उस काल में सीसा पिघलाने के लिए धातु-कर्मी (metalsmith) और विशेष भट्टी चाहिए। क्या प्रत्येक ग्राम में यह व्यवस्था होती थी?
क्या जब भी कोई शूद्र वेद-श्रवण करता तब तुरन्त सीसा पिघलाने की व्यवस्था होती थी?
सीसे की तरल अवस्था कैसे बनाए रखी जाती थी?
सीसे का गलनांक (Melting Point) 327.5 डिग्री सेल्सियस है। अर्थात् इसे पिघलाने के लिए इतना तापमान चाहिए।मानव शरीर का सामान्य तापमान 37 डिग्री सेल्सियस है।कान की नलिका (Ear Canal) की लम्बाई लगभग 25-35 मिलीमीटर और व्यास लगभग 7-9 मिलीमीटर है।
सीसे को 327 डिग्री से ऊपर रखना और उसे कान तक ले जाना — यह प्रक्रिया अत्यन्त जटिल है। कोई भी धातु-पात्र जिसमें इसे लाया जाए, वह स्वयं अत्यन्त गर्म होगा।
कोई भी व्यक्ति इस प्रक्रिया में सहयोग कैसे कर पाता होगा । उसे पकड़ा कैसे जाता होगा।
यदि यह दण्ड नियमित रूप से दिया जाता तो
इसके साक्ष्य होते। धातु-कर्मियों का उल्लेख होता। दण्ड-प्रक्रिया का विवरण होता। पीड़ितों के नाम होते। कोई अभिलेख नहीं, कोई दरबारी इतिहास नहीं, कोई यात्रा-वृत्तान्त नहीं जो यह कहे कि किसी विशेष व्यक्ति के कानों में पिघला सीसा डाला गया।
क्या ऐलूष ऋषि के कानों में यह सीसा पड़ा जिनके बारे में ऐतरेय ब्राह्मण (2.19) में स्पष्ट उल्लेख है कि ये दासी के पुत्र थे, पिता जुआरी और निम्न चरित्र के थे, जिन्होंने ऋग्वेद पर शोध किया और ऋषियों ने इन्हें आचार्य-पद दिया?
क्या वत्स ऋषि के कानों में यह सीसा पड़ा जिनके बारे मे ऐतरेय ब्राह्मण (2.19) में उल्लेख है कि ये शूद्र से उत्पन्न हुए और ऋषि बने?
ये सत्यकाम के कानों में सीसा गिराया गया क्या?
या कुक्षीवत के?
या महीदास के?
या पैजवन के ?
या मातंग ऋषि के?
या गृत्समद के?
या वीतहव्य के?
या गृत्संमति के?
ये सब तो वेदपरायण शूद्र ऋषि थे। इनके कान कैसे सुरक्षित रह गये?
ये विदुर कैसे ऋषितुल्य हो गये?
क्या मध्यकाल के इतने सारे शूद्र संतों के कानों में सीसा पड़ा जो वेदमार्ग नहीं छोड़ने के लिए इतने प्रतिबद्ध थे? वेद धर्म छोडूं नहीं चाहे गले चले कटार।
ऐतिहासिक स्तर पर जिसके क्रियान्वयन का एक भी साक्ष्य नहीं, Narratological स्तर पर जो दण्ड नियमित रूप से दिया जाना बताया जा रहा उसके कोई precise details नहीं, न पीड़ितों के नाम, न स्थान, न काल, न प्रक्रिया, भौतिकी के स्तर पर जिसकी प्रक्रिया इतनी जटिल और अव्यावहारिक है कि नियमित दण्ड के रूप में जिसका उपयोग असम्भव था।
और शूद्र को वेद-श्रवण से स्थायी रूप से वंचित करना ही उद्देश्य होताअर्थात् कानों को बहरा करना तो इसके लिए पिघला सीसा जैसा अत्यन्त जटिल, महँगा, दुर्लभ और अव्यावहारिक उपाय क्यों बताया जाता?
यदि लक्ष्य केवल बहरापन था तो उस काल में क्या सरल उपाय जैसे तेज आवाज़, कान में नुकीली वस्तु, ठंडा पानी अत्यधिक मात्रा में, कुछ वनस्पतियाँ आदि क्या उपलब्ध नहीं थे? इनमें से कोई भी विधान में क्यों नहीं है।
और यदि उद्देश्य ज्ञान से वंचित करना था, तो उसके लिए बहरा बनाना कभी भी पर्याप्त नहीं होता। बहरा व्यक्ति भी देख सकता है, पढ़ सकता है, स्मृति रख सकता है।
यहाँ तो महाकाव्यों को सुनने पर जैसे अन्य वर्णों की फलश्रुति है वैसे शूद्र की।
यह कहीं ऐसा तो नहीं था कि जैसे मि श न री अपने यूरोप की हत्यारी सचाई जिसमें देशी भाषा में बाइबिल लिखने पर मृत्युदंड था और जिसके ढेरों उदाहरण हैं, छुपाने के लिए हमारे दो ग्रंथों में ऐसे प्रक्षेप करवा दिए? खुद जिनके यहाँ ज्ञान का उत्पादन और संरक्षण पूरी तरह चर्च के हाथ में था, जहाँ Scriptorium (मठों में लिखाई-कक्ष) में केवल चर्च भिक्षु ही पांडुलिपियाँ नकल करते थे, जहाँ छपाई मशीन (Gutenberg, 1440s) आने के बाद चर्च ने Imprimatur ("छापने की अनुमति") की व्यवस्था बनाई कि बिना चर्च की मुहर के कोई किताब नहीं छप सकती थी- उन्होंने भारत के ब्राह्मणों को अपनी छवि में वैसे ही गढ़ा जैसे उनके हिसाब से गॉड ने आदमी को अपनी छवि में गढ़ा था?
क्योंकि हमारे यहाँ तो ‘विद्या बाँटने से बढ़ती है’ की मान्यता है-अपूर्वः कोऽपि कोशोऽयं विद्यते तव भारति। व्ययतो वृद्धिमायाति क्षयमायाति सञ्चयात्॥"कि हे सरस्वती माता! आपका विद्या रूपी खजाना अद्भुत है, जो व्यय (खर्च/बांटने) करने से बढ़ता है और संचय (इकट्ठा/छिपाकर रखने) करने से कम होता है।
इसलिए पेटेंट और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स के विचार भारत में जन्मे ही नहीं।
मुझमें उनमें फर्क इतना ही है। उनका हमारे पुराणों में भरोसा नहीं। मेरा अंग्रेजों और उनके पिट्ठुओं द्वारा गढ़े गये मिथकों में भरोसा नहीं।
कोलंबिया यूनिवर्सिटी से ग़लतफहमी शुरू हुई तो उसे ले उड़े भाई। स्वयं मनुस्मृति पढ़ने की ज़हमत न उठाई गई।
यह तो आम्बेडकर ने Annihilation of Caste में लिखा — "मनुस्मृति शूद्र के लिए जीभ काटने या कानों में पिघला सीसा डालने जैसे भारी दण्ड निर्धारित करती है।" - That is why the Manu-Smriti prescribes such heavy sentences as cutting off the tongue, or pouring of molten lead in the ears, of the Shudra who recites or hears the Veda.” यह लिखा उन्होंने। वास्तव में मनुस्मृति में ऐसा कोई दण्ड विधान नहीं है। उन्होंने यह Columbia University के एक शैक्षणिक स्रोत से उद्धृत किया। फिर उन्होंने महाड सम्मेलन ( 1927) में घोषणा की कि मनुस्मृति — जो शूद्रों के वेद सुनने या पढ़ने पर कानों में पिघला सीसा डालने का निर्देश देती है — को सार्वजनिक रूप से जला दिया जाए। तब शशरबुधे, राजभोज और थोराट ने प्रस्ताव पास करवाया: “The Manusmriti which directed molten lead to be poured into the ears of such Shudras as would hear or read the Vedas… be publicly burnt.”
@highlight