स्वामी विवेकानन्द ने एक बड़ी अजीब-सी बात कही है। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य वही पा सकता है जो पिछले जन्म में राजा रहा हो। मनीषियों ने उनकी इस बात की व्याख्या इस प्रकार से की है कि जब व्यक्ति के भोगों की सभी कामानाएं समाप्त हो जाती हैं तभी वह अध्यात्म के पथ का सच्चा तीर्थयात्री बन पाता है और लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।
आज मोक्षदा एकादशी है यानी मोक्ष प्रदान करने वाली एकादशी। इसी दिन गीता जयंती भी मनायी जाती है। देखा जाए तो भगवद्गीता भगवान कृष्ण और उनके प्रिय सखा अर्जुन के बीच का संवाद है। यह संवाद कई लेयरों में चलता है। इसमें भगवान अर्जुन के तमाम भ्रमों और सन्देह का निराकरण करते हुए धीरे-धीरे अपने को भी खोलते जाते हैं।
गीता का उत्कर्ष एकादश भाव माना जाता है जब भगवान ने अपना विश्वरूप दिखाया। किंतु विश्व रूप दिखाने से पहले भगवान अर्जुन को मानसिक रूप से इसके लिए तैयार करते हैं। अपनी विभूतियां बता कर। इसके बावजूद भगवान का विराट रूप देखकर अपने समय के लगभग अजेय योद्धा अर्जुन की मानों घिग्गी बंध जाती है। डर से। खैर, बात का विस्तार न करते हुए इसे कृष्ण और अर्जुन तक ही सीमित रखा जाए। गीता में अर्जुन भगवान को विभिन्न नामों से संबोधित करता है और विराट रूप में देखने के बाद इस बात पर पश्चाताप करता है कि उन्हें वह साधारण मित्र मानकर हे कृष्ण, हे यादव, हे सखा कहकर संबोधित करता रहा। जहाँ तक श्रीहरि की बात है, वे भी गीता में अर्जुन को विभिन्न नामों से संबोधित करते हैं।
पर गीता के सत्रहवें अध्याय में जब भगवान यादवेन्द्र अपनी विभूतियाँ बता रहे होते हैं तो उस समय वह अर्जुन के केवल धनञ्जय नाम को अपनी विभूति बताते हैं। मजेदार बात है कि भीष्म दादा ने विष्णुसहस्रनाम में भगवान के सहस्रनामों में एक नाम धनञ्जय बताया है।
कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः ॥
धनञ्जय का अर्थ है जो धन को जीत चुका हो। इसमें सभी प्रकार के धन सन्निहित हैं। श्रीहरि धनञ्जय और उनका शिष्य, उनका मित्र अर्जुन भी धनञ्जय है। दोनों जो भी कार्य करते हैं, उसका हेतु, उसकी प्रेरणा कभी धन नहीं होता। गीता के प्रारंभ में अर्जुन की मनोदशा को बदलने के लिए भगवान केशव तमाम तरह के तर्क देते हैं जिनमें से एक यह है कि ‘‘हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्’’ अर्थात युद्ध में मारे गये तो स्वर्ग जाओगे और विजयी हुई तो धरती के सुख भोगेगे। किंतु अर्जुन को धरती के सुख यानी धन एवं सम्पदा का कोई आकर्षण ही नहीं था क्योंकि वह धनञ्जय था।
अब जरा भगवान कृष्ण की समूची जीवनलीला पर दृष्टि डालिए। कहने को तो भगवान द्वारिकाधीश भी हैं किंतु उनकी किसी भी लीला में आपको रंच मात्र भी धन या सम्पदा का आकर्षण नहीं मिलेगा। शायद यही कारण है कि धन की अधिष्ठात्री देवी माता लक्ष्मी ने उन्हें अपना पति वरण किया और वह श्रीपति कहलाये। पर यह भी गहराई से समझने की बात है कि धनञ्जय का अर्थ धन का नकार नहीं है। धन के आकर्षण का नकार है।
एकादशी की राम राम।
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