Saturday, 29 August 2026

तुलसीदास ने राम मंदिर का जिक्र नहीं किया

आज मुझे बहुत सारे लोग कहते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास जी को अकबर ने बुलाया और उन्होंने जाने से इंकार कर दिया। लेकिन जिन जागीरदार, जिन जमींदारों के पास गोस्वामी तुलसीदास जी रहते थे, जिसमें बनारस में एक बहुत बड़ा नाम था राजा टोडरमल का। यह भूमिहार जमींदार थे भाई साहब।

इनके वंश के ही कुछ लोग बाद में काशी, जो यह काशी का जो राजाओं का परिवार है, इसी वंश से बना भाई साहब। काशी राजवंश ठाकुरों का नहीं है, ब्राह्मणों का है। जानता हूं, जानता हूं।

भूमिहारों का है। भाई साहब खुद राजा, ये टोडरमल के यहां रहते थे। और यह राजा टोडरमल वो नहीं जो नवरत्नों में जिसकी गिनती होती थी। यह दूसरे राजा टोडरमल हैं। और भाई साहब राजा टोडरमल अकबर के गुलाम थे, गुलाम।

पक्की बात, तो उस काल में और उनके धन पर पलने के कारण, गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने पूरे जीवन में इस्लाम के बारे में, इस्लाम के अत्याचारों के बारे में, जो अत्याचार उनके माता पिता पर हुए, उसके बारे में, जो नि-निर्संक हत्याकांड राम जन्मभूमि पर हुआ, उसके बारे में कहीं भी एक शब्द नहीं लिखा।

और कहीं इधर उधर दो चार लाइनें लिख दी हो भाई साहब स्पष्ट सी, तो मैं उसकी चर्चा तो नहीं करता। क्योंकि कुछ लोगों ने मुझे दो चार लाइनें बताई कि भैया तुलसीदास जी की लिखी हुई है, उसमें पीड़ा तो है, लेकिन सत्य संदेश कुछ भी नहीं है।

और भाई साहब, अकबर के, संभवतः अकबर के समय में ही दिल्ली में संतों की एक बहुत बड़ी सभा हुई और उस सभा में धर्मादेश दिया गया। वह धर्मादेश था दिल्लीश्वरोवा जगदीश्वरोवा। जो दिल्ली का अधिपति है, वही हमारा भगवान है।

और यह धर्मादेश किसी मुसलमान ने नहीं, हमारे बड़े बड़े संतों ने इकट्ठे होकर दिया। और उस समय दिल्ली इन अरब के लुटेरों के पास थी। अरब के भी नहीं, टर्की के। अरब तो भाई slightly थोड़े दिनों में समाप्त हो गए थे।

बाद में तो यह जिहाद का सारा ठेका ये टर्киयों ने ले लिया, टर्की के लुटेरों ने ले लिया था। जो अरब के लुटेरों से भी ज्यादा जाहिल और ज्यादा निर्दयी थे। आज भी हमारे कथावाचक, हमारे धर्माचार्य उसी परंपरा का पालन कर रहे हैं।

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