Sunday, 30 November 2025

षोडश मातृका पूजन विधि

षोडश मातृका पूजन विधि

गौरी, पद्मा, शची, मेधा, सावित्री, विजया, जया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा, मातरः, लोकमातरः, धृति, पुष्टिः, तुष्टि, आत्मनः कुलदेवता।

स्तोत्र:

गौरी पद्मा शची मेधा सावित्री विजया जया।
देवसेना स्वधा स्वाहा मातरो लोकमातरः॥

धृतिः पुष्टिस्तथा तुष्टिरात्मनः कुलदेवता।
गणेशेनाधिका ह्येता वृद्धो पूज्याश्च षोडशः॥

हमारे प्राचीन शास्त्रों में सोलह माताओं का उल्लेख मिलता है:

स्तनदात्री गर्भधात्री भक्ष्यदात्री गुरुप्रिया।
अभीष्टदेवपत्नी च पितुः पत्नी च कन्यका॥

सगर्भकन्या भगिनी पुत्रपत्नी प्रियाप्रसूः।
मातुर्माता पितुर्माता सोदरस्य प्रिया तथा॥

मातुः पितुश्च भगिनी मातुलानी तथैव च।
जनानां वेदविहिता मातरः षोडश स्मृताः॥
(गणपतिखण्ड १५। ३८-४०)

स्तन पिलाने वाली (धाय), गर्भ धारण करने वाली (माता), भोजन देने वाली (रसोइन), गुरुपत्नी, अभीष्ट देवता की पत्नी, पिताकी पत्नी (सौतेली माता), कन्या, बहन, पुत्रवधू, पत्नी की माता (सास), सहोदर भाई की पत्नी, माताकी बहिन (मौसी), माताकी माता (नानी), पिताकी बहिन (बूआ) और मामी - ये सोलह मानव जाति की वेदविहित माताएँ हैं।

गुरुपत्नी राजपत्नी देवपत्नी तथा वधू:।
पित्रो: स्वसा शिष्यपत्नी भृत्यपत्नी च मातुली।।

पितृपत्नी भ्रातृपत्नी श्वभ्रूश्च भगिनी सुता।
गर्भधात्रीष्टदेवी च पुंस: षोडश मातर:।।
(ब्रह्मावैवर्त्तपुराण, श्रीकृष्णजन्मखंड, ५९।५४-५६)

गुरुपत्नी, राजपत्नी, देवपत्नी, पुत्रवधू, माता की बहन (मौसी), पिता की बहन (बुआ), शिष्यपत्नी, मामी, पिता की पत्नी (माता और विमाता), भाई की पत्नी, सास, बहन, बेटी, गर्भ में धारण करने वाली (जन्मदात्री) तथा इष्टदेवी - ये पुरुष की सोलह माताएँ होती हैं।

माता का महत्व, पिता से सौ गुनी अधिक पूजनीय माता है:

सर्वेषामपि पूज्यानां पिता वन्द्यो महान् गुरुः।
पितुः शतगुणैर्माता गर्भधारणपोषणात्॥

माता च पृथिवीरूपा सर्वेभ्यश्च हितैषिणी।
नास्ति मातुः परो बन्धुः सर्वेषां जगतीतले॥
(ब्रह्मवैवर्तपुराण १६९)

‘समस्त पूजनीयों में पिता सबसे अधिक वन्दनीय हैं; किंतु गर्भ में धारण और पोषण करने वाली माता पिता से सौ गुनी श्रेष्ठ है। माता पृथ्वी के समान क्षमाशील और सभी का समान हित चाहने वाली है; अतः इस जगतीतल में माता से बढ़कर कोई बंधु नहीं है।

षोडश मातृका पूजन विधि

गौरीम् गणेश:

ॐ आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः।
पितरं च प्रयन्स्वः॥

हेमाद्रितनयां देवीं वरदां शङ्करप्रियाम्।
लम्बोदरस्य जननीं गौरीमावाहयाम्यहम्॥

पदमाम्:

ॐ हिरण्यरूपा ऽउपसो व्विरोक ऽउभाविन्दा ऽउदिधः सूर्यश्च।
आरोहतं व्वरुण मित्र गर्त ततश्श्चक्षाथामदितिं दितिञ्च मित्रोऽसिव्वरुणोऽसि॥

पद्माभां पद्मवदनां पद्मनाभोरुसंस्थिताम्।
जगत्प्रियां पद्मवासां पद्मावाहयाम्यहम्॥

शचीम्:

ॐ निवेशनः सङ्गमनो व्वसूनां विश्वा रूपाभिचष्टे शचीभिः।
देवऽइव सविता सत्यधर्मेन्द्रो न तस्त्थौ समरे पथीनाम्॥

दिव्यरुपां विशालाक्षीं शुचिकुण्डलधारिणीम्।
रक्तमुक्ताद्यलङकारां शचीमावाहयाम्यहम्॥

मेधाम्:

मेधां मे व्वरुणो ददातु मेधामग्निः प्रजापतिः।
मेधामिन्द्रश्च व्वायुश्श्च मेधां धाता ददातु मे स्वाहा॥

विश्वेऽस्मिन् भूरिवरदां जरां निर्जरसेविताम्।
बुद्धिप्रबोधिनीं सौम्यां मेधामावाहयाम्यहम्॥

सावित्रीम्:

ॐ सविता त्त्वा सवाना गुंग सुवतामाद्यगृहपतीना गुंग सोमो वनस्पतीनाम्।
वृहस्पतिर्बाचऽइन्द्रो ज्ज्यैष्ठ्यायरूद्रः पशुभ्यो मित्र – सत्त्यो व्वरुणो धर्मपतीनाम्॥

जगत्सृष्टिकरीं धात्रीं देवीं प्रणवमातृकाम्।
वेदगर्भां यज्ञमयीं सावित्रीं स्थापयाम्यहम्॥

विजयाम्:

ॐ विज्ज्यन्धनुः कपर्दिनो व्विशल्यो वाणावाँर 2 उत |
अनेशन्नस्य या ऽइषव ऽआभुरस्य निषङ्गधिः॥

सर्वास्तधारिणीं देवीं सर्वाभरणभूषिताम्।
सर्वदेवस्तुतां वन्द्यां विजयां स्थापयाम्यहम्॥

जयाम्:

ॐ वह्वीनां पिता वहुरस्य पुत्रश्शिचश्श्चाकृणोति समनावगत्य।
इषुधि: सङ्काः पृतनाश्च्ञ सर्वाः पृष्ठठे निनिद्धो जयति प्रसूतः॥

सुरारिमथिनीं देवीं देवानामभयप्रदाम्।
त्रैलोक्यवन्दितां शुभ्रां जयामावाहयाम्यहम्॥

देवसेनाम्:

ॐ इन्द्रऽआसां नेता वृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर एतु सोमः।
देवसेनानामभिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन्त्वग्रम्॥

मयूरवाहनां देवीं खड्गशक्तिधनुर्धराम्।
आवाहयेद् देवसेनां तारकासुरमर्दिनीम्॥

स्वधाम्:

ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः पितामहेभ्यः स्वायिब्भ्यः स्वधा नमः प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।
अक्षन्पितरोऽमीमदन्त पितरोऽतीतृपन्त पितरः, पितर शुन्धद्ध्वम्॥

अग्रजा सर्वदेवानां कव्यार्थं या प्रतिष्ठिता।
पितृणां तृप्तिदां देवीं स्वधामावाहयाम्यहम्॥

स्वाहाम्:

ॐ स्वाहा प्राणेब्भ्यः साधिपतिकेब्भ्यः । पृथिव्यै स्वाहाग्नये स्वाहान्तरिक्षाय स्वाहा ब्वायवे स्वाहा । दिवे स्वाहा सूर्याय स्वाहा॥

हविर्गृहीत्वा सततं देवेभ्यो या प्रयच्छति ।
तां दिव्यरूपां वरदां स्वाहामावाहयाम्यहम्॥

मातृ:

ॐ आपोऽअसम्मान्मातरःशुन्धयन्तु घृतेन तो घृतप्वः पुनन्तु ।
विश्व गुंग हि रिप्रंप्रवहन्ति देवीरुदिदाब्भ्यः शुचिरा पूतऽएमि।

दीक्षातपसोस्तनूरसितां त्वा शिवा गुंग शम्मां परिदधे भद्रं व्वर्ण पुष्यन् ।

आवाहयाम्यहं मातृ: सकला: लोकपूजिता:।
सर्वकल्याणरुपिण्यो वरदा दिव्यभूषणा:॥

लोकमातृ:

ॐ रयिश्च मे रायश्च मे पुष्टंचमे पुष्टिश्च मे विभुचमे प्रभुच मे पूर्ण्णं च मे पूर्णतरं च मे कुयवं चमऽक्षितं च मेऽन्नं च मेऽक्षुच्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥

आवाहयेल्लोकमातृर्जयन्तीप्रमुखा: शुभा: ।
नानाऽभीष्टप्रदा: शान्ता: सर्वलोकहितावहा:॥

धृतिम्:

ॐ यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु ।
यस्मान्नऋते किञ्च न कर्म क्रियतं तन्मे मनः शिवसंकल्प्पमस्तु ॥

सर्वहर्षकरीं देवीं भक्तानामभयप्रदाम् ।
हर्षोत्फुल्लास्यकमलां धृतिमावाहयाम्यहम्॥

पुष्टिम्:

ॐ अङ्गान्न्यात्मन्न्भिषजा तदश्विनात्मानमङ्गैः समधात्सरस्वती ।
इन्द्रस्य रूपगुंग शतमानमायुश्चन्द्रेण ज्योतिरमृतं दधानाः॥

पोषयन्तीं जगत्सर्व स्वदेहप्रभवैर्नवै:।
शाकै: फलैर्जलैरत्नै: पुष्टिमावाहयाम्यहम्॥

तुष्टिम्:

ॐ जातवेदसे सुनवाम सोममरातीयतो निदहाति वेदः ।
सनः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुंदुरितात्यग्निः ॥

देवैरारधिताँ देवीं सदा सन्तोषकारिणीम्।
प्रसादसुमुखी देवी तुष्टिमावाहयाम्यहम्॥

आत्मनः कुलदेवताम्:

ॐ प्राणाय स्वाहाऽपानाय स्वाहा ळ्यानाय स्वाहा ।
चक्षुषे स्वाहा क्षोत्राय स्वाहा व्वाचे स्वाहा मनसे स्वाहा।

पत्तने नगरे ग्रामे विपिने पर्वते गृहे ।
नानाजातिकुलेशानी दुर्गामावाहयाम्यहम्।

इस मंत्र द्वारा षोडश मातृकाओं का आवाहन एवं स्थापना करने के साथ ‘ॐ मनो जूति’ मंत्र से अक्षत छोड़ते हुए मातृका मंडल की प्रतिष्ठा करें। इसके बाद गंधादि सामग्री से पूजन करें:

‘ॐ गणेश सहित गौर्या दी षोडश मातृकाभ्यो नमः।’

फल अर्पण

उक्त मंत्र बोलते हुए ऋतु फल- नारियल आदि हाथ की अंजलि में लेकर प्रार्थना करें:

ॐ आयुरारोग्यमैश्वर्यं ददध्वं मातरो मम।
निर्विघ्नं सर्वकार्येषु कुरुध्वं सगणाधिपाः॥

इस प्रकार प्रार्थना करने के पश्चात नारियल और फल षोडश मातृकाओं के चरणों में अर्पित करने के बाद नमस्कार करते हुए कहें:

गेहे वृद्धिशतानि भवंतु, उत्तरे कर्मण्यविघ्नमस्तु॥

इसके बाद निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए अक्षत अर्पित करें:

अनया पूजया गणेश सहित गौर्या दी षोडश मातरः प्रीयन्तām‌, न मम॥

षोडशोपचार पूजन क्या होता है?

षोडश का अर्थ है "सोलह"। षोडशोपचार पूजन में निम्नलिखित शामिल हैं:

ध्यान

आवाहन

आसान

पाद्यम

अर्घ्यम

आचमन

स्नान (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर और पंचामृत से अभिषेक आदि करना)

वस्त्र

यज्ञोपवीत (पुरुष) देवताओं के लिए आभूषण और देवी के लिए

गंध (चंदन, गुलाल, कुमकुम आदि)

पुष्प पत्र-पान आदि

धूप दीप

नैवेद्यम (फल मिठाई मेवा आदि)

आरती

पुष्पांजलि

प्रदक्षिणा नमस्कार आदि।

इन सोलह संस्कारों का महत्व सभी के लिए महत्वपूर्ण है।

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