कोविदार माने हिंदी में कचनार,
कचनार के अनेक गुण हैं,
सबकी वार्ता, बाता क्या करें , एक ही ले लेते हैं, वह भी आधा अधूरा ..
कचनार के गुणों में प्रमुख है ग्रन्थि को गलाना, किसी भी शारीरिक गांठ को गला देना,
दशरथ को चौथेपन तक पुत्र न प्राप्त होने की ग्रंथि ने अवसाद ग्रस्त कर दिया था,
गुरु जी की कृपा से वह ग्रंथि गल गयी
विश्वामित्र को विश्व में मित्र भावना के विस्तार यज्ञ में बाधा आ गई, कोई एक शुभ संकल्प पूर्ण न हो तो किसी को भी ग्लानि ग्रंथि सता सकती है,
लो जी। राम लक्ष्मण द्वारा सुबाहु ताड़कादि रूपी ग्रंथि का शल्य हो गया ....
जनक जिस वचन ग्रंथि से व्यथित थे,
वह थी शिव धनुष पर चढ़ाए जाने वाली प्रत्यंचा, और जानकी का पाणिग्रहण ...
शिव धनुष की प्रत्यंचा क्या , शिव धनुष रूपी ग्रंथि का ही भेदन छेदन हो गया ..
जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई।
जदपि मृषा छूटत कठिनई।।
तब ते जीव भयउ संसारी।
छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी।।
ऐसे ही समस्त काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सरादि रूपी ग्रंथियों को गलाने के चक्र की नाभि है अवध ..
और उसकी पताका पर अंकित कोविदार का वृक्ष !
इक्ष्वाकुवंशी/सूर्यवंशी प्रभु श्रीराम का राजवृक्ष....
धर्मध्वज के एक चिह्न- दिव्यवृक्ष 'कोविदार' की राजयात्रा.....
युगपत्र से युगों की यात्रा...
🌳कचनार और कोविदार🌳
कोविदार और कचनार के वृक्ष में बहुत मामूली अंतर है। कोविदार का वैज्ञानिक नाम बौहिनिया पुरपुरिया (#Bauhinia_purpurea) है जबकि कचनार का वैज्ञानिक नाम बौहिनिया वेरिएगाटा (#Bauhinia_variegata) है। कई शोधों और मान्यताओं के अनुसार, कोविदार को मंदार और पारिजात वृक्षों के संकरण (Hybrid) से बना एक देव वृक्ष भी माना जाता है। कुछ लोग मानते हैं कि यह कचनार और पारिजात वृक्ष के बीच की एक प्रजाति है।
🌷कोविदार की पहचान: कोविदार के पत्ते ज्यादा दूर तक अलग-अलग रहते हैं। पत्तों में 9 से 11 शिराएं होती हैं। पुष्पकलिकाओं का घेरा उभरी हुई संधियों के कारण कोणयुक्त होता है। फूल नीलापन लिए हुए गुलाबी रंग के होते हैं।
🌷कचनार की पहचान: कचनार के पत्ते के दोनों हिस्से गोल और तिहाई या चौथाई दूरी तक अलग रहते हैं। पत्तों में 13 से 15 शिराएं होती हैं। पुष्पकलिका का घेरा सपाट होता है। पुष्प बड़े, मंद गन्ध वाले, सफेद, गुलाबी या नीले रंग के होते हैं।
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