आदि काल के 2 दौर समझिए -
### 1. वैदिक काल (1500 BC - 500 BC) - तब स्त्रियाँ गुरुकुल जाती थीं
उस समय दो प्रकार की विद्यार्थिनी होती थीं -
*क) ब्रह्मवादिनी -* जो आजीवन ब्रह्म-विद्या पढ़ती थीं, विवाह नहीं करती थीं। ये ऋषि ही बन जाती थीं।
- *लोपामुद्रा, घोषा, अपाला, विश्ववारा* - इन्होंने ऋग्वेद के सूक्त लिखे हैं। ऋषिका हैं।
- *गार्गी, मैत्रेयी* - जनक के दरबार में याज्ञवल्क्य जैसे ऋषियों से शास्त्रार्थ करती थीं।
*ख) सद्योवधू -* जो 15-16 साल तक गुरुकुल / आचार्य के आश्रम में पढ़ती थीं, फिर विवाह कर गृहस्थ बनती थीं।
तब उपनयन संस्कार लड़के-लड़की दोनों का होता था। अथर्ववेद कहता है - _"ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्"_ - ब्रह्मचर्य से ही कन्या योग्य पति पाती है।
### 2. उत्तर वैदिक और स्मृति काल (500 BC के बाद) - तब व्यवस्था बदली
जब गुरुकुल घर से बहुत दूर जंगलों में चले गए, और समाज में बाल-विवाह, बाहरी आक्रमण शुरू हुए, तब लड़कियों को दूर भेजना असुरक्षित माना गया। तब से -
*स्त्रियों की शिक्षा के 3 केंद्र बने -*
*1. घर ही पहला गुरुकुल -*
माता, पिता, भाई ही गुरु होते थे। मनु ने लिखा है - माता 1000 पिताओं से बड़ी आचार्य है। लड़की को पाकशास्त्र, आयुर्वेद, संगीत, गणित, धर्मशास्त्र माँ सिखाती थी। पिता वेदांग।
*2. अंतःपुर की शिक्षा -*
राजघरानों और श्रेष्ठी परिवारों में आचार्य घर आकर पढ़ाते थे। इसे अंतःपुर-शिक्षा कहते थे। कालिदास के नाटकों में शकुंतला, मालविका सब पढ़ी-लिखी हैं।
*3. पति ही गुरु -*
विवाह के बाद पति को गुरु माना गया। याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को घर में ही ब्रह्मज्ञान दिया। यही परम्परा बाद में "पति ही पत्नी का गुरुकुल है" बन गई।
*4. कन्या गुरुकुल भी थे -*
पूरी तरह बंद नहीं थे। जैन और बौद्ध काल में भिक्षुणी संघ थे, जहाँ स्त्रियाँ रहकर पढ़ती थीं। विजयनगर साम्राज्य में कन्या पाठशालाओं के शिलालेख मिलते हैं।
तो सार यह है - वैदिक आदि काल में स्त्रियाँ गुरुकुल जाती थीं, बराबरी से वेद रचती थीं। बाद में सुरक्षा और सामाजिक कारणों से शिक्षा का स्थान गुरुकुल से घर में शिफ्ट हो गया, शिक्षा बंद नहीं हुई, उसका रूप बदल गया।
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