अभी उनकी पत्नी शिवरानी देवी का लिखा "प्रेमचंद -घर में" पढ़ रहा हूँ...प्रेमचंद को भगवान में या हिन्दू धर्म में श्रद्धा नहीं थी...उन्ही की पत्नी ने लिखा है....
एकबार जब मुसलमान के पक्ष में बात आई तो ..
शिवरानी देवी ने पूछा ..आप हिन्दू हैं या मुसलमान ?
प्रेमचंद: न मैं हिन्दू हूँ... न मुसलमान..
प्रेमचंद सारा जीवन जमींदारों के विरुद्ध लिखने का ढोंग किये...पर अपने दोनों विवाह जमींदारों के घर में ही किये...
यहाँ तक की अपनी बेटी के विवाह में भी जमींदार घर ढूंढा ...सत्ताईस नखरे किये... बड़े बड़े उठ न सके ऐसे बर्तन दिखाने को दिए...बेटी की बारात दरवाजे लगने पर बाराती बताशे लुटा रहे थे तो पत्नी को पैसे लुटाने को बोले...
ये दिखावा असली था...लिखने वाला सादा विवाह नकली दाँत...
स्त्री अधिकारों की बात करने वाले प्रेमचंद ने अपनी बेटी के विवाह में ..बेटी को जानने तक न दिया की विवाह हो रहा है...किससे और कैसे तो दूर की बात है...
एक लड़के को इसलिए छाँट दिया गया कि उसकी माँ नहीं थी...कई लड़के "खूबसूरत" न पाए जाने से छाटें गए...
अपनी पहली पत्नी को बदसूरत होने कि वजह से छोड़ दिया...उसे उसके मायके भिजवा दिए...पंद्रह साल की उम्र में विवाह को अपने पिता का नाम लेके जिम्मेवारी छोड़ दिए..जबकि कारण पत्नी का "सुन्दर नहीं" होना था.
बाद में फिर से एक जमींदार की सोलह वर्षीय सुन्दर लड़की से विवाह किया (जो ग्यारह साल कि उम्र में विधवा हो गई थी)..
ये थी स्त्री अधिकार करने वालों की बात...
जो लोग प्रेमचंद की गरीबी की बात करते हैं...उनको पता होना चाहिए की प्रेमचंद डिप्टी इंस्पेक्टर थे...तब उनके घर में दूध, मेवा, घी जैसी बेगार में आती थी...दूध इतना आता था की घर के नौकर खोया बना कर खाते थे..घूमने के लिए घोडा और पत्नी के लिए बैल गाडी रखते थे...उस बैल गाडी रखने के लिए उनको १९१० में २५ रूपये भत्ता मिलता था...जो १२५ वेतन के अलावा था...जहाँ घूमने या ड्यूटी से जाते थे...वहां रहने का खर्च स्थानीय जमींदार उठाते थे...
तब प्रेमचंद के शब्दों में भारत के गरीब आदमी का घर दो पैसे से दो आने रोज में चलता था...मतलब आम आदमी का खर्च दो रूपये महीना था...
बाद में जब स्कूल में मास्टर की नौकरी छोड़े थे तो १२५ रूपये वेतन और २५ रूपये हॉस्टल इंचार्ज के मिलते थे...
बेटी के विवाह के कुछ दिन बाद जब दामाद अपनी पत्नी को ले जाना चाहे...तो प्रेमचंद ने दामाद की मौसेरी बहन को उनके यहाँ रहने को पचीस रूपये महीने का वसीका बांध दिया...सारे जीवन का...
(तस्वीर में लगे फटे जूतों पर मत जाइये... कलम के बाजीगर चित्र के बाजीगर भी हो सकते हैं.)
हिन्दू धर्म के लिए प्रेमचंद का कहना था..."हिन्दू धर्म सबसे ज्यादा स्त्रियों को ही चौपट कर रहा है"...जरा सी गलती हुई, हिन्दू धर्म ने उनको बहिष्कृत किया" "और मैं यह भी कहता हूँ, ऐसे तंग धर्म में रहना भी नहीं चाहिए" "उधर मुसलमानों का धर्म बड़ा विशाल है"...
(ये सब शिवरानी देवी ने लिखा है.)
तो हमारे प्रेमचंद ऐसे थे...
जारी रहेगा...
No comments:
Post a Comment