पद्मनाभ
१. पद्म-
पद्म के अर्थ-(१) कमल। (२) पद्म की तरह आभूषण, (३) कमल आकार, (४) हाथी की सूंड तथा सिर पर रंगीन चिह्न। (नैषध चरित, २२/९), (५) सैन्य ब्यूह या युद्ध का एक क्षेत्र (मनु स्मृति, ७/१८८)। रामरावण युद्ध में राम की सेना ने १८ स्थलों पर युद्ध किया था, जिसके लिए १८ पद्म-सेनापति थे। (वाल्मीकि रामायण, युद्ध काण्ड, अध्याय, २६, २७)। इसे संख्या मान कर रामचरितमानस में राम सेना के सेनापतियों की संख्या १८ पद्म कही है (सुन्दरकाण्ड, ५४/२)। (६) एक संख्या शब्द, पर १२ शून्य (शंकरवर्मन, षड्रत्नमाला, १/५-६)-
एकं दश च शतं चाथ सहस्रमयुतं क्रमात्। नियुतं प्रयुतं कोटिरर्बुदं वृन्दमप्यथ॥५॥
खर्वो निखर्वश्च महापद्मः शङ्कुश्च वारिधिः। अन्त्यं मध्यं परार्धं च संख्या दशगुणोत्तराः॥६॥
(७) कुबेर की नव निधियों में पद्म तथा महापद्म हैं।
महापद्मश्च पद्मश्च शङ्खो मकर-कच्छपौ।
मुकुन्द-कुन्द-नीलाश्च खर्वश्च निधयो नव॥
(अमरकोष, १/१/७१ के बाद व्याख्या प्रक्षेप)
नन्द वंश के प्रथम राजा को अधिक सम्पत्ति के कारण महापद्म नन्द कहते थे।
(८) सीसा (Lead) धातु, (९) शरीर के मेरु दण्ड की केन्द्रीय नाड़ी सुषुम्ना के ७ चक्र-मूलाधार (लिङ्ग-गुदा का मध्य), स्वाधिष्ठान (मेरुदण्ड का आधार), मणिपूर (नाभि), अनाहत (हृदय), विशुद्धि (कण्ठ कूप), आज्ञा (मस्तिष्क केन्द्र), सहस्रार (सिर का ऊपरी भाग)।
(१०) एक नाग जाति (महाभारत, आदि पर्व ३५/१०, ३४/१०)
(११) शरीर पर विन्दु या चिह्न।
(१२) योग का एक आसन। कामशास्त्र में भी एक आसन है।
(१३) विष्णु या राम का एक नाम। विष्णु पत्नी लक्ष्मी को भी पद्मा कहते हैं।
(१४) पद् धातु गति अर्थ में है। अतः जिस पर हम चलते हैं, वह पृथ्वी भी पद्म है। या आकाश में सृष्टि के ५ पर्वों में अन्तिम या पद है।
पद्भ्यां भूमिः दिशः श्रोत्रात् तथा लोकान् अकल्पयन्॥१३॥ (पुरुष सूक्त, वा. यजु. ३१/१३)
पृथ्वी के उत्तर गोल का नक्शा ४ खण्डों में बनता था, उसे भू-पद्म के ४ दल कहते थे।
भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा। पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः॥
(विष्णु पुराण, २/२/४०)
(१५) शरीर के अंग गति शील हैं। उनके सौन्दर्य की प्रशंसा के लिए भी उनको कमल, अरविन्द या पद्म कहते हैं। जैसे-चरण कमल, करकमल, कमल नयन। बाल रूप श्रीकृष्ण में सम्पूर्ण जगत् है। सृष्टि का अन्त उनका चरण है, जहां से अन्त हुआ, वहीं से नयी सृष्टि आरम्भ होती है, वह उनका मुख है, जिसमें उनके चरण हैं। सृष्टि का चक्र वट-पत्र है जिसमें उनका निवास है। (भागवत पुराण, स्कन्ध १२, अध्याय ९)। इसका सार इस स्तुति में है-
करारविन्देन पदारविन्दं, मुखारविन्दे विनिवेशयन्तः।
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं, बालं मुकुन्दं शिरसा नमामि॥
(१६) पद्म से सृष्टि होने के कारण एक कल्प का नाम भी पद्म है।
पद्मावसाने प्रलये निशासुत्पोत्थितः प्रभुः ।
सत्त्वोद्रिक्तस्तदा ब्रह्मा शून्यं लोकमवैक्षत ॥३॥
(मार्कण्डेय पुराण, अध्याय ४७)
२. पद्मनाभ सृष्टि-
पद्मनाभ के २ अर्थ हैं। प्रचलित अर्थ है विष्णु या उनका जाग्रत रूप जगन्नाथ जिनकी नाभि से पद्म निकला और उससे सृष्टि का आरम्भ हुआ। पद्मनाभ का अर्थ ब्रह्मा भी है जिनका जन्म विष्णु के नाभि पद्म से हुआ, उनको पद्मज या पद्मसम्भव कहा गया है। इसका मूल अर्थ माता गर्भ में मनुष्य जन्म से है। नाभि से एक नाल निकलती है जो माता के गर्भ से पोषण प्राप्त करता है। वह नाल कमल नाल जैसा है जो मिट्टी से जल और भोजन लेकर कमल पत्र तथा फूल तक पहुंचाता है। अतिसूक्ष्म तथा विराट् रूप के विभिन्न स्तर के निर्माण में यही शब्दावली प्रयुक्त है। इस कमलनाल को उल्ब या दृश्य जगत के मूल रूप में हिरण्यगर्भ भी कहा गया है।
३. आध्यात्मिक गर्भनाल-
(१) मनुष्य के स्थूल शरीर का जन्म के समय कमल नाल से माता गर्भ में पोषण होता है।
(२) आध्यात्मिक सूक्ष्म नाल-जन्म के बाद भी नाभि के सूक्ष्म चक्र में अष्टदल कमल द्वारा अष्टविध सिद्धियां मिलती हैं।
अग्नि पुराण, अध्याय ३७४-आध्यात्मिक नाभिकमल
द्वादशाङ्गुलविस्तीर्णं शुद्धं विकसितं सितम्। नालमष्टाङ्गुलं तस्य नाभिकन्दसमुद्भवम्॥२०॥
पद्मपत्राष्टकं ज्ञेयमणिमादिगुणाष्टकम्। कर्णिका केशरं नालं ज्ञानवैराग्यमुत्तमम्॥२१॥
विष्णुधर्मश्च तत्कन्दमिति पद्मं विचिन्तयेत्। तद्धर्मज्ञान वैराग्यं शिवैश्वर्यमयं परम्॥२२॥
ज्ञात्वा पद्मासनं सर्वं सर्वदुःखान्तमाप्नुयात्। तत्पद्मकर्णिकामध्ये शुद्धदीपशिखाकृतिम्॥२३॥
अङ्गुष्ठमात्रममलं ध्यायेदोङ्कारमीश्वरम्। कदम्ब गोलकाकारं तारं रूपमिवस्थितम्॥२४॥
ध्यायेद् वा रश्मिजालेन दीप्यमानं समन्ततः। प्रधानं पुरुषातीतं स्थितं पद्मस्थमीश्वरम्॥२५॥
ध्यायेज्जपेच्च सततमोङ्कारं परमक्षरम्। मनःस्थित्यर्थमिच्छन्ति स्थूलध्यानमनुक्रमात्॥२६॥
तद्भूतं निश्चलीभूतं लभेत् सूक्ष्मेऽपि संस्थितम्। नाभिकन्दे स्थितं नालं दशाङ्गुलसमायतम्॥२७॥
(द्रष्टव्य-पुरुष सूक्त-स भूमिं विश्वतो वृत्त्वात्यत्तिष्ठद्दशाङ्गुलम्।)
नालेनाष्टदलं पद्म द्वादशाङ्गुलविस्तृतम्। सकर्णिके केसराले सूर्य्यसोमाग्निमण्डलम्॥२८॥
अग्निमण्डलमध्यस्थः शङ्खचक्रगदाधरः। पद्मी चतुर्भुजो विष्णुरथ वाष्टभुजो हरिः॥२९॥
४. कण सृष्टि-
मनुष्य से छोटे विश्व के ७ स्तर क्रमशः १-१ लाख भाग छोटे हैं-कलिल (Cell), जीव (परमाणु, बालाग्र का १०,००० भाग जो निर्माण या कल्प में नष्ट नहीं होता), जगत् (३ प्रकार के गतिशील कण, चर = Lepton, स्थाणु = Baryon, अनुपूर्व = Meson), कुण्डलिनी (परमाणु नाभि), देव-असुर (जिस प्राण से सृष्टि हुई वह देव, अनुत्पादक प्राण असुर), पितर (निर्माण अवस्था, proto-type, quark ?), ऋषि (रस्सी, मीटर का १० घात ३५ भाग, Primordial string, Plank's length).
(१) वालाग्र शत साहस्रं तस्य भागस्य भागिनः। तस्य भागस्य भागार्धं तत्क्षये तु निरञ्जनम् ॥ (ध्यानविन्दु उपनिषद् , ४)
(२) ऋषिभ्यः पितरो जाताः पितॄभ्यो देव दानवाः। देवेभ्यश्च जगत्सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वशः॥ (मनुस्मृति, ३/२०१)
(३) कलिल-सर्व धातुं कलनीकृतः, अव्यक्त विग्रहः (तस्मात् कलिलः)- (चरक संहिता, शरीरस्थान, ४/९)
वालाग्रमात्रं हृदयस्य मध्ये विश्वं देवं जातरूपं वरेण्यं (अथर्वशिर उपनिषद् ५)
अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्व पाशैः ॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ५/१३)
(४) वालाग्र शत भागस्य शतधा कल्पितस्य च ॥
भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ५/९)
(५) षट्चक्र निरूपण, ७-एतस्या मध्यदेशे विलसति परमाऽपूर्वा निर्वाण शक्तिः कोट्यादित्य प्रकाशां त्रिभुवन-जननी कोटिभागैकरूपा । केशाग्रातिगुह्या निरवधि विलसत .. ।९। अत्रास्ते शिशु-सूर्यकला चन्द्रस्य षोडशी शुद्धा नीरज
सूक्ष्म-तन्तु शतधा भागैक रूपा परा ।७। (केन्द्र नाड़ी बालाग्र का कोटि भाग है। कुण्डलिनी इसका १/१०० भाग, अर्थात् मीटर का १० घात १५ भाग है)
(६) दिवा देवान् असृजत, नक्तं असुरान्, उअद् दिवा देवान् असृजत, तद् देवानां देवत्वम्। यद् असूर्यं (अनुत्पादक, सूर्य = सूयते, जन्म देता है), तद् असुराणां असुरत्वम्। (षड्विंश ब्राह्मण, ४/१)
(७) पद्मनाभ-परमाणु का केन्द्र नाभि है जिसके चारों तरफ की रचना कमल दल है। अदृश्य आकर्षण शक्ति कमल नाल है। परमाणु नाभि का भी केन्द्र हिरण्य गर्भ है और नाभि कणों की व्यवस्था कमल है।
५. हिरण्यगर्भ नाभि-
सृष्टि क्रिया में जो केन्द्र स्थान है, वह नाभि है। मनुष्य शरीर में पाचन का केन्द्र नाभि है, जिससे शरीर बनता है। उससे जो निर्माण होता है उसके प्रकार कमल के दल हैं। केन्द्र तथा निर्मित विश्व में दृश्य या अदृश्य सम्बन्ध कमल का नाल है।
वेद में मूल केन्द्र को नाभि तथा उसके निकट भाग को नाभनेदिष्ट कहा है। तेज रूप केन्द्र को हिरण्य, उससे बने लोक या स्थान हिरण्यकशिपु है, हिरण्मय पुरुष है, उसका मार्ग हिरण्यय है। नाभि केन्द्र से अन्य भागों का आकर्षण आदि से सम्बन्ध हिरण्यकेश है।
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे (ऋक्, १०/१२१/१)
हिरण्यं लोके अन्तरा (अथर्व सं. १०/७/२८)
हिरण्मयेन सुवृता रथेन (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३१/१/१९)
हिरण्ययः पन्थान आसन् (अथर्व सं. ५/४/५)
हिरण्याक्षः सविता देव आगात् (ऋक्, १/३५/८, वाज. सं. ३४/२४)-दृश्य निर्माता जिसके केन्द्र में हिरण्य है। उसके निर्माण साधन या अंग हिरण्य हस्त हैं-
हिरण्यहस्तं अश्विना अराणा (ऋक्, १/११७/२४)
हिरण्य केन्द्र से बनी ३ प्रकार की पृथ्वी (पृथ्वी ग्रह, सौर मण्डल, ब्रह्माण्ड) का शरीर हिरण्यकशिपु है।
हिरण्यकशिपुर्मही (अथर्व सं. ५/७/१०)
हिरण्य या उसके शरीर का आकाश या क्रिया क्षेत्र हिरण्य-प्राकारा, या हिरण्यवर्णा (लक्ष्मी) है।
हिरण्यवर्णाः परियन्ति यह्वीः (ऋक्, २/३५/९)
हिरण्यवर्णा हरिणीम्, कांसोस्मितां हिरण्यप्राकाराम् (ऋक् खिल, श्री सूक्त, ५/८७१)
हिरण्यवर्णा जगती जगम्या (तैत्तिरीय आरण्यक, १०/४२/१)
हिरण्यप्राकारा देवि मां वर (मानव श्रौत सूत्र, २/१३/६)
६. आकाश में सृष्टि-
सृष्टि का मूल तेज-पुञ्ज था जिसे ऋग्वेद में हिरण्यगर्भ कहा गया है। पुराणों में इसे विश्व का उल्ब (गर्भनाल) कहा है। अथर्व वेद इसे सर्वाधार या स्कम्भ कहता है। प्रथम उत्पन्न रूप में यह ज्येष्ठ ब्रह्म है।
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवीमुत द्यां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
यं क्रन्दसी अवतश्चस्कभाने भियसाने रोदसी अह्वयेथाम्। यस्यासौ पन्था रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥३॥
यस्य द्यौरुर्वी पृथिवी च मही यस्याद उर्वऽन्तरिक्षम्। यस्यासौ सूरो विततो महित्वा कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
यस्य विश्वे हिमवन्तो महित्वा समुद्रे यस्य रसामिदाहुः। इमाश्च प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
(ऋक् १०/१२१/१,४-६, अथर्व ४/२/३-५, ७)
=(यह अथर्व पाठ है, ऋक् पाठ थोड़ा भिन्न है, पर वही अर्थ है।) आरम्भ में केवल हिरण्यगर्भ (हिरण्य = स्वर्ण, तेज प्रकाश) था। वह भूतों का एक ही अधिपति था (भूत = उत्पन्न, ५ महाभूत = आकाश, वायु, अग्नि, अप्, पृथिवी तत्त्व)। उसने पृथिवी (पृथ्वी ग्रह, सौर मण्डल, ब्रह्माण्ड या सीमाबद्ध पिण्ड) तथा आकाश (पृथिवी सृष्टि आधार रूप में माता, उसका आकाश पिता है) को धारण किया। उस ’क’ (कर्त्ता ब्रह्म के लिए हवि (सृष्टि के लिए सामग्री) देते हैं। (१) किसी व्यक्ति की आंख से पानी निकलना रुदन है। सूर्य से तेज निकलना भी उसका रुदन है और उसका क्षेत्र रोदसी त्रिलोकी है। ब्रह्माण्ड के १०० अरब सूर्यों का मिलित रुदन क्रन्दन है तथा उसका क्षेत्र क्रन्दसी है। दोनों हिरण्यगर्भ के अधीन हैं। (२) विस्तृत द्यौ तथा मही पृथ्वी तथा सभी देव उससे उत्पन्न हैं।
सर्वाधार सूक्त, ज्येष्ठ-ब्रह्म सूक्त (अथर्व, १०/७-८)-इसमें २०० से अधिक मन्त्र हैं।
एक काल समुत्पन्नं जल बुद्बुदवच्च तत्। विशेषेभ्यो ऽण्डमभवत् बृहत्तदुदके शयम्॥३६॥
तस्मिन् कार्यस्य करणं संसिद्धिः परमेष्ठिनः। प्राकृते ऽण्डे विवृत्तः स क्षेत्रज्ञो ब्रह्म-संज्ञितः॥३७॥
स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते। आदि कर्त्ता स भूतानां ब्रह्माग्रे समवर्तत॥३८॥
यमाहुः पुरुषं हंसं प्रधानात् परतः स्थितम्। हिरण्यगर्भं कपिलं छन्दो-मूर्तिं सनातनम्॥३९॥
मेरुरुल्बमभूत्तस्य जरायुश्चापि पर्वताः। गर्भोदकं समुद्राश्च तस्यास परमात्मनः॥४०॥
(कूर्म पुराण, अध्याय, १/४)
= पहले जल जैसा फैला पदार्थ (रस, अप्) उत्पन्न हुआ जिसमें बुद्बुद् (बुलबुला) जैसी रचना से अण्ड (ब्रह्माण्ड) बने। स्रष्टा को परमेष्ठी कहा गया, उस अण्ड के ज्ञाता क्षेत्रज्ञ को ब्रह्म कहा गया। विश्व रूप शरीर या पुर वाले को पुरुष कहा गया। उसे हंस भी कहा गया (२ प्रकार की विपरीत गति-हं से सं, सं से हं-ईशावायोपनिषद्, १४ का सम्भूति-विनाश या सांख्य सूत्र, ५ का सञ्चर-प्रतिसञ्चर)। यह स्रष्टा प्रधान और सबसे परे है। यह हिरण्यगर्भ (तेजपुञ्ज), कपिल (मन्द तेज का कपिल रंग, या ’क’ = जल का पान कर सृष्टि करने वाला, यथापूर्वं अकल्पयत्-ऋक्, १०/१९०/३, पहले जैसी सृष्टि, अतं पुरुष की नकल करने वाला कपि है), छन्द-मूर्ति (स्थूल रूप मूर्ति, उसकी सीमा या आवरण छन्द है), सनातन (सदा एक समान), मेरु इसका उल्ब है-विस्तृत अप् में आकर्षण-विकिरण से पिण्डों मंर सम्बन्ध।
मूल स्रष्टा ब्रह्म है, कर्ता रूप में नर है, उससे अप् (जल जैसा विरल पदार्थ) हुआ, वह नार है। नार (अप् समुद्र) में निवास करने वाला नारायण है। निर्मित पुर (रचना) में निवास करने से वह पुरुष है। ब्रह्माण्डों के बी च परस्पर आकर्षण उल्ब (गर्भनाल, पद्म) है।
आपो नारा इति प्रोक्ता, आपो वै नरसूनवः।
ता यदस्यायनं पूर्वं तेन नारायणं स्मृतम्॥
(मनु स्मृति, १/१०, विष्णु पुराण, १/४/६, ब्रह्मवैवर्त्त पुराण, १/३, अग्नि पुराण, १७/७, गरुड पुराण, ३/२४/५३, ब्रह्म पुराण, १/१/३९, ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/६/६२, वराह पुराण, २/२६, वायु पुराण, ७/६४)
तत् सृष्ट्वा तदेव अनुप्राविशत्। तत् अनुप्रविश्य सत् च त्यत् च अभवत्। (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/६)
७. ब्रह्माण्ड (गैलेक्सी)-
सूर्य रूपी विष्णु के २ रूप हैं-सौर मण्डल के ताप, बायु तथा प्रकाश क्षेत्र विष्णु के ३ पद या विक्रम हैं। ब्रह्माण्ड की सीमा तक वह विन्दु रूप में दीखता है (सूर्य सिद्धान्त, १२/९०)। इस सूर्यों के समूह को विष्णु का परम पद या महाविष्णु कहते हैं।
इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्॥१७॥
तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः॥२०॥ (ऋक्, १/२२/१७, २०)
ब्रह्माण्ड सबसे बड़ी ईंट है, अतः इसे परमेष्ठी कहा गया है। इसका निर्माण स्थल कूर्म है, जो ब्रह्माण्ड का १० गुणा है। अतः पुराण में इसे गोलोक और ब्रह्माण्ड को महाविष्णु रूप विराट् बालक कहा गया है।
अथाण्डं तु जलेऽतिष्टद्यावद्वै ब्रह्मणो वयः॥१॥
तन्मध्ये शिशुरेकश्च शतकोटिरविप्रभः॥२॥ स्थूलात्स्थूलतमः सोऽपि नाम्ना देवो महाविराट्॥४॥
तत ऊर्ध्वे च वैकुण्ठो ब्रह्माण्डाद् बहिरेव सः॥९॥
तदूर्ध्वे गोलकश्चैव पञ्चाशत् कोटियोजनात्॥१०॥नित्यौ गोलोक वैकुण्ठौसत्यौ शश्वदकृत्रिमौ॥१६॥
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृति खण्ड, अध्याय ३)
स यत् कूर्मो नाम-एतद्वै रूपं कृत्वा प्रजापतिः प्रजा असृजत । यदसृजत-अकरोत्-तत् । यदकरोत्-तस्मात् कूर्मः। कश्यपो वै कूर्मः । तस्मादाहुः-सर्वाः प्रजाः काश्यप्यः-इति । (शतपथ ब्राह्मण, ७/५/१/५)
मानेन तस्य कूर्मस्य कथयामि प्रयत्नतः ।
शङ्कोः शत सहस्राणि (१ पर १८ शून्य) योजनानि वपुः स्थितम् ॥ (नरपति जयचर्या, स्वरोदय, कूर्मचक्र)
ब्रह्माण्ड का आकार परार्द्ध (१ पर १७ शून्य) योजन कहा है-ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।
छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ (कठोपनिषद्, १/३/१) = कूर्म का आकार १०० हजार शङ्कु (१० घात १३) योजन है। यहां पृथ्वी व्यास का १००० भाग योजन है। उससे कोटि x कोटि = १० घात १४ गुणा बड़ा अर्थात् १० घात १७ योजन का ब्रह्माण्ड है। उसका १० गुणा बड़ा कूर्म है। इसी कूर्म में ब्रह्माण्ड रूपी महा-पृथ्वी घूम रही है।
महाविष्णु (ब्रह्माण्ड) गोलोक रूपी समुद्र में हैं, वह ब्रह्माण्डों के परस्पर आकर्षण या अनन्त शेष पर स्थित है। उनकी नाभि या केन्द्र की सूर्य परिक्रमा कर रहा है। केन्द्र से सूर्य की दूरी ३०,००० प्रकाश वर्ष कही गयी है।
अस्य मूलदेशे त्रिंशयोजन (यहां योजन = प्रकाश वर्ष) सहस्रान्तर आस्ते या वैकला भगवतस्तामसी समाख्यातानन्त इति सात्वतीया द्रष्टृर्दृश्ययोः सङ्कर्षणमित्याचक्षते। यस्येदं क्षितिमण्डलं भगवतो अनन्त मूर्तेः सहस्र शिरस एकस्मिन्नेव शीर्षणि ध्रियमाणं सिद्धार्थ इव लक्ष्यते॥२॥ (भागवत पुराण, ५/२५/१, २)
आकृष्णेन रजसा वर्तमानो, निवेशयन् अमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन्॥
(ऋग्वेद, १/३५/२, वाज यजु, ३३/४३, तैत्तिरीय सं, ३/४/११/२)
यहां सूर्य के २ रूप हैं- वह अपने प्रकाशित मार्ग (हिरण्यय) पर ब्रह्माण्ड केन्द्र के आकर्षण से उसकी परिक्रमा कर रहा है। यह केन्द्र कृष्ण (कृष्ण विवर) है।
८. सौर मण्डल में पृथ्वी-
ब्रह्माण्ड अप् का समुद्र है। आकाशगंगा की सर्पाकार भुजा अहिर्बुध्न्य है जिसे पुराण में शेषनाग कहा गया है। इस भुजा में जहां सूर्य स्थित है, वहां भुजा की मोटाई के बराबर गोल महर्लोक है जिसका आकार ४३ अहर्गण अर्थात् पृथ्वी व्यास का २ घात ४० गुणा है। इसमें प्रायः १००० तारा हैं जिनको पुराण में शेष के १००० सिर कहा गया है। इनमें एक सिर हमारा सूर्य है, जिसके क्षेत्र में पृथ्वी सूक्ष्म विन्दु मात्र है।
ब्रह्माण्ड का घूर्णन अक्ष शिवलिङ्ग है, उसे सर्पाकार भुजा घेरे हुए है। अतः अहिर्बुध्न्य शिव का भी नाम है। इसे पुराण में शेषनाग कहा है।
तद्यदब्रवीत् (ब्रह्म) आभिर्वा अहमिदं सर्वमाप्स्यामि यदिदं किंचेति तस्मादापोऽभवंस्तदपामप्त्वमाप्नोति वै स सर्वान् कामान्यान्कामयते । (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/२)
जिस क्षेत्र में जल बन्धाहै, वह बुध्न है। बुध्न का अहि (सर्प) अहिर्बुध्न्य है।
नीचीनाः स्थुरुपरि बुध्न एषाम्। (ऋक्, १/२४/७)
अब्जां उक्थैः अहिं गृणीषे, बुध्ने नदीनां रजःसु षीदन्॥१६॥
मा नो अहिर्बुध्न्यो रिषे धान्मा यज्हो अस्य स्रिधदृतायोः॥१७॥
(ऋक्, ७/३४/१६, १७, निरुक्त, १०/४१, ४४)
सहस्र धारा-राजा सिन्ध्य़्नां पवते दिवः ऋतस्य याति पथिभिः। (ऋक्, ९/८६/३३)
सहस्रधारः शतवाज इन्दुः (ऋक्, ९/११०/१०)
सहस्रधारा के ७ भाग-सप्त प्रवत आ दिवम् (ऋक्, ९/५४/२)
इस शेष में सौर-मण्डल विष्णु है। उसका केन्द्र सूर्य पिण्ड उसकी नाभि है। उस नाभि के आकर्षण या कमल-नाल से पृथ्वी बन्धी है, जो मर्त्य ब्रह्मा है।
विष्णु के नाभि पद्म से ब्रह्मा का जन्म कहा है। पृथ्वी को भी पद्म रूप ही कहा है, जिसके केसर पर्वत रूप हैं। पृथ्वी पुनः विष्णु के उदर में लीन होती है। पद्म रूप पृथ्वी को बहु-योजन या सहस्रवर्ण कहा है। इसका एक अर्थ है कि पृथ्वी व्यास के १/१००० भाग (= १२.८ कि.मी.) को योजन माना गया है। पुराणों में पृथ्वी से दृष्ट ग्रह कक्षाओं को पृथ्वी के द्वीपों का नाम दिया गया है एवं उनके आकार इसी योजन में हैं।
पद्मपुराण, सृष्टि खण्ड, अध्याय ३४-
द्यौः स चन्द्रार्कनक्षत्रा सपर्वतमहीद्रुमाः। सलिलार्णव संमग्नं त्रैलोक्यं सचराचरम्॥१०५॥
एकमेव सदा ह्यासीत्सर्व मेकमिवाम्बरम्। पुनर्भूः सह लक्ष्म्या च विष्णोर्जठरमाविशत्॥१०६॥
तानि गृह्य महातेजाः प्रविश्य सलिलार्णवे। सुप्त्वा वारिकृतात्मा च बहुवर्ष शतानि च॥१०७॥
विष्णौ सुप्ते ततो ब्रह्मा विवेश जठरं ततः। बहुस्रोतं च तं ज्ञात्वा महायोगी समाविशत्॥१०८॥
नाभ्यां विष्णोः समुत्पन्नं पद्मं हेमविभूषितम्। स तु निर्गम्य वै ब्रह्मा योगी भूत्वा महाप्रभुः॥१०९॥
सिसृक्षुः पृथिवीं वायुं पर्वतांश्च महीरुहान्। तदन्तरा प्रजाः सर्वा मनुष्यांश्च सरीसृपान्॥११०॥
अध्याय ३९-पद्मनाभ्युद्भवं चैकं समुपादितवांस्ततः। सहस्रवर्णं विरजं भास्कराभं हिरण्मयम्॥१५३॥
अध्याय ४०-पुलस्त्य उवाच
अथ योगवतां श्रेष्ठमसृजद् भूरिवर्चसम्। स्रष्टारं सर्वलोकानां ब्रह्माणं सर्वतोमुखम्॥१॥
तस्मिन् हिरण्मये पद्मे बहु योजन विस्तृते। सर्व तेजो गुणमये पार्थिवैर्लक्षणैर्वृते॥२॥
तच्च पद्म पुरा भूतं पृथिवीरूपमुत्तमम्। नारायण समुद्भूतं प्रवदन्ति महर्षयः॥३॥
यत् पद्मं सार सा देवी पृथिवी परिकथ्यते। ये पद्मकेसरा मुख्यास्तान्दिव्यान् पर्वतान् विदुः॥४॥
हिमवन्तं च नीलं च मेरुं निषधमेव च। कैलासं शृङ्गवन्तं च तथाद्रिं गन्धमादनम्॥५॥
९. भौगोलिक पद्मनाभ-
गोल पृथ्वी सतह का चित्र समतल कागज पर नहीं हो सकता। अतः उत्तरी गोलार्ध के ४ पादों को भूपद्म का ४ दल कहा गया है। नक्शा बनाने के लिये इन दलों को खोल कर उनका प्रतिरूप काल्पनिक चौकोर मेरु सतह पर बनाते हैं, जो वर्ग आधार पर पिरामिड है। इसके वर्ग आधार की रेखायें विषुव वृत्त को बाहर से स्पर्श करती हैं। इस काल्पनिक मेरु की ऊंचाई १ लाख योजन है।
जम्बूद्वीपो द्वीपमध्ये तन्मध्ये मेरुरुच्छ्रितः। चतुरशीतिसाहस्रो भूयिष्ठः षोडशाद्रिराट्॥३॥
द्वात्रिंशन् मूर्ध्नि विस्तारात् षोडशाधः सहस्रवान्। भूयस्तस्यास्य शैलोऽसौ कर्णिकाकार संस्थितः॥४॥
(अग्नि पुराण, अध्याय १०८)
सूर्य सिद्धान्त (१२/३४-३६) के अनुसार पृथ्वी का घूर्णन अक्ष के उत्तर दिशा में मेरु या सुमेरु है, दक्षिण दिशा में कुमेरु है। ये सतह पर हैं। पर इसका आकार १ लाख योजन कहा है, जो १००० योजन पृथ्वी व्यास का १०० गुणा है। यह पृथ्वी के गुरुत्व क्षेत्र की सीमा है। पृथ्वी कक्षा में इस आकार के वृत्त को सौर मण्डल का जम्बू द्वीप कहा है (विष्णु पुराण, २/४/२, भागवत पुराण, ५/१६/५ आदि)। पृथ्वी सतह का जम्बू द्वीप न वृत्ताकार है, न पृथ्वी आकार का १०० गुणा है। पृथ्वी का गुरुत्व क्षेत्र त्रिज्या की १०० गुणा दूरी तक है।
उत्तर के ४ पादों का समतल नक्शा काल्पनिक मेरु (पिरामिड) के ४ त्रिकोण पृष्ठों पर विक्षेप से बनता था। इसका आधार विषुव वृत्त पर चतुर्भुज था जिसकी एक भुजा के मध्य में लंका थी। इनके ४ रंग कहे गये हैं। आज तक नक्शा में ४ रंगों का ही प्रयोग होता है। इसका सामान्य गणितीय प्रमाण आज तक नहीं मिला है, पर कम्प्यूटर द्वारा १० लाख से अधिक विकल्पों की जांच से यह सही प्रमाणित हुआ है।
चातुर्वर्ण्यस्तु सौवर्णो मेरुश्चोल्बमयः स्मृतः॥१२॥
नाभीबन्धनसम्भूतो ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः। पूर्वतः श्वेतवर्णस्तु ब्राह्मण्यं तस्य तेन वै॥१४॥
पीतश्च दक्षिणेनासौ तेन वैश्यत्वमिष्यते ।भृङ्गिपत्रनिभश्चैव पश्चिमेन समन्वितः॥१५॥
पार्श्वमुत्तरतस्तस्य रक्तवर्णं स्वभावतः। तेनास्य क्षत्रभावः स्यादिति वर्णाः प्रकीर्तिताः॥१६(मत्स्य पुराण, अध्याय, ११३)
ध्रुव के निकट गोल भूखण्ड का आकार बढ़ता जाता है, जैसे ग्रीनलैण्ड भारत से छोटा है, पर नक्शे में बड़ा दीखता है। उत्तर ध्रुव जल में है (स्थल से घिरा है), अतः वहां कोई समस्या नहीं है। दक्षिणी ध्रुव स्थल भाग में है, अतः इसका आकार अनन्त हो जायेगा, अतः इसे अनन्त द्वीप कहते थे। इसका नक्शा अलग से बनता था। इसके २ भूखण्ड प्रायः जुड़े हुए थे। अतः इसे यम (यमल = जुड़वां) द्वीप भी कहते थे, तथा यम दक्षिण का स्वामी है।
स्वर्मेरु-स्थल मध्ये नरको बडवा-मुखं च जल-मध्ये (आर्यभटीय, ४/१२)
मेरुः स्थित उत्तरतो दक्षिणतो दैत्यनिलयः स्यात्॥३॥
एते जल-स्थला मेरुः स्थलगो ऽसुरालयो जलगः।
(लल्ल का शिष्यधीवृद्धिद तन्त्र, अध्याय १७)
दक्षिण दिशा को नक्शे में नीचा दिखाते हैं, अतः अनन्त को पातालों के भी नीचे कहा है जिसके ऊपर पृथ्वी है।
पातालानामधस्श्चास्ते विष्णोर्या तामसी तनुः।
शेषाख्या यद्गुणान्वक्तुं न शक्ता दैत्य दानवाः॥ (विष्णु पुराण, २/५/१३)
इसके सबसे निकट के द्वीप को पुष्कर (दक्षिण अमेरिका) कहा है, जो ब्रह्मा का निवास था।
त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत। मूर्ध्नो विश्वस्य वाधतः॥१३॥
तमुत्वा दध्यङ्गृषिः पुत्र ईधे अथर्वणः। वृत्रहणं पुरन्दरम्॥१४॥ (ऋक्, ६/१६)
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम्।
तस्मिन्निवसति ब्रह्मा पूज्यमानः सुरासुरैः॥(विष्णु पुराण, २/२/८५, ब्रह्माण्ड पुराण, ८/८/७)
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे पद्मवत् तेन स स्मृतः (मत्स्य पुराण, १२३/३९) अपरमेरु का देश पेरु है। यहां हिमालय के शिव-पार्वती जैसे मेरु-मू देव हैं। हायु मरका पर्वत पर अमारु मेरु की ७ मीटर ऊंची विशाल मूर्ति तथा प्राचीन विशाल भवन हैं। इसका स्थान १६०१२’५१.६२" दक्षिण तथा ६९०३०’२१.२८" पश्चिम है। इसके निकट कैलास के मानसरोवर जैसा टीटीकाका झील है।
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे तत्रत्यैः सनमस्कृतः॥१४०॥
महादेवः पूज्यते तु ब्रह्मा त्रिभुवनेश्वरः। तस्मिन्निवसति ब्रह्मा साध्यः सार्द्धं प्रजापतिः॥१४१॥
(ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/१९/१४०-१४१, वायु पुराण, ४९/१३५-१३६)
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे पद्मवत् तेन स स्मृतः।
पूज्यते स महादेवैर्ब्रह्मांशोऽव्यक्त सम्भवः॥ (मत्स्य पुराण, १२३/३९)
महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय ३४८ में मनुष्य रूप में अन्य ७ ब्रह्मा का वर्णन है-
१. मुख्य (नारायण के मुख से)-वैखानस को उपदेश,
२. नेत्र से-सोम को उपदेश, उनसे रुद्र, वालखिल्यों को,
३. वाणी से-इसे शान्ति पर्व ३४९/४९ में वाणी का पुत्र अपान्तरतमा कहा है, उनके माता पिता के लिये वाणी-हिरण्यगर्भाय नमः यज्ञ में पाठ होता है।
४. आदि कृत युग में (श्लोक ३४) कर्ण से ब्रह्मा की उत्पत्ति-आरण्यक, रहस्य. और संग्रह सहित वेद क्रम से स्वारोचिष मनु, शंखपद, दिक्पाल, सुवर्णाभ को उपदेश।
५. आदि कृत युग में (श्लोक ४१) नासिका से ब्रह्मा की उत्पत्ति- क्रम से वीरण, रैभ्य मुनि, दिक्पाल कुक्षि को उपदेश।
६. अण्डज ब्रह्मा (शान्ति पर्व ३४९/१७ में भी)-से बर्हिषद् मुनि, ज्येष्ठसामव्रती हरि, राजा अविकम्पन को उपदेश।
७. पद्मनाभ ब्रह्मा से दक्ष, विवस्वान्, वैवस्वत मनु, इक्ष्वाकु को उपदेश। यह सम्भवतः मणिपुर के निकट हिमालय के पूर्व भाग में थे। उनके नाम पर त्रिविष्टप् का पूर्व भाग ब्रह्म विटप (ब्रह्मपुत्र नदी का स्रोत क्षेत्र), ब्रह्मपुत्र, ब्रह्म देश (बर्मा, अभी म्याम्मार = महा + अमर) हैं।
कश्यप को भी ब्रह्मा कहा गया है। इनके समय अदिति के पुनर्वसु नक्षत्र में संवत्सर का अन्त तथा आरम्भ होता था-अदितिर्जातम्, अदितिर्जनित्वम् (शान्ति पाठ, ऋक्, १/८९/९०, अथर्व, ७/६/१, वाज. यजु, २५/२३)। यह प्रायः १७.५०० ईपू. में था।
१०. भारत का पद्मनाभ-
पृथ्वी का दक्षिणी छोर अनन्त द्वीप है। अतः भारत के दक्षिणी नहर को तिरु (श्री)-अनन्तपुरम् (अंग्रेजी में त्रिवेन्द्रम्) कहा गया है।तः यहां पद्मनाभ मन्दिर है। पृथ्वी के पुष्कर द्वीप में अपर-मेरु (अमेरु) था। इससे उसका नाम अमेरिका हुआ। इसकी विपरीत दिशा में पुष्कर उज्जैन से १२ अंश पश्चिम था (विष्णु पुराण, २/८/२८, मत्स्य पुराण, १२४/४०)। अभी इसे बुखारा कहते हैं (उजबेकिस्तान में)। तृतीय पुष्कर इन्द्रप्रस्थ का पुष्कर है, जो राजस्थान में है।
स्कन्द पुराण, अध्याय (६/१७९/५४) के अनुसार ३ पुष्कर हैं-
ज्येष्ठ-पुष्कर द्वीप में न्यग्रोध नामक स्थान के निकट।
मध्य-उज्जैन के १२ अंश पश्चिम उजबेकिस्तान का बुखारा।
कनीयक-अजयमेरु (अजमेर) का पुष्कर जहां सरस्वती धारा बहती थी।
३ पुष्कर के अन्य उल्लेख हैं-(पद्म पुराण, १/१५/१५१, १/१९-२०, अग्नि पुराण, २११/८, स्कन्द पुराण, ६/४५, १७९)-उज्जैन से १२ अंश पश्चिम का पुष्कर (विष्णु पुराण, २/८/२८), इन्द्रप्रस्थ पुष्कर (अजमेर, आबू पर्वत, पद्म पुराण, १/२० आदि)
विश्व सभ्यता के केन्द्र रूप में भारत को अजनाभ वर्ष कहते थे। इसके शासक को जम्बूद्वीप के राजा अग्नीध्र (स्वयम्भू मनु पुत्र प्रियव्रत की सन्तान) का पुत्र नाभि कहा गया है।
विष्णु पुराण, खण्ड २, अध्याय १-जम्बूद्वीपेश्वरो यस्तु आग्नीध्रो मुनिसत्तम॥१५॥
पित्रा दत्तं हिमाह्वं तु वर्षं नाभेस्तु दक्षिणम्॥१८॥
इसका नाभि कमल पूर्वोत्तर भाग का मणिपुर है, जिसके बाद ब्रह्मा का ब्रह्म देश (बर्मा, या अब म्याम्मार) है।
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