Saturday, 15 November 2025

मासानाम्मार्गशीर्षोऽहम्

मासानाम्मार्गशीर्षोऽहम्
(१) बाल गंगाधर तिळक ने ओरायन ग्रन्थ में इसके आधार पर महाभारत का काल निर्णय किया कि उस समय मार्गशीर्ष मास से वर्ष का आरम्भ होता था, अर्थात् उस मास में विषुव संक्रान्ति होती थी। विषुव संक्रान्ति से ही वसन्त का आरम्भ भी होता है, अतः कहा-ऋतूनां कुसुमाकरः।
(२) अन्य मत है कि सदा चैत्र मास तथा वसन्त से ही वर्ष का आरम्भ होता है। मेरे मत से इसके लिए अयनांश को २७ अंश से कम रखा जाता है, जो सूर्य सिद्धान्त गणना अनुसार अयनांश की सीमा है।। कलि वर्ष ३०४४ में ऋतु चक्र १.५ मास पीछे हट गया था, अतः वर्ष चक्र को भी उतना पीछे कर कृष्ण पक्ष से मास आरम्भ हुआ। किन्तु वर्ष आरम्भ चैत्र शुक्ल पक्ष से ही रहा। इसकी गणना नहीं करने के कारण ३४ विक्रम संवत् (३०६८ कलि) का ज्योतिर्विदाभरण १०६८ शालिवाहन शक का लगता है (शंकर बालकृष्ण दीक्षित-भारतीय ज्योतिष का इतिहास)। विक्रम संवत् द्वारा इस संशोधन के कारण चैत्र मास का कृष्ण पक्ष वर्ष के अन्त में तथा शुक्ल पक्ष आगामी वर्ष के आरम्भ में आता है। शान्ति पाठ के एक अंश का संवत्सर सम्बन्धित यही अर्थ है-अदितिर्जातम्, अदितिर्जनित्वम्। अदिति के पुनर्वसु नक्षत्र से संवत्सर का अन्त तथा नये संवत्सर का आरम्भ होता है। विक्रम संवत १० (गत) के पौष मास से जुलियस सीजर द्वारा रोमन कैलेण्डर आरम्भ हुआ तो उसमें प्रथम मास को जनवरी कहा गया क्योंकि ग्रीक जानुस देवता का मुंह आगे पीछे दोनों दिशा में रहता है।
(३) यदि सूर्य सिद्धान्त अनुसार सदा चैत्र तथा वसन्त से वर्ष आरम्भ होगा तो भगवान अपने को मार्गशीर्ष मास क्यों कहते हैं? वर्ष के दो अयन होते हैं-६ मास उत्तरायण, ६ मास दक्षिणायन (गीता, अध्याय ८)। दोनों अयन मिलाकर वर्ष को हायन कहते हैं। हायन का आरम्भ अग्रहायण है जो मार्गशीर्ष मास में होता है, अतः उसे अग्रहायण (अगहन) कहते हैं। उत्तरायण से ही दिव्य दिन या देवों का दिन आरम्भ होता है (सूर्य सिद्धान्त, अध्याय १)। अतः भगवान ने अपने को मार्गशीर्ष (अग्रहायण) कहा है। इस मास में भारत या उत्तर गोल में सबसे बड़ी रात्रि होती है, अतः इसे कृष्ण मास कहते थे। इस अर्थ में भी भगवान श्रीकृष्ण मार्गशीर्ष मास हैं।सीजर ने उत्तरायण आरम्भ से वर्ष आरम्भ करने का आदेश दिया था पर वहां के लोगों ने ७ दिन बाद वर्ष आरम्भ किया जब विक्रम संवत् गत १० का पौष मास आरम्भ हो रहा था। अतः उत्तरायण आरम्भ दिन २५ दिसम्बर हो गया। उनकी काल गणना में अशुद्धि के कारण आजकल यह २२ दिसम्बर को हो रहा है। किन्तु अभी भी २५ दिसम्बर को बड़ा दिन (दिव्य दिन का आरम्भ) कहते हैं। कृष्ण मास का आरम्भ होने से इसे क्रिसमस कहते हैं। किसी भी मत से इस समय ईसा का जन्म नहीं हुआ था। सौर वर्ष को दिव्य दिन मानने पर उसका उषा काल १६ दिन का होगा (३६५ ÷ २४ = १५.२)। मार्गशीर्ष मास के आरम्भ से १६ दिन पूर्व दिव्य उषा का आरम्भ होगा जिसे ओड़िशा में बड़ ओसा (दिव्य उषा) कहते है।

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