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बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में वर्णित बिम्बिसार के पृथक्-पृथक् चरित्र की ही भांति, दोनों प्रकार के ग्रंथों ने उनकी रहस्यमयी मृत्यु के पार्श्व में दो पृथक्-पृथक् मत देकर उसे और भी अधिक रहस्यमयी कर दिया है।
जैन-आगम उववाई सूत्र के “कुणिक” नामक अध्याय के अनुसार, बिम्बिसार को स्वयं उनके प्रिय पुत्र कुणिक ने बंदी बना लिया था और जब उसकी माता चेलना ने उसे उसके जन्म की कथा सुनाई, तो बिम्बिसार के हृदय में स्वयं के लिए इतना प्रेम जानकार उसे ग्लानि का अनुभव हुआ और पिता को लौह-बंधनों से मुक्त करने के एक विशाल हथौड़ा लेकर स्वयं ही बंदीगृह की ओर दौड़ पड़ा। जब बिम्बिसार को ज्ञात हुआ कि कुणिक एक विशाल हथौड़े के साथ आ रहा है, तो उन्हें हथौड़े के प्रहार से होने वाली अत्यंत पीड़ादायक मृत्यु की पूर्वानुभूति होने लगी और उन्होंने विषपान कर अपेक्षाकृत अल्प पीड़ादायक मृत्यु का वरण कर लिया।
वहीं थेरवादी अष्टकथा (पालि: अट्ठकथा) का संदर्भ लेकर बौद्ध कहते हैं कि बिम्बिसार की हत्या उनके पुत्र कुणिक ने सन् 493 ई.पू. में कर दी थी और मगध की राजनैतिक अस्थिरता का हवाला देकर सन् 492 ई.पू. में स्वयं राज्य बन बैठा। हालांकि ये वही कुणिक है, जिसे स्वयं बिम्बिसार ने विजितभूमि अंगदेश का प्रभारी बनाकर, चम्पा व गंगा के मिलन पर बसे चम्पा नगर का प्रवास करने की आज्ञा दी थी और उसने बड़ी ही कुशलता से अंग के प्रशासन और मगध के जलीय व्यापार को संभाला। अपनी व्यवहार कुशलता के कारण “कुणिक” का उपाख्य पाने वाला राजपुत्र, स्वयं मुझे व्यक्तिगत रूप से कभी इतना कृतघ्न प्रतीत नहीं हुआ कि सत्ता-प्राप्ति के लिए पितृहंता बने। तथापि इतिहास “प्रतीति” पर आधारित नहीं, बल्कि तथ्य-प्रतीकों की उंगली पकड़ कर चलता है। अतः कुणिक द्वारा बिम्बिसार की हत्या के विषय में अधिक विमर्श होना चाहिए।
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जैन-आगम निर्णयवल्लिका सूत्र (प्राकृत: निरयावलिका) के अनुसार जब महारानी चेलना गर्भवती थीं, तो उन्हें मदिरा के साथ बिम्बिसार के हृदय का माँस खाने की इच्छा हुई। ऐसे में, महाराज बिंबिसार और रानी नंदा के अत्यंत बुद्धिमान पुत्र अभयकुमार ने चेलना के लिए हृदय की भांति दिखने वाले एक जंगली फल को भूना और उसका भक्षण कर चेलना अत्यंत ग्लानि व क्षोभ से भर उठीं कि भला किस तरह की पैशाचिक इच्छा उन्होंने की। उन्होंने इस इच्छा की उत्पत्ति के लिए अपने गर्भ में पल रहे प्राणी को मन ही मन पिशाच मान लिया। जब उसका जन्म हुआ, तो महारानी ने अनिष्ट की अशांक से उसे महल से बाहर फिंकवा दिया, जहां एक कुक्कट ने अपनी चोंच से उसकी कनिष्ठा उंगली में घाव रोप दिया।
इस पूरे घटनाक्रम की सूचना जब महाराज बिंबिसार को मिली, तो वे स्वयं बालक को खोजने दौड़ पड़े। बालक को गोद में उठाया, तो देखा कि उसकी कनिष्ठा उंगली में घाव है और रक्त बह रहा है। महाराज ने वैद्य की प्रतीक्षा किए बिना ही पुत्र की उंगली को अपने मुंह से चूसा और इस उपक्रम को उसके स्वस्थ हो जाने तक बारम्बार किया। कनिष्ठा उंगली में घाव और पीड़ा के कारण ही, उस बालक को कुणिक कहा गया। हालांकि महाराज ने उसका नामकरण “अशोकचन्द” किया था।
कालांतर में, जब कुणिक ने अपने पिता को बंदी बनाया, तो उसकी माता चेलना ने बहुत समय तक कुणिक से पिता के स्वतंत्र कर देने का आग्रह किया। किन्तु कोई उपाय काम न आया। एक दिन महारानी चेलना ने कुणिक को उसके जन्म की कथा सुनाई, जिसमें कि उसके पिता द्वारा की गई उसकी प्राण-रक्षा की मार्किक कथा! कुणिक भावुक हो गया, उसे ग्लानि का अनुभव होने लगा और पिता को लौह-बंधनों से मुक्त करने के एक विशाल हथौड़ा लेकर स्वयं ही बंदीगृह की ओर दौड़ पड़ा। जब बिम्बिसार को ज्ञात हुआ कि कुणिक एक विशाल हथौड़े के साथ आ रहा है, तो उन्हें हथौड़े के प्रहार से होने वाली अत्यंत पीड़ादायक मृत्यु की पूर्वानुभूति होने लगी और उन्होंने विषपान कर अपेक्षाकृत अल्प पीड़ादायक मृत्यु का वरण कर लिया।
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ठीक इसी घटनाक्रम को बौद्ध-ग्रंथ तनिक फेर-बदल के साथ बतलाते हैं। उनके अनुसार जब महारानी कोशलादेवी गर्भवती थीं, तो उन्हें बिंबिसार की भुजा से रक्तपान की इच्छा उत्पन्न हुई, जिसे महाराज ने पूर्ण भी किया। किन्तु रक्तपान के पश्चात् वही ग्लानि और क्षोभ, वही पैशाचिक इच्छा की उत्पत्ति के लिए गर्भ में पल रहे प्राणी को पिशाच मान लेना और फिर जन्मोपरांत उसे महल से बहार फिंकवा देना। इस पूरे घटनाक्रम की सूचना जब महाराज को मिली, तो वे स्वयं बालक को खोजने दौड़ पड़े। बालक को गोद में उठाया, तो पाया कि उसकी कनिष्ठा उंगली में व्रण (फोड़ा) है। महाराज ने उस व्रण की ऊष्मा से रोते बालक को शीतलता प्रदान करने के लिए, उस उंगली को अपने मुंह में रख लिया और सहसा वो व्रण फूट गया, तो बिम्बिसार के पुत्रप्रेम की अनंतता देखने को मिली कि उन्होंने व्रण के मवाद को थूकने के लिए मुंह नहीं खोला, अपितु मवाद को चूसकर पी गए, ताकि पूरा व्रण समाप्त हो सके।
किन्तु कुणिक ने सत्ता के लोभ में आकर, ऐसे स्नेहिल पिता को असमय मृत्यु के मार्ग पर भेज दिया! इस घटनाक्रम के विषय में बौद्धों का मत अत्यंत सतही है, सहमति के योग्य नहीं है। चूंकि अपनी व्यवहार कुशलता के कारण “कुणिक” का उपाख्य पाने वाला राजपुत्र, समग्र ऐतिहासिक कथानक में इतना कृतघ्न कभी प्रतीत नहीं होता कि सत्ता-प्राप्ति के लिए पितृहंता बने। अतः बौद्धों के इस विवरण का सत्य होना असंभव-सा लगता है।
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वस्तुतः कुणिक ने सत्तारूढ़ होते ही “वर्षकार” (पालि: वस्सकार) नामक एक अत्यंत गुणवान ब्राह्मण को महामंत्री नियुक्त किया था। ऐन इसी घटना से कुणिक बौद्धों का नेत्र-कंटक बन गया था, तिसपर भी कुणिक ने बौद्धों के प्रति कोई दुर्व्यवहार नहीं किया, बल्कि अपने पिता के द्वारा दिए गए राज-प्रश्रय को अनवरत रखा था, किन्तु बौद्धधर्म के प्रति उनमें एक उदासीनता थी। पालिग्रंथ उसे अत्यंत महत्वाकांक्षी पुरुष के रूप में वर्णित करते हैं, चूंकि उसने उत्तर में स्थित श्रावस्ती और लुम्बिनी की राजनीति में मगध का महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप बनाए रखने के लिए बुद्ध के चचेरे भाई और प्रतिद्वंद्वी देवदत्त के साथ गठबंधन कर लिया था, जिसे पालिग्रंथों ने शाक्यों के राज्य को भी मगध में समाहित कर लेने की बड़ी सोची समझी गई साजिश के रूप में वर्णित किया है।
बहुत से हिंसात्मक युद्धक अभियानों के पश्चात्, जब कुणिक के जीवन की साँझ हुई, तो उनकी राजसभा में वैदिक विद्वानों का जमघट लगा रहता था। वस्तुत: बौद्धों को कुणिक में एक वैदिक क्षत्रिय सम्राट का दर्शन होने लगा था। प्रजा भी अपने राजा की धार्मिक रुचियों पर न चल पड़े, संभवतया इसी इसी हेतु से बौद्धग्रंथों ने कुणिक को पितृहंता कलंक से कलंकित किया हो! हालांकि कई बौद्धग्रंथ उन्हें अपने पिता की ही भांति बौद्ध धर्म का संरक्षक भी बतलाते हैं। उनका उल्लेख कई बौद्ध ग्रंथों में मिलता है, यथा- महापरिनिब्बान सुत्त, जिसमें कि बुद्ध के अंतिम दिनों में कुणिक उनसे भेंट करते हैं। कुणिक द्वारा बौद्ध धर्म के प्रति समर्थन ने क्षेत्र में इसके प्रसार और सुदृढ़ीकरण में योगदान देना जारी रखा।
बहुत संभव है कि बौद्ध-ग्रंथों के अनुसार उसने सीधे वध का मार्ग अपनाया और पितृहत्या के पश्चात् अपने जन्म का सत्य जानकर अपनी माता के प्रति क्रोध से भर गया। अथवा कि जैन-ग्रंथों के अनुसार पिता को बंदी बनाया, किन्तु जन्म का सत्य जाकर उन्हें मुक्त करने दौड़ा, तो पाया कि पिता विषपान किए मृत पड़े हैं और अपनी माता के प्रति क्रोध से भर गया। हालांकि एक निष्पक्ष अध्येता के लिए, आज ढाई हजार वर्ष पश्चात् यह निर्णय कर पान तो असंभव कि दोनों ही धर्म के ऐतिहासिक स्रोतों में शत-प्रतिशत सत्य कौनसा स्रोत रहा होगा, किन्तु यह निश्चय अवश्य किया जा सकता है कि उक्त घटनाक्रम के परिणाम क्या रहे?
मूल रोचकता यही कि दोनों ही घटनाक्रमों के उपरांत आए परिणाम एकदम समान थे- बिम्बिसार का शासन व जीवन दोनों समाप्त हुए एवं जन्म के सत्य को उससे छुपाये रखने के लिए अपनी दोनों माताओं के प्रति क्रोध से भरे हुए कुणिक ने मगध की सत्ता संभाली। और अपने पिता की ही विस्तारवादी नीति पर चलकर दोनों ही माताओं के राज्यों को युद्ध में पराभूत किया और मगध को अभूतपूर्व प्रतिष्ठा प्रदान की।
इति।
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