Sunday, 30 November 2025

पुनर्वसु नक्षत्र

पुनर्वसु नक्षत्र 
अभी एक विचार पढ़ा कि पुनर्वसु नक्षत्र धनुष आकार का है। इस नक्षत्र में भगवान राम का जन्म हुआ था। उन्होंनें धनुष तोड़ा अतः विवाह सफल नहीं रहा। सीताराम की जोड़ी को सबसे आदर्श माना जाता है जो सबसे कठिन परिस्थिति में भी स्थिर रहा। विवाह अवसर पर सीताराम विवाह सम्बन्धित गीत ही गाये जाते हैं। भगवान परशुराम का भी जन्म पुनर्वसु नक्षत्र में हुआ था। किन्तु उनके विवाह की चर्चा नहीं होती है। 
भगवान राम का विवाह मार्गशीर्ष शुक्ल पञ्चमी को हुआ था। इस दिन उत्तराषाढ़ नक्षत्र रहता है जो पुनर्वसु से १३ नक्षत्र बाद है, अर्थात् २७ नक्षत्र के चक्र में विपरीत दिशा में होगा। इस अर्थ में वह पुनर्वसु रूपी धनुष को तोड़ने वाला है। नक्षत्र प्रतीक के अतिरिक्त वास्तविक धनुष भंग हुआ था। उसमें विशेषता है कि सीता स्वयंवर या कंस के धनुष यज्ञ-दोनों में शिव का धनुष तोड़ा गया था। लेकिन परशुराम ने भगवान राम को शार्ङ्ग धनुष दिया तथा भगवान श्रीकृष्ण भी उसी धनुष का प्रयोग करते थे। उसे कभी नहीं तोड़ा गया। इन धनुषों का अन्तर एवं धनुष तोड़ना एक रहस्य है।

एक प्रश्न हैं कि क्या राम जी का विवाह मार्गशीर्ष पंचमी को ही हुवा था? जबकि महर्षि वाल्मिकि ने तो लिखा हैं कि उत्तराफाल्गुनी मे हुवा। (गीताप्रेस छपे की बाल्कान्ड 71 वां सर्ग 24 वां श्लोक।) फिर यह मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी का प्रचार किसने किया और कब हुवा? (जबकि मेरी गणना से पौष की पूर्णिमा को तो राम जी विश्वामित्र जी के आश्रम पहुंचे थे।) 

क्योंकि रामजी ने तो चौमास किष्किंधा मै वास किया था।तो फिर दशहरा और दिवाली तो चौमास मै आता है।और कार्तिक पूर्णिमा से समाप्त होता है।फिर कैसे।

 आपकी बात ठीक है। पर विवाह पञ्चमी मार्गशीर्ष शुक्ल पञ्चमी को ही मनायी जा रही है, जिसका कारण मुझे पता नहीं है।
 दशहरा पहले चैत्र में ही मनाया जाता था जिसे ब्रिटिश दौर में आश्विन महीने में लाया गया। यह मात्र 300 साल पहले हुआ है।
वैसे ही रावण का वध तो (पौष) अमवष्या को हुवा था तब अश्विन शुक्ल दशमी का प्रचलन क्यू कर हो गया ?

पूर्णाहुति की विशेषता

"पूर्णाहुति की विशेषता: शास्त्रीय, तांत्रिक और वैदिक-कर्ममीमांसा दृष्टि से एक शोधपरक विवेचन"

✓•१. प्रस्तावना: यज्ञ-परंपरा का अंतिम, सर्वोच्च तथा संपूर्णता-सूचक चरण पूर्णाहुति है। यह केवल अग्नि में अर्घ्य-समर्पण या पदार्थ-अर्पण नहीं, बल्कि सम्पूर्ण यज्ञ-ऊर्जा का परिपाक-बिंदु है। पूर्णाहुति के क्षण में मंत्र-स्पन्दन, हवि-ऊर्जा, ऋत्विज-अनुष्ठान, ब्रह्म-चेतना और यजमान-संकल्प सभी एक बिंदु पर संकेन्द्रित होते हैं। इसीलिए गृह्यसूत्रों में इसे यज्ञ का “परिपूर्ण कर्म” कहा गया है।
आपस्तम्ब गृह्यसूत्र (१.८.१२) कहता है—
"अन्ते हविषां पूर्णाहुति:"
अर्थात् यज्ञ में प्रयुक्त समस्त हवि का अंतिम समर्पण ही पूर्णाहुति कहलाता है।
इसी विधि को कात्यायन श्रौतसूत्र (६.३.२८) “समष्ट्याहुति” कहकर समझाता है—
“समस्तं हविरग्नौ प्रयोक्तुं पूर्णत्वं भवति।”
अर्थात् सभी आहुतियों का एकीकृत समर्पण ही पूर्णता उत्पन्न करता है।
अत: पूर्णाहुति मात्र एक अनुष्ठानिक क्रिया नहीं, अपितु ऊर्जा-ब्रह्म के साथ यजमान के भाव-संयोग का परम क्षण है।

✓•२. पूर्णाहुति की वैदिक परिभाषा:
वैदिक ग्रंथों में पूर्णाहुति के तीन मूल तत्व निर्धारित हैं—
१. हविरूप पदार्थ का सर्वोच्च अंश।
२. सर्वमन्त्र-स्पन्दन का समन्वय बिंदु।
३. यजमान के संकल्प का निष्कर्ष। (resultant vector)
तैत्तिरीय संहिता (१.३.१०.५) में कहा है—
“यज्ञस्य पूर्णता हविषां समर्पणेन भवति।”
अर्थात् यज्ञ पूर्ण तब होता है जब उसकी चरम ऊर्जा अग्नि में समर्पित होती है।
इसका दार्शनिक आशय है कि यज्ञ का आध्यात्मिक ऊर्जावाहन (energy-discharge) पूर्णाहुति में पूर्ण रूप से सम्पन्न होता है।

✓•३. पूर्णाहुति का स्थान और काल—शास्त्रीय निर्देश:
३.१ गृह्यसूत्रीय निर्देश:
आपस्तम्ब गृह्यसूत्र २.७.२५—
“पूर्णाहुतौ दीप्तोऽग्निः, शान्तः मनः, प्रशान्तं हविः।”
इसके अनुसार—
१. अग्नि पूर्ण ज्वलित अवस्था में हो।
२. आहुति एकाग्र मन से दी जाए।
३. हवि शुद्ध, सात्त्विक, प्रशस्त हो।

३.२ श्रौतसूत्रीय निर्देश:
श्रौतसूत्रों में पूर्णाहुति अवभृथस्नान से पूर्व का अंतिम कर्म है, अर्थात् यह यज्ञ-क्रिया के समापन-चिह्न के रूप में स्थापित है।
शांखायन श्रौतसूत्र (११.९)—
“यज्ञस्य फलोत्पत्तिः पूर्णाहुत्या भवति।”
यह अत्यंत महत्वपूर्ण वचन है।
यह बताता है कि यज्ञफल का वास्तविक उद्भव पूर्णाहुति से होता है, न कि अन्य आहुतियों से।

✓•४. पूर्णाहुति का आध्यात्मिक महत्व:
४.१ द्रव्य-ऊर्जा का रूपान्तरण:
यज्ञ का मूल सिद्धांत है—
“अन्नं ब्रह्म, हविः ब्रह्म, अग्निः ब्रह्म।”
पूर्णाहुति के क्षण में—
हवि (सृष्टि)
अग्नि (तेज)
मन्त्र (नाद)
संकल्प (चेतना)
= ‘महाप्रसारण शक्ति’ बन जाते हैं।
इस प्रकार पूर्णाहुति द्रव्य से देवता तक सम्पूर्ण ऊर्जा-चरणों का अंतिम संक्रमण है।

४.२ अन्तर्यामित्व सिद्धांत:
बृहदारण्यक उपनिषद् (५.७.१) कहता है—
“अन्तर्यामी देवता आहुतिं गृह्णाति।”
पूर्णाहुति में यह ‘अन्तर्यामी’ प्रकट होकर यजमान से संबंध स्थापित करता है।

✓•५. पूर्णाहुति का पद्धतिगत स्वरूप:
५.१ हवि का विशेष रूप:
शास्त्रों के अनुसार पूर्णाहुति के लिए हवि—
१. घृत,
२. मधु,
३. क्षीर,
४. तिल,
५. चावल,
६. नवधान्य,
७. नैवेद्य,
का संयुक्त रूप हो सकता है।
कौशिकसूत्र (१०.१५) में इसे
“सर्वसमृद्धि-हविः” कहा गया है।
५.२ मन्त्र-पद्धति
पूर्णाहुति के मंत्र तीन प्रकार से मिलते हैं—
१. स्विष्टकृत पूर्णाहुति मन्त्र
२. शान्तिकाम पूर्णाहुति मन्त्र
३. दैविक-अनुकूल्य हेतु पूर्णाहुति मंत्र
उदाहरण:
तैत्तिरीय संहिता (१.१.१३)
“स्वाहा पूर्णाहुते स्वाहा।”
तंत्रागम पूर्णाहुति में प्रयोग होता है—
“ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं…”
यह दार्शनिक रूप से यज्ञ को पूर्णता-ब्रह्म में विलीन करता है।

५.३ समर्पण की तकनीक:
पूर्णाहुति का वास्तविक स्वरूप है—
“ऊपर से ऊर्ध्व-रेखीय (vertical) आहुति, बिना विचलन।”
यह अग्नि के ऊर्ध्ववाहिनी चक्र का अनुसरण करता है।
आहुत्यङ्गुलि:
१. अंजलि,
2. अर्घ्य,
3. ऊर्ध्व-प्रकृति समर्पण,
गृह्यसूत्र कहता है—
“ऊर्ध्वं हुतिं जुहोति।”

✓•६. पूर्णाहुति का फल—शास्त्रीय विवेचन:
शास्त्रों में पूर्णाहुति के फल तीन स्तरों पर वर्णित हैं—
६.१ लौकिक फल:
१. समृद्धि,
२. आरोग्य,
३. गृह-शांति,
४. ऋण-निवारण,
इसे मनुस्मृति (३.७६) में स्पष्ट किया गया है—
“यज्ञेन सर्वं लभते।”

६.२ आध्यात्मिक फल:
१. सूक्ष्मकर्मों का दग्धीकरण,
२. चित्तवृत्ति का एकाग्रीकरण,
३. देवादि-अनुकूलता,
४. नाद-ब्रह्म के साथ तादात्म्य
छान्दोग्य उपनिषद् (५.२४.१)
“आहुतेरुद्गतः स्वर्गलोकं नयति।”

६.३ कर्ममीमांसा फल:
कर्ममीमांसक जैमिनि कहते हैं—
“पूर्णाहुति निष्कर्षणं फलोत्पत्तिकं कर्म।” (जैमिनि सूत्र ३.५.२९)
इसका अर्थ है कि पूर्णाहुति फल-उत्पत्ति का वास्तविक कारक है।

✓•७. पूर्णाहुति और देवता-संवेग विज्ञान:
तैत्तिरीय ब्राह्मण (२.७.१६) में वर्णित है—
“देवा पूर्णाहुतेः तुष्यन्ति।”
यह देवता-संवेग (divine resonance) का सिद्धांत है:
मंत्र-आहुतियों से निर्मित कम्पन जब उच्चतम बिंदु पर पहुँचता है, तब देवता की प्रेरक-शक्ति सक्रिय होकर यजमान के संकल्प को ग्रहण करती है।
पूर्णाहुति इसी क्षण का तकनीकी नाम है।

✓•८. विभिन्न यागों में पूर्णाहुति का विशेष रूप:
८.१ नवचण्डी याग:
यहाँ पूर्णाहुति में—
१. महाप्रसाद
२. पंचमेव
३. बलिद्रव्य
का उपयोग होता है।
देवीभागवत (७.१८.२७)—
“पूर्णाहुति प्रीतिदा चण्डिकायाः।”

८.२ रुद्रहोम:
रुद्रसूत्र ‘नमः शिवाय’ पर आधारित पूर्णाहुति में कहा गया है—
“त्र्यम्बकं यजामहे पूर्णाहुते स्वाहा”
यह आत्म-शुद्धि हेतु होता है।

८.३ ग्रहयोग-निवारण यज्ञ:
पूर्णाहुति व्यक्तिगत ग्रहदोष शमन का चरम बिंदु है।
बृहज्जातक वचन—
“आहुतिर्मोक्षदायिनी।”

✓•९. पूर्णाहुति का दार्शनिक, वैज्ञानिक एवं ऊर्जा-सिद्धांत:
ऊर्जा-विज्ञान की दृष्टि से पूर्णाहुति में तीन घटनाएँ घटित होती हैं—
१. संवेग-चरमोत्कर्ष (peak resonance)
मंत्र-नाद की आवृत्ति अग्नि-ऊर्जा के साथ मिलकर चरम अवस्था पर पहुँचती है।
२. ऊर्जा-मुक्ति (energy discharge)
अग्नि, घृत और मंत्र मिलकर उच्च-आयनित (ionized) ऊर्जा क्षेत्र बनाते हैं।
३. संकल्प- imprinting
यजमान का संकल्प ऊर्जा-क्षेत्र पर अंकित (imprinted) होता है।
आधुनिक विज्ञान में यही प्रक्रिया ऊर्जा-क्वांटम फील्ड imprinting कहाती है।

✓•१०. उपसंहार: पूर्णाहुति यज्ञ का परम क्षण, पूर्णता-प्राप्ति बिंदु और देवता-समर्पण का द्वार है।
शास्त्रों में इसे “यज्ञस्य आत्मा”, “यज्ञफल का उद्गम”, “ऊर्जा-प्रसारण बिंदु” तथा “संकल्प-सिद्धि का मूल तत्व” कहा गया है।
इसके बिना यज्ञ का कोई भाग पूर्ण नहीं माना जाता।
अतः पूर्णाहुति—
केवल एक आहुति नहीं,
बल्कि
द्रव्य, मंत्र, अग्नि और संकल्प के समष्टि-प्रयोग का आध्यात्मिक-वैज्ञानिक चरमोत्कर्ष है।

षोडश मातृका पूजन विधि

षोडश मातृका पूजन विधि

गौरी, पद्मा, शची, मेधा, सावित्री, विजया, जया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा, मातरः, लोकमातरः, धृति, पुष्टिः, तुष्टि, आत्मनः कुलदेवता।

स्तोत्र:

गौरी पद्मा शची मेधा सावित्री विजया जया।
देवसेना स्वधा स्वाहा मातरो लोकमातरः॥

धृतिः पुष्टिस्तथा तुष्टिरात्मनः कुलदेवता।
गणेशेनाधिका ह्येता वृद्धो पूज्याश्च षोडशः॥

हमारे प्राचीन शास्त्रों में सोलह माताओं का उल्लेख मिलता है:

स्तनदात्री गर्भधात्री भक्ष्यदात्री गुरुप्रिया।
अभीष्टदेवपत्नी च पितुः पत्नी च कन्यका॥

सगर्भकन्या भगिनी पुत्रपत्नी प्रियाप्रसूः।
मातुर्माता पितुर्माता सोदरस्य प्रिया तथा॥

मातुः पितुश्च भगिनी मातुलानी तथैव च।
जनानां वेदविहिता मातरः षोडश स्मृताः॥
(गणपतिखण्ड १५। ३८-४०)

स्तन पिलाने वाली (धाय), गर्भ धारण करने वाली (माता), भोजन देने वाली (रसोइन), गुरुपत्नी, अभीष्ट देवता की पत्नी, पिताकी पत्नी (सौतेली माता), कन्या, बहन, पुत्रवधू, पत्नी की माता (सास), सहोदर भाई की पत्नी, माताकी बहिन (मौसी), माताकी माता (नानी), पिताकी बहिन (बूआ) और मामी - ये सोलह मानव जाति की वेदविहित माताएँ हैं।

गुरुपत्नी राजपत्नी देवपत्नी तथा वधू:।
पित्रो: स्वसा शिष्यपत्नी भृत्यपत्नी च मातुली।।

पितृपत्नी भ्रातृपत्नी श्वभ्रूश्च भगिनी सुता।
गर्भधात्रीष्टदेवी च पुंस: षोडश मातर:।।
(ब्रह्मावैवर्त्तपुराण, श्रीकृष्णजन्मखंड, ५९।५४-५६)

गुरुपत्नी, राजपत्नी, देवपत्नी, पुत्रवधू, माता की बहन (मौसी), पिता की बहन (बुआ), शिष्यपत्नी, मामी, पिता की पत्नी (माता और विमाता), भाई की पत्नी, सास, बहन, बेटी, गर्भ में धारण करने वाली (जन्मदात्री) तथा इष्टदेवी - ये पुरुष की सोलह माताएँ होती हैं।

माता का महत्व, पिता से सौ गुनी अधिक पूजनीय माता है:

सर्वेषामपि पूज्यानां पिता वन्द्यो महान् गुरुः।
पितुः शतगुणैर्माता गर्भधारणपोषणात्॥

माता च पृथिवीरूपा सर्वेभ्यश्च हितैषिणी।
नास्ति मातुः परो बन्धुः सर्वेषां जगतीतले॥
(ब्रह्मवैवर्तपुराण १६९)

‘समस्त पूजनीयों में पिता सबसे अधिक वन्दनीय हैं; किंतु गर्भ में धारण और पोषण करने वाली माता पिता से सौ गुनी श्रेष्ठ है। माता पृथ्वी के समान क्षमाशील और सभी का समान हित चाहने वाली है; अतः इस जगतीतल में माता से बढ़कर कोई बंधु नहीं है।

षोडश मातृका पूजन विधि

गौरीम् गणेश:

ॐ आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः।
पितरं च प्रयन्स्वः॥

हेमाद्रितनयां देवीं वरदां शङ्करप्रियाम्।
लम्बोदरस्य जननीं गौरीमावाहयाम्यहम्॥

पदमाम्:

ॐ हिरण्यरूपा ऽउपसो व्विरोक ऽउभाविन्दा ऽउदिधः सूर्यश्च।
आरोहतं व्वरुण मित्र गर्त ततश्श्चक्षाथामदितिं दितिञ्च मित्रोऽसिव्वरुणोऽसि॥

पद्माभां पद्मवदनां पद्मनाभोरुसंस्थिताम्।
जगत्प्रियां पद्मवासां पद्मावाहयाम्यहम्॥

शचीम्:

ॐ निवेशनः सङ्गमनो व्वसूनां विश्वा रूपाभिचष्टे शचीभिः।
देवऽइव सविता सत्यधर्मेन्द्रो न तस्त्थौ समरे पथीनाम्॥

दिव्यरुपां विशालाक्षीं शुचिकुण्डलधारिणीम्।
रक्तमुक्ताद्यलङकारां शचीमावाहयाम्यहम्॥

मेधाम्:

मेधां मे व्वरुणो ददातु मेधामग्निः प्रजापतिः।
मेधामिन्द्रश्च व्वायुश्श्च मेधां धाता ददातु मे स्वाहा॥

विश्वेऽस्मिन् भूरिवरदां जरां निर्जरसेविताम्।
बुद्धिप्रबोधिनीं सौम्यां मेधामावाहयाम्यहम्॥

सावित्रीम्:

ॐ सविता त्त्वा सवाना गुंग सुवतामाद्यगृहपतीना गुंग सोमो वनस्पतीनाम्।
वृहस्पतिर्बाचऽइन्द्रो ज्ज्यैष्ठ्यायरूद्रः पशुभ्यो मित्र – सत्त्यो व्वरुणो धर्मपतीनाम्॥

जगत्सृष्टिकरीं धात्रीं देवीं प्रणवमातृकाम्।
वेदगर्भां यज्ञमयीं सावित्रीं स्थापयाम्यहम्॥

विजयाम्:

ॐ विज्ज्यन्धनुः कपर्दिनो व्विशल्यो वाणावाँर 2 उत |
अनेशन्नस्य या ऽइषव ऽआभुरस्य निषङ्गधिः॥

सर्वास्तधारिणीं देवीं सर्वाभरणभूषिताम्।
सर्वदेवस्तुतां वन्द्यां विजयां स्थापयाम्यहम्॥

जयाम्:

ॐ वह्वीनां पिता वहुरस्य पुत्रश्शिचश्श्चाकृणोति समनावगत्य।
इषुधि: सङ्काः पृतनाश्च्ञ सर्वाः पृष्ठठे निनिद्धो जयति प्रसूतः॥

सुरारिमथिनीं देवीं देवानामभयप्रदाम्।
त्रैलोक्यवन्दितां शुभ्रां जयामावाहयाम्यहम्॥

देवसेनाम्:

ॐ इन्द्रऽआसां नेता वृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर एतु सोमः।
देवसेनानामभिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन्त्वग्रम्॥

मयूरवाहनां देवीं खड्गशक्तिधनुर्धराम्।
आवाहयेद् देवसेनां तारकासुरमर्दिनीम्॥

स्वधाम्:

ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः पितामहेभ्यः स्वायिब्भ्यः स्वधा नमः प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।
अक्षन्पितरोऽमीमदन्त पितरोऽतीतृपन्त पितरः, पितर शुन्धद्ध्वम्॥

अग्रजा सर्वदेवानां कव्यार्थं या प्रतिष्ठिता।
पितृणां तृप्तिदां देवीं स्वधामावाहयाम्यहम्॥

स्वाहाम्:

ॐ स्वाहा प्राणेब्भ्यः साधिपतिकेब्भ्यः । पृथिव्यै स्वाहाग्नये स्वाहान्तरिक्षाय स्वाहा ब्वायवे स्वाहा । दिवे स्वाहा सूर्याय स्वाहा॥

हविर्गृहीत्वा सततं देवेभ्यो या प्रयच्छति ।
तां दिव्यरूपां वरदां स्वाहामावाहयाम्यहम्॥

मातृ:

ॐ आपोऽअसम्मान्मातरःशुन्धयन्तु घृतेन तो घृतप्वः पुनन्तु ।
विश्व गुंग हि रिप्रंप्रवहन्ति देवीरुदिदाब्भ्यः शुचिरा पूतऽएमि।

दीक्षातपसोस्तनूरसितां त्वा शिवा गुंग शम्मां परिदधे भद्रं व्वर्ण पुष्यन् ।

आवाहयाम्यहं मातृ: सकला: लोकपूजिता:।
सर्वकल्याणरुपिण्यो वरदा दिव्यभूषणा:॥

लोकमातृ:

ॐ रयिश्च मे रायश्च मे पुष्टंचमे पुष्टिश्च मे विभुचमे प्रभुच मे पूर्ण्णं च मे पूर्णतरं च मे कुयवं चमऽक्षितं च मेऽन्नं च मेऽक्षुच्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥

आवाहयेल्लोकमातृर्जयन्तीप्रमुखा: शुभा: ।
नानाऽभीष्टप्रदा: शान्ता: सर्वलोकहितावहा:॥

धृतिम्:

ॐ यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु ।
यस्मान्नऋते किञ्च न कर्म क्रियतं तन्मे मनः शिवसंकल्प्पमस्तु ॥

सर्वहर्षकरीं देवीं भक्तानामभयप्रदाम् ।
हर्षोत्फुल्लास्यकमलां धृतिमावाहयाम्यहम्॥

पुष्टिम्:

ॐ अङ्गान्न्यात्मन्न्भिषजा तदश्विनात्मानमङ्गैः समधात्सरस्वती ।
इन्द्रस्य रूपगुंग शतमानमायुश्चन्द्रेण ज्योतिरमृतं दधानाः॥

पोषयन्तीं जगत्सर्व स्वदेहप्रभवैर्नवै:।
शाकै: फलैर्जलैरत्नै: पुष्टिमावाहयाम्यहम्॥

तुष्टिम्:

ॐ जातवेदसे सुनवाम सोममरातीयतो निदहाति वेदः ।
सनः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुंदुरितात्यग्निः ॥

देवैरारधिताँ देवीं सदा सन्तोषकारिणीम्।
प्रसादसुमुखी देवी तुष्टिमावाहयाम्यहम्॥

आत्मनः कुलदेवताम्:

ॐ प्राणाय स्वाहाऽपानाय स्वाहा ळ्यानाय स्वाहा ।
चक्षुषे स्वाहा क्षोत्राय स्वाहा व्वाचे स्वाहा मनसे स्वाहा।

पत्तने नगरे ग्रामे विपिने पर्वते गृहे ।
नानाजातिकुलेशानी दुर्गामावाहयाम्यहम्।

इस मंत्र द्वारा षोडश मातृकाओं का आवाहन एवं स्थापना करने के साथ ‘ॐ मनो जूति’ मंत्र से अक्षत छोड़ते हुए मातृका मंडल की प्रतिष्ठा करें। इसके बाद गंधादि सामग्री से पूजन करें:

‘ॐ गणेश सहित गौर्या दी षोडश मातृकाभ्यो नमः।’

फल अर्पण

उक्त मंत्र बोलते हुए ऋतु फल- नारियल आदि हाथ की अंजलि में लेकर प्रार्थना करें:

ॐ आयुरारोग्यमैश्वर्यं ददध्वं मातरो मम।
निर्विघ्नं सर्वकार्येषु कुरुध्वं सगणाधिपाः॥

इस प्रकार प्रार्थना करने के पश्चात नारियल और फल षोडश मातृकाओं के चरणों में अर्पित करने के बाद नमस्कार करते हुए कहें:

गेहे वृद्धिशतानि भवंतु, उत्तरे कर्मण्यविघ्नमस्तु॥

इसके बाद निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए अक्षत अर्पित करें:

अनया पूजया गणेश सहित गौर्या दी षोडश मातरः प्रीयन्तām‌, न मम॥

षोडशोपचार पूजन क्या होता है?

षोडश का अर्थ है "सोलह"। षोडशोपचार पूजन में निम्नलिखित शामिल हैं:

ध्यान

आवाहन

आसान

पाद्यम

अर्घ्यम

आचमन

स्नान (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर और पंचामृत से अभिषेक आदि करना)

वस्त्र

यज्ञोपवीत (पुरुष) देवताओं के लिए आभूषण और देवी के लिए

गंध (चंदन, गुलाल, कुमकुम आदि)

पुष्प पत्र-पान आदि

धूप दीप

नैवेद्यम (फल मिठाई मेवा आदि)

आरती

पुष्पांजलि

प्रदक्षिणा नमस्कार आदि।

इन सोलह संस्कारों का महत्व सभी के लिए महत्वपूर्ण है।

धनञ्जय

‘‘ पाण्डवों में मैं धनञ्जय हूं’’

स्वामी विवेकानन्द ने एक बड़ी अजीब-सी बात कही है। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य वही पा सकता है जो पिछले जन्म में राजा रहा हो। मनीषियों ने उनकी इस बात की व्याख्या इस प्रकार से की है कि जब व्यक्ति के भोगों की सभी कामानाएं समाप्त हो जाती हैं तभी वह अध्यात्म के पथ का सच्चा तीर्थयात्री बन पाता है और लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।

आज मोक्षदा एकादशी है यानी मोक्ष प्रदान करने वाली एकादशी। इसी दिन गीता जयंती भी मनायी जाती है। देखा जाए तो भगवद्गीता भगवान कृष्ण और उनके प्रिय सखा अर्जुन के बीच का संवाद है। यह संवाद कई लेयरों में चलता है। इसमें भगवान अर्जुन के तमाम भ्रमों और सन्देह का निराकरण करते हुए धीरे-धीरे अपने को भी खोलते जाते हैं। 
गीता का उत्कर्ष एकादश भाव माना जाता है जब भगवान ने अपना विश्वरूप दिखाया। किंतु विश्व रूप दिखाने से पहले भगवान अर्जुन को मानसिक रूप से इसके लिए तैयार करते हैं। अपनी विभूतियां बता कर। इसके बावजूद भगवान का विराट रूप देखकर अपने समय के लगभग अजेय योद्धा अर्जुन की मानों घिग्गी बंध जाती है। डर से। खैर, बात का विस्तार न करते हुए इसे कृष्ण और अर्जुन तक ही सीमित रखा जाए। गीता में अर्जुन भगवान को विभिन्न नामों से संबोधित करता है और विराट रूप में देखने के बाद इस बात पर पश्चाताप करता है कि उन्हें वह साधारण मित्र मानकर हे कृष्ण, हे यादव, हे सखा कहकर संबोधित करता रहा। जहाँ तक श्रीहरि की बात है, वे भी गीता में अर्जुन को विभिन्न नामों से संबोधित करते हैं। 
पर गीता के सत्रहवें अध्याय में जब भगवान यादवेन्द्र अपनी विभूतियाँ बता रहे होते हैं तो उस समय वह अर्जुन के केवल धनञ्जय नाम को अपनी विभूति बताते हैं। मजेदार बात है कि भीष्म दादा ने विष्णुसहस्रनाम में भगवान के सहस्रनामों में एक नाम धनञ्जय बताया है।

कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः ॥

धनञ्जय का अर्थ है जो धन को जीत चुका हो। इसमें सभी प्रकार के धन सन्निहित हैं। श्रीहरि धनञ्जय और उनका शिष्य, उनका मित्र अर्जुन भी धनञ्जय है। दोनों जो भी कार्य करते हैं, उसका हेतु, उसकी प्रेरणा कभी धन नहीं होता। गीता के प्रारंभ में अर्जुन की मनोदशा को बदलने के लिए भगवान केशव तमाम तरह के तर्क देते हैं जिनमें से एक यह है कि ‘‘हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्’’ अर्थात युद्ध में मारे गये तो स्वर्ग जाओगे और विजयी हुई तो धरती के सुख भोगेगे। किंतु अर्जुन को धरती के सुख यानी धन एवं सम्पदा का कोई आकर्षण ही नहीं था क्योंकि वह धनञ्जय था।

अब जरा भगवान कृष्ण की समूची जीवनलीला पर दृष्टि डालिए। कहने को तो भगवान द्वारिकाधीश भी हैं किंतु उनकी किसी भी लीला में आपको रंच मात्र भी धन या सम्पदा का आकर्षण नहीं मिलेगा। शायद यही कारण है कि धन की अधिष्ठात्री देवी माता लक्ष्मी ने उन्हें अपना पति वरण किया और वह श्रीपति कहलाये। पर यह भी गहराई से समझने की बात है कि धनञ्जय का अर्थ धन का नकार नहीं है। धन के आकर्षण का नकार है।

एकादशी की राम राम।

Thursday, 27 November 2025

स्त्री और ईसाई धर्म

women, church and state में मटिल्डा यह स्पष्ट लिखती हैं कि ख्रीस्तपंथ में चर्च ने महिलाओं को जीवित ही नहीं माना था। चर्च की दृष्टि में महिला का कोई अस्तित्व नहीं था। वह ईविल का कारक थी और साथ ही कौमार्य को सबसे पवित्र माना गया था। वे इस पुस्तक के पृष्ठ 55 पर लिखती हैं कि सैन्ट पॉल ने पुरुष को महिलाओं का मास्टर बताया है, और वही स्त्री का सिर है। वे लिखती हैं, कि हालांकि चर्च ने व्यावहारिक रूप से महिला को विश्व के विनाश के लिए जिम्मेदार बताया था और उसके लिए पछतावा आदि बताते थे और ऐसे प्राणी के लिए लानत भेजते थे, जिसे उन्होनें “door of hell” अर्थात नरक का द्वार कहा था। 

अब यह बताया जाए कि दिन भर गोस्वामी तुलसीदास जी को कोसने वाली या फिर मनु स्मृति को कोसने वाली डीडी लॉग्स, जिन्हें मोक्ष और शांति ही चर्च या मस्जिद में मिलती है, क्या उन्होनें कभी यह बातें आपको बताईं? मुझे मस्जिद या चर्च जाने से कोई आपत्ति नहीं है, वह उनका विश्वास है वे करें परंतु जो सबसे महत्वपूर्ण है वह यह कि चर्च ने महिलाओं को क्या बताया था और चर्च ने ईसाई महिलाओं और गैर ईसाई महिलाओं के साथ क्या सुलूक किया, उसके विषय में मुंह क्यों नहीं खोला?

फिर मटिल्डा आगे लिखती हैं कि छठवीं शताब्दी में macon में उनसठ बिशपस ने एक काउन्सल में भाग लिया और अपना पूरा समय इस प्रश्न पर चर्चा करते हुए बिताया कि क्या “महिलाओं में आत्मा भी होती है?” 

एक तरह यह तर्क दिया गया था कि महिलाओं को “होमो” नहीं कहा जाना चाहिए तो दूसरी तरह यह तर्क दिया गया कि उसे “होमो” कहा जाना चाहिए, क्योंकि पहली बात कि ग्रंथ यह घोषणा करते हैं कि गॉड ने मैन को बनाया, मेल और फ़ीमेल को बनाया और दूसरा कि जीसस क्राइस्ट जो एक वुमन के बेटे हैं, उन्हें मैन का बेटा कहा जाता है। 

इसलिए ईसाई महिलाओं को पादरियों की दृष्टि में मानव तो माना जाता रहा, मगर उन्हें बहुत कमजोर और बहुत बुरा माना जाता था। मगर इसके हजार साल बाद नए पाए गए अमेरिका की महिलाओं के लिए यह कहा गया कि ये तो “brute creations अर्थात पशु हैं, जिनमें न ही कोई soul है और न ही उनका कोई कारण है।“

इसके बाद वे लिखती हैं कि सोलहवीं शताब्दी के अंत तक यह लिखा जाता रहा कि महिलाएं किसी भी प्रकार से mankind अर्थात मानवता में स्थान नहीं है, अपितु ये तो मानव और brute जीवों के बीच कोई पशु प्रकार की जीव हैं। 
फिर उसके आगे वे लिखती हैं कि पीटर द ग्रेट के समय तक महिलाओं को मानव माना ही नहीं जाता था, जब Christendom का विभाजन हुआ, जिसे ग्रीक चर्च के रूप में जानते हैं, उस समय साम्राज्य की जनगणना में केवल और केवल आदमियों की ही गिनती हुई थी और तमाम “souls” में किसी भी महिला का नाम नहीं था। 

हालांकि यह पुस्तक बहुत बड़ी है और इसे पढ़ने के लिए धैर्य और साहस चाहिए क्योंकि कई ऐसी मान्यताऐं टूटेंगी जो हमारे मन में न जाने कब से घुसी हुई हैं और इन कथित डीडी लोग्स ने डाल रखी हैं। 

ये पापिन हैं, क्योंकि इन्होनें हिन्दू इतिहास और ऐतिहासिक पात्रों को चर्च की दृष्टि से देखकर पढ़ा है और हमारे सामने प्रस्तुत किया है, जिसके चलते हमारी बेटियाँ या तो लव जिहाद की ओर जा रही हैं या फिर अपनी लैंगिक पहचान के प्रति ही भ्रमित हो रही हैं।


Wednesday, 26 November 2025

कोविदार वृक्ष

अवध ध्वज में कोविदार वृक्ष है !

कोविदार माने हिंदी में कचनार,

कचनार के अनेक गुण हैं,
सबकी वार्ता, बाता क्या करें , एक ही ले लेते हैं, वह भी आधा अधूरा ..

कचनार के गुणों में प्रमुख है ग्रन्थि को गलाना, किसी भी शारीरिक गांठ को गला देना,

दशरथ को चौथेपन तक पुत्र न प्राप्त होने की ग्रंथि ने अवसाद ग्रस्त कर दिया था,

गुरु जी की कृपा से वह ग्रंथि गल गयी

विश्वामित्र को विश्व में मित्र भावना के विस्तार यज्ञ में बाधा आ गई, कोई एक शुभ संकल्प पूर्ण न हो तो किसी को भी ग्लानि ग्रंथि सता सकती है,

लो जी। राम लक्ष्मण द्वारा सुबाहु ताड़कादि रूपी ग्रंथि का शल्य हो गया ....

जनक जिस वचन ग्रंथि से व्यथित थे, 
वह थी शिव धनुष पर चढ़ाए जाने वाली प्रत्यंचा, और जानकी का पाणिग्रहण ...

शिव धनुष की प्रत्यंचा क्या , शिव धनुष रूपी ग्रंथि का ही भेदन छेदन हो गया ..

जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। 
जदपि मृषा छूटत कठिनई।। 
तब ते जीव भयउ संसारी। 
छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी।।

ऐसे ही समस्त काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सरादि रूपी ग्रंथियों को गलाने के चक्र की नाभि है अवध ..

और उसकी पताका पर अंकित कोविदार का वृक्ष !

Tuesday, 25 November 2025

जाति

पिछले दिनों नाम में बदलाव लेकर सोशल मीडिया और अखबारों में सुर्खियां थी.

दोनवार को भूमिहार ब्राह्मण से अलग कर 79 नम्बर पर नई जाति बना दी गई.

वैश्य को 56 जाति में बांटा गया. किन्नर को जाति में गिना गया. लोहार को "कमार" में गिना गया.

वैश्य और लोहार ठीक ढंग से कोर्ट में गए नहीं, न ही लड़े.

किन्नर वाला केस अपनी टीम ही लड़ रही है, सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है.

इधर भूमिहार ब्राह्मण को केवल "भूमिहार " जानबूझकर लिखवाया गया ताकि भ्रम बना रहे जबकि भूमिहार एक विशेषण है, जाति नहीं.

पूरी जाति "भूमिहार ब्राह्मण /बाभन" है.

जैसे मिथिला में रहने वाले "मैथिल ब्राह्मण " कन्नौज मूल से जुड़े ब्राह्मण "कान्यकुब्ज ब्राह्मण "
आदि.

इस देश में जाति नियमानुसार कोई नहीं बदल सकता.
धर्म बदला जा सकता है.

न तो कोर्ट, न ही कोई सरकार 

फिर किस आधार पर केवल "भूमिहार " लिखा गया... या कहें जानबूझकर लिखवाया गया?
करीब 12 राज्यों में भूमिहार(यह अलग जाति है), भुइया, भूइझार, भूइजहार आदि नाम से जातियों का समाज में स्थान है और ये SC/ ST कि श्रेणी में है.

इन विसंगति को ख़त्म करने के लिए 2023 में हीं अपनी "समाज संवाद यात्रा " टीम नें पटना हाई कोर्ट में केस किया था. (वकील श्री Arun Kumar जी हैँ,बड़े भाई हैँ )

लेकिन बीच में हीं CJ श्री विनोद चन्द्रन जी कि बेंच में जातीय जनगणना को पहले 3 महीने के लिए रोका गया, फिर ALLOW किया गया, वाला निर्णय आ गया.(जो अब सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है)

अब न्यायधीश मोहित शाह जी फंस गए.

न्यायधीश मोहित शाह जी नें हमारी बातों को सही माना.
विभिन्न ऐतिहासिक ग्रंथों, प्रिवी पर्स कौंसिल के निर्णय, हेनरी बुकानन के दस्तावेज़ आदि भी भूमिहार ब्राह्मण/ बाभन ही कहते हैँ. 1931 में हुई अंतिम जनगणना में भी यही अंकित है.

लेकिन इससे उनके CJ के निर्णय प्रभावित हो रहे थे. पूरी जनगणना ही सिंगल बेंच के निर्णय से गलत हो जाती, जबकि डबल बेंच उसपर फैसला( गलत ही सही, क्योंकि जनगणना का अधिकार केंद्र सरकार को है, राज्य सरकार को नहीं) दे चुकी थी.

इसलिए जज शाह साहब नें बीच का तरीका निकाला और हमें रिप्रेजेंटेशन राज्य सरकार आदि को भेजनें को कहा ताकि इसमें सुधार हो.

इसपर पेटिशनर Dhirendra Kumar जी, गया,बरबीघा, मुजफ्फरपुर(मिंटू जी और टीम) नवादा आदि से कई सम्मानित लोगों नें लगातार बिहार सरकार को नाम सही करने का आवेदन माननीय उच्च नायलाय, पटना हाई कोर्ट के अनुसार लिखा है.

RTI से बिहार सरकार नें कहा है कि सवर्ण आयोग नें नाम बदलने कि सिफारिश कि थी.

प्रश्न है कि किस अधिकार से यह आयोग ऐसा कर सकता है? किस कानून के तहत? 
वे ऐसा कर ही नहीं सकते.

इसलिये अब राज्य सरकार नें सवर्ण आयोग से पूछा है कि आपने यह कैसे किया? 

यह सामूहिक प्रयास का नतीजा है.समाज संवाद टीम के कानूनी दबाब का नतीजा है. RTI और सोशल मीडिया के दबाब का प्रतिफल है.

अब कुछ समाचार पत्रों में अक्टूबर कि खबर आई है.

ध्यान ये रहे कि बिहार सरकार कि चिट्ठी 10/10/2025 कि है, यानि चुनाव के ठीक पहले कि है जबकि कोर्ट का आदेश 7 नवंबर 2023 का ही है. हमारे representation करीब 16-17 महीने से लगातार जा रहे हैँ.

Sunday, 23 November 2025

इंदिरा गांधी सेक्स संबंध

Chapter SHE of Mathai book Hindi.docx

वह महिला

प्रस्तावना

इस लेख का एक संक्षिप्त लेकिन महत्वपूर्ण इतिहास है। इसे 23 जून, 1977 को एम.ओ. मथाई ने लिखा था। वे तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के निजी सचिव थे। मथाई दक्षिण भारत के एक बुद्धिमान और योग्य व्यक्ति थे, कई दक्षिण भारतीयों की तरह धर्म से कैथोलिक थे, और नेहरू और उनके समय के कथित अनुभवों पर दो प्रसिद्ध पुस्तकें लिखने का साहस रखते थे, जो विवादास्पद रहीं- (1) नेहरू युग की यादें, और (2) नेहरू के साथ मेरे दिन, जिनमें उन्होंने पहली बार नेहरू के समय के उच्च और पराक्रमी कई रहस्यों का खुलासा किया है।

एम.ओ. मथाई (1909-1981) भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के निजी सहायक थे। 1946 में नेहरू के सहायक बनने से पहले मथाई ने भारत में संयुक्त राज्य अमेरिका की सेना के साथ काम किया था। सत्ता के दुरुपयोग के कम्युनिस्ट आरोपों के बाद उन्होंने 1959 में इस्तीफा दे दिया। दिल्ली स्थित गैर-लाभकारी ट्रस्ट ‘मिशन नेताजी’ द्वारा खोजे गए मथाई के एक पत्र ने 2006 में विवाद खड़ा कर दिया था। इस पत्र में संकेत दिया गया था कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अस्थियाँ 1950 के दशक में भारत में प्राप्त हुई थीं। यह जानकारी भारत सरकार की इस राय के विपरीत है कि बोस की अस्थियाँ जापान के रेंकोजी मंदिर में रखी हैं। मथाई का 1981 में मद्रास में 72 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।

यद्यपि यहाँ आप जिस लेख को पढ़ने जा रहे हैं, वह कोई साधारण वर्णनात्मक लेख नहीं था। इसमें इंदिरा गांधी (पूर्व नाम नेहरू) के साथ मथाई की व्यक्तिगत बातचीत के कई संदर्भ हैं। यह लेख मूल रूप से मथाई की पुस्तक ‘नेहरू युग की यादें’ का एक हिस्सा होना था, लेकिन स्पष्ट कारणों से, अंतिम समय में इसे पुस्तक से हटा दिया गया। मुझे इस लेख की एक प्रति (जिसे मैं अपने पाठकों के साथ साझा कर रहा हूँ) एक अज्ञात लेखक द्वारा लिखे गए लेख के रूप में प्रकाशित होने के तुरंत बाद प्राप्त हुई, लेकिन यह अनुमान लगाने के लिए ज्यादा दिमाग लगाने की आवश्यकता नहीं है कि यह सब कौन और किसके बारे में लिख रहा है। हमारे पाठक ही इसका फ़ैसला करेंगे।

मथाई इन पृष्ठों में जो कुछ भी बता रहे हैं, उसका एक बड़ा हिस्सा बुद्धिमान और जानकार पाठकों को पहले से ही ज्ञात है; ये कुछ पृष्ठ निश्चित रूप से काफी पठनीय हैं, हालाँकि इस पुराने नाटक के अभिनेता और अभिनेत्रियाँ अब नहीं रहे, और कईयों का अतीत धूमिल हो गया है! उस कलंक को छिपाने के लिए ही इन कुछ पृष्ठों को उस समय आम जनता से छिपाने के लिए इतनी मेहनत की गई थी। भारत में, आम जनता हमेशा से जागरूक रही है और आज भी है, राजनेता चाहे कुछ भी कहें! मथाई ने इस अध्याय में जो लिखा वह नीचे दिया जा रहा है-

उसकी नाक क्लियोपेट्रा जैसी, आँखें पॉलीन बोनापार्ट जैसी और स्तन वीनस जैसे हैं। उसके अंगों पर बाल हैं, जिन्हें बार-बार मुंडवाना पड़ता है। शारीरिक और मानसिक रूप से वह महिला से अधिक पुरुष जैसी है। मैं उसे एक मर्दाना महिला कहूँगा। मैं उससे पहली बार 1945 की सर्दियों में उसके पैतृक घर में मिला था। तब उसका एक छोटा बेटा था जो रेंगने की उम्र का था और वह बहुत रोता था। मेरी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि वह एक घमंडी लड़की है जिसके चेहरे पर नाखुशी साफ़ दिखाई देती है। दिसंबर 1946 में पैदा हुआ उसका दूसरा बेटा एक अनचाहा बच्चा था। बचपन में ही उसे एक दोष दूर करने के लिए खतना करवाना पड़ा था। 1947 तक उसके दुखों का प्याला भर गया था और भाग्य ने उसके चेहरे पर कब्ज़ा कर लिया था।

1946 की शरद ऋतु में उसके पिता ने उसे एक छोटी ऑस्टिन कार दी। वह चाहती थी कि मैं उसे ड्राइविंग सिखाऊँ। शुरुआती दौर में मैं उसे वायसराय के अंगरक्षक के पोलो ग्राउंड में ड्राइविंग सिखाने ले जाता था। वह जल्दी सीख जाती थी। फिर मैंने ड्राइविंग की ट्रेनिंग बंद कर दी, क्योंकि वह गर्भावस्था के अंतिम चरण में पहुँच रही थी। मैंने उससे कहा कि मैं नहीं चाहता कि वह खुली सड़कों पर ड्राइविंग सीखने का कोई जोखिम उठाए।

उसके दूसरे बेटे का जन्म दिसंबर 1946 के मध्य में हुआ। फरवरी 1947 के मध्य तक वह ड्राइविंग की ट्रेनिंग फिर से शुरू करने के लिए तैयार थी। हम सड़कों पर और कनॉट सर्कस गए। फिर मैंने उससे कहा, तुम बस कल्पना करो कि तुम सब कुछ जानती हो, ध्यान केंद्रित करो, मानो कि विपरीत दिशा से कार चलाने वाला व्यक्ति मूर्ख है, और आत्मविश्वास से कार चलाओ, कनॉट सर्कस का एक चक्कर लगाओ और वापस आ जाओ। उसने ऐसा ही किया और विजय के साथ लौटी। ड्राइविंग की शिक्षा वहीं समाप्त हो गई। 1947 के मध्य से पहले उसने मुझसे कहा कि मैं उसे सिनेमा ले चलूँ। उसके बाद से जब भी मैं खाली होता, हम तस्वीरें लेने निकल पड़ते, जो अक्सर नहीं होता था।

वह मुझे जंगल वाली रिज पर घुमाने ले जाने के लिए उत्सुक रहती थी। उसे छोटी कारों से नफ़रत थी। इसलिए हम मेरी प्लायमाउथ कार में जाते थे। उसे जंगलों में जाना पसंद था जहाँ खंडहर थे। कुतुब मीनार से आगे के इलाकों में ड्राइव करना पसंद था। एक दिन, एक बेमतलब ड्राइव के दौरान, उसने मुझसे शिकायत करते हुए कहा, ”तुम मुझसे प्यार नहीं करते।“ मैंने कहा, ”मुझे नहीं पता; मैंने इसके बारे में सोचा ही नहीं था।“ 1947 की शरद ऋतु तक मुझे पता चल गया था कि वह बिना मेरी पहल के ही मुझसे बेपनाह प्यार करने लगी थी। मुझे देखते ही उसका चेहरा उदास हो जाता था। वह मुझसे अपने बारे में बात करने लगी। उसने बताया कि शादी के कुछ समय बाद, उसे पता चला कि उसका पति उसके प्रति वफ़ादार नहीं है। यह उसके लिए एक बड़ा सदमा था, क्योंकि उसने परिवार के हर सदस्य के विरोध के बावजूद उससे शादी की थी।

उसने बताया कि उसकी साड़ियाँ, कोट, ब्लाउज़, जूते और हैंडबैग खोने लगे थे। उसे नौकरों पर शक था, जब तक कि उसे एक पार्टी में दो महिलाओं के पास अपनी खोई हुई कुछ चीज़ें नहीं मिलीं। ये महिलाएँ उसके पति के साथ दोस्ताना व्यवहार के लिए जानी जाती थीं। उसने यह भी पता लगाया कि उसके पति ने उसकी किताबों की अलमारियों से चुराई किताबें किन महिलाओं को दी थीं। उसने बड़ी ही सावधानी से बताया कि मेरे बारे में उसके क्या इरादे थे। मैंने उसे बताया कि मेरी दो झिझकें हैं- (1) मुझे शादीशुदा महिलाओं के साथ खिलवाड़ करना पसंद नहीं; (2) उसके पिता के प्रति मेरी वफ़ादारी है।

उसके मन में जो कुछ भी था, उसे करने से रोकती थी। वह नंबर 1 के बारे में तुरंत खुल गई। उसने मुझे भरोसा दिलाया कि कुछ समय पहले से उसने अपने पति से कोई भी संबंध नहीं रखा था। उसने आगे कहा- ”मैं अब उसके मुझे छूने के बारे में सोच भी नहीं सकती।“ उसने आगे मुझसे कहा, ”सौभाग्य से वह नपुंसक भी हो गया है, हालाँकि उसका महिलाओं के प्रति आकर्षण बना हुआ है।“ नंबर 2 के बारे में वह मुझसे नाराज़ थी और पूछा, ”मेरे पिता का इससे क्या लेना-देना है? क्या मैं नाबालिग हूँ?“

तब से वह मेरे साथ जितना हो सके उतना समय बिताने लगी और अपने पिता के प्रति मेरे रवैये का मज़ाक उड़ाती रही, जहाँ तक उसका सवाल था। लेकिन मैं धीरे से विरोध करता रहा। मैं अभी मानसिक रूप से तैयार या समझौता नहीं कर पाया था। 18 नवंबर 1947 को वह मुझे अपने कमरे में ले गई और मेरे होंठों पर ज़ोर से चूमा और मुझसे कहा, ”मैं तुम्हारे साथ सोना चाहती हूँ;  मुझे कल शाम जंगल में ले चलो।“ मैंने उससे कहा कि मुझे औरतों के साथ बहुत कम अनुभव है। उसने कहा, ”और भी अच्छा है।“ इसलिए 19 तारीख को, जो उसका जन्मदिन था, हम गाड़ी से बाहर गए और जंगल में एक जगह चुनी। वापस आते समय मैंने उससे कहा कि मुझे उसके स्तनों में दूध से थोड़ी नफ़रत है (हालाँकि उसने कुछ समय पहले बच्चे को दूध पिलाना बंद कर दिया था)। बाद में, उसने इसके बारे में कुछ किया और जल्द ही पूरी तरह से उदासीन हो गई।

उसे पता चला कि मुझे सेक्स के बारे में बहुत कम जानकारी है, और उसने मुझे दो किताबें दीं, जिनमें से एक डॉ. अब्राहम स्टोन की ‘सेक्स और महिला शरीर रचना विज्ञान’ पर थी। मैंने उन्हें बड़े चाव से पढ़ा। वह कामुक नहीं थी; न ही उसे बार-बार सेक्स की ज़रूरत थी। लेकिन सेक्स में उसमें फ्रांसीसी महिलाओं और केरल की नायर महिलाओं की सारी कलात्मकता थी। उसे लंबे समय तक चुंबन लेना और उसी तरह चूमना बहुत पसंद था। उसने ठंडी और निषेधात्मक होने की प्रतिष्ठा बना ली थी। वह ऐसी बिल्कुल नहीं थी। यह केवल आत्म-सुरक्षा के लिए एक स्त्रीवत दिखावा था। वह एक भावुक महिला थी, जो बिस्तर में असाधारण रूप से अच्छी तरह से हिलती-डुलती थी।

बारह सालों तक हम प्रेमी रहे, मैं उससे कभी संतुष्ट नहीं हुआ। धीरे-धीरे वह उस मोटी महिला पारिवारिक मित्र के प्रति शत्रुतापूर्ण हो गई, जो मेरे पास रहने आती थी। जब से उसने उस पारिवारिक मित्र को मेरे आगमन पर गले लगाकर और मेरे गाल पर एक मासूम चुंबन देकर मेरा स्वागत करते देखा, वह ईर्ष्यालु हो गई और गुस्से से जल उठी। कभी-कभी पारिवारिक मित्र महिला मुझसे कहती थीं कि जब भी शहर में कोई अच्छा सिनेमा हो, मैं उसे और मेरी ‘उस’ को वहाँ ले जाऊँ। मेरी ‘वह’ बड़ी चतुराई से यह सुनिश्चित कर लेती थी कि मैं पारिवारिक मित्र के पास न बैठूँ, बल्कि पंक्ति में तीसरे नंबर पर उसके बगल में ही बैठूँ।

अगली बार जब पारिवारिक मित्र महिला के आने की उम्मीद थी, उससे एक दिन पहले उसने मुझसे कहा कि मैं उसे सूर्यास्त के बाद जंगल में ले जाऊँ। कार में मैंने उससे पूछा, ”क्या खास योजना है? मुझे कुछ ज़रूरी काम है।“ उसने जवाब दिया, ”जब तक वह मोटी यहाँ है, मैं तुमसे दूर रहूँगी क्योंकि मैं नहीं चाहती कि उसके छूने के बाद तुम मुझे छूओ।“ मैंने उसे यकीन दिलाया कि मुझे उस मोटी में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं है। आखिरकार, वह उस मोटी के दोस्ताना स्वागत और विदाई के हाव-भावों की आदी हो गई।

 

उसने मुझे यह समझाने की बहुत कोशिश की कि मैं कभी-कभी उसके कमरे में चला जाऊँ, जब उसका पति वहाँ हो, और बैठकर उन दोनों से बात करूँ। मैंने उससे कहा कि मेरा धोखा देने का कोई इरादा नहीं है। इसलिए वह उसे कभी-कभार मेरे अध्ययन कक्ष में ले आती थी। वह यह सुनिश्चित करने के लिए हर तरह के उपाय करती थी कि उसके बच्चे अपने पिता के साथ कम से कम समय बिताएँ। उसने मुझे बताया कि वह नहीं चाहती कि उनके बच्चों पर उनके पिता का कोई प्रभाव पड़े, क्योंकि उसे यकीन था कि उनका प्रभाव उनके लिए बुरा होगा। उसने यह कहते हुए अपनी बात समाप्त की- ”मैं नहीं चाहती कि मेरे बच्चे बड़े होकर सबसे बड़े झूठे बनें।“ यही एक कारण था कि उसके पति को अलग कमरे में स्थानांतरित कर दिया गया था। एक बार मैंने उससे कहा था कि उसके पति ने मुझे जो कुछ बताया था, वह उसे याद आया। उसने कहा- ”उसकी एक भी बात पर यकीन मत करना। मैंने यह सब अपनी कड़वी कीमत चुकाकर सीखा है।“

उसने ए.सी.एन. नांबियार को, जिन्हें वह लंबे समय से व्यक्तिगत रूप से जानती थी और जो उसके माता-पिता के मित्र भी थे, पत्र लिखकर अपने पति से तलाक लेने के बारे में उसकी राय पूछी। वह जानती थी कि नांबियार मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं। नांबियार ने उसे उत्तर दिया कि कुछ परिस्थितियों में, काल्पनिक जीवन जीने से पूरी तरह अलग हो जाना बेहतर होता है। मैंने उसे इस मामले में प्रोत्साहित नहीं किया, मुख्यतः उसके पिता की खातिर। एक दिन, उसने मुझसे कहा कि वह एक हिंदू से शादी करने के बारे में सोच भी नहीं सकती। मैंने उससे कहा, यह हिंदू धर्म द्वारा सदियों से उत्पन्न किए गए महान पुरुषों की श्रृंखला का सम्मान है।

मैंने उसे कभी अपने शयनकक्ष में आने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया। एक बार वह आई। आधी रात हो चुकी थी। मैं आधी रात तक काम करने के कारण गहरी नींद में था; वह मेरे बगल में लेट गई और मुझे चुम्बन देकर धीरे से जगाया। मैंने उससे पूछा, ”क्या बात है?“ उसने कहा, ”मुझे आना ही था।“ मुझे नहीं पता था कि वह मन ही मन परेशान थी या नहीं। मैंने उससे कहा, ” चलो यहाँ चुपचाप लेटे रहें और जब तक तुम न चाहो कुछ न करें।“ उसने कहा, ”इस अवसर पर, मैं बस तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ। वह लगभग सुबह 4 बजे तक आराम से लेटी रही, और धीरे से ऊपर अपने कमरे में चली गई। जाने से पहले उसने मुझसे कहा, ”मैंने तुम्हें कभी नहीं बताया कि मैंने एक बार आत्महत्या करने के बारे में सोचा था। अब मेरे मन में ऐसे विचार नहीं आते। तुमने मुझे मेरी खुशी वापस दे दी है।“

एक बार, हमारे प्यार भरे जीवन के शुरुआती दिनों में, उसने मुझसे कहा था, ”जब तक तुम मेरे पास नहीं आए, मुझे असली सेक्स का मतलब ही नहीं पता था।“ बिस्तर पर अपनी उत्तेजना के चरम पर, वह मुझे कसकर पकड़ लेती और कहती, ”ओह, भूपत, मैं तुमसे प्यार करती हूँ।“ उसे उपनाम देना और लेना बहुत पसंद था। उसने मुझे ‘भूपत डाकू’ नाम दिया, और मैंने भी तुरंत उसे ‘पुतली डाकू’ नाम दे दिया। अकेले में हम एक-दूसरे को इन्हीं नामों से पुकारते थे।

उसके रोमांटिक उत्साह में उसके प्रेम के दावों के बारे में, मैंने एक बार उसे बायरन के ‘डॉन जुआन’ के दो अंश सुनाए- ”पुरुष का प्रेम पुरुष का जीवन है, एक अलग चीज़ है, यह एक स्त्री का संपूर्ण अस्तित्व है। अपने पहले जुनून में स्त्री अपने प्रेमी से प्रेम करती है; बाकी सभी में, वह केवल प्रेम से ही प्रेम करती है।“ उसने उत्तर दिया, ”ठीक है, मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे जितनी बार हो सके, बिस्तर पर नहीं, बताओ कि तुम मुझसे प्यार करते हो।“ मैंने उसकी बात मानने की पूरी कोशिश की। वास्तव में, इसमें कोई कठिनाई नहीं थी, क्योंकि मैं उससे गहराई से प्रेम करने लगा था।

एक शाम, मैंने उसे परेशान पाया। जब उसने मुझे देखा, तो वह फफककर रो पड़ी। मैंने उससे पूछा कि क्या हुआ था। उसने बताया कि जब वह अपने ड्रेसिंग रूम से अपना सामान्य गिलास दूध पीने आई, तो उसने पाया कि उसमें बारीक पाउडर था। पाउडर गाढ़ी मलाई पर तैर रहा था। पहली घूँट लेते ही उसने तुरंत उसे अपने मुँह में महसूस किया और थूक दिया। उसने बताया कि अपने ड्रेसिंग रूम से उसने अपने पति को चुपके से अपने बेडरूम में घुसते और बाहर निकलते सुना। उसने खुद को संभाला और मुझे अपनी बाहों में भर लिया और मुझे कसकर पकड़ते हुए कहा, ”ओह, मैकी, मैं तुमसे प्यार करती हूँ; मुझे बहुत खुशी है कि तुम ऊपर आए।“

जब हम पहली बार विदेश यात्रा पर जा रहे थे, तो नक्षत्र मंडल की योजना के अनुसार, जब हम मोंट ब्लांक के नज़ारे में थे, तो वह बहुत उत्साहित थी। उसने मुझसे धीरे से कहा, ”मुझे रानी मधुमक्खी पसंद है, मैं ऊँचे हवा में प्यार करना चाहती हूँ।“ मैंने उससे पूछा, ”क्या तुमने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं एक चील की तरह ऊँचे उड़कर दुनिया का नज़ारा देखूँ? मैं एक बार ऐसे ही सपने से जागा और खुद कोफर्श पर पाया, क्योंकि मैं बिना कोई हड्डी तोड़े बिस्तर से गिर गया था।“ वह जानती थी कि मैं उसका उपहास कर रहा हूँ।

लंदन पहुँचने पर, उसे अपने लिए पहला खाली समय पता चला, और उसने मेरे लिए एक शांत रेस्टोरेंट में ले जाने की व्यवस्था की। रेस्टोरेंट पहुँचकर, मैंने उससे खाना ऑर्डर करने को कहा; मैंने कहा कि मैं भी उसके जैसा ही खाऊँगा, साथ में बर्फ पर छह बड़े कच्चे सीप और उपयुक्त सॉस भी। उसने कहा कि वह भी खाएगी। उसने जो मुख्य व्यंजन ऑर्डर किया था वह बछड़े का मांस था। उसने कहा, जब से मैं यहाँ आई हूँ, ”मुझे बछड़े का मांस खाने की बहुत इच्छा हो रही है।“ मैंने उससे पूछा कि क्या उसने कभी वात्स्यायन का ‘कामसूत्र’ पढ़ा है। उसने कहा, ”नहीं, क्यों?“ मैंने उसे बताया कि वात्स्यायन ने शादी से छह महीने पहले युवा जोड़ों के लिए बछड़े का मांस खाने की सलाह दी थी।

उसने रामायण या महाभारत भी नहीं पढ़ी थी। रामायण के बारे में उसका ज्ञान केवल वही था जो उसकी दादी ने उसे बताया था। कई मायनों में, वह एक अराष्ट्रीय व्यक्ति थी। उसे कृत्रिम गर्भनिरोधक उपकरण पसंद नहीं थे। पचास के दशक की शुरुआत में एक बार वह मुझसे गर्भवती हो गई। उसने गर्भपात कराने का फैसला किया। वह ब्रिटिश उच्चायोग के डॉक्टर के पास गई जिसे वह व्यक्तिगत रूप से जानती थी; लेकिन उसने मदद करने से इनकार कर दिया। इसलिए वह अपने पैतृक घर गईं और एक महिला डॉक्टर से संपर्क किया, जिन्हें वह व्यक्तिगत रूप से जानती थीं और जिन पर उन्हें पूरा भरोसा था। इस यात्रा पर वह अपने दूसरे बेटे को भी साथ ले गईं।

दो हफ़्ते बाद माँ और छोटा बेटा यह खुशखबरी लेकर लौटा कि उसके बोलने की समस्या प्राकृतिक रूप से ठीक हो गई है। पहले वह र का उच्चारण नहीं कर पाता था, और माँ इस बात को लेकर चिंतित थी। वह किसी वाणी-सुधार विशेषज्ञ की तलाश में थी। लौटने के दिन, उसने मुझे बताया कि यह सब बिना किसी दवा या सहायता के ठीक हो गया। क्या पिता को उसके मेरे प्रति लगाव का पता था? जवाब हाँ में है। हर बार जब उसे रात के खाने के लिए बाहर जाना होता था, तो वह उसे ढूँढ़ने के लिए जाता था। जाने के समय से पंद्रह मिनट पहले, वह पूरी तरह से सज-धज कर मेरे अध्ययन कक्ष में मेरे सामने बैठ जाती थी। नियत समय पर, पिता मेरे अध्ययन कक्ष के पास से गुजरते और उसे बुलाते।

1958 की सर्दियों में संयोग से मुझे कुछ दिखाई दिया। दोपहर के भोजन के तुरंत बाद, मैं उसे कुछ ज़रूरी जानकारी देने गया। उसने दरवाज़ा बंद कर लिया था। मैंने खटखटाया; लगभग पाँच मिनट बाद उसने दरवाज़ा आधा खोला और बाहर झाँका। मैंने देखा कि पर्दे खींचे हुए थे और एक लंबा, जवान, सुंदर, दाढ़ी वाला आदमी - एक ब्रह्मचारी - कमरे में था। मैं यह कहते हुए चला गया, ”मुझे तुमसे कुछ कहना था; लेकिन मैं इसे बाद में कहूँगा।“ यही हमारे रिश्ते का अंत था।

उसने मुझे कई बार यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि जो दृश्य मैंने देखा, उसका मतलब कुछ योग और आध्यात्मिक पाठों से ज्यादा कुछ नहीं था। मैंने उसे यह पक्का आभास दिया कि मुझे उसकी व्याख्याओं में कोई दिलचस्पी नहीं है। धीरे-धीरे वह मुझसे कड़वी होती गई। दरअसल, आखिरकार वह मेरी जान लेवा दुश्मन बन गई - जिससे मुझे लगातार विलियम कॉन्ग्रेव का प्रसिद्ध दोहा याद आता रहा- स्वर्ग में प्रेम के समान क्रोध नहीं है घृणा में बदल जाने जैसा; और न ही नर्क में तिरस्कृत स्त्री जैसा क्रोध है।’ इस घटना के एक पखवाड़े के भीतर मैंने उसके सभी भावुक पत्र एकत्र किए और उसे लौटा दिए। एक साल बाद मुझे अपने पुराने कागज़ों में कुछ और मिले। वे भी उन्हें लौटा दिए गए।

कुछ लोगों में यह गलत धारणा है कि वह और उनके पति अपने पति के जीवन के अंतिम दो वर्षों में एक-दूसरे के साथ आए थे। उनके जीवन में इतना कुछ घटित हो चुका था कि दिलों का पुनर्मिलन मानवीय रूप से संभव नहीं था। यह सच है कि वह उनकी बीमारी के दौरान उनके प्रति दयालु और विचारशील थीं। इस दौरान और विशेष रूप से उनके पति के दाह संस्कार और अस्थियों के संग्रह के समय कुछ काम किए गए और कुछ खास प्रभाव पैदा करने के लिए उनका खूब प्रचार किया गया। ये सभी काम सार्वजनिक उपयोग के लिए थे, क्योंकि उस समय तक वह एक पूर्ण राजनीतिक व्यक्ति के रूप में उभर चुकी थीं।

उपसंहार-

कुछ स्पष्टीकरण, अब जब पाठकों ने इंदिरा (उर्फ मैमूना बेगम) पर एम.ओ. मथाई जैसे किसी व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत सामग्री पर एक नज़र डाल ली है। इंदिरा ‘अपने अंग मुंडवाती थीं’, इसे ‘उसके जघन बाल’ समझिए। यह एक इस्लामी प्रथा है जिसे आज अफ़गानिस्तान में तालिबान द्वारा अफ़गान लोगों पर थोपी जा रही है। उसके इस कथन में कुछ भी असाधारण नहीं है कि वह एक हिंदू पुरुष से शादी नहीं करना चाहती, हालाँकि वह अपने ही शयनकक्ष में एक हिंदू ‘ब्रह्मचारी’ के साथ अनधिकृत यौन संबंध बनाती थी।

यह बात अब किसी से छिपी नहीं है कि उसके दूसरे बेटे (मोहम्मद यूनुस के नाजायज़ बेटे) संजय (उर्फ संजीव) का खतना हुआ था। किसी अज्ञात और काल्पनिक ‘दोष’ को दोष क्यों दें? यह सिर्फ़ इस्लाम की मुहर छोड़ने के लिए किया गया था, ठीक वैसे ही जैसे अवध के नवाब के महल में जवाहर पर किया गया था। बछड़े का मांस खाने का उसका अत्यधिक शौक बर्दाश्त किया जा सकता है, लेकिन खतने की झूठी व्याख्या बर्दाश्त नहीं की जा सकती।

पूरा नेहरू परिवार अज्ञात मूल के इस्लामी मूल का था और अब वे आज देश को एक अज्ञात मूल की कुप्रथा कैथोलिक महिला को सौंपने की योजना बना रहे हैं। यह बात कि उसने अपने तीसरे बच्चे, मथाई के बच्चे, का गर्भपात करवाया था, बहुत कम लोगों को पता है। लेकिन इस मामले को नवजात बेटे संजीव (लंदन में कार चोरी के बाद और लंदन पुलिस से बचने के लिए एक अलग भारतीय पासपोर्ट हासिल करने के लिए, उसका नाम अभी तक संजय नहीं रखा गया था) के ‘भाषण-दोष’ के बहाने दबा दिया गया था। अब हम जानते हैं कि ‘र’ अक्षर का उच्चारण करना मुश्किल है! यह कि फिरोज झूठा था, हमें आश्चर्य नहीं हुआ!

क्या स्कूल के लड़के यह नारा नहीं लगाते थे- ‘गली गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है?’ और यह सोचना कि किसी ने उन्हें यह नहीं बताया था कि इंदिरा का नाजायज बेटा बोफोर्स चोर था, जिस तथ्य को कोई भी भारतीय नेता अभी तक समझ नहीं पाया है! और फिरोज जैसा व्यभिचारी चोर, अपनी पत्नी इंदिरा (उर्फ मैमुना बेगम) जैसी चतुर महिला से यह बात कैसे छिपा सकता था, क्योंकि यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि इंदिरा वास्तव में फिरोज से कहीं अधिक चतुर थी।

चूताः

श्रीराम जी के अवध राज्य के कोविदार ध्वज के विविध उल्लेख - श्रीमद्वाल्मीकिरामायण, आनंद रामायण, उत्तर रामचरित 
एष वै सुमहान् श्रीमान् विटपी सम्प्रकाशते। 
विराजत्युज्ज्वलस्कन्धः कोविदारध्वजो रथे॥ १८॥
(सामनेकी ओर यह जो बहुत बड़ा शोभासम्पन्न वृक्ष दिखायी देता है, उसके समीप जो रथ है, उसपर उज्ज्वल तनेसे युक्त कोविदार वृक्षसे चिह्नित ध्वज शोभा पा रहा है ॥ १८ ॥) 

असनाः सप्तपर्णाश्च कोविदाराश्च पुष्पिताः। 
दृश्यन्ते बन्धुजीवाश्च श्यामाश्च गिरिसानुषु॥ ६२ ॥
 (पर्वतके शिखरोंपर असन, छितवन, कोविदार बन्धु-जीव तथा श्याम तमाल खिले दिखायी देते हैं॥ ६२ ॥=

अङ्गोलाश्च कुरण्टाश्च चूर्णकाः पारिभद्रकाः।
चूताः पाटलयश्चापि कोविदाराश्च पुष्पिताः॥ ८०॥ मुचुकुन्दार्जुनाश्चैव दृश्यन्ते गिरिसानुषु।

(अङ्गोल, कुरंट, चूर्णक (सेमल), पारिभद्रक (नीम या मदार), आम, पाटलि, कोविदार मुचुकुन्द (नारङ्ग) और अर्जुन नामक वृक्ष भी पर्वत-शिखरोंपर फूलोंसे लदे दिखायी देते हैं॥ ८० ॥) 

एष वै सुमहच्छ्रीमान् विटपी सम्प्रकाशते । विराजत्युज्ज्वलस्कन्धः कोविदारध्वजो रथे ॥३३॥

(विशाल शाखावाले पेड़के समान ऊँचे तथा शोभित कन्धेवाला राम रथमें कोविदार (कचनार या रक्तकाञ्चन) की ध्वजा लगाये हुए अपने पिताकी आज्ञासे उनके ही रथपर सवार होकर आ रहा है।)

हनुमत्कोविदाराण्डजेश वाणांकिताः शुभाः। चतुर्व्वपि बंधनीयाः पताकाः स्पंदनेषु हि ॥६९॥
अतः सोप्यस्थ रामस्य कोविदारध्वजः स्मृतः । बाणध्वजांकितरथमारुह्य ताटिकां वने ॥८४॥ स्थितः स्त्रीयरथे दिव्ये तस्माच्च गरुडध्वजः । शुक्लायां हि पताकायां कोविदारोऽस्ति वै शुभः ८७॥ 
चतुर्षुस्यंदनेष्येवं चत्वारः कीर्तिता ध्वजाः । कोविदारध्जो रामः श्रीरामो मार्गेण ध्वजः ॥८९॥

आकाशचुंबिनश्चित्रा इमेऽग्रे कस्य वै ध्वजाः।
हनुमत्कोविदारांडजेशबाणांकिताः शुभाः ॥३१॥

विराजत्युज्ज्वलस्कन्धः कोविदारध्वजो रथे । १८ ।
(राज्य को निष्कंटक बनाने के इच्छा से हमें मार डालने को सेना लेकर चढ़े आ रहे हैं, भरत की सेना देखकर लक्ष्मण ने कहा)

उत्तर रामचरित - 

भो भोः! सैनिकाः! जातमवलम्बनमस्माकम्।
नन्वेष त्वरितसुमन्त्रनुद्यमान-प्रोदुवल्गत्प्रजवितवाजिना रथेन। उत्खातप्रवलितकोविदारकेतुः श्रुत्वा वः प्रधनमुपैतिचन्द्रकेतुः। 
(कोई सैनिक नेपथ्य से अपने साथी सैनिकों के प्रति कहता है-) हे सैनिकों! आप लोग ध्यान दें कि सुमन्त्र के द्वारा शीघ्रताःपूर्वक हाँके जाने के कारण छलाँगें लगा-लगाकर अत्यन्त वेग से दौड़ रहे (एवं रथ में जुते हुए) घोड़ों से युक्त रथ से, ऊँची-नीची भूमि पर तीव्रगति से दौड़ (रहे रथ) के कारण हिलती हुई, कोविदार नामक वृक्ष के काष्ठ से निर्मित पताका (से युक्त रथ-) वाले, ये हमारे सेनापति चन्द्रकेतु, तुम लोगों की (लव के साथ चल रही हुई) युद्ध-वार्ता को सुनकर (यहाँ हम लोगों के) समीप आ रहे हैं।)

अपि नौ वशमागच्छेत् कोविदार-ध्वजों रणे। (रा०, अयो०, अ० ६७)
लक्ष्मण को जब भरत के आने की बात किरातों से ज्ञात होती है कि भरत अक्षौहिणी सेना लेकर चित्रकूट पर चढ़ आए है और कोशल-साम्राज्य का कोविदार भंडा चित्रकूट रहा है तो वे कोविदार-ध्वज को वश में करने की प्रबल इच्छा प्रकट करते है। 

अंबेडकर और शूद्र

#बाबा_बख्तियार की मूर्खता, धूर्तता और fanatism के कई उदाहरण मिलते हैं।
1- उनको संस्कृत नहीं आती थी फिर भी उन्होंने वेदों आदि का उद्धरण देते हुए अपनी पुस्तक #WhoWereTheShudras में यह प्रमाणित करने का प्रयास किया कि शूद्र निम्न थे। वे तो इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि शूद्र थे ही नही वे क्षत्रिय थे। 

प्रश्न यह उठता है कि शूद्र निम्न हैं यह बात किसने कही?
क्या किसी संस्कृत ग्रन्थ में ऐसा लिखा है? 
नही। 

जिस कौटिल्य को संदर्भित करते हुए उन्होंने लिखा कि शूद्र भी आर्य थे, उसी ग्रन्थ में लिखा है कि शूद्र का कर्तव्य - अपने स्वभाव के अनुकूल - सर्विस सेक्टर, इंजीनियरिंग, वास्तुकला का निर्माण, शिल्प मैन्युफैक्चरिंग, गायन वादन, फ़िल्म नाटक और नौटंकी में काम करना है। 

2- तो उनको कहाँ से यह बात पता चली कि शूद्र नीच थे? अवश्य ही मैक्समुलर और एम ए शेररिंग जैसे लोगों के द्वारा भारत के बारे में फैलाये गए अफवाह साहित्य का अध्ययन करके वे इस निर्णय पर पहुंचे होंगे। 

3- मनुस्मृति या किसी भी ग्रन्थ का दहन और वह भी बिना उसका अध्ययन किये - किस मानसिकता का परिचायक है - पागलपन या fanatism ?

4- बुद्ध की शरण मे जाने की नौटंकी करने वाले अम्बेडकर को क्या पता भी था कि बुद्ध मनु के प्रशंसकों में से एक थे। धम्म ग्रंथो में मनुषमृति के श्लोकों का वर्णन तो यही सिद्ध करता है। 

और वह यह भी सिद्ध करता है कि दलित चिंतन एक कूड़ेदान से अधिक कुछः भी नही है। ये समस्त दलित चिन्तक अम्बेडकर की तरह ही मैकाले के स्कूल से निकले " अभारतीय और मूर्ख पिछलग्गू" हैं।

प्रमाण संलग्न है - बुद्ध के धम्मपद में मनुस्मृति का किस सम्मान के साथ वर्णित किया है बुद्ध ने।

अंत में: बुद्ध राजा थे। राज्य को त्यागा था सत्य की खोज में। संसार को त्यागा था परम की खोज हेतु। 
दो कौड़िये राजनीतिज्ञ उसी बुद्ध को सन्सार में घसीट लाए। बुद्धत्व का इससे अधिक अपमान क्या हो सकता है?

....

ब्राह्मण लोग पढ़ने की कृपा अवश्य करें , और अंत तक पढ़ें , तथा कम से कम जो ब्राम्हण , ब्राह्मणत्व को मानते हो उनको यह जानकारी लेना अति आवश्यक है
         त्रेता युग में क्षत्रियों का शासन था !!
         महाभारत काल मे यादव क्षत्रियों का शासन था !!
         उसके बाद दलित-मौर्य और बौद्धो का राज था !!
         उसके बाद 600 साल मुसलमान बादशाह (अरबी लुटेरों) का राज था.......
         फिर 300 साल अंग्रेज राज था, 
         पिछले 71 वर्षों से अंबेडकर का संविधान राजकाज चला रहा है़
         लेकिन फिर भी सब पर अत्याचार ब्राह्मणों द्वारा किया गया... आश्चर्य किंतु सत्य !!
         मूर्खता की कोई सीमा नही !!
         ब्राह्मणों को गाली देना , कोसना , उन्हें कर्मकांडी , पाखंडी , लालची , भ्रष्ट, ढोंगी जैसे विशेषणों के द्वारा अपमानित करना आजकल ट्रेंड में है !
कुछ लोग ब्राह्मणों को सबक सिखाना चाहते हैं , कुछ उन्हें मंदिरों से बाहर कर देना चाहते हैं
. वगैरह-वगैरह !!
         कुछ कथित रूप से पिछड़े लोगों को लगता है कि ब्राह्मणों की वजह से ही वो 'पिछड़े' रह गये, दलितों की अपनी दलीलें हैं , कभी - कभी अन्य जातियों के लोगों के श्रीमुख से भी इस तरह की बातें सुनने को मिल जाती हैं !!
         आमतौर से ये धारणा फैलाई जा रही है कि ब्राह्मणों की वजह से समाज पिछड़ा रह गया , लोग अशिक्षित रह गये, समाज जातियों में बंट गया, देश में अंधविश्वासों को बढ़ावा मिला .. वगैरह - वगैरह !!
         आज , ऐसे सभी माननीयों को हृदय से धन्यवाद देते हुए हम आपको जवाब दे रहे हैं ... हम वैधानिक चेतावनी के साथ कि , हम किसी प्रकार की जातीय श्रेष्ठता में विश्वास नहीं रखते !!
         लेकिन आप जान लीजिये , - वो कौटिल्य , जिसने संपूर्ण मगध साम्राज्य को संकटों से मुक्ति दिलाई , देश में जनहितैषी सरकार की स्थापना कराई , भारत की सीमाओं को ईरान तक पहुंचा दिया और कालजयी ग्रन्थ
 'अर्थशास्त्र' की रचना की (जिसे आज पूरी दुनिया पढ़ रही है) वो *कौटिल्य* ब्राह्मण थे !!
          आदि शंकराचार्य जिन्होंने संपूर्ण हिंदू समाज को एकता के सूत्र में बांधने के प्रयास किये, 8वीं सदी में ही पूरे देश का भ्रमण किया , विभिन्न विचारधाराओं वाले तत्कालीन विद्वानों-मनीषियों से शास्त्रार्थ कर उन्हें हराया, देश के चार कोनों में चार मठों की स्थापना कर हर हिंदू के लिए चार धाम की यात्रा का विधान किया , जिससे आप इस देश को समझ सकें वो शंकराचार्य ब्राह्मण थे !!
         कर्नाटक के जिन लिंगायतों को कांग्रेसी हिंदूओं से अलग करना चाहतें हैं , उनके गुरु और लिंगायत के संस्थापक - बसव - भी ब्राह्मण थे !!
         भारत में सामाजिक - वैचारिक उत्थान , विभिन्न जातियों की समानता , छुआछूत - भेदभाव के खिलाफ समाज को एक करने वाले भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत रामानंद , (जो केवल "कबीर" के ही नहीं बल्कि *"संत रैदास"* के भी "गुरु" थे) ब्राह्मण थे !!
आज
दिल्ली में जिस भव्य अक्षरधाम मंदिर के दर्शन करके दलितों समेत सभी जातियों के लोग खुद को धन्य मानते हैं, उस मंदिर की स्थापना करने वाला स्वामीनारायण संप्रदाय है जिसके जनक घनश्याम पांडेय भी ब्राह्मण थे !!
         वक्त के अलग-अलग कालखंड मे 
हिंदू समाज में व्याप्त हो चुकी बुराईयों को दूर करने के लिए 'आर्य समाज' व 'ब्रह्म समाज' के रूप में जो दो बड़े आंदोलन देश में खड़े हुए , इन दोनों के ही जनक क्रमश: "स्वामी दयानंद सरस्वती व राजा राममोहन राय" ( जिन्होंने हमें सती प्रथा से मुक्ति दिलाई ) ब्राह्मण थे !
भारत में विधवा विवाह की शुरुआत कराने वाले *"ईश्वरचंद्र विद्यासागर"* भी ब्राह्मण थे,
 इन सभी संतों ने जाति - पांति , छुआछूत, भेदभाव के खिलाफ समाज को जागरुक करने में अपना जीवन खपा दिया - लेकिन समाज नहीं सुधरा !!
         भगवान श्रीराम की महिमा को ' " रामचरित मानस " ' के जरिये घर-घर में पहुंचाने वाले "तुलसीदास" और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति की लहर पैदा करने वाले वल्लभाचार्य भी ब्राह्मण थे !
 ये भी याद रखिये - मंदिरों में ब्राह्मणों का वर्चस्व था , जैसा कि आप लोग कहते हैं,फिर भी भारत में भगवान परशुराम (ब्राह्मण) के मंदिर सामान्यत: नहीं मिलते ये है ब्राह्मणों की भावना !!
         विदेशी आधिपत्य के खिलाफ सबसे पहले विद्रोह का बिगुल बजाने संन्यासियों में से अधिकांश लोग ब्राह्मण थे ,
 अंग्रेजों की तोपों के सामने सीना तानने वाले
मंगल पांडेय , रानी लक्ष्मीबाई
अंग्रेज अफसरों के लिए दहशत का पर्याय बन चुके चंद्रशेखर आजाद , फांसी के फंदे पर झूलने वाले राजगुरु - ये सभी ब्राह्मण थे !!
         वंदेमातरम जैसी कालजयी रचना से पूरे देश में देशभक्ति का ज्वार पैदा करने वाले बंकिमचंद्र चटर्जी , जन-गण-मन के रचयिता रविंद्रनाथ टैगोर ब्राह्मण , देश के पहले आईएएस (तत्कालीन ICS) सत्येंद्रनाथ टौगोर भी ब्राह्मण
 स्वतंत्रता आंदोलन के नायक गोपालकृष्ण गोखले ( गांधी जी के गुरु ), बाल गंगाधर तिलक, राजगोपालाचारी ब्राह्मण। भारत के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में स्वर्गीय " श्री अटल बिहारी वाजपेयी " भी ब्राह्मण !!
         नेहरु सरकार से त्यागपत्र देने वाले पहले मंत्री , जिन्होंने पद की बजाय जनहित के लिए संघर्ष का रास्ता चुना और कश्मीर के सवाल पर अपने प्राणों की आहुति दी - वो डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी ब्राह्मण बीजेपी के सबसे बड़े सिद्धांतकार पंडित दीनदयाल उपाध्याय हिंदू समाज की एकता , जातिविहीन समाज की स्थापना और सांस्कृतिक गौरव की पुनर्स्थापना के लिए खड़ा हुआ दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ - की नींव एक गरीब ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाले पूज्य *डॉ. हेडगेवार जी* ने डाली थी उन्होंने अपने खून का कतरा-कतरा हिंदूओं को ताकत देने और उन्हें एकसूत्र में पिरोने में खपा दिया , केवल ब्राह्मणों की चिंता नहीं की संघ के दूसरे सरसंघचालक - डॉ. गोलवलकर -जिन्होंने संपूर्ण हिंदू समाज को ताकत देने के लिए सारा जीवन समर्पित कर दिया - वो भी ब्राह्मण !!
         यही नहीं , देश में पहली कम्यूनिस्ट सरकार केरल में बनाने वाले *नंबूदरीपाद* समेत मार्क्सवादी आंदोलन के कई प्रमुख रणनीतिकार ब्राह्मण ही थे। समकालीन नेताओं की बात करें तो तमिलनाडु में *जयललिता ब्राह्मण थीं ,*
         मायावती , जिन्होंने 'तिलक-तराजू और तलावर, इनको मारो जूते चार' जैसा अपमानजनक नारा बार-बार लगवाया , उन पर जब लखनऊ के गेस्ट हाउस में सपा के गुंडों ने जानलेवा हमला किया , उन्हें मारा-पीटा, उनके कपड़े फाड़े , और शायद उनकी हत्या करने वाले थे , उस समय जान पर खेलकर उन गुंडों से लड़ने वाले और
 मायावती को सुरक्षित वहां से निकालने वाले " स्वर्गीय ब्रह्मदत्त द्विवेदी " भी ब्राह्मण थे !!
         फिर भी , जिन्हें लगता है कि ब्राह्मण केवल मंदिर में घंटा बजाना जानता है - वो ये भी जान लें कि 
भारत के इतिहास का सबसे महान घुड़सवार योद्धा और सेनानायक - जो 20 साल के अपने राजनीतिक जीवन में कभी कोई युद्ध नहीं हारा , जिसने मुस्लिम शासकों के आंतक से कराहते देश में भगवा पताकाओं को चारों दिशाओं में लहरा दिया और जिसे बाजीराव-मस्तानी फिल्म में देखकर आपने भी तालियां ठोंकी होंगी , - वो बाजीराव बल्लाल भी ब्राह्मण था !!
         तो , ब्राह्मणों को कोसने वाले इतिहास को ठीक से पढ़ लो..!!
         सभी ब्राह्मण बन्धुओं से निवेदन किया जाता है कि अपने पूर्वजों का इतिहास बच्चों को अवश्य / जरूर बताएं !!

Saturday, 22 November 2025

गलती होने पर कान क्यों पकड़ते हैं.........

गलती होने पर कान क्यों पकड़ते हैं.........

गौतम, वसिष्ठ, आपस्तंब धर्मसूत्रों और पाराशर स्मृति सहित अन्य ग्रंथों में ज्ञान की कई बातें बताई गई हैं। इन ग्रंथों में रहन-सहन के नियम और तरीकों के बारे में बताया गया है। इन ग्रंथों के अनुसार, हमारे शरीर में पंचतत्वों के अलग-अलग प्रतिनिधि अंग माने गए हैं जैसे- नाक भूमि का, जीभ जल का, आंख अग्नि का, त्वचा वायु का और कान आकाश का प्रतिनिधि अंग। 
विभिन्न कारणों से शेष सभी तत्व अपवित्र हो जाते हैं, लेकिन आकाश कभी अपवित्र नहीं होता। इसलिए ग्रंथों में कान को अधिक पवित्र माना जाता है।

1. मनु स्मृति के अनुसार, मनुष्य के नाभि के ऊपर का शरीर पवित्र है और उसके नीचे का शरीर मल- मूत्र धारण करने की वजह से अपवित्र माना गया है। यही कारण है कि शौच करते समय यज्ञोपवित (जनेऊ) को दाहिने कान पर लपेटा जाता है क्योंकि दायां कान, बाएं कान की अपेक्षा ज्यादा पवित्र माना गया है। इसलिए जब कोई व्यक्ति दीक्षा लेता है तो गुरु उसे दाहिने कान में ही गुप्त मंत्र बताते हैं, यही कारण है कि दाएं कान को बाएं की अपेक्षा ज्यादा पवित्र माना गया है।

2. गोभिल गृह्यसूत्र के अनुसार, मनुष्य के दाएं कान में वायु,चंद्रमा, इंद्र, अग्नि, मित्र तथा वरुण देवता निवास करते हैं। इसलिए इस कान को अधिक पवित्र माना गया है।

गोभिल गृह्यसूत्र का श्लोक ....
मरुत: सोम इंद्राग्नि मित्रावरिणौ तथैव च।
एते सर्वे च विप्रस्य श्रोत्रे तिष्टन्ति दक्षिणै।।

3. पराशरस्मृति के बारहवें अध्याय के 19 वें श्लोक में बताया गया है कि छींकने, थूकने, दांत के जूठे होने और मुंह से झूठी बात निकलने पर दाहिने कान का स्पर्श करना चाहिए। इससे मनुष्य की शुद्धि हो जाती है।

पराशर स्मृति का श्लोक ......

क्षुते निष्ठीवने चैव दंतोच्छिष्टे तथानृते।
पतितानां च सम्भाषे दक्षिणं श्रवणं स्पृशेत्।।

एक नए दृष्टिकोण से समझें 
कान पकड़ना का अर्थ है – बुरे काम को न करने की प्रतिज्ञा करना।

ऐसा भी कहा जाता है कि कान के मूल में जो नाड़ियाँ हैं उनका मूत्राशय और गुदा से संबंध है। दाहिने कान की नाड़ी मूत्राशय के लिए गई है और बाएँ कान की नाड़ी गुदा से संबंध है। मूत्र त्याग करते समय दाहिने कान को लपेटने से उन नाड़ियों पर दबाव पड़ता है फल स्वरूप मूत्राशय की नाड़ियाँ भी कड़ी रहती हैं। तदनुसार, बहुमूत्र, मधुमेह, प्रमेह आदि रोग नहीं होते। इसी प्रकार दाहिने कान की नाड़ियाँ दबने से काँच, भगन्दर, बवासीर आदि गुदा के रोग नहीं होते। कई सज्जन शौच जाते समय दोनों कानों पर यज्ञोपवीत चढ़ाते हैं उनका तर्क यह है कि मल त्याग के समय मूत्र विसर्जन भी होता है इसलिए दोनों कानों पर उपवीत को बढ़ाना चाहिए। 

क्षुते निष्ठीवने चैव दन्तेच्छिप्टे तथान्नृते।
पतितानाँ चसम्भायें दक्षिणं श्रवण स्पृष्येत।
पाराशर स्मृति 7। 38

अर्थात्- छींकने पर, थूकने पर, दाँतों से किसी अंग के उच्छिष्ट हो जाने पर झूठ बोलने और पाठकों के साथ संभाषण करने पर अपने दाहिने कान का स्पर्श करें।

छोटी-मोटी अशुद्धताएं कान का स्पर्श करने मात्र से दूर हो जाती हैं। कान को छूने पकड़ने या दबाने से भूल सुधारने का प्रायश्चित होने का सम्बन्ध है। बालक के कान पकड़ने का अध्यापकों का यही प्रयोजन होता है कि उसे देवत्व का और मनोबल का विकास हो। कान पर यज्ञोपवीत चढ़ाने से भी सूक्ष्म रूप से वही प्रयोजन सिद्ध होता है। इसलिए भी मलमूत्र के समय उसके कान पर चढ़ाने का विधान है।

आदित्यावसवो रुद्रा वायुरग्निश्व धर्मराट्।
विप्रस्य दक्षिणे कर्णे नित्यं निष्ठन्ति देवताः॥

शंख्यायन-
अग्निरापश्च वेदाश्च सोमः सूर्योऽनिलस्तथा।
सर्वे देवास्तु विप्रस्य कर्णे तिष्ठन्ति दक्षिणें॥

आचार मयूख-
प्रभासादीनि तीर्थानि गंगाद्या सरितस्तथा।
विप्रस्य दक्षिणे कर्णे वसन्ति मुनिरब्रवीत॥

परराशरः

उपरोक्त तीन श्लोकों में दाहिने कान का पवित्रता का वर्णन है। शांख्यायन का मत है कि आदित्य, वसु, रुद्र, वायु और अग्नि देवता विप्र-के दाहिने कान में सदा रहते हैं। आचार्य मयूखकार का कथन है अग्नि, जल, वेद, सोम, सूर्य, अनिल तथा सब देवता ब्राह्मण के दाहिने कान में निवास करते हैं। पराशर का मत है कि गंगा आदि सरिताएं तीर्थ गण दाहिने कान में निवास करते हैं। इसलिए ऐसे पवित्र अंग पर मलमूत्र त्यागते समय यज्ञोपवीत को चढ़ा लेते हैं जिससे वह अपवित्र न होने पावे।

Friday, 21 November 2025

विष्णुसहस्रनाम – वो जादुई 1000 नाम जो आपकी जिंदगी को चुपचाप बदल देते हैं!

🌟 विष्णुसहस्रनाम – वो जादुई 1000 नाम जो आपकी जिंदगी को चुपचाप बदल देते हैं!

कल्पना कीजिए... सुबह-सुबह चाय की चुस्की लेते हुए सिर्फ़ 15-20 मिनट में आप ऐसा कुछ कर लें कि पूरा दिन आपके नाम हो जाए! 
यही कमाल है विष्णुसहस्रनाम का। 1000 नाम, करीब 142 श्लोक – लेकिन इनके पीछे छिपी है अपार शक्ति जो बिना कुछ माँगे आपको सब कुछ दे देती है।
आम आदमी की जिंदगी में ये कैसे काम करता है? 
(रियल लाइफ़ उदाहरण)
नौकरी/बिज़नेस में सफलता चाहिए?
→ जो लोग रोज़ सुबह 10-15 मिनट पढ़ते हैं, उन्हें प्रमोशन, नए ऑर्डर्स या इंटरव्यू में अचानक सफलता मिलने के केस बहुत हैं। लोग कहते हैं – “पता नहीं कैसे, लेकिन क्लाइंट खुद फोन कर रहा है!”
घर में पैसों की तंगी?
→ ये स्तोत्र लक्ष्मी जी को सीधे बुलावा भेजता है। कई लोग बताते हैं कि नियमित पाठ शुरू करने के 40-50 दिन बाद अचानक रुके हुए पैसे आए, बोनस मिला या नया सोर्स ऑफ इनकम खुल गया।
बीमारी बार-बार परेशान कर रही?
→ डॉक्टर भी हैरान रह जाते हैं जब पुरानी बीमारियाँ बिना दवा कम होने लगती हैं। मानसिक तनाव, नींद न आना, चिंता – ये तो भागते ही हैं। बहुत से लोग तो हॉस्पिटल के बेड पर भी मोबाइल में लगा कर सुनते हैं और जल्दी रिकवर होते हैं।
शादी नहीं हो रही? संतान सुख चाहिए?
→ एकादशी या गुरुवार को नियम से पढ़ने वालों को अक्सर 6-11 महीने में शुभ प्रस्ताव आते देखा गया है। जो दंपत्ति संतान के लिए परेशान थे, उन्हें भी खुशखबर मिली।
बस मन शांत चाहिए?
→ शाम को 7 बजे सिर्फ़ सुन लो (यूट्यूब पर कोई भी अच्छा संस्करण चला दो), 10 मिनट में दिमाग का सारा शोर ग़ायब। घर में झगड़े कम, नींद गहरी।
सबसे आसान तरीक़े (जेब में रख लो)
सुबह नहा-धो कर 15 मिनट पढ़ लो – पूरा दिन कवच की तरह सुरक्षा
ऑफिस जाते समय गाड़ी में/ईयरफोन में सुन लो – ट्रैफिक में भी शांति
रात को सोते समय लगा दो – सुबह तरोताज़ा उठोगे
बीमार हैं या समय नहीं – बस रोज़ सुन लो, पाठ का पूरा फल मिलेगा (शास्त्र भी यही कहते हैं!)
एक छोटा सा चैलेंज
अगले 40 दिन सिर्फ़ सुन कर देखो (पाठ की भी ज़रूरत नहीं)।
90% लोग कहते हैं – “यार, ज़िंदगी में पहले कभी इतनी अच्छी फीलिंग नहीं हुई!”
तो आज से शुरू कर दो...
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पद्मनाभ पद्म

पद्मनाभ
१. पद्म-
पद्म के अर्थ-(१) कमल। (२) पद्म की तरह आभूषण, (३) कमल आकार, (४) हाथी की सूंड तथा सिर पर रंगीन चिह्न। (नैषध चरित, २२/९), (५) सैन्य ब्यूह या युद्ध का एक क्षेत्र (मनु स्मृति, ७/१८८)। रामरावण युद्ध में राम की सेना ने १८ स्थलों पर युद्ध किया था, जिसके लिए १८ पद्म-सेनापति थे। (वाल्मीकि रामायण, युद्ध काण्ड, अध्याय, २६, २७)। इसे संख्या मान कर रामचरितमानस में राम सेना के सेनापतियों की संख्या १८ पद्म कही है (सुन्दरकाण्ड, ५४/२)। (६) एक संख्या शब्द,  पर १२ शून्य (शंकरवर्मन, षड्रत्नमाला, १/५-६)- 
एकं दश च शतं चाथ सहस्रमयुतं क्रमात्। नियुतं प्रयुतं कोटिरर्बुदं वृन्दमप्यथ॥५॥ 
खर्वो निखर्वश्च महापद्मः शङ्कुश्च वारिधिः। अन्त्यं मध्यं परार्धं च संख्या दशगुणोत्तराः॥६॥ 
(७) कुबेर की नव निधियों में पद्म तथा महापद्म हैं।
महापद्मश्च पद्मश्च शङ्खो मकर-कच्छपौ।
मुकुन्द-कुन्द-नीलाश्च खर्वश्च निधयो नव॥ 
(अमरकोष, १/१/७१ के बाद व्याख्या प्रक्षेप)
नन्द वंश के प्रथम राजा को अधिक सम्पत्ति के कारण महापद्म नन्द कहते थे।
(८) सीसा (Lead) धातु, (९) शरीर के मेरु दण्ड की केन्द्रीय नाड़ी सुषुम्ना के ७ चक्र-मूलाधार (लिङ्ग-गुदा का मध्य), स्वाधिष्ठान (मेरुदण्ड का आधार), मणिपूर (नाभि), अनाहत (हृदय), विशुद्धि (कण्ठ कूप), आज्ञा (मस्तिष्क केन्द्र), सहस्रार (सिर का ऊपरी भाग)।
(१०) एक नाग जाति (महाभारत, आदि पर्व ३५/१०, ३४/१०)
(११) शरीर पर विन्दु या चिह्न।
(१२) योग का एक आसन। कामशास्त्र में भी एक आसन है।
(१३) विष्णु या राम का एक नाम। विष्णु पत्नी लक्ष्मी को भी पद्मा कहते हैं।
(१४) पद् धातु गति अर्थ में है। अतः जिस पर हम चलते हैं, वह पृथ्वी भी पद्म है। या आकाश में सृष्टि के ५ पर्वों में अन्तिम या पद है। 
पद्भ्यां भूमिः दिशः श्रोत्रात् तथा लोकान् अकल्पयन्॥१३॥ (पुरुष सूक्त, वा. यजु. ३१/१३) 
पृथ्वी के उत्तर गोल का नक्शा ४ खण्डों में बनता था, उसे भू-पद्म के ४ दल कहते थे।
भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा। पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः॥
(विष्णु पुराण, २/२/४०)
(१५) शरीर के अंग गति शील हैं। उनके सौन्दर्य की प्रशंसा के लिए भी उनको कमल, अरविन्द या पद्म कहते हैं। जैसे-चरण कमल, करकमल, कमल नयन। बाल रूप श्रीकृष्ण में सम्पूर्ण जगत् है। सृष्टि का अन्त उनका चरण है, जहां से अन्त हुआ, वहीं से नयी सृष्टि आरम्भ होती है, वह उनका मुख है, जिसमें उनके चरण हैं। सृष्टि का चक्र वट-पत्र है जिसमें उनका निवास है। (भागवत पुराण, स्कन्ध १२, अध्याय ९)। इसका सार इस स्तुति में है-
करारविन्देन पदारविन्दं, मुखारविन्दे विनिवेशयन्तः।
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं, बालं मुकुन्दं शिरसा नमामि॥ 
(१६) पद्म से सृष्टि होने के कारण एक कल्प का नाम भी पद्म है। 
पद्मावसाने प्रलये निशासुत्पोत्थितः प्रभुः ।
सत्त्वोद्रिक्तस्तदा ब्रह्मा शून्यं लोकमवैक्षत ॥३॥
(मार्कण्डेय पुराण, अध्याय ४७)
२. पद्मनाभ सृष्टि-
पद्मनाभ के २ अर्थ हैं। प्रचलित अर्थ है विष्णु या उनका जाग्रत रूप जगन्नाथ जिनकी नाभि से पद्म निकला और उससे सृष्टि का आरम्भ हुआ। पद्मनाभ का अर्थ ब्रह्मा भी है जिनका जन्म विष्णु के नाभि पद्म से हुआ, उनको पद्मज या पद्मसम्भव कहा गया है। इसका मूल अर्थ माता गर्भ में मनुष्य जन्म से है। नाभि से एक नाल निकलती है जो माता के गर्भ से पोषण प्राप्त करता है। वह नाल कमल नाल जैसा है जो मिट्टी से जल और भोजन लेकर कमल पत्र तथा फूल तक पहुंचाता है। अतिसूक्ष्म तथा विराट् रूप के विभिन्न स्तर के निर्माण में यही शब्दावली प्रयुक्त है। इस कमलनाल को उल्ब या दृश्य जगत के मूल रूप में हिरण्यगर्भ भी कहा गया है।
३. आध्यात्मिक गर्भनाल-
(१) मनुष्य के स्थूल शरीर का जन्म के समय कमल नाल से माता गर्भ में पोषण होता है। 
(२) आध्यात्मिक सूक्ष्म नाल-जन्म के बाद भी नाभि के सूक्ष्म चक्र में अष्टदल कमल द्वारा अष्टविध सिद्धियां मिलती हैं।
अग्नि पुराण, अध्याय ३७४-आध्यात्मिक नाभिकमल 
द्वादशाङ्गुलविस्तीर्णं शुद्धं विकसितं सितम्। नालमष्टाङ्गुलं तस्य नाभिकन्दसमुद्भवम्॥२०॥
पद्मपत्राष्टकं ज्ञेयमणिमादिगुणाष्टकम्। कर्णिका केशरं नालं ज्ञानवैराग्यमुत्तमम्॥२१॥
विष्णुधर्मश्च तत्कन्दमिति पद्मं विचिन्तयेत्। तद्धर्मज्ञान वैराग्यं शिवैश्वर्यमयं परम्॥२२॥
ज्ञात्वा पद्मासनं सर्वं सर्वदुःखान्तमाप्नुयात्। तत्पद्मकर्णिकामध्ये शुद्धदीपशिखाकृतिम्॥२३॥ 
अङ्गुष्ठमात्रममलं ध्यायेदोङ्कारमीश्वरम्। कदम्ब गोलकाकारं तारं रूपमिवस्थितम्॥२४॥
ध्यायेद् वा रश्मिजालेन दीप्यमानं समन्ततः। प्रधानं पुरुषातीतं स्थितं पद्मस्थमीश्वरम्॥२५॥
ध्यायेज्जपेच्च सततमोङ्कारं परमक्षरम्। मनःस्थित्यर्थमिच्छन्ति स्थूलध्यानमनुक्रमात्॥२६॥
तद्भूतं निश्चलीभूतं लभेत् सूक्ष्मेऽपि संस्थितम्। नाभिकन्दे स्थितं नालं दशाङ्गुलसमायतम्॥२७॥
(द्रष्टव्य-पुरुष सूक्त-स भूमिं विश्वतो वृत्त्वात्यत्तिष्ठद्दशाङ्गुलम्।)
नालेनाष्टदलं पद्म द्वादशाङ्गुलविस्तृतम्। सकर्णिके केसराले सूर्य्यसोमाग्निमण्डलम्॥२८॥
अग्निमण्डलमध्यस्थः शङ्खचक्रगदाधरः। पद्मी चतुर्भुजो विष्णुरथ वाष्टभुजो हरिः॥२९॥
४. कण सृष्टि-
मनुष्य से छोटे विश्व के ७ स्तर क्रमशः १-१ लाख भाग छोटे हैं-कलिल (Cell), जीव (परमाणु, बालाग्र का १०,००० भाग जो निर्माण या कल्प में नष्ट नहीं होता), जगत् (३ प्रकार के गतिशील कण, चर = Lepton, स्थाणु = Baryon, अनुपूर्व = Meson), कुण्डलिनी (परमाणु नाभि), देव-असुर (जिस प्राण से सृष्टि हुई वह देव, अनुत्पादक प्राण असुर), पितर (निर्माण अवस्था, proto-type, quark ?), ऋषि (रस्सी, मीटर का १० घात ३५ भाग, Primordial string, Plank's length).
(१) वालाग्र शत साहस्रं तस्य भागस्य भागिनः। तस्य भागस्य भागार्धं तत्क्षये तु निरञ्जनम् ॥ (ध्यानविन्दु उपनिषद् , ४)
(२) ऋषिभ्यः पितरो जाताः पितॄभ्यो देव दानवाः। देवेभ्यश्च जगत्सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वशः॥ (मनुस्मृति, ३/२०१)
(३) कलिल-सर्व धातुं कलनीकृतः, अव्यक्त विग्रहः (तस्मात् कलिलः)- (चरक संहिता, शरीरस्थान, ४/९)
वालाग्रमात्रं हृदयस्य मध्ये विश्वं देवं जातरूपं वरेण्यं (अथर्वशिर उपनिषद् ५)
अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । 
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्व पाशैः ॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ५/१३)
(४) वालाग्र शत भागस्य शतधा कल्पितस्य च ॥ 
भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ५/९)
(५) षट्चक्र निरूपण, ७-एतस्या मध्यदेशे विलसति परमाऽपूर्वा निर्वाण शक्तिः कोट्यादित्य प्रकाशां त्रिभुवन-जननी कोटिभागैकरूपा । केशाग्रातिगुह्या निरवधि विलसत .. ।९। अत्रास्ते शिशु-सूर्यकला चन्द्रस्य षोडशी शुद्धा नीरज 
सूक्ष्म-तन्तु शतधा भागैक रूपा परा ।७। (केन्द्र नाड़ी बालाग्र का कोटि भाग है। कुण्डलिनी इसका १/१०० भाग, अर्थात् मीटर का १० घात १५ भाग है)
(६) दिवा देवान् असृजत, नक्तं असुरान्, उअद् दिवा देवान् असृजत, तद् देवानां देवत्वम्। यद् असूर्यं (अनुत्पादक, सूर्य = सूयते, जन्म देता है), तद् असुराणां असुरत्वम्। (षड्विंश ब्राह्मण, ४/१)
(७) पद्मनाभ-परमाणु का केन्द्र नाभि है जिसके चारों तरफ की रचना कमल दल है। अदृश्य आकर्षण शक्ति कमल नाल है। परमाणु नाभि का भी केन्द्र हिरण्य गर्भ है और नाभि कणों की व्यवस्था कमल है। 
५. हिरण्यगर्भ नाभि- 
सृष्टि क्रिया में जो केन्द्र स्थान है, वह नाभि है। मनुष्य शरीर में पाचन का केन्द्र नाभि है, जिससे शरीर बनता है। उससे जो निर्माण होता है उसके प्रकार कमल के दल हैं। केन्द्र तथा निर्मित विश्व में दृश्य या अदृश्य सम्बन्ध कमल का नाल है।
वेद में मूल केन्द्र को नाभि तथा उसके निकट भाग को नाभनेदिष्ट कहा है। तेज रूप केन्द्र को हिरण्य, उससे बने लोक या स्थान हिरण्यकशिपु है, हिरण्मय पुरुष है, उसका मार्ग हिरण्यय है। नाभि केन्द्र से अन्य भागों का आकर्षण आदि से सम्बन्ध हिरण्यकेश है।
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे (ऋक्, १०/१२१/१)
हिरण्यं लोके अन्तरा (अथर्व सं. १०/७/२८)
हिरण्मयेन सुवृता रथेन (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३१/१/१९)
हिरण्ययः पन्थान आसन् (अथर्व सं. ५/४/५)
हिरण्याक्षः सविता देव आगात् (ऋक्, १/३५/८, वाज. सं. ३४/२४)-दृश्य निर्माता जिसके केन्द्र में हिरण्य है। उसके निर्माण साधन या अंग हिरण्य हस्त हैं-
हिरण्यहस्तं अश्विना अराणा (ऋक्, १/११७/२४)
हिरण्य केन्द्र से बनी ३ प्रकार की पृथ्वी (पृथ्वी ग्रह, सौर मण्डल, ब्रह्माण्ड) का शरीर हिरण्यकशिपु है।
हिरण्यकशिपुर्मही (अथर्व सं. ५/७/१०)
हिरण्य या उसके शरीर का आकाश या क्रिया क्षेत्र हिरण्य-प्राकारा, या हिरण्यवर्णा (लक्ष्मी) है।
हिरण्यवर्णाः परियन्ति यह्वीः (ऋक्, २/३५/९)
हिरण्यवर्णा हरिणीम्, कांसोस्मितां हिरण्यप्राकाराम्  (ऋक् खिल, श्री सूक्त, ५/८७१)
हिरण्यवर्णा जगती जगम्या (तैत्तिरीय आरण्यक, १०/४२/१)
हिरण्यप्राकारा देवि मां वर (मानव श्रौत सूत्र, २/१३/६)
६. आकाश में सृष्टि-
सृष्टि का मूल तेज-पुञ्ज था जिसे ऋग्वेद में हिरण्यगर्भ कहा गया है। पुराणों में इसे विश्व का उल्ब (गर्भनाल) कहा है। अथर्व वेद इसे सर्वाधार या स्कम्भ कहता है। प्रथम उत्पन्न रूप में यह ज्येष्ठ ब्रह्म है। 
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवीमुत द्यां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥ 
यं क्रन्दसी अवतश्चस्कभाने भियसाने रोदसी अह्वयेथाम्। यस्यासौ पन्था रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥३॥ 
यस्य द्यौरुर्वी पृथिवी च मही यस्याद उर्वऽन्तरिक्षम्। यस्यासौ सूरो विततो महित्वा कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
यस्य विश्वे हिमवन्तो महित्वा समुद्रे यस्य रसामिदाहुः। इमाश्च प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम॥ 
(ऋक् १०/१२१/१,४-६, अथर्व ४/२/३-५, ७)
=(यह अथर्व पाठ है, ऋक् पाठ थोड़ा भिन्न है, पर वही अर्थ है।) आरम्भ में केवल हिरण्यगर्भ (हिरण्य = स्वर्ण, तेज प्रकाश) था। वह भूतों का एक ही अधिपति था (भूत = उत्पन्न, ५ महाभूत = आकाश, वायु, अग्नि, अप्, पृथिवी तत्त्व)। उसने पृथिवी (पृथ्वी ग्रह, सौर मण्डल, ब्रह्माण्ड या सीमाबद्ध पिण्ड) तथा आकाश (पृथिवी सृष्टि आधार रूप में माता, उसका आकाश पिता है) को धारण किया। उस ’क’ (कर्त्ता ब्रह्म के लिए हवि (सृष्टि के लिए सामग्री) देते हैं। (१) किसी व्यक्ति की आंख से पानी निकलना रुदन है। सूर्य से तेज निकलना भी उसका रुदन है और उसका क्षेत्र रोदसी त्रिलोकी है। ब्रह्माण्ड के १०० अरब सूर्यों का मिलित रुदन क्रन्दन है तथा उसका क्षेत्र क्रन्दसी है। दोनों हिरण्यगर्भ के अधीन हैं। (२) विस्तृत द्यौ तथा मही पृथ्वी तथा सभी देव उससे उत्पन्न हैं।
सर्वाधार सूक्त, ज्येष्ठ-ब्रह्म सूक्त (अथर्व, १०/७-८)-इसमें २०० से अधिक मन्त्र हैं।
एक काल समुत्पन्नं जल बुद्बुदवच्च तत्। विशेषेभ्यो ऽण्डमभवत् बृहत्तदुदके शयम्॥३६॥
तस्मिन् कार्यस्य करणं संसिद्धिः परमेष्ठिनः। प्राकृते ऽण्डे विवृत्तः स क्षेत्रज्ञो ब्रह्म-संज्ञितः॥३७॥
स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते। आदि कर्त्ता स भूतानां ब्रह्माग्रे समवर्तत॥३८॥
यमाहुः पुरुषं हंसं प्रधानात् परतः स्थितम्। हिरण्यगर्भं कपिलं छन्दो-मूर्तिं सनातनम्॥३९॥
मेरुरुल्बमभूत्तस्य जरायुश्चापि पर्वताः। गर्भोदकं समुद्राश्च तस्यास परमात्मनः॥४०॥
(कूर्म पुराण, अध्याय, १/४)
= पहले जल जैसा फैला पदार्थ (रस, अप्) उत्पन्न हुआ जिसमें बुद्बुद् (बुलबुला) जैसी रचना से अण्ड (ब्रह्माण्ड) बने। स्रष्टा को परमेष्ठी कहा गया, उस अण्ड के ज्ञाता क्षेत्रज्ञ को ब्रह्म कहा गया। विश्व रूप शरीर या पुर वाले को पुरुष कहा गया। उसे हंस भी कहा गया (२ प्रकार की विपरीत गति-हं से सं, सं से हं-ईशावायोपनिषद्, १४ का सम्भूति-विनाश या सांख्य सूत्र, ५ का सञ्चर-प्रतिसञ्चर)। यह स्रष्टा प्रधान और सबसे परे है। यह हिरण्यगर्भ (तेजपुञ्ज), कपिल (मन्द तेज का कपिल रंग, या ’क’ = जल का पान कर सृष्टि करने वाला, यथापूर्वं अकल्पयत्-ऋक्, १०/१९०/३, पहले जैसी सृष्टि, अतं पुरुष की नकल करने वाला कपि है), छन्द-मूर्ति (स्थूल रूप मूर्ति, उसकी सीमा या आवरण छन्द है), सनातन (सदा एक समान), मेरु इसका उल्ब है-विस्तृत अप् में आकर्षण-विकिरण से पिण्डों मंर सम्बन्ध।
मूल स्रष्टा ब्रह्म है, कर्ता रूप में नर है, उससे अप् (जल जैसा विरल पदार्थ) हुआ, वह नार है। नार (अप् समुद्र) में निवास करने वाला नारायण है। निर्मित पुर (रचना) में निवास करने से वह पुरुष है। ब्रह्माण्डों के बी च परस्पर आकर्षण उल्ब (गर्भनाल, पद्म) है।
आपो नारा इति प्रोक्ता, आपो वै नरसूनवः।
ता यदस्यायनं पूर्वं तेन नारायणं स्मृतम्॥ 
(मनु स्मृति, १/१०, विष्णु पुराण, १/४/६, ब्रह्मवैवर्त्त पुराण, १/३, अग्नि पुराण, १७/७, गरुड पुराण, ३/२४/५३, ब्रह्म पुराण, १/१/३९, ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/६/६२, वराह पुराण, २/२६, वायु पुराण, ७/६४)
तत् सृष्ट्वा तदेव अनुप्राविशत्। तत् अनुप्रविश्य सत् च त्यत् च अभवत्। (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/६)
७. ब्रह्माण्ड (गैलेक्सी)-
सूर्य रूपी विष्णु के २ रूप हैं-सौर मण्डल के ताप, बायु तथा प्रकाश क्षेत्र विष्णु के ३ पद या विक्रम हैं। ब्रह्माण्ड की सीमा तक वह विन्दु रूप में दीखता है (सूर्य सिद्धान्त, १२/९०)। इस सूर्यों के समूह को विष्णु का परम पद या महाविष्णु कहते हैं।
इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्॥१७॥
तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः॥२०॥ (ऋक्, १/२२/१७, २०) 
ब्रह्माण्ड सबसे बड़ी ईंट है, अतः इसे परमेष्ठी कहा गया है। इसका निर्माण स्थल कूर्म है, जो ब्रह्माण्ड का १० गुणा है। अतः पुराण में इसे गोलोक और ब्रह्माण्ड को महाविष्णु रूप विराट् बालक कहा गया है।
अथाण्डं तु जलेऽतिष्टद्यावद्वै ब्रह्मणो वयः॥१॥ 
तन्मध्ये शिशुरेकश्च शतकोटिरविप्रभः॥२॥ स्थूलात्स्थूलतमः सोऽपि नाम्ना देवो महाविराट्॥४॥ 
तत ऊर्ध्वे च वैकुण्ठो ब्रह्माण्डाद् बहिरेव सः॥९॥
तदूर्ध्वे गोलकश्चैव पञ्चाशत् कोटियोजनात्॥१०॥नित्यौ गोलोक वैकुण्ठौसत्यौ शश्वदकृत्रिमौ॥१६॥
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृति खण्ड, अध्याय ३)
स यत् कूर्मो नाम-एतद्वै रूपं कृत्वा प्रजापतिः प्रजा असृजत । यदसृजत-अकरोत्-तत् । यदकरोत्-तस्मात् कूर्मः। कश्यपो वै कूर्मः । तस्मादाहुः-सर्वाः प्रजाः काश्यप्यः-इति । (शतपथ ब्राह्मण, ७/५/१/५)
मानेन तस्य कूर्मस्य कथयामि प्रयत्नतः । 
शङ्कोः शत सहस्राणि (१ पर १८ शून्य) योजनानि वपुः स्थितम् ॥ (नरपति जयचर्या, स्वरोदय, कूर्मचक्र)
ब्रह्माण्ड का आकार परार्द्ध (१ पर १७ शून्य) योजन कहा है-ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।
छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ (कठोपनिषद्, १/३/१) = कूर्म का आकार १०० हजार शङ्कु (१० घात १३) योजन है। यहां पृथ्वी व्यास का १००० भाग योजन है। उससे कोटि x कोटि = १० घात १४ गुणा बड़ा अर्थात् १० घात १७ योजन का ब्रह्माण्ड है। उसका १० गुणा बड़ा कूर्म है। इसी कूर्म में ब्रह्माण्ड रूपी महा-पृथ्वी घूम रही है।
महाविष्णु (ब्रह्माण्ड) गोलोक रूपी समुद्र में हैं, वह ब्रह्माण्डों के परस्पर आकर्षण या अनन्त शेष पर स्थित है। उनकी नाभि या केन्द्र की सूर्य परिक्रमा कर रहा है। केन्द्र से सूर्य की दूरी ३०,००० प्रकाश वर्ष कही गयी है।
अस्य मूलदेशे त्रिंशयोजन (यहां योजन = प्रकाश वर्ष) सहस्रान्तर आस्ते या वैकला भगवतस्तामसी समाख्यातानन्त इति सात्वतीया द्रष्टृर्दृश्ययोः सङ्कर्षणमित्याचक्षते। यस्येदं क्षितिमण्डलं भगवतो अनन्त मूर्तेः सहस्र शिरस एकस्मिन्नेव शीर्षणि ध्रियमाणं सिद्धार्थ इव लक्ष्यते॥२॥ (भागवत पुराण, ५/२५/१, २)
आकृष्णेन रजसा वर्तमानो, निवेशयन् अमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन्॥ 
(ऋग्वेद, १/३५/२, वाज यजु, ३३/४३, तैत्तिरीय सं, ३/४/११/२) 
यहां सूर्य के २ रूप हैं- वह अपने प्रकाशित मार्ग (हिरण्यय) पर ब्रह्माण्ड केन्द्र के आकर्षण से उसकी परिक्रमा कर रहा है। यह केन्द्र कृष्ण (कृष्ण विवर) है।
८. सौर मण्डल में पृथ्वी-
ब्रह्माण्ड अप् का समुद्र है। आकाशगंगा की सर्पाकार भुजा अहिर्बुध्न्य है जिसे पुराण में शेषनाग कहा गया है। इस भुजा में जहां सूर्य स्थित है, वहां भुजा की मोटाई के बराबर गोल महर्लोक है जिसका आकार ४३ अहर्गण अर्थात् पृथ्वी व्यास का २ घात ४० गुणा है। इसमें प्रायः १००० तारा हैं जिनको पुराण में शेष के १००० सिर कहा गया है। इनमें एक सिर हमारा सूर्य है, जिसके क्षेत्र में पृथ्वी सूक्ष्म विन्दु मात्र है।
ब्रह्माण्ड का घूर्णन अक्ष शिवलिङ्ग है, उसे सर्पाकार भुजा घेरे हुए है। अतः अहिर्बुध्न्य शिव का भी नाम है। इसे  पुराण में शेषनाग कहा है। 
तद्यदब्रवीत् (ब्रह्म) आभिर्वा अहमिदं सर्वमाप्स्यामि यदिदं किंचेति तस्मादापोऽभवंस्तदपामप्त्वमाप्नोति वै स सर्वान् कामान्यान्कामयते । (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/२)
जिस क्षेत्र में जल बन्धाहै, वह बुध्न है। बुध्न का अहि (सर्प) अहिर्बुध्न्य है।
नीचीनाः स्थुरुपरि बुध्न एषाम्। (ऋक्, १/२४/७)
अब्जां उक्थैः अहिं गृणीषे, बुध्ने नदीनां रजःसु षीदन्॥१६॥
मा नो अहिर्बुध्न्यो रिषे धान्मा यज्हो अस्य स्रिधदृतायोः॥१७॥
(ऋक्, ७/३४/१६, १७, निरुक्त, १०/४१, ४४)
सहस्र धारा-राजा सिन्ध्य़्नां पवते दिवः ऋतस्य याति पथिभिः। (ऋक्, ९/८६/३३)
सहस्रधारः शतवाज इन्दुः (ऋक्, ९/११०/१०)
सहस्रधारा के ७ भाग-सप्त प्रवत आ दिवम् (ऋक्, ९/५४/२)
इस शेष में सौर-मण्डल विष्णु है। उसका केन्द्र सूर्य पिण्ड उसकी नाभि है। उस नाभि के आकर्षण या कमल-नाल से पृथ्वी बन्धी है, जो मर्त्य ब्रह्मा है।
विष्णु के नाभि पद्म से ब्रह्मा का जन्म कहा है। पृथ्वी को भी पद्म रूप ही कहा है, जिसके केसर पर्वत रूप हैं। पृथ्वी पुनः विष्णु के उदर में लीन होती है। पद्म रूप पृथ्वी को बहु-योजन या सहस्रवर्ण कहा है। इसका एक अर्थ है कि पृथ्वी व्यास के १/१००० भाग (= १२.८ कि.मी.) को योजन माना गया है। पुराणों में पृथ्वी से दृष्ट ग्रह कक्षाओं को पृथ्वी के द्वीपों का नाम दिया गया है एवं उनके आकार इसी योजन में हैं।
पद्मपुराण, सृष्टि खण्ड, अध्याय ३४-
द्यौः स चन्द्रार्कनक्षत्रा सपर्वतमहीद्रुमाः। सलिलार्णव संमग्नं त्रैलोक्यं सचराचरम्॥१०५॥
एकमेव सदा ह्यासीत्सर्व मेकमिवाम्बरम्। पुनर्भूः सह लक्ष्म्या च विष्णोर्जठरमाविशत्॥१०६॥
तानि गृह्य महातेजाः प्रविश्य सलिलार्णवे। सुप्त्वा वारिकृतात्मा च बहुवर्ष शतानि च॥१०७॥
विष्णौ सुप्ते ततो ब्रह्मा विवेश जठरं ततः। बहुस्रोतं च तं ज्ञात्वा महायोगी समाविशत्॥१०८॥
नाभ्यां विष्णोः समुत्पन्नं पद्मं हेमविभूषितम्। स तु निर्गम्य वै ब्रह्मा योगी भूत्वा महाप्रभुः॥१०९॥
सिसृक्षुः पृथिवीं वायुं पर्वतांश्च महीरुहान्। तदन्तरा प्रजाः सर्वा मनुष्यांश्च सरीसृपान्॥११०॥
अध्याय ३९-पद्मनाभ्युद्भवं चैकं समुपादितवांस्ततः। सहस्रवर्णं विरजं भास्कराभं हिरण्मयम्॥१५३॥
अध्याय ४०-पुलस्त्य उवाच
अथ योगवतां श्रेष्ठमसृजद् भूरिवर्चसम्। स्रष्टारं सर्वलोकानां ब्रह्माणं सर्वतोमुखम्॥१॥
तस्मिन् हिरण्मये पद्मे बहु योजन विस्तृते। सर्व तेजो गुणमये पार्थिवैर्लक्षणैर्वृते॥२॥
तच्च पद्म पुरा भूतं पृथिवीरूपमुत्तमम्। नारायण समुद्भूतं प्रवदन्ति महर्षयः॥३॥
यत् पद्मं सार सा देवी पृथिवी परिकथ्यते। ये पद्मकेसरा मुख्यास्तान्दिव्यान् पर्वतान् विदुः॥४॥ 
हिमवन्तं च नीलं च मेरुं निषधमेव च। कैलासं शृङ्गवन्तं च तथाद्रिं गन्धमादनम्॥५॥
९. भौगोलिक पद्मनाभ-
गोल पृथ्वी सतह का चित्र समतल कागज पर नहीं हो सकता। अतः उत्तरी गोलार्ध के ४ पादों को भूपद्म का ४ दल कहा गया है। नक्शा बनाने के लिये इन दलों को खोल कर उनका प्रतिरूप काल्पनिक चौकोर मेरु सतह पर बनाते हैं, जो वर्ग आधार पर पिरामिड है। इसके वर्ग आधार की रेखायें विषुव वृत्त को बाहर से स्पर्श करती हैं। इस काल्पनिक मेरु की ऊंचाई १ लाख योजन है। 
जम्बूद्वीपो द्वीपमध्ये तन्मध्ये मेरुरुच्छ्रितः। चतुरशीतिसाहस्रो भूयिष्ठः षोडशाद्रिराट्॥३॥
द्वात्रिंशन् मूर्ध्नि विस्तारात् षोडशाधः सहस्रवान्। भूयस्तस्यास्य शैलोऽसौ कर्णिकाकार संस्थितः॥४॥
(अग्नि पुराण, अध्याय १०८)
सूर्य सिद्धान्त (१२/३४-३६) के अनुसार पृथ्वी का घूर्णन अक्ष के उत्तर दिशा में मेरु या सुमेरु है, दक्षिण दिशा में कुमेरु है। ये सतह पर हैं। पर इसका आकार १ लाख योजन कहा है, जो १००० योजन पृथ्वी व्यास का १०० गुणा है। यह पृथ्वी के गुरुत्व क्षेत्र की सीमा है। पृथ्वी कक्षा में इस आकार के वृत्त को सौर मण्डल का जम्बू द्वीप कहा है (विष्णु पुराण, २/४/२, भागवत पुराण, ५/१६/५ आदि)। पृथ्वी सतह का जम्बू द्वीप न वृत्ताकार है, न पृथ्वी आकार का १०० गुणा है। पृथ्वी का गुरुत्व क्षेत्र त्रिज्या की १०० गुणा दूरी तक है। 
उत्तर के ४ पादों का समतल नक्शा काल्पनिक मेरु (पिरामिड) के ४ त्रिकोण पृष्ठों पर विक्षेप से बनता था। इसका आधार विषुव वृत्त पर चतुर्भुज था जिसकी एक भुजा के मध्य में लंका थी। इनके ४ रंग कहे गये हैं। आज तक नक्शा में ४ रंगों का ही प्रयोग होता है। इसका सामान्य गणितीय प्रमाण आज तक नहीं मिला है, पर कम्प्यूटर द्वारा १० लाख से अधिक विकल्पों की जांच से यह सही प्रमाणित हुआ है। 
चातुर्वर्ण्यस्तु सौवर्णो मेरुश्चोल्बमयः स्मृतः॥१२॥
नाभीबन्धनसम्भूतो ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः। पूर्वतः श्वेतवर्णस्तु ब्राह्मण्यं तस्य तेन वै॥१४॥
पीतश्च दक्षिणेनासौ तेन वैश्यत्वमिष्यते ।भृङ्गिपत्रनिभश्चैव पश्चिमेन समन्वितः॥१५॥
पार्श्वमुत्तरतस्तस्य रक्तवर्णं स्वभावतः। तेनास्य क्षत्रभावः स्यादिति वर्णाः प्रकीर्तिताः॥१६(मत्स्य पुराण, अध्याय, ११३)
ध्रुव के निकट गोल भूखण्ड का आकार बढ़ता जाता है, जैसे ग्रीनलैण्ड भारत से छोटा है, पर नक्शे में बड़ा दीखता है। उत्तर ध्रुव जल में है (स्थल से घिरा है), अतः वहां कोई समस्या नहीं है। दक्षिणी ध्रुव स्थल भाग में है, अतः इसका आकार अनन्त हो जायेगा, अतः इसे अनन्त द्वीप कहते थे। इसका नक्शा अलग से बनता था। इसके २ भूखण्ड प्रायः जुड़े हुए थे। अतः इसे यम (यमल = जुड़वां) द्वीप भी कहते थे, तथा यम दक्षिण का स्वामी है।
स्वर्मेरु-स्थल मध्ये नरको बडवा-मुखं च जल-मध्ये (आर्यभटीय, ४/१२)
मेरुः स्थित उत्तरतो दक्षिणतो दैत्यनिलयः स्यात्॥३॥
एते जल-स्थला मेरुः  स्थलगो ऽसुरालयो जलगः। 
(लल्ल का शिष्यधीवृद्धिद तन्त्र, अध्याय १७)
दक्षिण दिशा को नक्शे में नीचा दिखाते हैं, अतः अनन्त को पातालों के भी नीचे कहा है जिसके ऊपर पृथ्वी है। 
पातालानामधस्श्चास्ते विष्णोर्या तामसी तनुः। 
शेषाख्या यद्गुणान्वक्तुं न शक्ता दैत्य दानवाः॥ (विष्णु पुराण, २/५/१३)
इसके सबसे निकट के द्वीप को पुष्कर (दक्षिण अमेरिका) कहा है, जो ब्रह्मा का निवास था।
त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत। मूर्ध्नो विश्वस्य वाधतः॥१३॥
तमुत्वा दध्यङ्गृषिः पुत्र ईधे अथर्वणः। वृत्रहणं पुरन्दरम्॥१४॥ (ऋक्, ६/१६)
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम्। 
तस्मिन्निवसति ब्रह्मा पूज्यमानः सुरासुरैः॥(विष्णु पुराण, २/२/८५, ब्रह्माण्ड पुराण, ८/८/७)
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे पद्मवत् तेन स स्मृतः (मत्स्य पुराण, १२३/३९) अपरमेरु का देश पेरु है। यहां हिमालय के शिव-पार्वती जैसे मेरु-मू देव हैं। हायु मरका पर्वत पर अमारु मेरु की ७ मीटर ऊंची विशाल मूर्ति तथा प्राचीन विशाल भवन हैं। इसका स्थान १६०१२’५१.६२" दक्षिण तथा ६९०३०’२१.२८" पश्चिम है। इसके निकट कैलास के मानसरोवर जैसा टीटीकाका झील है। 
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे तत्रत्यैः सनमस्कृतः॥१४०॥
महादेवः पूज्यते तु ब्रह्मा त्रिभुवनेश्वरः। तस्मिन्निवसति ब्रह्मा साध्यः सार्द्धं प्रजापतिः॥१४१॥
(ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/१९/१४०-१४१, वायु पुराण, ४९/१३५-१३६)
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे पद्मवत् तेन स स्मृतः।
पूज्यते स महादेवैर्ब्रह्मांशोऽव्यक्त सम्भवः॥ (मत्स्य पुराण, १२३/३९) 
महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय ३४८ में मनुष्य रूप में अन्य ७  ब्रह्मा का वर्णन है-
१. मुख्य (नारायण के मुख से)-वैखानस को उपदेश, 
२. नेत्र से-सोम को उपदेश, उनसे रुद्र, वालखिल्यों को, 
३. वाणी से-इसे शान्ति पर्व ३४९/४९ में वाणी का पुत्र अपान्तरतमा कहा है, उनके माता पिता के लिये वाणी-हिरण्यगर्भाय नमः यज्ञ में पाठ होता है।
४. आदि कृत युग में (श्लोक ३४) कर्ण से ब्रह्मा की उत्पत्ति-आरण्यक, रहस्य. और संग्रह सहित वेद क्रम से स्वारोचिष मनु, शंखपद, दिक्पाल, सुवर्णाभ को उपदेश।
५. आदि कृत युग में (श्लोक ४१) नासिका से ब्रह्मा की उत्पत्ति- क्रम से वीरण, रैभ्य मुनि, दिक्पाल कुक्षि को उपदेश।
६. अण्डज ब्रह्मा (शान्ति पर्व ३४९/१७ में भी)-से बर्हिषद् मुनि, ज्येष्ठसामव्रती हरि, राजा अविकम्पन को उपदेश।
७. पद्मनाभ ब्रह्मा से दक्ष, विवस्वान्, वैवस्वत मनु, इक्ष्वाकु को उपदेश। यह सम्भवतः मणिपुर के निकट हिमालय के पूर्व भाग में थे। उनके नाम पर त्रिविष्टप् का पूर्व भाग ब्रह्म विटप (ब्रह्मपुत्र नदी का स्रोत क्षेत्र), ब्रह्मपुत्र, ब्रह्म देश (बर्मा, अभी म्याम्मार = महा + अमर) हैं।
कश्यप को भी ब्रह्मा कहा गया है। इनके समय अदिति के पुनर्वसु नक्षत्र में संवत्सर का अन्त तथा आरम्भ होता था-अदितिर्जातम्, अदितिर्जनित्वम् (शान्ति पाठ, ऋक्, १/८९/९०, अथर्व, ७/६/१, वाज. यजु, २५/२३)। यह प्रायः १७.५०० ईपू. में था।
१०. भारत का पद्मनाभ-
पृथ्वी का दक्षिणी छोर अनन्त द्वीप है। अतः भारत के दक्षिणी नहर को तिरु (श्री)-अनन्तपुरम् (अंग्रेजी में त्रिवेन्द्रम्) कहा गया है।तः यहां पद्मनाभ मन्दिर है। पृथ्वी के पुष्कर द्वीप में अपर-मेरु (अमेरु) था। इससे उसका नाम अमेरिका हुआ। इसकी विपरीत दिशा में पुष्कर उज्जैन से १२ अंश पश्चिम था (विष्णु पुराण, २/८/२८, मत्स्य पुराण, १२४/४०)। अभी इसे बुखारा कहते हैं (उजबेकिस्तान में)। तृतीय पुष्कर इन्द्रप्रस्थ का पुष्कर है, जो राजस्थान में है।
स्कन्द पुराण, अध्याय (६/१७९/५४) के अनुसार ३ पुष्कर हैं-
ज्येष्ठ-पुष्कर द्वीप में न्यग्रोध नामक स्थान के निकट।
मध्य-उज्जैन के १२ अंश पश्चिम उजबेकिस्तान का बुखारा।
कनीयक-अजयमेरु (अजमेर) का पुष्कर जहां सरस्वती धारा बहती थी।
३ पुष्कर के अन्य उल्लेख हैं-(पद्म पुराण, १/१५/१५१, १/१९-२०, अग्नि पुराण, २११/८, स्कन्द पुराण, ६/४५, १७९)-उज्जैन से १२ अंश पश्चिम का पुष्कर (विष्णु पुराण, २/८/२८), इन्द्रप्रस्थ पुष्कर (अजमेर, आबू पर्वत, पद्म पुराण, १/२० आदि) 
विश्व सभ्यता के केन्द्र रूप में भारत को अजनाभ वर्ष कहते थे। इसके शासक को जम्बूद्वीप के राजा अग्नीध्र (स्वयम्भू मनु पुत्र प्रियव्रत की सन्तान) का पुत्र नाभि कहा गया है।
विष्णु पुराण, खण्ड २, अध्याय १-जम्बूद्वीपेश्वरो यस्तु आग्नीध्रो मुनिसत्तम॥१५॥
पित्रा दत्तं हिमाह्वं तु वर्षं नाभेस्तु दक्षिणम्॥१८॥
इसका नाभि कमल पूर्वोत्तर भाग का मणिपुर है, जिसके बाद ब्रह्मा का ब्रह्म देश (बर्मा, या अब म्याम्मार) है।

Wednesday, 19 November 2025

स्त्री

स्त्री— केवल एक शरीर नहीं, एक गूढ़ चेतना है,जो जितना दिखती है,उससे कहीं अधिक गहराई में बहती है. समाज ने उसे अक्सर समझने की कोशिश तो की, परंतु शायद कभी पूरी तरह समझा नहीं. 
जितना हम उसे देखते हैं, उतना ही कम लगता है कि हम उसे जानते हैं. यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी गहरे समुद्र को सतह से देखकर उसकी गहराई का अनुमान लगाना.
स्त्री को अक्सर एक 'रहस्य' कहा गया, लेकिन वह रहस्य नहीं, बल्कि एक खुली किताब है जिसे पढ़ने के लिए नज़र चाहिए, नीयत चाहिए और सबसे ज़्यादा चाहिए समझ.

जब कोई स्त्री किसी पुरुष से या किसी भी अपने प्रिय से प्रेम करती है, तो वह सिर्फ प्रेम नहीं देती — वह समय देती है, सम्मान देती है, और साथ ही साथ सहयोग भी. वह सिर्फ पाने की इच्छा नहीं रखती; वह देने का सामर्थ्य रखती है और तब यह भी पता चलता है कि स्त्रियों के पास भी ‘ट्रांसपोर्ट मनी’ होती है, वे आपको भी सरप्राइज़ दे सकती हैं, वे बातचीत शुरू कर सकती हैं और उसे बनाए भी रख सकती हैं.
लेकिन यह सब तब दिखता है, जब आप ऐसी स्त्री को समझने लगते हैं जो खुद को साबित करने की ज़रूरत नहीं समझती — जो आपके साथ रहकर किसी एहसान का भाव नहीं रखती, बल्कि आपको अपना मानती है.
वह स्त्री न तो आपके ऊपर निर्भर होती है, न ही आप पर हावी. वह समानांतर चलने वाली वह ऊर्जा होती है, जो आपके साथ चलती है — न आगे, न पीछे.

दुर्भाग्य यह है कि बहुत से लोग ऐसी स्त्रियों को पहचान नहीं पाते. वे उन्हें सीमाओं में बाँधते हैं, उन्हें सिर्फ एक भूमिका में देखते हैं: प्रेमिका, पत्नी, माँ, बहन… लेकिन वह हर भूमिका में पूरी होती है, और फिर भी किसी एक में सीमित नहीं.

जो लोग ऐसी स्त्रियों के संपर्क में आते हैं, जो सच में प्रेम करती हैं, वे समझते हैं कि प्रेम में बराबरी होती है — एहसान नहीं. वे समझते हैं कि स्त्री को ‘रखा’ नहीं जाता, वह ‘साथ’ रखी जाती है.

स्त्री कोई रहस्य नहीं, वह एक सच है और जब कोई उसे समझने का प्रयास करता है, तो वह स्वयं को खोलती है — बातों में, भावनाओं में, ख़ामोशियों में और छोटे-छोटे उस प्यार भरे ख्याल में जो आपके लिए रखती है.

उस स्त्री को जानिए — जो आपकी बातें सुनती है, आपको जवाब देती है, आपकी थकान पढ़ लेती है और कभी-कभी आपके हिस्से का आकाश भी थाम लेती है.

🪢❤️🪢❤️🪢❤️🪢

#रजतपुष्प🍀 #रजतमंथन

Monday, 17 November 2025

प्रेम

मनुष्य के जीवन में कुछ अनुभूतियाँ शब्दों से परे होती हैं. जैसे सुबह की पहली किरण का चेहरा छू जाना, या ठंडी हवा में किसी अपने की साँसों का एहसास। ऐसी ही एक अनुभूति है — प्रेम❤️

यह वाक्य सिर्फ प्रेम नहीं, बल्कि दो आत्माओं के बीच बहती उस सूक्ष्म चेतना की गवाही है.
जहाँ रिश्ते सिर्फ नाम नहीं होते बल्कि भावनाओं की एक नदी होते हैं, जो अपने आप में पवित्र होती है.

प्रकृति में हर तत्व का संतुलन है दिन और रात, अग्नि और जल, ध्वनि और मौन। स्त्री और पुरुष भी इसी संतुलन की दो परछाइयाँ हैं.
स्त्री, जो प्रेम की सौम्यता है, कोमलता है, संवेदना है और पुरुष, जो विश्वास है, स्थिरता है, दिशा है.
जब ये दो अस्तित्व एक-दूसरे के समीप आते हैं, तो कोई दावेदारी नहीं होती बस एक मौन सहमति होती है कि "मैं तुम्हें समझना चाहता हूँ, वैसे ही जैसे तुम हो.” 

प्रेम तब तक अधूरा है, जब तक उसमें विश्वास न हो.
विश्वास गणित का कोई समीकरण नहीं होता जिसे हल किया जा सके. यह तो एक प्रमेय की तरह होता है जिसे बार-बार जीकर सिद्ध करना पड़ता है.
जब कोई कहता है "तुम मेरे विश्वास का प्रमेय हो," तो वह यह स्वीकार करता है कि उसने हर संशय, हर डर, हर टूटन के पार जाकर एक चेहरे में अपनी आत्मा की शांति देखी है.
प्रेम कोई तात्कालिक आवेग नहीं, वह तो एक प्रयोगशाला है, जहाँ हर दिन भावनाएँ नए रूप लेती हैं 
कभी ईर्ष्या में, कभी समर्पण में, कभी ख़ामोशी में और कभी उत्सव में.
और इस हर प्रयोग का अगर कोई खूबसूरत परिणाम है, तो वह है "हम".
'मैं' और 'तुम' की सीमाएँ मिटाकर जो एक सामूहिक चेतना बनती है, वहीं प्रेम की पूर्णता है.

रिश्ते किसी बंधन की तरह नहीं होते, बल्कि नदी की तरह होते हैं. वो बहते हैं शांत भी, उग्र भी.
कभी अपने किनारे खुद बनाते हैं, तो कभी तोड़ देते हैं पुराने तटबंध. लेकिन उनका मूल स्वभाव बहना है, रुकना नहीं.

जब हम किसी को अपनी "ख़ुशी की परिकल्पना" कहते हैं, तो हम केवल कह नहीं रहे होते हम समर्पित कर रहे होते हैं खुद को उस भावना के बहाव में, जहाँ प्रेम, विश्वास, और मौन तीनों मिलकर एक ऐसा संगीत रचते हैं, जिसे सिर्फ आत्मा ही सुन सकती है.

इस संसार में बहुत कुछ ज़ोर से कहा जाता है लेकिन जो सबसे ज़्यादा सच्चा होता है, वह अक्सर धीमे से कहा जाता है, कभी-कभी तो बस आँखों से.
प्रेम में भी यही होता है. वहाँ नाटक नहीं होता, वहाँ स्थिरता होती है.
जैसे सूर्य रोज़ उगता है, बिना शोर के.

तुम मेरी ख़ुशी की परिकल्पना हो...
क्योंकि जब तुम हो, तो जीवन केवल जीना नहीं होता वह एक अर्थ बन जाता है 

Sunday, 16 November 2025

शूद्र

#शूद्र_वर्ण__तीनों_वर्णों_जातियों_की_आत्मा____है
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Tribhuwan Singh #शूद्र_दलित_पीड़ित_सम्बोधन_कब_हुआ ,इसके दो पहलू हैं:     
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ऋग्वेद मे लिखा है - ब्राम्हण्म मुखम आसीत ..... शूद्रह अजायत । अर्थात परंब्रम्ह की जिह्वा है ब्रामहण । यानि जो तपस्या (रेसेर्च ) से जो मांनव कल्याण हेतु जो मंत्र खोजे जाते है , उसी को जिह्वा से जगत मे प्रचारित प्रसारित करने वाले को ही ब्रामहण कहते हैं ।
दूसरी बात उस परम्ब्रंह की उपासना जब कोई करता है तो उसके चरण को ही प्रणाम कर चरणामृत लेता है , उसके मुह की उपासना नहीं न करता।

कौटिल्य ने लिखा - स्वधर्मों शूद्रस्य द्विजस्य सुश्रुषा वार्ता कारकुशीलव कर्मम च ।अर्थात सर्विस सैक्टर , मैनुफेक्चुरिंग ,एंजिनियरिंग, पशुपालन, खनिजदोहन और व्यापार की शिक्षा मे पारंगत होना ही शूद्र कर्म का हिस्सा है। यही वार्ता का अंग है।

अब इसमे कहीं भी किसी वर्ण विशेष को एक दूसरे से श्रेष्ठ घोसित नहीं किया गया है ।जैसे आज कार्यपालिका न्यायपालिका प्रशासन एक दूसरे से श्रेष्ठ नहीं एक दूसरे के पूरक हैं।

वर्ण व्यवस्था परस्पर पोषक और एक दूसरे पर निर्भर संस्था थी न कि ऊंच नीच आधारित।

जिस देश मे सर्वे भवन्तु सुखिनः, और वसुधैव कुटुम्बकम का उद्घोष मंत्र रचे गए हों, वहां जन्मजात श्रेष्ठता की बार करना, निश्चित तौर पर उस संस्कृति पर आक्रान्ता संस्कृति का आरोपण मात्र हो सकता है।

धरमपाल जी ने अपनी पुस्तक The Beautiful Tree में 1830 का अंग्रेजों द्वारा संकलित एक डाटा दिया है जिसमे स्कूल जाने वाले शूद्र छत्रों की संख्या ब्रामहणो से चार गुणी थी। और वे स्कूल ब्राम्हणों द्वारा प्रायः निशुल्क चलाये जाते थे, जिन्हें गुरुकुल कहते थे। 

तवेर्निएर 340 साल पहले कहता है कि शूद्र पदाति योद्धा थे , और उसने या अन्य किसी यात्री ने अछूत लोगों का जिक्र तक नहीं करता।

गणेश सखाराम देउसकर 1904 मे लिखते हैं कि 1875 से 1900 के बीच मे 2.5 करोड़ भारतीय अन्नाभाव मे भूख से प्राण त्याग देते हैं , ऐसा इस लिए नहीं हुआ था कि अन्न की कमी रही हो , ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अन्न खरीदने का उनकी जेब मे (बेरोजगारी के कारण) पैसा नहीं था। 

Will Durant 1930 मे The case for India मे, और J Sunderland  "India in Bondage" में यही बात लिखते हैं कि 19 वे शताब्दी में 2.5 से 5 करोड़ लोग अन्न के अभाव से भूंख से इसलिए मर जाते है क़ि देश की मैन्युफैक्चरिंग शक्ति बेरोजगार हो जाती है , और उसके पास अन्न खरीदने का पैसा नही था।

दोनों ही लेखको ने गनेश देउसकर के कथन की पुष्टि किया है। विल दुरान्त  लिखता है : 
 "बेरोजगारी दूर करने हेतु लोग शहरों की ओर भागे कुछ लोगों को मिलों और खदानों मे काम मिल गया , बाकी बचे लोगों मे जो सौभाग्यशाली थे, उनको गोरों का मैला उठाने का काम मिल गया। क्योंकि अगर गुलाम इतने सस्ते हों तो सौचालय बनवाने का झंझट कौन पाले"?

किसी भी देश मे सरकारी तंत्र द्वारा प्रायोजित ये आज तक का सबसे बड़ा जेनोसाइड है।
लेकिन 1946 में डॉ अंबेडकर लिखते हैं कि ऋग्वेद का पुरुषशूक्त एक क्षेपक है जो ब्रांहनों ने एक शाजिस के तहत बाद मे उसमे घुशेडा है , इसीलिए 20 वीं शताब्दी में अपार जनमानस की हालत दरिद्रों जैसी हो गई है जिसको शुद्र अतिशूद्र या अछूत कहते है । जो आज घृणित जीवन जीने को हजारो साल से मजबूर है ।
तथ्यों पर विश्वास किया जाय कि किसी के मनोमस्तिस्क के कल्पना की उड़ान पर ?
आइये इसकी जांच पड़ताल करें ।
"शूद्र एक घृणित" सम्बोधन कब हुआ ?
इसके दो पहलू हैं। 
(1 ) डॉ बुचनन ने 1807 में प्रकाशित ,अपनी पुस्तक में ये जिक्र किया है:
"..बंटर्स शूद्र थे , जो अपनी पवित्र वंशज से उत्पत्ति बताते हैं"।
देखिये बताने वालों के शब्दों में एक आत्म सम्मान और गर्व का पुट है।
अर्थात 1800 के आस पास तक शूद्र कुल में उत्पन्न होना , उतना ही सम्मानित था , जितना तथाकथित द्विज वर्ग ।इसके अलावा 1500 से 1800 के बीच के ढेर सारे यात्रा वित्रांत हैं ,जो यही बात बोलते हैं ..अगर आप कहेंगे तो उनको भी क्वोट कर दूंगा। फिर धूम फिर कर सुई वापस भारत के आर्थिक इतिहास पर आ जाता है।
1900 आते आते भारत के सकल घरेलु उत्पाद में 1750 की तुलना में 1200 प्रतिशत की घटोत्तरी हुई । 700 प्रतिशत लोग जो घरेलू उत्पाद के प्रोडूसर थे , उनके सर से छत और तन से कपडे छीन लिए गए और उनका परिवार भुखमरी और भिखारीपन की कगार पर पहुँच गया ।
अब उन्ही पवित्र शूद्रों के वंशजों की स्थिति अंग्रेजों के भारत के आर्थिक दोहन और घरेलू उद्योगों को विनष्ट किए जाने के कारण 150 सालों में upside डाउन हो गयी । अगर छ सात पीढ़ियों में शूद्र "रिचेस to रुग्स " की स्थिति में पहुँच गया , तो उसके प्रति भौतिक कारणों से समाज का दृष्टिकोण भी बदल गया।
जब एक अपर जनसमूह जिसकी रोजी रोटी का आधार हजारों साल से --"शुश्रूषा वार्ता कारकुशीलव कर्म च " के अनुसार मैनुफेक्चुरिंग करके जीवन यापन करना था , और जो भारत के आर्थिक जीडीपी की रीढ़ था , बेघर बेरोजगार होकर दरिद्रता की स्थिति मे जीवन बसर करने को मजबूर हुआ।
यही वर्ग हजारों सालों से भारत के अर्थजगत की रीढ़ हुआ करती थी । समाज में भौतिकता की प्रवृत्ति मैकाले के शिक्षा प्रभाव से बढ़ रही थी , और आध्यात्मिकता का ह्रास हो रहा था।
एक सोसिओलोगिस्ट प्रोफेसर John Campbell ओमान ने अपनी पुस्तक "Brahmans theism एंड Musalmaans " में लिखा .."कि ब्रम्हविद्या और पावर्टी ( अपरिग्रह ,,और गांधी के भेष भूसा ,,को कोई ब्रिटिश - पावर्टी ही मानेगा ) का सम्मान जिस तरह ख़त्म हो रहा है ,बहुत जल्दी वो समय आएगा जब भारत के लोग धन की पूजा ,पश्चिमी देश की तरह ही करेंगे।"

निश्चित तौर पर वह उस भारतीय समाज की बात कर रहा था जो मैकाले की शिक्षा से संस्कारित हो चुका था।
तो ऐसे सामजिक उथल पुथल में ये तबका सम्मानित तो नहीं ही रह जाएगा , घृणित ही समझा जाएगा । ये तो सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की देन है। 

(2) शूद्र शब्द दुबारा तब घृणित हुआ जब इस बेरोजगार बेघर हुए तबके को को बाइबिल के फ्रेमवर्क में फिट किया गया।
बाइबिल के अनुसार जेनेसिस (ओल्ड टेस्टामेंट ) में ये वर्णन है ,( Genesis 5:32-10:1New International Version (NIV) ) नूह Noah की उम्र 500 थी और उसके तीन पुत्र थे Shem, Ham and Japheth.। गॉड ने देखा की जिन मनुष्यों को उसने पैदा किया था, उनकी लडकिया खूबसूरत हैं और वे जिससे मन करता है उसी से शादी कर लेती हैं ,।गॉड ने ये भी देखा की मनुस्य दुष्ट हो गया है ,तो उसने महाप्रलय लाकर मनुष्यों को ख़त्म करने का निर्णय लिया । लेकिन नूह सत्चरित्र और नेक इंसान था तो , गॉड ने नूह से कहा कि सारे जीवों का एक जोड़ा लेकर नाव में बैठकर निकल जाओ,जिससे दुबारा दुनिया बसाया जा सके । जब महाप्रलय ख़त्म हुवा ,और धरती सूख गयी, तो नूह ने अंगूर की खेती की ,और उसकी वाइन (शराब ) बनाकर पीकर मदहोश हो गया ,और नंग धडंग होकर टेंट में गिर पड़ा । उसको Ham ने इस हालत में देखा तो बाहर जाकर अपने 2 अन्य भाइयों को बताया।
तो Shem, और Japheth.ने मुहं दूसरी तरफ घुमाकर कपडे से नूह को ढक दिया, और नूह को नंगा नहीं देखा ।
यानि सिर्फ Ham ने नूह को नंगा देखा ।जब शराब का नशा उतरा तो सारी बात नूह को पता चली तो उसने Ham को श्राप दिया की तुम्हारी आने वाली संतानें Shem, और Japheth.की आने वाली संतानों की गुलाम बनकर रहेंगी।
क्रिस्चियन धर्म गुरु और च्रिस्तिअनों ने इस जेनेसिस में वर्णित घटना को लेटर एंड स्पिरिट में पूरी दुनिया में लागू किया । बाइबिल में , टावर ऑफ़ बेबल ये भी वर्णन है , की गॉड ने नूह की संतानों से कहा की सारी दुनिया में फ़ैल जाओ ।
Monotheism वाले रिलिजन की एक बड़ी समस्या है की वे अपने ही रिलिजन को सच्चा रिलिजन मानते हैं ,और बाकियों को असत्य धर्म।
ईसाई धर्म गुरुओं ओरिजन (१८५-२५४ CE ) और गोल्डनबर्ग ने नूह के श्राप की आधार पर Ham के वंशजों को , को गुलामी और और उनके चमड़ी के काले रंग को नूह के श्राप से जोड़कर उसे रिलिजियस सैंक्टिटी दिलाया ।
काले रंग को उन्होंने अवर्ण,(discolored ) के नाम से सम्बोधित किया । उनकों घटिया , संस्कृति का वाहक और गुलामी के योग्य घोषित किया। 

जहाँ भी क्रिस्चियन गए ,और जिन देशों पर कब्ज़ा किया ,वहां के लोगो को चमड़ी रंग के आधार पर काले discolored लोगों को Hamites की संज्ञा से नवाजा।
ईसाइयत में नूह के श्राप के कारन Hamites असभ्य ,बर्बर और शासित होने योग्य बताया।

यही आजमाया हुवा नुस्का उन्होंने भारत पर भी आरोपित किया ।बाहर से आये कल्पित आर्य गोरे रंग के यानि द्विज सवर्ण, और यहाँ के मूल निवासी जिनको द्रविड़ शूद्र अछूत अतिशूद्र ,काले यानि अवर्ण। अर्थात बाइबिल के अनुसार Ham की संताने ,जो अनंत काल की गुलामी में झुलसने को मजबूर ,यानि "घृणित शूद्र " यानि डॉ आंबेडकर के शब्दों में "menial जॉब " करने को मजबूर।

अर्थात कौटिल्य के अनुसार शूद्रों कुछ धर्म --"शुश्रूषा वार्ता कारकुशीलव कर्म च ।" से गिरकर ...आंबेडकर जी के शब्दों में शूद्रों का धर्म (कर्तव्य ) --" "menial जॉब " में बदल जाता है 1750 से 1946 आते आते।

शुश्रूषा या परिचर्या को जब् बाइबिल में खोजा गया तो वहां एक शब्द मिला #Servitude और servile यानि हैम के वंशज जो Perpetual Slavery के लिए शापित थे ।
तभी से #शूद्र शब्द को घृणित यानि मेनिअल जॉब वाला वर्ग मान लिया ।
इन डकैतों द्वारा प्रायोजित सरकारी नरसंहार और अछूत बनाये गए लोगों की तस्वीरें देखें।
सारी फोटुएं देखिये।
जिनके मन में इस बात की पीड़ा क्रोध और हीन भाव है कि उनके पूर्वजो का छुवा कोई खाता नहीं था, उनको ये समझ नही आता कि जो इस स्थिति में भी नही थे कि अपने इन मासूम बच्चों के मुहं में रोटी का टुकडॉ भी डाल सकें वे किसी दूसरे को अपने हाँथ का छुवा खिलाते और पिलाते क्या?

छुआछूत की शुरुवात 19वीं शताब्दी में शुरू हुयी, जब संक्रामक रोगों के कारण करोड़ो भारतीय मौत के मुंह में समाने लगे। विल दुरान्त के अनुसार आज से 100 वर्ष पूर्व 1918 में इन्फ्लूएंजा से 12.5 करोड़ लोग प्रभावित हुए, जिनमें से 1.25 करोड़ भारतीयों की मृत्यु हो गयी। यह छुआछूत नहीं था वरण - शौच की अपनायी गयी प्रक्रिया थी - जिसे आज 100 साल बाद वैज्ञानिक विधि माना जा रहा है। #कोविड19 इसका उदाहरण है। आज इसे हाइजीन, सैनिटेशन और सोशल distancing कहते हैं। करोड़ो और अरबों रुपयों के sanitizer बेंचे गए एक साल में। 
लेकिन अनेक कारणों से इसकी दुर्व्याख्या किया अंग्रेजो ने और उनके चमचों ने। उदाहरण स्वरूप किसी भी संस्कृत ग्रन्थ में अछूत शब्द नहीं मिलता। मिले तो दिखाओ। दूसरी बात अछूत untouchable की हिंदीबाजी है। लेकिन एक शब्द उन्होंने ख़ोजा Touchable - उसकी हिंदीबाजी किस शब्द में किया गया मुझे आज तक नहीं पता चला। 

लेकिन अफवाहजनक साहित्य के सृजन के कारण इनका माइंड सेट ऐसा निर्मित हो चुका है कि जिन्होंने इनके पूर्वजो का जेनोसाइड किया। आज वे उसी  मैकाले का ये बर्थडे मनाते हैं और सरस्वती जी के स्थान पर अंग्रेजी की पूजा कर रहे हैं।