं कि :

उद्भिज्जाः स्थावराः सर्वे बीजकाण्डप्ररोहिणः । ओषध्यः फलपाकान्ता बहुपुष्पफलोपगाः ॥ 

कि बीज और शाखा-खण्ड से उत्पन्न होने वाले सब स्थावर जीव वृक्ष आदि 'उद्भिज्ज' यानी भूमि को फाड़कर उगने वाले कहाते हैं। इनमें फल आने पर पककर सूख जाने वाले और वे भी शामिल हैं जो 'ओषधि' कहलाते हैं और वे भी जिन पर बहुत फूल-फल लगते हैं।

अपुष्पाः फलवन्तो ये ते वनस्पतयः स्मृताः ।
पुष्पिणः फलिनश्चैव वृक्षास्तूभयतः स्मृताः ॥ 

कि जिन पर बिना फूल आये ही फल लगते हैं, वे वनस्पतियाँ' कहलाती हैं और फूल लगकर फल लगने वाले दोनों से युक्त होने के कारण वे उद्भिज्ज स्थावर जीव 'वृक्ष' कहलाते हैं ॥

गुच्छगुल्मं तु विविधं तथैव तृणजातयः ।
बीजकाण्डरुहाण्येव प्रताना वल्ल्य एव च ॥

कि अनेक प्रकार के जड़ से गुच्छे के रूप में बनने वाले 'झाड़' आदि एक जड़ से अनेक भागों में फूटने वाले 'ईख' आदि उसी प्रकार घास की सब जातियाँ, बीज और शाखा से उत्पन्न होने वाले उगकर फैलने वाली 'दूब' आदि और उगकर किसी का सहारा लेकर चढ़ने वाली बेलें ये सब स्थावर उद्भिज्ज हैं।

तमसा बहुरूपेण वेष्टिताः कर्महेतुना।
अन्तःसंज्ञा भवन्त्येते सुखदुःखसमन्विताः ॥ 

कि कर्म-कारण से बहुत प्रकार के तमोगुण से आवेष्टित ये स्थावर जीव सुख और दुःख के भावों से संयुक्त हुए आन्तरिक चेतना वाले होते हैं। यानी इनके भीतर चेतना होती है, किन्तु चर प्राणियों के समान बाहरी क्रियाओं में प्रकट नहीं होती। अत्यधिक तमोगुण के कारण चेतना और भावों का प्रकटीकरण नहीं हो पाता है।

कर्महेतु वृक्षों के साथ भी मनु के यहाँ उतना ही सक्रिय है जितना अन्य जीवों में। भले ही तमस से आवेष्टित हो और उस आविष्टि के प्रकार अनेक तरह के हों, पर वह है अवश्य। कर्मचक्र से वे भी मुक्त नहीं हैं बल्कि उन्हीं का परिणाम हैं। वेंडी डोनिगर मनु के इस श्लोक को यों प्रस्तुत करती हैं : “From the combination of the elements and the qualities, the Great Self created all sorts of immobile creatures, some of which are conscious inside but are shrouded in a great darkness in many ways because of the cause of their actions; these are the ones who experience happiness and suffering.”

इसी के समकक्ष आप ईश्वरीय पुस्तकों का हाल देखिए। बाइबल कहीं नहीं कहती कि पेड़ों में संज्ञा होती है – मतलब विचार, जागरूकता, आत्म-जागरूकता, भावना या मनुष्यों/जानवरों जैसी व्यक्तित्व नहीं। वहाँ पेड़ सृष्टि का हिस्सा हैं, जीव नहीं। सृष्टि उत्पत्ति की पहली कथा में तीसरे दिन  पौधे और पेड़ बिना नफ़श – आत्मा/साँस के निर्मित हुए । पाँचवे और छठवें दिन जानवर और मनुष्य हुए जिनमें जीवित आत्मा है। “और परमेश्वर ने कहा, पृथ्वी हरी घास, बीजवाले पौधे और फलदायक वृक्ष उगाए…” (उत्पत्ति 1:11) — यहाँ कोई आत्मा नहीं।फिर कहा गया “और परमेश्वर ने… हर एक जीवित प्राणी को बनाया…” (उत्पत्ति 1:21) — आत्मा यहाँ से शुरू होती है। यह भी कहा गया कि The land produced vegetation: plants bearing seed according to their kinds and trees bearing fruit with seed in it according to their kinds. लेकिन जब “living creatures” की बात कही गई तो उसमें पेड़ नहीं बताये गये। जबकि मनु जीवों के प्रकार बताते हुए उसमें उद्भिज्ज स्थावर जीवों के रूप में तरुओं को बताते हैं। 

बाइबिल में काव्यात्मक मानवीकरण आम है, लेकिन पेड़ों की अन्त:संज्ञा की बात कहीं नहीं है। साहित्यिक मानवीकरण हिब्रू काव्य शैली है जहाँ पेड़ “ताली बजाते”, “गाते” या “चिल्लाते” हैं, पर ये रूपक हैं। ईसैया में कहा गया : “तुम आनन्द के साथ निकलोगे… पहाड़ और टीलों के सामने गीत गाएँगे, और खेत के सब वृक्ष ताली बजाएँगे।” या Psalm में कहा गया : “खेत और उसकी हर वस्तु आनन्दित हों; तब जंगल के सब वृक्ष यहोवा के सामने गाएँगे…”। ये मानवीय रूपक हैं, जैसे “सूरज मुस्कुराता है” या “हवा फुसफुसाती है”। ये सृष्टि की परमेश्वर के प्रति प्रतिक्रिया दिखाते हैं, न कि स्वतंत्र जागरूकता।
यहेजकेल 31:8-9 में कहा गया कि ईडन के पेड़ “उससे डाह” करते हैं। यह स्पष्ट रूप से गर्व और तुलना का प्रतीक है जिसमें मानवीय क्रियाएँ चीजों पर अध्यारोपित कर दी जाती हैं पर यह किसी जीव की वास्तविक ईर्ष्या नहीं।यीशु और अंजीर के पेड़ (मरकुस 11:13-14, 20) का एक प्रसंग है जहाँ यीशु ने फल न होने पर अंजीर के पेड़ को श्राप दिया है। यानी यीशु मनु की तरह पेड़ की सीमाएँ समझने की जगह उसे शापित करते हैं। और यह पेड़ “जानता” या “प्रतिक्रिया” नहीं देता – निष्क्रिय रूप से बस मुरझा जाता है। 1 कुरिन्थियों 15:39 में पौलुस भेद करते हैं – मनुष्य, पशु, पक्षी, मछली के बीच में। वहाँ पुन: पौधे जीवित आत्मा के रूप में शामिल नहीं किये गये हैं। 

बाइबल कभी पेड़ों को चेतना, आत्मा या व्यक्तित्व नहीं देती। ताली बजाना, गाना या जानना – सब काव्यात्मक, प्रतीकात्मक या दृष्टांत हैं – जीवित  प्राणी की संज्ञा का स्वीकार नहीं हैं। पेड़ परमेश्वर की निर्मिति हैं, उनके अधीन हैं,पर संवेदी प्राणी नहीं हैं। इस बात में पुराने से नये टेस्टामेंट तक आते आते कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। 

तौरात (Torah) भी स्पष्ट रूप से पौधों (पेड़ों या वनस्पतियों) को चेतना (consciousness) या संवेदनशीलता (sentience) का दर्जा नहीं देती – अर्थात् विचार, भावना, आत्म-जागरूकता या दर्द महसूस करने जैसी क्षमता उनमें नहीं बताती।तौरात (मुख्य रूप से पेंटेट्यूक – उत्पत्ति से यहोशू तक) पौधों को सृष्टि का हिस्सा मानती है, जो जीवन का आधार प्रदान करते हैं, लेकिन वे जीवित प्राणियों (nefesh chayah) की श्रेणी में नहीं आते। 

इंजील ( न्यू टेस्टामेंट) ने भी यही मान्यता जारी रखी है। जबकि मनु के बारे में वेंडी डोनिगर यह मानती हैं कि Manu endows even the immobile with a veiled sentience… these creatures, though dark and formless, partake in the universal drama of sukha and duhkha, echoing the Upanishads’ insistence that all life bears the fruits of karma. 

कुरान मजीद में सृष्टि की हर चीज़ अल्लाह की शान में गौरव गायन करती है, जिसमें निर्जीव वस्तुएँ जैसे पेड़ शामिल। उसके अनुसार मनुष्य इस “प्रशंसा” को नहीं समझते, जिससे मनुष्य की बौद्धिक सीमाओं का संकेत मिलता है। कुछ विद्वान (जैसे तफ़सीर अल-मिज़ान में) इसे पौधों में बुनियादी “अंतरात्मा” या सृष्टिकर्ता की जागरूकता के रूप में देखते हैं, जो अल्लाह की अनंत चेतना से निकलती है।वह यों भी है कि : “और तारे और वृक्ष सजदा करते हैं।” (सूरह अर-रहमान 55:6)
“क्या तुम नहीं देखते कि अल्लाह को वह सब सजदा करता है जो आकाशों और पृथ्वी में है – सूरज, चाँद, तारे, पहाड़, वृक्ष और चलने वाले जीव…” (सूरह अल-हज्ज 22:18)
“उनकी परछाइयाँ दाहिने-बाएँ झुकती हैं, अल्लाह को सजदा करती हुईं, विनम्रता के साथ।” (सूरह अन-नहल 16:48, पौधों के संदर्भ में)। पर “सजदा” यहाँ रूपक है – जैसे पेड़ प्रकाश की ओर झुकते हैं या हवा में झूमते हैं, जो समर्पण का प्रतीक है। तफ़सीर इब्न कथीर जैसे टीकाकार इसे प्राकृतिक आज्ञाकारिता कहते हैं, न कि सचेत चुनाव। फिर भी, सूफ़ी और दार्शनिक परंपराएँ (जैसे इब्न अरबी या आधुनिक विद्वान सैयद हुसैन नसर) इसे स्तरित चेतना मानती हैं: पेड़ खनिजों से अधिक “जागरूक” हैं, पशुओं से कम, क्योंकि सब अल्लाह की सर्वोच्च जागरूकता से आते हैं। पर कुरान सृष्टि के स्तर भेद करता है: मनुष्यों में रूह (आत्मा) और बुद्धि है (सूरह अल-हिज्र 15:29)। पशुओं में जीवन और सहज ज्ञान (सूरह अल-अनआम 6:38)। पौधे/वृक्ष “उगाए गए” प्रावधान हैं, बिना नफ़्स (आत्मा) या स्वतंत्र इच्छा का उल्लेख (सूरह अन-नहल 16:10-11)।हदीसें उसमें  सूक्ष्मता जोड़ती हैं: एक में पेड़ “रोता” है जब नबी उससे हटते हैं (सहीह बुखारी 2:23:377), जो भावना दर्शाता है, पर यह नबी का चमत्कार है, सामान्य नियम नहीं। दूसरी हदीस “आत्मावाले” चित्र बनाने से रोकती है पर पेड़ों की अनुमति देती है (सहीह बुखारी), जो संकेत करता है कि पौधों में पूर्ण आत्मा नहीं।

लेकिन मनु स्पष्ट रूप से पेड़ों के Karmic veil के बारे में बात करते हैं। तमस शब्द के प्रयोग से वही karmic obfuscation मनु बताते हैं। अपने एक अन्य ग्रन्थ On Hinduism में वेंडी डोनिगर मनु के इस श्लोक को हिन्दुओं की उस हरित धर्मशास्त्रीयता ( green theology) से जोड़ती हैं जिसमें पर्यावरण चेतना है।

पर यह स्पष्ट है कि मनु की यह स्थापना वैदिक विश्वदृष्टि के अनुसार ही थी। वैसे भी मनु श्रुति प्रामाण्य के अनुसार ही स्मृति का निर्वचन करने का आग्रह बार बार करते हैं। 

उधर पश्चिम में इस विचार का प्रारंभिक प्रस्ताव 1811 में जेम्स पर्चर्ड टपर (An Essay on the Probability of Sensation in Vegetables) ने प्रस्तुत किया जिसने कहा कि पौधों में “निम्न स्तर की संवेदना” होती है, जिसमें दर्द या सुख शामिल है। यह मनु के ‘सुखदुखसमन्विता’ जैसा ही कुछ था। 1848 में गुस्ताव फेश्नर ने कहा कि पौधे भावनाएँ महसूस करते हैं और मानवीय स्नेह, ध्यान और “बात” से बढ़ते भी हैं। पर यह सब प्रस्ताव और कथन जगदीश चंद्र बसु की तरह किसी वैज्ञानिक परीक्षण से निकले निष्कर्ष नहीं थे। चार्ल्स डार्विन और फ्रांसिस डार्विन ने The Power of Movement in Plants नामक अपने लेख में जड़ के मस्तिष्क की परिकल्पना की कि जड़ की नोक एक आदिम मस्तिष्क की तरह काम करती है और गुरुत्व, स्पर्श आदि का पता लगाती है।यह आदिम मस्तिष्क का भाव मनु के किसी नैकट्य तक पहुँचना था। 1884 में जॉन एलोर टेलर (The Sagacity and Morality of Plants) ने पश्चिम में पहली बार पौधों को स्पष्टतया चेतन एजेंट कहा। थॉमस जी. जेंट्री (Intelligence in Plants and Animals) ने 1900 में पौधों में चेतना और आत्मा की बात की क्योंकि वे खतरे पर बुद्धिमानी से प्रतिक्रिया देते हैं। किन्तु जगदीश चंद्र बसु ने ही पहली बार क्रेस्कोग्राफ बनाया; चोट, एनेस्थेटिक पर पौधों की विद्युतीय प्रतिक्रिया मापी। Response in the Living and Non-Living (1902) और The Nervous Mechanism of Plants (1926) में इसे “दर्द” और तंत्रिका-जैसा बताया।

उसके बाद से मनु की दिशा में पश्चिम में बहुत प्रगति हुई है। क्लीव बैक्स्टर के प्रयोग हुए हैं। पौधों में टेलीपैथिक संचार और दर्द की अनुभूति बताने वाली पीटर टॉम्पकिंस और क्रिस्टोफर बर्ड की पुस्तक The Secret Life of Plants बेस्ट सेलर रही है। उसे छद्म विज्ञान कहा गया लेकिन इस 21वीं सदी ने पुन: मनु की ओर इस मामले में रुख किया है। एंथनी ट्रेवावास के 2003-5 के प्रयोगों की वैज्ञानिकता और प्रामाणिकता पर कोई संदेह नहीं किया जा सका। उसने “पादप बुद्धिमत्ता” पर शोध करने सोसाइटी फॉर प्लांट न्यूरोबायोलॉजी (2005) शुरू की। 2016 में आई पीटर वोलेबेन की पुस्तक The Hidden Life of Trees एक और बेस्टसेलर रही। 2017 में क्योहेई तोमियामा और फ्रांटिसेक बालुस्का ने दर्द दमन” का प्रयोगात्मक प्रमाण पेश किया। उन्होंने सिद्ध किया कि अरेबिडोप्सिस की जड़ में “निर्णय केंद्र” है एनेस्थेटिक गति रोकता है। यह मनु के तामस जैसी ही बात थी। अब 2025 में पादपों के सामूहिक जीवन और उनके आपसी संप्रेषण तंत्र के प्रमाण भी आ गए हैं। 

यह अवश्य है कि बाइबल की अवधारणा के कारण अब भी पश्चिमी वैज्ञानिक जगत् में पेड़ों की अन्त:संज्ञा का पूर्ण स्वीकार नहीं हुआ है। हर प्रयोग के निष्कर्ष जब जब इसे प्रमाणित करते हैं तब तब वहाँ लोग उन पर आक्रमण करने पर तुल जाते हैं पर वे स्वयं कोई वैज्ञानिक प्रयोग इस बात को असिद्ध करने हेतु नहीं करते। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, यह स्वीकारने में भी उन्हें समय लगा था।

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