Sunday, 2 November 2025

स्त्री पुरुष

डॉ. शिरीष राजे, मनोवैज्ञानिक
ने यह परम सत्य कहा है — और इसे स्वीकार करना ही होगा…!!

1. पुरुष बूढ़ा होता है, और स्त्री परिपक्व।

2. जब पुरुष अपने बच्चों की शादी कर देता है और परिवार की आर्थिक स्थिति स्थिर कर देता है, तो परिवार में उसका वरिष्ठ और सम्मानित स्थान धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।

3. इसके बाद, उसे बोझ समझा जाने लगता है — चिड़चिड़ा, गुस्सैल और अनिश्चित स्वभाव वाला बुजुर्ग व्यक्ति।

4. जिन कठोर निर्णयों को उसने कभी अपनी पत्नी और बच्चों के लिए लिया था, अब उनकी आलोचना होती है; हर बात में उसे दोषी ठहराया जाता है। और यदि उसने सच में कुछ गलतियाँ की हों — तो भगवान ही उसकी रक्षा करें।

5. लेकिन बुजुर्ग स्त्री को बच्चों और बहुओं से सहानुभूति मिलती रहती है — क्योंकि उससे अभी भी कई काम करवाने होते हैं।

6. सही समय आने पर वह चतुराई से पति के शिविर से बच्चों के शिविर में चली जाती है।

7. अगर पति उम्र में बड़ा है, तो पत्नी बहू का साथ पकड़ लेती है ताकि बेटा उससे दूर न हो जाए और उसकी देखभाल करता रहे।

8. चाहे किसी पुरुष की जवानी में कितनी भी बड़ी उपलब्धियाँ रही हों, बुज़ुर्गावस्था में उसका कोई फायदा नहीं होता।

9. वहीं, बुजुर्ग स्त्री अपने पिछले पुण्यों के ब्याज पर जीवन का आनंद लेती रहती है।

10. जिनके पास पुश्तैनी संपत्ति या खेत-खलिहान होते हैं (जिस पर बच्चों की नज़र बनी रहती है), उनका हाल कुछ बेहतर होता है।
लेकिन जिन्होंने भविष्य के झगड़ों से बचने के लिए अपनी संपत्ति पहले ही बाँट दी — उनका अंजाम ऊपर बताए गए दुखद हाल जैसा ही होता है।
इसलिए, संपत्ति को समय से पहले बाँटना बुद्धिमानी नहीं है।

11. किसी भी अस्पताल में जाइए — आप सिर्फ रिश्तेदारों की आँखें देखकर पहचान सकते हैं कि मरीज बूढ़ा पुरुष है या महिला।
अगर मरीज बुजुर्ग पुरुष है, तो बेटी को छोड़कर किसी की आँखों में आँसू नहीं होंगे।

12. सार: जब पुरुष वृद्ध हो जाए, तो उसे दूसरों से किसी भी प्रकार की अपेक्षा रखना छोड़ देना चाहिए।
याद रखिए — पुरुष जीवनभर विद्यार्थी ही रहता है।
समझ लीजिए कि इस संसार में कोई किसी का नहीं होता।
निर्लिप्त, आत्मनिर्भर और आत्मसम्मानपूर्ण जीवन जीना सीखिए।

13. मेरा सुझाव: जो कुछ आपने दूसरों के लिए किया है, उस पर कभी विचार न करें, और न ही उसका ज़िक्र करें।

14. प्राचीन शास्त्रों में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता कि किसी स्त्री ने वानप्रस्थ या संन्यास ग्रहण किया हो।

15. ये दोनों जीवन के चरण केवल पुरुषों के लिए निर्धारित थे।
उनका महत्व समझिए — तब आप जान पाएँगे कि हमारे पूर्वज कितने दूरदर्शी थे।

— डॉ. शिरीष राजे, मनोवैज्ञानिक, नाशिक।  
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