किसी #देश_को_विकलांग कैसे कर सकते हैं?
उसको उसके पुरातन ज्ञान से वंचित करके।
किसी भी देश को अपने पुरातन ज्ञान से वंचित करना हो तो उसके इतिहास की दुर्व्याख्या कर दो, और उसे शिक्षा का अंग बना दो।
मात्र दो पीढ़ियों में वह देश अपने इतिहास से कट जाएगा। और समाज विकलांग हो जाएगा।
नाभि नाल का संबंध संक्रमित कर दो तो जो शिशु जन्मेंगा वह विकलांग ही रहेगा जीवन भर। मूक बधिर हो सकता है। या ऐसे ही अनेक तरह की मानसिक बाधाओं से ग्रसित हो सकता है।
मैकाले की शिक्षा का अर्थ यही था और उसका उद्देश्य भी यही था। 1835 में जब उसने अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाने का तर्क प्रस्तुत किया था, तो उसका मंतव्य संक्षिप्त परंतु स्पष्ट था।
मैकाले ने कहा :
"इस शिक्षा का उद्देश्य करोड़ों शासितों और शासकों ( मुट्ठी भर) के बीच ऐसे बिचौलिए पैदा करना है जो शक्ल से भारतीय और अक्ल, नैतिकता और स्वाद से अंग्रेज हों। जिनके ऊपर यह दायित्व होगा कि वे यूरोप के वैज्ञानिक शब्दावलियों को देशज भाषा में आम भारतीयों तक पहुंचाए। अंग्रेजी शासकों की भाषा है। और हम भारत में अच्छे अंग्रेज विद्वान पैदा कर सकते हैं।"
1836 में वह अपने पिता को लिखे पत्र में इस शिक्षा नीति का मंतव्य समझाता है:
"मुझे यह देखकर अपार हर्ष की अनुभूति हो रही है कि बंगाल में आधुनिक शिक्षा से शिक्षित भारतीयों (हिंदुओं) में अपने धर्म और संस्कृति के प्रति घोर अरुचि उत्पन्न हो रही है। यदि यह शिक्षा नीति जारी रहती है तो आने वाले समय काल में उनके धर्म में किसी भी तरह की हस्तक्षेप किए बिना, और धर्म परिवर्तन का कोई भी प्रयास किए बिना आने वाले 30 वर्षों में बंगाल में कोई भी मूर्तिपोजक न बचेगा।"
( आज यह पत्र गूगल पर उपलब्ध है। इसके पूर्व यह गुप्त था।)
उसी शिक्षा से जन्मे थे इस देश के निर्माता। ब्रिटिश एजुकेटेड इडियट इंडियन बैरिस्टर्स, जो शक्ल से भारतीय और अक्ल , स्वाद और नैतिकता से अंग्रेज थे। नैतिकता मॉरलिटी की हिंदीबाजी है जिसका अर्थ होता है ईसाइयत। उस नैतिकता की व्याख्या कभी अलग से करूंगा। मूलतः उसका अर्थ वही है जो उनके समयकाल में हुवा।
नैतिक और अक्लमंद अंग्रेज भारत से 45 ट्रिलियन डॉलर लूटकर ले गए, और भारत के समस्त विज्ञान और शिल्प उद्योग को नष्ट किया। जो भारत हजारों सालों से निर्यातक देश रहा हो, उसे मैनचेस्टर में बने घटिया वस्त्रों का आयातक बाजार बना दिया। जो भारत आज से मात्र 250 वर्ष पूर्व विश्व की 25% जीडीपी का उत्पादक था वह अंग्रेजों के मात्र 150 वर्षों के कूटनीति, फूटनीति और कूटनीति के कारण मात्र 1.8% जीडीपी का उत्पादक बचा।
भारत के करोड़ों लोग बेरोजगार हो गए। क्या यह प्रश्न मन में नहीं आता कि हिंदुओं का कौन सा वर्ग, कौन सी जाति इस जीडीपी की उत्पादक थी? और उनका क्या हुआ, जब भारत की जीडीपी धराशाई हो गई, अंग्रेजों की लूटनीति के कारण?
उनके बाल बच्चों का क्या हुआ?
उनकी दुर्दशा के लिए कौन उत्तरदाई था?
किसने उनका शोषण किया?
मनुस्मृति ने, ब्राह्मणों ने या तथाकथित सवर्णों ने?
मैकाले की शिक्षा का प्रभाव आज भी भारतीय बुद्धजीवियों और राजनेताओं के बुद्धि पर पर्दा डाले हुए है। किसका किसका नाम लिया जाय?
लाखों की संख्या में हैं ऐसे बुद्धि विकलांग, जिनके अंदर घटनाओं के सहज विश्लेषण का विवेक नहीं है।
नेहरू का नाम लिया जा सकता है - जो लिखते हैं - डिस्कवरी ऑफ इंडिया। जिसका अर्थ इतना ही है कि उसके पूर्व भारत किसी गुफा में छुपा हुआ था।
जबकि रोमन इतिहासकार प्लिनी, जो ईसाइयत के पूर्व काल का था, लिखता है कि रोमन नोबल्स और स्त्रियों के भारत से आयातित सिल्क वस्त्रों का मूल्य हम सोने में चुकाते हैं।
वही नेहरू लिखते हैं - एक्सीडेंट के कारण मैं हिन्दू हूँ, लेकिंन स्वभाव से मैं मुसलमान हूँ, और चरित्र से मैं अंग्रेज हूँ।
सोचो जरा कि मैकाले की शिक्षा ने किस तरह इस देश के प्रथम प्रधानमंत्री के चरित्र को दूषित किया था।
और आज तो लाखों करोड़ो लोग हैं जो उसी मैकाले के अवैध संतानें हैं - राजनीतिज्ञ, सामाजिक शास्त्री, इतिहासकार, पत्रकार, न्याय व्यवस्था आदि आदि।
यह मत समझना कि यह किसी पार्टी विशेष के लोगों की बात हो रही है।
एक प्रमुख राजनीतिज्ञ और संस्था प्रमुख का एक उद्बोधन मैने सुना। उन्होंने कहा कि हमने ऐसे समाज की रचना किया जिसमें हमने अपने ही समाज की निम्न जातियों को दो हजार वर्ष से शोषित किया है। महाभारत में इसका उद्धरण मिलता है।
उनसे पूंछिए कि महाभारत के किस पर्व के जातियों का उल्लेख है, ऊंची और नीची जातियों का उल्लेख है, उनके शोषण का उल्लेख है?
ऐसा ही था तो क्या क_साई और ई_साई भारत में जनकल्याण हेतु आए थे?
No comments:
Post a Comment