आचार्य चतुरसेन की चतुराई वयं रक्षाम: में दिखती है। वे रावण को रक्ष संस्कृति का कहते हैं और राक्षस का व्युत्पत्तिमूलक अर्थ रक्षा करने वाला बता देते हैं।
जबकि राक्षस शब्द की व्युत्पत्ति निघंटु में यह नहीं बताई गई है। वहाँ तो “रक्ष : रक्षितव्यमस्माद, रहसि क्षणोतीति वा, रात्रौ नक्षते इति वा” अर्थात जिससे धन-सम्पत्ति, प्राण आदि की रक्षा करनी पड़े, जो एकान्त अवसर पाकर हानि पहुंचाते और लूट-पाट, चोरी-व्यभिचार आदि दुष्ट कर्मों में सक्रिय हो जाते हैं, वे राक्षस हैं। टीकाकार मल्लिनाथ “रक्षकस्य विपरीतः राक्षसः” -रक्षक का विपरीत राक्षस -बताते हैं।
यह कहा जा सकता है कि कोई जाति अपना ऐसा नाम क्यों रखेगी। पर कुछ लोग होते ही ऐसे हैं कि उन्हें ऐसे ही परिचय में गौरव का भान होता है। गब्बर की तरह। "यहाँ से 50-50 कोस दूर गाँव में..जब बच्चा रात को रोता है तो माँ कहती है बेटे सो जा..सो जा नहीं तो गब्बर सिंह आ जायेगा।” रावण वाल्मीकि रामायण में सीता के सामने अरण्य में जब अपना वास्तविक रूप प्रदर्शित करता है तब ऐसे ही कहता है:
'जैसे प्रजा मौतके भयसे सदा डरती रहती है,
उसी प्रकार देवता, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और नाग सदा जिससे भयभीत होकर भागते हैं, जिसने किसी कारणवश अपने सौतेले भाई कुबेरके साथ द्वन्द्वयुद्ध किया और क्रोधपूर्वक पराक्रम करके रणभूमिमें उन्हें परास्त कर दिया था, वही रावण मैं हूँ। मेरे ही भयसे पीड़ित हो नरवाहन कुबेरने अपनी समृद्धिशालिनी पुरी लङ्काका परित्याग करके इस समय पर्वतश्रेष्ठ कैलासकी शरण ली है। मिथिलेशकुमारी ! जब मुझे रोष चढ़ता है, उस समय इन्द्र आदि सब देवता मेरा मुँह देखकर ही भयसे थर्रा उठते हैं और इधर-उधर भाग जाते हैं। जहाँ मैं खड़ा होता हूँ, वहाँ हवा डरकर धीरे-धीरे चलने लगती है। मेरे भयसे आकाशमें प्रचण्ड किरणोंवाला सूर्य भी चन्द्रमाके समान शीतल हो जाता है।
एक अन्य व्युत्पत्ति के अनुसार राक्षस वह है जिसके कारण समाज और देश में क्षीणता तथा दुर्बलता आती है- क्षरतीति राक्षसः॥
पर चतुरसेन जी चतुराई दिखा गये और राक्षसों को रक्षा करने वाला बताकर मूल व्युत्पत्ति को ही सिर के बल खड़ा कर गये जबकि पूरी रामायण में राक्षस कहीं भी लोगों की रक्षा करते हुए नहीं दिखाई देते।
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