श्री राम ने अयोध्या पर राजा के रूप में ग्यारह हज़ार वर्षों तक राज किया और रामराज की स्थापना की। कृष्ण कभी राजा नहीं बने, न मथुरा के न ही द्वारिका के। अपनी बनाई नगरी में भी वो द्वारिकाधीश बने, द्वारिका के संरक्षक। राम राजतन्त्र के प्रतीक पुरुष थे जबकि कृष्ण प्रजातन्त्र के प्रतीक पुरुष। राम भाइयों में सबसे बड़े थे, उनका मर्यादित होना आवश्यक था इसलिए वह मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं। कृष्ण भाइयों में सबसे छोटे थे, उनका चंचल होना स्वाभाविक था, इसलिए वह लीला पुरुषोत्तम कहलाते हैं।
कृष्ण ने अपनी लीलाओं में पूतना को फंसाया, बकासुर को फंसाया। साड़ी की लीला रच दुःशासन को थकाया, गज़ अश्वत्थामा की लीला में द्रोणाचार्य को और शिखंडी की लीला रच भीष्म को फंसाया। इसके विपरीत राम स्वयं मरीच की लीला में फंस गए। सोने का हिरण नहीं होता, यह जानते हुए भी वह उसके पीछे गए। राम ईश्वर थे, फिर भी वह स्वर्ण मृग का रूप धारण किये मारीच को पहचानने में धोखा खा गए फिर हम तो इन्सान हैं, धोखा खा जाना स्वाभाविक है।
No comments:
Post a Comment