जितना हम उसे देखते हैं, उतना ही कम लगता है कि हम उसे जानते हैं. यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी गहरे समुद्र को सतह से देखकर उसकी गहराई का अनुमान लगाना.
स्त्री को अक्सर एक 'रहस्य' कहा गया, लेकिन वह रहस्य नहीं, बल्कि एक खुली किताब है जिसे पढ़ने के लिए नज़र चाहिए, नीयत चाहिए और सबसे ज़्यादा चाहिए समझ.
जब कोई स्त्री किसी पुरुष से या किसी भी अपने प्रिय से प्रेम करती है, तो वह सिर्फ प्रेम नहीं देती — वह समय देती है, सम्मान देती है, और साथ ही साथ सहयोग भी. वह सिर्फ पाने की इच्छा नहीं रखती; वह देने का सामर्थ्य रखती है और तब यह भी पता चलता है कि स्त्रियों के पास भी ‘ट्रांसपोर्ट मनी’ होती है, वे आपको भी सरप्राइज़ दे सकती हैं, वे बातचीत शुरू कर सकती हैं और उसे बनाए भी रख सकती हैं.
लेकिन यह सब तब दिखता है, जब आप ऐसी स्त्री को समझने लगते हैं जो खुद को साबित करने की ज़रूरत नहीं समझती — जो आपके साथ रहकर किसी एहसान का भाव नहीं रखती, बल्कि आपको अपना मानती है.
वह स्त्री न तो आपके ऊपर निर्भर होती है, न ही आप पर हावी. वह समानांतर चलने वाली वह ऊर्जा होती है, जो आपके साथ चलती है — न आगे, न पीछे.
दुर्भाग्य यह है कि बहुत से लोग ऐसी स्त्रियों को पहचान नहीं पाते. वे उन्हें सीमाओं में बाँधते हैं, उन्हें सिर्फ एक भूमिका में देखते हैं: प्रेमिका, पत्नी, माँ, बहन… लेकिन वह हर भूमिका में पूरी होती है, और फिर भी किसी एक में सीमित नहीं.
जो लोग ऐसी स्त्रियों के संपर्क में आते हैं, जो सच में प्रेम करती हैं, वे समझते हैं कि प्रेम में बराबरी होती है — एहसान नहीं. वे समझते हैं कि स्त्री को ‘रखा’ नहीं जाता, वह ‘साथ’ रखी जाती है.
स्त्री कोई रहस्य नहीं, वह एक सच है और जब कोई उसे समझने का प्रयास करता है, तो वह स्वयं को खोलती है — बातों में, भावनाओं में, ख़ामोशियों में और छोटे-छोटे उस प्यार भरे ख्याल में जो आपके लिए रखती है.
उस स्त्री को जानिए — जो आपकी बातें सुनती है, आपको जवाब देती है, आपकी थकान पढ़ लेती है और कभी-कभी आपके हिस्से का आकाश भी थाम लेती है.
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#रजतपुष्प🍀 #रजतमंथन
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