एष वै सुमहान् श्रीमान् विटपी सम्प्रकाशते।
विराजत्युज्ज्वलस्कन्धः कोविदारध्वजो रथे॥ १८॥
(सामनेकी ओर यह जो बहुत बड़ा शोभासम्पन्न वृक्ष दिखायी देता है, उसके समीप जो रथ है, उसपर उज्ज्वल तनेसे युक्त कोविदार वृक्षसे चिह्नित ध्वज शोभा पा रहा है ॥ १८ ॥)
असनाः सप्तपर्णाश्च कोविदाराश्च पुष्पिताः।
दृश्यन्ते बन्धुजीवाश्च श्यामाश्च गिरिसानुषु॥ ६२ ॥
(पर्वतके शिखरोंपर असन, छितवन, कोविदार बन्धु-जीव तथा श्याम तमाल खिले दिखायी देते हैं॥ ६२ ॥=
अङ्गोलाश्च कुरण्टाश्च चूर्णकाः पारिभद्रकाः।
चूताः पाटलयश्चापि कोविदाराश्च पुष्पिताः॥ ८०॥ मुचुकुन्दार्जुनाश्चैव दृश्यन्ते गिरिसानुषु।
(अङ्गोल, कुरंट, चूर्णक (सेमल), पारिभद्रक (नीम या मदार), आम, पाटलि, कोविदार मुचुकुन्द (नारङ्ग) और अर्जुन नामक वृक्ष भी पर्वत-शिखरोंपर फूलोंसे लदे दिखायी देते हैं॥ ८० ॥)
एष वै सुमहच्छ्रीमान् विटपी सम्प्रकाशते । विराजत्युज्ज्वलस्कन्धः कोविदारध्वजो रथे ॥३३॥
(विशाल शाखावाले पेड़के समान ऊँचे तथा शोभित कन्धेवाला राम रथमें कोविदार (कचनार या रक्तकाञ्चन) की ध्वजा लगाये हुए अपने पिताकी आज्ञासे उनके ही रथपर सवार होकर आ रहा है।)
हनुमत्कोविदाराण्डजेश वाणांकिताः शुभाः। चतुर्व्वपि बंधनीयाः पताकाः स्पंदनेषु हि ॥६९॥
अतः सोप्यस्थ रामस्य कोविदारध्वजः स्मृतः । बाणध्वजांकितरथमारुह्य ताटिकां वने ॥८४॥ स्थितः स्त्रीयरथे दिव्ये तस्माच्च गरुडध्वजः । शुक्लायां हि पताकायां कोविदारोऽस्ति वै शुभः ८७॥
चतुर्षुस्यंदनेष्येवं चत्वारः कीर्तिता ध्वजाः । कोविदारध्जो रामः श्रीरामो मार्गेण ध्वजः ॥८९॥
आकाशचुंबिनश्चित्रा इमेऽग्रे कस्य वै ध्वजाः।
हनुमत्कोविदारांडजेशबाणांकिताः शुभाः ॥३१॥
विराजत्युज्ज्वलस्कन्धः कोविदारध्वजो रथे । १८ ।
(राज्य को निष्कंटक बनाने के इच्छा से हमें मार डालने को सेना लेकर चढ़े आ रहे हैं, भरत की सेना देखकर लक्ष्मण ने कहा)
उत्तर रामचरित -
भो भोः! सैनिकाः! जातमवलम्बनमस्माकम्।
नन्वेष त्वरितसुमन्त्रनुद्यमान-प्रोदुवल्गत्प्रजवितवाजिना रथेन। उत्खातप्रवलितकोविदारकेतुः श्रुत्वा वः प्रधनमुपैतिचन्द्रकेतुः।
(कोई सैनिक नेपथ्य से अपने साथी सैनिकों के प्रति कहता है-) हे सैनिकों! आप लोग ध्यान दें कि सुमन्त्र के द्वारा शीघ्रताःपूर्वक हाँके जाने के कारण छलाँगें लगा-लगाकर अत्यन्त वेग से दौड़ रहे (एवं रथ में जुते हुए) घोड़ों से युक्त रथ से, ऊँची-नीची भूमि पर तीव्रगति से दौड़ (रहे रथ) के कारण हिलती हुई, कोविदार नामक वृक्ष के काष्ठ से निर्मित पताका (से युक्त रथ-) वाले, ये हमारे सेनापति चन्द्रकेतु, तुम लोगों की (लव के साथ चल रही हुई) युद्ध-वार्ता को सुनकर (यहाँ हम लोगों के) समीप आ रहे हैं।)
अपि नौ वशमागच्छेत् कोविदार-ध्वजों रणे। (रा०, अयो०, अ० ६७)
लक्ष्मण को जब भरत के आने की बात किरातों से ज्ञात होती है कि भरत अक्षौहिणी सेना लेकर चित्रकूट पर चढ़ आए है और कोशल-साम्राज्य का कोविदार भंडा चित्रकूट रहा है तो वे कोविदार-ध्वज को वश में करने की प्रबल इच्छा प्रकट करते है।
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