यह वाक्य सिर्फ प्रेम नहीं, बल्कि दो आत्माओं के बीच बहती उस सूक्ष्म चेतना की गवाही है.
जहाँ रिश्ते सिर्फ नाम नहीं होते बल्कि भावनाओं की एक नदी होते हैं, जो अपने आप में पवित्र होती है.
प्रकृति में हर तत्व का संतुलन है दिन और रात, अग्नि और जल, ध्वनि और मौन। स्त्री और पुरुष भी इसी संतुलन की दो परछाइयाँ हैं.
स्त्री, जो प्रेम की सौम्यता है, कोमलता है, संवेदना है और पुरुष, जो विश्वास है, स्थिरता है, दिशा है.
जब ये दो अस्तित्व एक-दूसरे के समीप आते हैं, तो कोई दावेदारी नहीं होती बस एक मौन सहमति होती है कि "मैं तुम्हें समझना चाहता हूँ, वैसे ही जैसे तुम हो.”
प्रेम तब तक अधूरा है, जब तक उसमें विश्वास न हो.
विश्वास गणित का कोई समीकरण नहीं होता जिसे हल किया जा सके. यह तो एक प्रमेय की तरह होता है जिसे बार-बार जीकर सिद्ध करना पड़ता है.
जब कोई कहता है "तुम मेरे विश्वास का प्रमेय हो," तो वह यह स्वीकार करता है कि उसने हर संशय, हर डर, हर टूटन के पार जाकर एक चेहरे में अपनी आत्मा की शांति देखी है.
प्रेम कोई तात्कालिक आवेग नहीं, वह तो एक प्रयोगशाला है, जहाँ हर दिन भावनाएँ नए रूप लेती हैं
कभी ईर्ष्या में, कभी समर्पण में, कभी ख़ामोशी में और कभी उत्सव में.
और इस हर प्रयोग का अगर कोई खूबसूरत परिणाम है, तो वह है "हम".
'मैं' और 'तुम' की सीमाएँ मिटाकर जो एक सामूहिक चेतना बनती है, वहीं प्रेम की पूर्णता है.
रिश्ते किसी बंधन की तरह नहीं होते, बल्कि नदी की तरह होते हैं. वो बहते हैं शांत भी, उग्र भी.
कभी अपने किनारे खुद बनाते हैं, तो कभी तोड़ देते हैं पुराने तटबंध. लेकिन उनका मूल स्वभाव बहना है, रुकना नहीं.
जब हम किसी को अपनी "ख़ुशी की परिकल्पना" कहते हैं, तो हम केवल कह नहीं रहे होते हम समर्पित कर रहे होते हैं खुद को उस भावना के बहाव में, जहाँ प्रेम, विश्वास, और मौन तीनों मिलकर एक ऐसा संगीत रचते हैं, जिसे सिर्फ आत्मा ही सुन सकती है.
इस संसार में बहुत कुछ ज़ोर से कहा जाता है लेकिन जो सबसे ज़्यादा सच्चा होता है, वह अक्सर धीमे से कहा जाता है, कभी-कभी तो बस आँखों से.
प्रेम में भी यही होता है. वहाँ नाटक नहीं होता, वहाँ स्थिरता होती है.
जैसे सूर्य रोज़ उगता है, बिना शोर के.
तुम मेरी ख़ुशी की परिकल्पना हो...
क्योंकि जब तुम हो, तो जीवन केवल जीना नहीं होता वह एक अर्थ बन जाता है
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