दोनवार को भूमिहार ब्राह्मण से अलग कर 79 नम्बर पर नई जाति बना दी गई.
वैश्य को 56 जाति में बांटा गया. किन्नर को जाति में गिना गया. लोहार को "कमार" में गिना गया.
वैश्य और लोहार ठीक ढंग से कोर्ट में गए नहीं, न ही लड़े.
किन्नर वाला केस अपनी टीम ही लड़ रही है, सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है.
इधर भूमिहार ब्राह्मण को केवल "भूमिहार " जानबूझकर लिखवाया गया ताकि भ्रम बना रहे जबकि भूमिहार एक विशेषण है, जाति नहीं.
पूरी जाति "भूमिहार ब्राह्मण /बाभन" है.
जैसे मिथिला में रहने वाले "मैथिल ब्राह्मण " कन्नौज मूल से जुड़े ब्राह्मण "कान्यकुब्ज ब्राह्मण "
आदि.
इस देश में जाति नियमानुसार कोई नहीं बदल सकता.
धर्म बदला जा सकता है.
न तो कोर्ट, न ही कोई सरकार
फिर किस आधार पर केवल "भूमिहार " लिखा गया... या कहें जानबूझकर लिखवाया गया?
करीब 12 राज्यों में भूमिहार(यह अलग जाति है), भुइया, भूइझार, भूइजहार आदि नाम से जातियों का समाज में स्थान है और ये SC/ ST कि श्रेणी में है.
इन विसंगति को ख़त्म करने के लिए 2023 में हीं अपनी "समाज संवाद यात्रा " टीम नें पटना हाई कोर्ट में केस किया था. (वकील श्री Arun Kumar जी हैँ,बड़े भाई हैँ )
लेकिन बीच में हीं CJ श्री विनोद चन्द्रन जी कि बेंच में जातीय जनगणना को पहले 3 महीने के लिए रोका गया, फिर ALLOW किया गया, वाला निर्णय आ गया.(जो अब सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है)
अब न्यायधीश मोहित शाह जी फंस गए.
न्यायधीश मोहित शाह जी नें हमारी बातों को सही माना.
विभिन्न ऐतिहासिक ग्रंथों, प्रिवी पर्स कौंसिल के निर्णय, हेनरी बुकानन के दस्तावेज़ आदि भी भूमिहार ब्राह्मण/ बाभन ही कहते हैँ. 1931 में हुई अंतिम जनगणना में भी यही अंकित है.
लेकिन इससे उनके CJ के निर्णय प्रभावित हो रहे थे. पूरी जनगणना ही सिंगल बेंच के निर्णय से गलत हो जाती, जबकि डबल बेंच उसपर फैसला( गलत ही सही, क्योंकि जनगणना का अधिकार केंद्र सरकार को है, राज्य सरकार को नहीं) दे चुकी थी.
इसलिए जज शाह साहब नें बीच का तरीका निकाला और हमें रिप्रेजेंटेशन राज्य सरकार आदि को भेजनें को कहा ताकि इसमें सुधार हो.
इसपर पेटिशनर Dhirendra Kumar जी, गया,बरबीघा, मुजफ्फरपुर(मिंटू जी और टीम) नवादा आदि से कई सम्मानित लोगों नें लगातार बिहार सरकार को नाम सही करने का आवेदन माननीय उच्च नायलाय, पटना हाई कोर्ट के अनुसार लिखा है.
RTI से बिहार सरकार नें कहा है कि सवर्ण आयोग नें नाम बदलने कि सिफारिश कि थी.
प्रश्न है कि किस अधिकार से यह आयोग ऐसा कर सकता है? किस कानून के तहत?
वे ऐसा कर ही नहीं सकते.
इसलिये अब राज्य सरकार नें सवर्ण आयोग से पूछा है कि आपने यह कैसे किया?
यह सामूहिक प्रयास का नतीजा है.समाज संवाद टीम के कानूनी दबाब का नतीजा है. RTI और सोशल मीडिया के दबाब का प्रतिफल है.
अब कुछ समाचार पत्रों में अक्टूबर कि खबर आई है.
ध्यान ये रहे कि बिहार सरकार कि चिट्ठी 10/10/2025 कि है, यानि चुनाव के ठीक पहले कि है जबकि कोर्ट का आदेश 7 नवंबर 2023 का ही है. हमारे representation करीब 16-17 महीने से लगातार जा रहे हैँ.
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