Thursday, 6 November 2025

कार्तिक पूर्णिमा-बालि यात्रा

कार्तिक पूर्णिमा-बालि यात्रा
कार्तिक पूर्णिमा का उत्सव कई रूपों में मनाते हैं। प्रथम सिख गुरु नानक देव का जन्म दिन या प्रकाश पर्व है। ओड़िशा में पूरे मास कुछ लोग दिन में एक बार हविष्य अन्न खाते हैं। कार्तिक पूर्णिमा को यह व्रत पूर्ण होता है। उसके बाद छाड़खाई करते हैं, जो वास्तव में कोई पर्व नहीं है। उस दिन कार्तिक का संयम पूरा होने पर कुछ लोग मांसाहार करते हैं। यह प्रायः वही करते हैं, जिन्होंने कोई संयम नहीं किया था। कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भोजपुरी, मैथिली, मगही और अंगिका क्षेत्रों में छठ होता है। दक्षिण में स्कन्द षष्ठी रूप में इसका पालन होता है-यह कार्तिकेय नाम का मूल हो सकता है। अन्य सम्भावना है कि कृत्तिका नक्षत्र में जन्म हुआ जिसमें ६ मुख्य तारा हैं। मुख्य कारण है कि देव सेनापति रूप में कार्त्तिकेय ने ६ शक्ति-पीठ या सैन्य मुख्यालय बनाये थे जिनको उनकी ६ माता कहते थे। इसी प्रकार बाद में शंकराचार्य तथा गोरखनाथ ने ४-४ पीठ बनाये। शब्दों के प्रचलन के अनुसार कार्त्तिकेय के पीठों के नाम और स्थान हैं-१. दुला-ओड़िशा तथा बंगाल, २. वर्षयन्ती-असम, ३. चुपुणीका-पंजाब, कश्मीर (चोपड़ा उपाधि), ४. मेघयन्ती-गुजरात राजस्थान-यहां मेघ कम हैं पर मेघानी, मेघवाल उपाधि बहुत हैं। ५. अभ्रयन्ती-महाराष्ट्र, आन्ध्र (अभ्यंकर), ६. नितत्नि-तमिलनाडु, कर्णाटक। अतः ओड़िशा में कोणार्क के निकट बहुत से दुला देवी के मन्दिर हैं। दुलाल = दुला का लाल कार्त्तिकेय। 
अत्र जुहोति अग्नये स्वाहा, कृत्तिकाभ्यः स्वाहा, अम्बायै स्वाहा, दुलायै स्वाहा, नितत्न्यै स्वाहा, अभ्रयन्त्यै स्वाहा, मेघयन्त्यै स्वाहा, चुपुणीकायै स्वाहेति। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/१/४/१-९)
छठ में घाट पर अर्घ्य का सामान ले जाते हैं। उसके लिए बांस की बहंगी बनाते हैं, जिसके दोनों तरफ भार रहता है। बिहार में इसका प्रचलन कम हो गया है। टोकरे में सामान ले जाते हैं, किन्तु बहंगी का गीत आज भी गाते हैं। ओड़िशा में इस नाम का एक नगर है-बहंगा बाजार। लगता है कि यहां भी बहंगी से सामान ढो कर समुद्रपत्तन तक ले जाते थे। कार्त्तिक पूर्णिमा को समुद्री जहाज यात्रा आरम्भ होती थी। उसके पहले जहाज में भोजन सामग्री तथा निर्यात का सामान रखना आवश्यक है। कार्त्तिक पूर्णिमा को ओड़िशा में बइत-बन्धान अर्थात् जहाज छोड़ते हैं। संस्कृत में जहाज को वहित्र कहते थे जिससे बइत या बोइत हुआ है। बोइत से अंग्रेजी में बोट (boat) हुआ। कार्तिक मास में समुद्री चक्रवात बन्द हो जाते हैं अतः इसी समय समुद्री यात्रा आरम्भ होती थी पश्चिम के समुद्र तट गुजरात में कार्तिक मास से ही विक्रम संवत् का आरम्भ होने का यह कारण है। 
कार्तिक पूर्णिमा से समुद्र यात्रा आरम्भ होने को ओड़िशा में बालि-यात्रा कहते हैं। इसके मूल विषय में ३ अनुमान सम्भव हैं। 
(१) बाली द्वीप की यात्रा- प्रचलित कथा है कि बाली द्वीप की यात्रा इस दिन से आरम्भ होती थी। किन्तु बाली द्वीप इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। ओड़िशा के नौसैनिकों ने कम्बोडिया-वियतनाम में चम्पा राज्य स्थापित किया था। चीन में प्रायः जहाज जाते थे। ऐसेही एक जहाज से फाहियान ताम्रलिप्ति से चीन के कैण्टन तक गया था, जिसमें १,५०० व्यक्ति सवार थे। रोमन इतिहासकार प्लिनी ने लिखा है कि ओड़िशासे चावल, रेशम आदि रोम को जाता था। चावल को उड्र से आने के कारण ग्रीक में ओराइजा कहते थे, जिससे अंग्रेजी में राइस हुआ है।
(२) वानर राजा बालि-किष्किन्धा काउत्तरी भाग दक्षिणी ओड़िशा था, जहां बालिगुड़ा, बालिकुदाआदि कई स्थान हैं। साल वन का दक्षिणी छोर बालिमेला है जहां बालि का वध हुआ था। बालि के राज्य में इण्डोनेसिया आदि थे जहां इससमय वह जाता था।
(३) असुर राजा बलि-बलि कश्यप के ७वें युग (१५३४२-१४९८२ ई.पू.) में थे। उनके समय वामन अवतार हुआ था। अदिति के पुत्र रूप में विष्णु नाम के वामन का जन्म हुआ। 
श्रोणायां श्रवणद्वादश्यां मुहूर्तेऽभिजिति प्रभुः।
सर्वे नक्षत्र ताराद्याश्चक्रुस्तज्जन्म दक्षिणम्॥५॥
द्वादश्यां सविता तिष्ठन् मध्यन्दिन गतो नृप।
विजया नाम सा प्रोक्ता यस्यां जन्म विदुर्हरेः॥६॥ (भागवत पुराण, ८/१८) 
= वामन भगवान् के जन्म के समय चन्द्र श्रवण नक्षत्र में थे, भाद्रमास शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि थी जिसे विजया द्वादशी कहते हैं। जन्म के समय सूर्य आकाश के मध्य में स्थित थे जो अभिजित् मुहूर्त होता है।
उन्हों ने बलि के यज्ञ में ३ पग भूमि मांगी। बलि को देवों की बढ़ी शक्ति का अनुमान था (मत्स्य पुराण, २४६/६५, देवी भागवत पुराण, अध्याय ४/१४) अतः उन्होंने बिना विरोध के देवों के ३ लोक लौटा दिये। उत्तर गोलार्ध में विषुव से उत्तर ध्रुव तक उज्जैन केन्द्र से ९० अंश देशान्तर का क्षेत्र भारत पद्म (उत्तर नक्शा का चतुर्थ भाग) कहलाता था। इसके ३ लोक भारत, चीन, रूस थे जिनपर इन्द्र का पुनः अधिकार हो गया। यह भाद्र शुक्ल द्वादशी को हुआ जिसे वामन द्वादशी या ओणम कहते हैं। इसी काल से राजाओं का राजत्व काल गिना जाता है जो ओड़िशा में आज भी प्रचलित है (अंक पद्धति)। 
तत्र पूर्वपदं कृत्वा पुरा विष्णुस्त्रिविक्रमे। द्वितीयं शिखरे मेरोश्चकार पुरुषोत्तमः॥५८॥ 
(वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धा काण्ड, अध्याय ४०) 
किसी भी समय अभिषेक होने पर, उसके बाद प्रथम भाद्र शुक्ल १२ को शून्य गिनते हैं, उसके बाद अगले वर्षों में क्रमशः १, २, ३, --- गिनते हैं। इनकी २ पद्धति हैं-एक में सभी अंक गिनते हैं। अन्य पद्धति में ० तथा ६ से अन्त होने वाले अंक छोड़ देते हैं, जैसे १, २, ३, ४, ५, ७, ८, ९, ११, ---। इसके अतिरिक्त अभिषेक समय से भी गिनते हैं, या निकटतम दहाई अंक में लिखते हैं। अतः पुरुरवा आदि का राजत्व काल ५६, ६०, ६४ आदि विभिन्न पद्धतियों में लिखा है। 
बलि से इन्द्र के ३ लोक लेने का काम १ दिन में नहीं हुआ। वामन के साथ सेना भी थी जो सम्भवतः केरल तट से गयी थी, अतः वहां ओणम का पालन होता है। इस सेना ने अश्वमेध यज्ञ करते समय बलि की सेना को पराजित कर दिया था। अतः बलि ने युद्ध बन्द कर सन्धि कर ली। इसा मसीह के पूर्व तक बलि की पश्चिम एशिया में बाल देवता रूप में पूजा होती थी। इन्द्र को विशाल भूभाग पर अधिकार करने में कुछ मास लगा। दीपावली के समय तक यह पूरा हुआ जिसके अगले दिन बलि को दीपदान किया जाता है। उसके कुछ समय बाद बलि ने ओड़िशा पूर्व तट से यात्रा की। कार्त्तिक पूर्णिमा के दिन ओड़िशा में बालि यात्रा मनाते हैं। (स्कन्द पुराण, २/४/९/५९-५८) पूर्व एशिया में बलि के वंशज बाण का शासन रह गया (भागवत पुराण, ६/१८/१६। यह भगवान् कृष्ण से युद्ध करने वाले बाण से बहुत पहले था।
आजकल समुद्र यात्रा हर समय होती है, तथा ओड़िशा उसका केन्द्र नहीं है। प्रतीक रूप में नदी में कागज की नौका कार्तिक पूर्णिमा को तैराते हैं। भुवनेश्वर में लिंगराज मन्दिर के निकट विन्दु सागर (पोखरी) में नौका छोड़ते हैं। ५

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