Sunday, 30 November 2025

पूर्णाहुति की विशेषता

"पूर्णाहुति की विशेषता: शास्त्रीय, तांत्रिक और वैदिक-कर्ममीमांसा दृष्टि से एक शोधपरक विवेचन"

✓•१. प्रस्तावना: यज्ञ-परंपरा का अंतिम, सर्वोच्च तथा संपूर्णता-सूचक चरण पूर्णाहुति है। यह केवल अग्नि में अर्घ्य-समर्पण या पदार्थ-अर्पण नहीं, बल्कि सम्पूर्ण यज्ञ-ऊर्जा का परिपाक-बिंदु है। पूर्णाहुति के क्षण में मंत्र-स्पन्दन, हवि-ऊर्जा, ऋत्विज-अनुष्ठान, ब्रह्म-चेतना और यजमान-संकल्प सभी एक बिंदु पर संकेन्द्रित होते हैं। इसीलिए गृह्यसूत्रों में इसे यज्ञ का “परिपूर्ण कर्म” कहा गया है।
आपस्तम्ब गृह्यसूत्र (१.८.१२) कहता है—
"अन्ते हविषां पूर्णाहुति:"
अर्थात् यज्ञ में प्रयुक्त समस्त हवि का अंतिम समर्पण ही पूर्णाहुति कहलाता है।
इसी विधि को कात्यायन श्रौतसूत्र (६.३.२८) “समष्ट्याहुति” कहकर समझाता है—
“समस्तं हविरग्नौ प्रयोक्तुं पूर्णत्वं भवति।”
अर्थात् सभी आहुतियों का एकीकृत समर्पण ही पूर्णता उत्पन्न करता है।
अत: पूर्णाहुति मात्र एक अनुष्ठानिक क्रिया नहीं, अपितु ऊर्जा-ब्रह्म के साथ यजमान के भाव-संयोग का परम क्षण है।

✓•२. पूर्णाहुति की वैदिक परिभाषा:
वैदिक ग्रंथों में पूर्णाहुति के तीन मूल तत्व निर्धारित हैं—
१. हविरूप पदार्थ का सर्वोच्च अंश।
२. सर्वमन्त्र-स्पन्दन का समन्वय बिंदु।
३. यजमान के संकल्प का निष्कर्ष। (resultant vector)
तैत्तिरीय संहिता (१.३.१०.५) में कहा है—
“यज्ञस्य पूर्णता हविषां समर्पणेन भवति।”
अर्थात् यज्ञ पूर्ण तब होता है जब उसकी चरम ऊर्जा अग्नि में समर्पित होती है।
इसका दार्शनिक आशय है कि यज्ञ का आध्यात्मिक ऊर्जावाहन (energy-discharge) पूर्णाहुति में पूर्ण रूप से सम्पन्न होता है।

✓•३. पूर्णाहुति का स्थान और काल—शास्त्रीय निर्देश:
३.१ गृह्यसूत्रीय निर्देश:
आपस्तम्ब गृह्यसूत्र २.७.२५—
“पूर्णाहुतौ दीप्तोऽग्निः, शान्तः मनः, प्रशान्तं हविः।”
इसके अनुसार—
१. अग्नि पूर्ण ज्वलित अवस्था में हो।
२. आहुति एकाग्र मन से दी जाए।
३. हवि शुद्ध, सात्त्विक, प्रशस्त हो।

३.२ श्रौतसूत्रीय निर्देश:
श्रौतसूत्रों में पूर्णाहुति अवभृथस्नान से पूर्व का अंतिम कर्म है, अर्थात् यह यज्ञ-क्रिया के समापन-चिह्न के रूप में स्थापित है।
शांखायन श्रौतसूत्र (११.९)—
“यज्ञस्य फलोत्पत्तिः पूर्णाहुत्या भवति।”
यह अत्यंत महत्वपूर्ण वचन है।
यह बताता है कि यज्ञफल का वास्तविक उद्भव पूर्णाहुति से होता है, न कि अन्य आहुतियों से।

✓•४. पूर्णाहुति का आध्यात्मिक महत्व:
४.१ द्रव्य-ऊर्जा का रूपान्तरण:
यज्ञ का मूल सिद्धांत है—
“अन्नं ब्रह्म, हविः ब्रह्म, अग्निः ब्रह्म।”
पूर्णाहुति के क्षण में—
हवि (सृष्टि)
अग्नि (तेज)
मन्त्र (नाद)
संकल्प (चेतना)
= ‘महाप्रसारण शक्ति’ बन जाते हैं।
इस प्रकार पूर्णाहुति द्रव्य से देवता तक सम्पूर्ण ऊर्जा-चरणों का अंतिम संक्रमण है।

४.२ अन्तर्यामित्व सिद्धांत:
बृहदारण्यक उपनिषद् (५.७.१) कहता है—
“अन्तर्यामी देवता आहुतिं गृह्णाति।”
पूर्णाहुति में यह ‘अन्तर्यामी’ प्रकट होकर यजमान से संबंध स्थापित करता है।

✓•५. पूर्णाहुति का पद्धतिगत स्वरूप:
५.१ हवि का विशेष रूप:
शास्त्रों के अनुसार पूर्णाहुति के लिए हवि—
१. घृत,
२. मधु,
३. क्षीर,
४. तिल,
५. चावल,
६. नवधान्य,
७. नैवेद्य,
का संयुक्त रूप हो सकता है।
कौशिकसूत्र (१०.१५) में इसे
“सर्वसमृद्धि-हविः” कहा गया है।
५.२ मन्त्र-पद्धति
पूर्णाहुति के मंत्र तीन प्रकार से मिलते हैं—
१. स्विष्टकृत पूर्णाहुति मन्त्र
२. शान्तिकाम पूर्णाहुति मन्त्र
३. दैविक-अनुकूल्य हेतु पूर्णाहुति मंत्र
उदाहरण:
तैत्तिरीय संहिता (१.१.१३)
“स्वाहा पूर्णाहुते स्वाहा।”
तंत्रागम पूर्णाहुति में प्रयोग होता है—
“ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं…”
यह दार्शनिक रूप से यज्ञ को पूर्णता-ब्रह्म में विलीन करता है।

५.३ समर्पण की तकनीक:
पूर्णाहुति का वास्तविक स्वरूप है—
“ऊपर से ऊर्ध्व-रेखीय (vertical) आहुति, बिना विचलन।”
यह अग्नि के ऊर्ध्ववाहिनी चक्र का अनुसरण करता है।
आहुत्यङ्गुलि:
१. अंजलि,
2. अर्घ्य,
3. ऊर्ध्व-प्रकृति समर्पण,
गृह्यसूत्र कहता है—
“ऊर्ध्वं हुतिं जुहोति।”

✓•६. पूर्णाहुति का फल—शास्त्रीय विवेचन:
शास्त्रों में पूर्णाहुति के फल तीन स्तरों पर वर्णित हैं—
६.१ लौकिक फल:
१. समृद्धि,
२. आरोग्य,
३. गृह-शांति,
४. ऋण-निवारण,
इसे मनुस्मृति (३.७६) में स्पष्ट किया गया है—
“यज्ञेन सर्वं लभते।”

६.२ आध्यात्मिक फल:
१. सूक्ष्मकर्मों का दग्धीकरण,
२. चित्तवृत्ति का एकाग्रीकरण,
३. देवादि-अनुकूलता,
४. नाद-ब्रह्म के साथ तादात्म्य
छान्दोग्य उपनिषद् (५.२४.१)
“आहुतेरुद्गतः स्वर्गलोकं नयति।”

६.३ कर्ममीमांसा फल:
कर्ममीमांसक जैमिनि कहते हैं—
“पूर्णाहुति निष्कर्षणं फलोत्पत्तिकं कर्म।” (जैमिनि सूत्र ३.५.२९)
इसका अर्थ है कि पूर्णाहुति फल-उत्पत्ति का वास्तविक कारक है।

✓•७. पूर्णाहुति और देवता-संवेग विज्ञान:
तैत्तिरीय ब्राह्मण (२.७.१६) में वर्णित है—
“देवा पूर्णाहुतेः तुष्यन्ति।”
यह देवता-संवेग (divine resonance) का सिद्धांत है:
मंत्र-आहुतियों से निर्मित कम्पन जब उच्चतम बिंदु पर पहुँचता है, तब देवता की प्रेरक-शक्ति सक्रिय होकर यजमान के संकल्प को ग्रहण करती है।
पूर्णाहुति इसी क्षण का तकनीकी नाम है।

✓•८. विभिन्न यागों में पूर्णाहुति का विशेष रूप:
८.१ नवचण्डी याग:
यहाँ पूर्णाहुति में—
१. महाप्रसाद
२. पंचमेव
३. बलिद्रव्य
का उपयोग होता है।
देवीभागवत (७.१८.२७)—
“पूर्णाहुति प्रीतिदा चण्डिकायाः।”

८.२ रुद्रहोम:
रुद्रसूत्र ‘नमः शिवाय’ पर आधारित पूर्णाहुति में कहा गया है—
“त्र्यम्बकं यजामहे पूर्णाहुते स्वाहा”
यह आत्म-शुद्धि हेतु होता है।

८.३ ग्रहयोग-निवारण यज्ञ:
पूर्णाहुति व्यक्तिगत ग्रहदोष शमन का चरम बिंदु है।
बृहज्जातक वचन—
“आहुतिर्मोक्षदायिनी।”

✓•९. पूर्णाहुति का दार्शनिक, वैज्ञानिक एवं ऊर्जा-सिद्धांत:
ऊर्जा-विज्ञान की दृष्टि से पूर्णाहुति में तीन घटनाएँ घटित होती हैं—
१. संवेग-चरमोत्कर्ष (peak resonance)
मंत्र-नाद की आवृत्ति अग्नि-ऊर्जा के साथ मिलकर चरम अवस्था पर पहुँचती है।
२. ऊर्जा-मुक्ति (energy discharge)
अग्नि, घृत और मंत्र मिलकर उच्च-आयनित (ionized) ऊर्जा क्षेत्र बनाते हैं।
३. संकल्प- imprinting
यजमान का संकल्प ऊर्जा-क्षेत्र पर अंकित (imprinted) होता है।
आधुनिक विज्ञान में यही प्रक्रिया ऊर्जा-क्वांटम फील्ड imprinting कहाती है।

✓•१०. उपसंहार: पूर्णाहुति यज्ञ का परम क्षण, पूर्णता-प्राप्ति बिंदु और देवता-समर्पण का द्वार है।
शास्त्रों में इसे “यज्ञस्य आत्मा”, “यज्ञफल का उद्गम”, “ऊर्जा-प्रसारण बिंदु” तथा “संकल्प-सिद्धि का मूल तत्व” कहा गया है।
इसके बिना यज्ञ का कोई भाग पूर्ण नहीं माना जाता।
अतः पूर्णाहुति—
केवल एक आहुति नहीं,
बल्कि
द्रव्य, मंत्र, अग्नि और संकल्प के समष्टि-प्रयोग का आध्यात्मिक-वैज्ञानिक चरमोत्कर्ष है।

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