एक मुस्लिम विचारक ने ही पूछा था कि इस्लाम ने अमन का पैगाम कब दिया था? क्यों इसको शांति का संदेश देने वाला कहते हैं? इसके पीछे कोई तर्क व आधार तो हो, लेकिन ऐसा कुछ है ही नहीं..!!
उसने कहा था कि मुस्लिमों की तारीख़ लहू में डूबी हुई है ये जुमला किसी नफ़रत या नजरिये से नहीं, बल्कि हक़ीक़त की गहराईयों से उभरता हुआ एहसास है।.. उसने कहा कि हो सकता है शुरू में इस्लाम ने जब इन्सानियत को शान्ति , अमन और भाई चारे का पैग़ाम दिया तो उस के मानने वालों ने इबतिदा में क़ुर्बानी, सब्र और इस्तिक़ामत की मिसालें क़ायम कीं। मगर वक़्त गुज़रने के साथ साथ, प्रभुत्व की इच्छा , फिरको की जंग और आपसी मसलों की टक्कर ने इस उम्मत के हाथों को ख़ून से रंग दिया,
नबी के मर जाने के फ़ौरन बाद ख़िलाफ़त का मसला वो पहला मौक़ा था जब मुसलमानों के बीच वाद विवाद, सत्ता संघर्ष ने बहुत तेजी पकड़ी । सक़ीफ़ा बनी साअदा से लेकर सफ़ीन और कर्बला तक, हर मोड़ पर मुसलमानों ने अपने ही भाईयों के ख़िलाफ़ तलवार उठाई। कर्बला की ज़ंग तो तारीख-ए-इस्लाम का वो काला अध्याय है जिसने इस्लाम के दामन पर ऐसा काला धब्बा छोड़ा, जो सदीयों बाद भी नहीं धुल सका। सत्ता लोलुपता की हवस ने नबी के नवासे का ख़ून बहाया, और इस दिन से मुसलमानों की सियासत में ताक़त और तलवार का खेल कभी ख़त्म ना हुआ...!
अब्बासियों ने मुवावियों का ख़ून बहाया, फिर तुर्कों, फ़ातिमियों, ममालीक और उस्मानियों ने एक दूसरे के ख़िलाफ़ जंगें कीं। कहीं मज़हब के नाम पर, कहीं अपनी धाक जमाने के नाम पर,.... और कहीं महज़ झूठे स्वाभिमान के लिए । इतिहास की परते खोलें तो हर दौर में कोई ना कोई मुस्लिम बादशाह अपने भाई, बाप या बेटे का सर तन से जुदा करता नज़र आता है। इस्लाम जिसने "और अपने भाई का ख़ून ना बहाये का संदेश दिया था , उसी उम्मत ने मसलक, फिरको और सियासत के नाम पर ख़ून की नदियाँ बहाई है
अंदलुस का ज़वाल, बग़दाद की बर्बादी, और ख़िलाफ़त-ए-उस्मानिया की टूट-फूट भी इसी आंतरिक कलह का ही नतीजा थी।गैर मुस्लिम दुश्मनों ने तलवार नहीं चलाई, मुस्लमानों ने ख़ुद अपनी जड़ें काटीं। हर दौर में किसी ना किसी ने अपने नज़रिए को सच्चाई का स्रोत क़रार दिया, और दूसरे को काफ़िर या बाग़ी ठहरा कर मार दिया....!
आज भी ये तारीख़ ख़त्म नहीं हुई। कभी सीरिया में, कभी यमन में, कभी अफ़्ग़ानिस्तान या इराक़ में, यानि लड़ना ही है दूसरे नहीं तो आपस में!
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