Thursday, 27 November 2025

स्त्री और ईसाई धर्म

women, church and state में मटिल्डा यह स्पष्ट लिखती हैं कि ख्रीस्तपंथ में चर्च ने महिलाओं को जीवित ही नहीं माना था। चर्च की दृष्टि में महिला का कोई अस्तित्व नहीं था। वह ईविल का कारक थी और साथ ही कौमार्य को सबसे पवित्र माना गया था। वे इस पुस्तक के पृष्ठ 55 पर लिखती हैं कि सैन्ट पॉल ने पुरुष को महिलाओं का मास्टर बताया है, और वही स्त्री का सिर है। वे लिखती हैं, कि हालांकि चर्च ने व्यावहारिक रूप से महिला को विश्व के विनाश के लिए जिम्मेदार बताया था और उसके लिए पछतावा आदि बताते थे और ऐसे प्राणी के लिए लानत भेजते थे, जिसे उन्होनें “door of hell” अर्थात नरक का द्वार कहा था। 

अब यह बताया जाए कि दिन भर गोस्वामी तुलसीदास जी को कोसने वाली या फिर मनु स्मृति को कोसने वाली डीडी लॉग्स, जिन्हें मोक्ष और शांति ही चर्च या मस्जिद में मिलती है, क्या उन्होनें कभी यह बातें आपको बताईं? मुझे मस्जिद या चर्च जाने से कोई आपत्ति नहीं है, वह उनका विश्वास है वे करें परंतु जो सबसे महत्वपूर्ण है वह यह कि चर्च ने महिलाओं को क्या बताया था और चर्च ने ईसाई महिलाओं और गैर ईसाई महिलाओं के साथ क्या सुलूक किया, उसके विषय में मुंह क्यों नहीं खोला?

फिर मटिल्डा आगे लिखती हैं कि छठवीं शताब्दी में macon में उनसठ बिशपस ने एक काउन्सल में भाग लिया और अपना पूरा समय इस प्रश्न पर चर्चा करते हुए बिताया कि क्या “महिलाओं में आत्मा भी होती है?” 

एक तरह यह तर्क दिया गया था कि महिलाओं को “होमो” नहीं कहा जाना चाहिए तो दूसरी तरह यह तर्क दिया गया कि उसे “होमो” कहा जाना चाहिए, क्योंकि पहली बात कि ग्रंथ यह घोषणा करते हैं कि गॉड ने मैन को बनाया, मेल और फ़ीमेल को बनाया और दूसरा कि जीसस क्राइस्ट जो एक वुमन के बेटे हैं, उन्हें मैन का बेटा कहा जाता है। 

इसलिए ईसाई महिलाओं को पादरियों की दृष्टि में मानव तो माना जाता रहा, मगर उन्हें बहुत कमजोर और बहुत बुरा माना जाता था। मगर इसके हजार साल बाद नए पाए गए अमेरिका की महिलाओं के लिए यह कहा गया कि ये तो “brute creations अर्थात पशु हैं, जिनमें न ही कोई soul है और न ही उनका कोई कारण है।“

इसके बाद वे लिखती हैं कि सोलहवीं शताब्दी के अंत तक यह लिखा जाता रहा कि महिलाएं किसी भी प्रकार से mankind अर्थात मानवता में स्थान नहीं है, अपितु ये तो मानव और brute जीवों के बीच कोई पशु प्रकार की जीव हैं। 
फिर उसके आगे वे लिखती हैं कि पीटर द ग्रेट के समय तक महिलाओं को मानव माना ही नहीं जाता था, जब Christendom का विभाजन हुआ, जिसे ग्रीक चर्च के रूप में जानते हैं, उस समय साम्राज्य की जनगणना में केवल और केवल आदमियों की ही गिनती हुई थी और तमाम “souls” में किसी भी महिला का नाम नहीं था। 

हालांकि यह पुस्तक बहुत बड़ी है और इसे पढ़ने के लिए धैर्य और साहस चाहिए क्योंकि कई ऐसी मान्यताऐं टूटेंगी जो हमारे मन में न जाने कब से घुसी हुई हैं और इन कथित डीडी लोग्स ने डाल रखी हैं। 

ये पापिन हैं, क्योंकि इन्होनें हिन्दू इतिहास और ऐतिहासिक पात्रों को चर्च की दृष्टि से देखकर पढ़ा है और हमारे सामने प्रस्तुत किया है, जिसके चलते हमारी बेटियाँ या तो लव जिहाद की ओर जा रही हैं या फिर अपनी लैंगिक पहचान के प्रति ही भ्रमित हो रही हैं।


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