अभी एक विचार पढ़ा कि पुनर्वसु नक्षत्र धनुष आकार का है। इस नक्षत्र में भगवान राम का जन्म हुआ था। उन्होंनें धनुष तोड़ा अतः विवाह सफल नहीं रहा। सीताराम की जोड़ी को सबसे आदर्श माना जाता है जो सबसे कठिन परिस्थिति में भी स्थिर रहा। विवाह अवसर पर सीताराम विवाह सम्बन्धित गीत ही गाये जाते हैं। भगवान परशुराम का भी जन्म पुनर्वसु नक्षत्र में हुआ था। किन्तु उनके विवाह की चर्चा नहीं होती है।
भगवान राम का विवाह मार्गशीर्ष शुक्ल पञ्चमी को हुआ था। इस दिन उत्तराषाढ़ नक्षत्र रहता है जो पुनर्वसु से १३ नक्षत्र बाद है, अर्थात् २७ नक्षत्र के चक्र में विपरीत दिशा में होगा। इस अर्थ में वह पुनर्वसु रूपी धनुष को तोड़ने वाला है। नक्षत्र प्रतीक के अतिरिक्त वास्तविक धनुष भंग हुआ था। उसमें विशेषता है कि सीता स्वयंवर या कंस के धनुष यज्ञ-दोनों में शिव का धनुष तोड़ा गया था। लेकिन परशुराम ने भगवान राम को शार्ङ्ग धनुष दिया तथा भगवान श्रीकृष्ण भी उसी धनुष का प्रयोग करते थे। उसे कभी नहीं तोड़ा गया। इन धनुषों का अन्तर एवं धनुष तोड़ना एक रहस्य है।
एक प्रश्न हैं कि क्या राम जी का विवाह मार्गशीर्ष पंचमी को ही हुवा था? जबकि महर्षि वाल्मिकि ने तो लिखा हैं कि उत्तराफाल्गुनी मे हुवा। (गीताप्रेस छपे की बाल्कान्ड 71 वां सर्ग 24 वां श्लोक।) फिर यह मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी का प्रचार किसने किया और कब हुवा? (जबकि मेरी गणना से पौष की पूर्णिमा को तो राम जी विश्वामित्र जी के आश्रम पहुंचे थे।)
क्योंकि रामजी ने तो चौमास किष्किंधा मै वास किया था।तो फिर दशहरा और दिवाली तो चौमास मै आता है।और कार्तिक पूर्णिमा से समाप्त होता है।फिर कैसे।
आपकी बात ठीक है। पर विवाह पञ्चमी मार्गशीर्ष शुक्ल पञ्चमी को ही मनायी जा रही है, जिसका कारण मुझे पता नहीं है।
दशहरा पहले चैत्र में ही मनाया जाता था जिसे ब्रिटिश दौर में आश्विन महीने में लाया गया। यह मात्र 300 साल पहले हुआ है।
वैसे ही रावण का वध तो (पौष) अमवष्या को हुवा था तब अश्विन शुक्ल दशमी का प्रचलन क्यू कर हो गया ?
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