Tuesday, 11 November 2025

सीता अग्नि परीक्षा

🌹 कहियत भिन्न न भिन्न 🌹    
🌹अभिन्नहृदय भगवान् श्रीसीताराम के प्रगाढ़ प्रेम का वर्णन करने में ब्रह्मादि भी थकित हो जाते हैं तब सत्परम्पराविहीन किसी असंस्कृत प्राणी की कुण्ठित बुद्धि का कहना ही क्या! 

रामायण-महाभारतादि की रामकथा में लंकाविजय के पश्चात् अग्नि, वायु, वरुणादि के द्वारा भगवती सीता के परमपवित्र निर्दुष्ट पातिव्रत्य को प्रमाणित और प्रकाशित करना ही भगवान् श्रीराम की कटूक्ति का उद्देश्य था। मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम सीताजी की लोकगर्हणा किये बिना उन्हें शीघ्र ही स्वीकार कर लेते तो तत्काल एवं कालान्तर के कलुषितहृदय प्राणी भगवान् श्रीराम पर स्त्रैण पत्नीभक्त होने का अथवा दोनों पर विभिन्न विगर्हित प्रवाद प्रस्तुत करते रहते। तथापि इतनी सावधानी एवं कठिनतम अग्निपरीक्षा के बाद भी प्राप्त लोकापवाद के कारण श्रीराम को सीता का रहस्यमय त्याग करना ही पड़ गया था।

महाभारत के छायाचित्रोक्त १३वें श्लोक "श्वावलीढं हविर्यथा" में भले ही श्रीराम का वाचिक आक्रोश दीख पड़े परन्तु सीताजी को परमोत्तम हव्यस्थानीय बताना गूढभावेन चिन्तनीय है। पुन: किसी कान्ताचरणचञ्चरीक महाशय को एक दिव्यदम्पती (श्रीसीताराम) के पारस्परिक संवाद से शूल चुभे तो इससे बड़ा आश्चर्य और अनर्थ हो ही क्या सकता है!? शास्त्रों एवं काव्यों मे पति-पत्नी के किञ्चित् वाक्कलह को प्रमोदकारक ही बताया गया है। किसी कवि ने भी कहा है- "कबहुँ न हँसि कर कर गह्यो कबहुँ तमकि नहिं केश। का कन्ता के घर रह्यो का भयो गयो विदेश।।" 

व्यवहार में भी शुद्धि की भूमिका के रूप में सन्देह को ही प्रस्तुत किया जाता है। श्रीराम के हविष्यकथन से ही सीता की निर्मलता सिद्ध हो जाती है। केवल संसार को विश्वस्त करने की भावना से भगवान् श्रीराम ने सीता की बाह्यगर्हणा की और उन्हें अग्निपरीक्षा का अवसर दिया। परिणामत: अग्नि, वायु, ब्रह्मादि देवताओं ने सीता के अनुपम समुज्ज्वल चरित्र की सार्वजनिक घोषणा कर दी। श्रीराम ने अपने मुख से ऐसा प्रसार न कर अच्छा ही किया था। दोनों के पारस्परिक पूर्णानुराग में किञ्चिदपि सन्देह नहीं।

सावधान- रामायण-महाभारतादि की हिन्दीटीकाओं से मूलभाव का प्रकटीकरण एकप्रतिशत भी सम्भव नहीं। तुमने गुरुपरम्परा से जिस विषय में साधना नहीं की है उस पर तुम्हारा चञ्चुचालन हास्यास्पद है। हिन्दीटीका के बल पर भारतीय धर्ममर्यादा को विनष्ट करने की कुचेष्टा न करो। जिसने चिकित्साशास्त्र के ककहरे को भी नहीं देखा है वह कैंसर की चिकित्सा करने लगे तो निश्चय ही परिणाम भयावह होगा.....

❌❌ जबसे संस्कृतभिन्न भारतीय एवं वैधर्मिक भाषाओं में वेद, स्मृति, रामायण, पुराण, महाभारत आदि का सामान्यानुवाद प्रचलित हुआ; तबसे शब्दों के #लक्ष्यार्थ विनष्ट हो चुके हैं! केवल भाषाटीका देख कर शास्त्रवाक्यों का तात्पर्य बताने वाले कुपरम्परया पढ़े-लिखे प्रगतिवादी मूर्खों की सुनामी आ गयी है! क्या गुरुपरम्परा से सङ्गीतसाधना किये बिना तालानुवाद मात्र पढ़कर सूक्ष्मकलासम्पन्न शास्त्रीय सङ्गीतज्ञ बनना सम्भव है? सावधान- उच्चात्युच्च नास्तिकशिक्षाप्राप्त प्रगतिशीलों ने विमान उड़ाना नहीं सीखा है तो निश्चय ही तदर्थ कुचेष्टा न करे.....

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