कोविदार माने हिंदी में कचनार,
कचनार के अनेक गुण हैं,
सबकी वार्ता, बाता क्या करें , एक ही ले लेते हैं, वह भी आधा अधूरा ..
कचनार के गुणों में प्रमुख है ग्रन्थि को गलाना, किसी भी शारीरिक गांठ को गला देना,
दशरथ को चौथेपन तक पुत्र न प्राप्त होने की ग्रंथि ने अवसाद ग्रस्त कर दिया था,
गुरु जी की कृपा से वह ग्रंथि गल गयी
विश्वामित्र को विश्व में मित्र भावना के विस्तार यज्ञ में बाधा आ गई, कोई एक शुभ संकल्प पूर्ण न हो तो किसी को भी ग्लानि ग्रंथि सता सकती है,
लो जी। राम लक्ष्मण द्वारा सुबाहु ताड़कादि रूपी ग्रंथि का शल्य हो गया ....
जनक जिस वचन ग्रंथि से व्यथित थे,
वह थी शिव धनुष पर चढ़ाए जाने वाली प्रत्यंचा, और जानकी का पाणिग्रहण ...
शिव धनुष की प्रत्यंचा क्या , शिव धनुष रूपी ग्रंथि का ही भेदन छेदन हो गया ..
जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई।
जदपि मृषा छूटत कठिनई।।
तब ते जीव भयउ संसारी।
छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी।।
ऐसे ही समस्त काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सरादि रूपी ग्रंथियों को गलाने के चक्र की नाभि है अवध ..
और उसकी पताका पर अंकित कोविदार का वृक्ष !
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