“हर पीढ़ी अपनी एक अलग भाषा गढ़ती है। जनरेशन-ज़ी की भाषा संयोग से ऐसी है जिसमें गालियाँ हैं, तीखा व्यंग्य है, और इस तरह बोलने के लिए किसी से अनुमति लेने में उसे तनिक भी रुचि नहीं है। जंतर-मंतर के पोस्टर, इंस्टाग्राम की रीलें और शिक्षा मंत्री के आवास के बाहर लगे प्लेकार्ड भारतीय विरोध-प्रदर्शनों की उस पुरानी परंपरा जैसे नहीं थे, जो गंभीर नैतिक आग्रह और संयमित भाषा के लिए जानी जाती थी।
वे अधिक किसी ग्रुप-चैट की तरह दिखाई देते थे—गाली-गलौज से भरे, अश्लील, बेतुके और उल्लासपूर्वक मर्यादा-भंजक। और ठीक यही उनकी मंशा भी थी। उनका उद्देश्य उन्हीं लोगों को आहत करना था जिन्हें वे आहत करना चाहते थे— ….उस परिवेश से जुड़े स्वयंभू 'संस्कारी' आस्थावानों को, और उन 'भक्तों' को जिनके लिए नेता के प्रति श्रद्धा लगभग एक नागरिक धर्म का रूप ले चुकी है।
यह आहत करना कोई रणनीतिक भूल नहीं थी; बल्कि यही पूरी रणनीति का केंद्र था। वास्तव में, इस आंदोलन की सफलता के कारणों में इसे भी गिना जाना चाहिए। क्योंकि जब किसी ऐसी सत्ता के विरुद्ध, जिसे पवित्र या अछूत मान लिया गया हो, जान-बूझकर अश्लीलता और अभद्रता का प्रयोग किया जाता है, तो उसकी राजनीतिक उपयोगिता का इतिहास कहीं अधिक पुराना और कहीं अधिक सफल रहा है, जितना कि तथाकथित शालीन और सम्मानजनक टिप्पणीकार स्वीकार करने को तैयार होते हैं।”
यह स्टैंड पहली दृष्टि में आकर्षक और आधुनिक प्रतीत होता है, परन्तु इसके भीतर कई दार्शनिक, समाजशास्त्रीय और तार्किक भ्रम छिपे हुए हैं।
सबसे पहला भ्रम यह है कि यह ध्यान आकर्षित करने (attention) और विश्वास अर्जित करने (persuasion) को एक ही चीज़ मान लेता है। अश्लीलता, व्यंग्य और गाली निश्चित रूप से लोगों का ध्यान खींच सकती हैं; वे समाचारों की सुर्खियाँ बन सकती हैं, सोशल मीडिया पर वायरल हो सकती हैं। किन्तु किसी बात का अधिक दिखाई देना इस बात का प्रमाण नहीं है कि उसने लोगों के विचार भी बदल दिए। लोकतंत्र में किसी आंदोलन की वास्तविक सफलता केवल अपने समर्थकों का मनोरंजन करने में नहीं, बल्कि उन लोगों को भी अपने पक्ष में लाने में है जो अभी तक निर्णय की स्थिति में नहीं हैं। गाली इस कार्य में प्रायः बाधा बनती है, साधन नहीं।
दूसरा भ्रम यह है कि लेखक पीढ़ीगत भाषा (Generational Slang) और लोकतांत्रिक राजनीतिक भाषा के बीच का अंतर मिटा देता है। यह सत्य है कि प्रत्येक पीढ़ी अपनी अलग शब्दावली गढ़ती है। किन्तु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि वही भाषा सार्वजनिक विमर्श और राजनीतिक संघर्ष की आदर्श भाषा भी है। घर, मित्र-मंडली और ग्रुप चैट की भाषा तथा संसद, न्यायालय, विश्वविद्यालय और जनांदोलन की भाषा का उद्देश्य अलग-अलग होता है। निजी संवाद में जो स्वीकार्य है, वह सार्वजनिक संस्कृति का मानक नहीं बन जाता। "Gen-Z ऐसे बोलती है"—यह एक समाजशास्त्रीय तथ्य हो सकता है; किन्तु "अतः राजनीति भी ऐसी ही बोले"—यह निष्कर्ष तार्किक रूप से नहीं निकलता। यह 'जो है' (is) से 'जो होना चाहिए' (ought) निकालने की त्रुटि है।
तीसरा भ्रम यह है कि यह अपमान को साहस का पर्याय बना देता है। सत्ता से असहमति व्यक्त करना और सत्ता को गाली देना दो अलग-अलग बातें हैं। इतिहास के सबसे प्रभावशाली प्रतिरोध—महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, नेल्सन मंडेला—इसलिए सफल नहीं हुए कि वे अपने विरोधियों को सबसे तीखी गालियाँ देते थे। उनकी शक्ति इस बात में थी कि वे प्रतिरोध करते हुए भी अपनी नैतिक ऊँचाई बनाए रखते थे। नैतिक अधिकार (moral authority) अक्सर भाषा के संयम से जन्म लेता है, भाषा के विघटन से नहीं।
चौथा भ्रम इतिहास का चयनात्मक पाठ (Selective Reading) है। लेखक कहता है कि अश्लीलता का राजनीति में एक लंबा और सफल इतिहास रहा है। यदि यह सत्य है, तो उतना ही सत्य यह भी है कि गरिमा, संयम और नैतिक अनुशासन का इतिहास उससे कहीं अधिक लंबा और कहीं अधिक स्थायी है। भारत का स्वतंत्रता आंदोलन, अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन, दक्षिण अफ्रीका का रंगभेद-विरोधी संघर्ष—इनकी विजय का आधार सार्वजनिक मर्यादा, नैतिक विश्वसनीयता और तर्कपूर्ण संवाद था, न कि अश्लीलता। इतिहास में मसखरे भी रहे हैं और महात्मा भी; केवल मसखरों को चुन लेना इतिहास नहीं, इतिहास का संपादित संस्करण है।
पाँचवाँ भ्रम यह है कि लेखक पवित्रता (Sacredness) और सत्ता (Power) को एक ही वस्तु मान लेता है। निस्संदेह, अनेक बार सत्ता स्वयं को पवित्र घोषित कर आलोचना से बचना चाहती है। परन्तु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि समाज में जो कुछ भी किसी के लिए पवित्र है, उसका अपमान राजनीतिक सद्गुण बन जाता है। लोकतंत्र का अर्थ पवित्रताओं का विनाश नहीं, बल्कि पवित्रताओं के बीच सह-अस्तित्व है। यदि प्रत्येक समूह दूसरे की आस्थाओं को अपमानित करने लगे, तो अंततः राजनीति विचारों का संघर्ष न रहकर घृणा का प्रतियोगिता-मंच बन जाएगी।
छठा भ्रम मनोविज्ञान से जुड़ा है। लेखक मानकर चलता है कि किसी नेता या विचारधारा का अपमान उसके समर्थकों को कमजोर कर देगा। सामाजिक मनोविज्ञान इसके विपरीत अनेक उदाहरण प्रस्तुत करता है। जब किसी समूह की पहचान पर सार्वजनिक आक्रमण होता है, तो वह समूह प्रायः और अधिक संगठित हो जाता है। अपमान विरोधियों को तोड़ने से अधिक, उन्हें एकजुट भी कर सकता है। इस दृष्टि से गाली हमेशा राजनीतिक अस्त्र नहीं होती; अनेक बार वह विरोधी पक्ष के लिए सबसे प्रभावी प्रचार-सामग्री बन जाती है।
सातवाँ भ्रम यह है कि लेखक आहत कर देने (offence) को ही सफलता का प्रमाण मान लेता है। यदि किसी आंदोलन का उद्देश्य केवल विरोधी को क्रोधित करना रह जाए, तो वह आंदोलन धीरे-धीरे लोकतांत्रिक संवाद से हटकर नाटकीय प्रदर्शन (performance) में बदल जाता है। राजनीति का अंतिम लक्ष्य प्रतिद्वंद्वी को चिढ़ाना नहीं, समाज को बदलना है। समाज परिवर्तन तर्क, संगठन, नेतृत्व, धैर्य और विश्वसनीयता से होता है; केवल उत्तेजना से नहीं।
सबसे गहरी आपत्ति इस तर्क के दार्शनिक आधार पर है। यह मान लिया गया है कि क्योंकि कभी-कभी सत्ता पवित्रता का आवरण ओढ़ लेती है, इसलिए पवित्रता स्वयं संदेहास्पद है और उसका उपहास करना लोकतांत्रिक कर्तव्य है। यह निष्कर्ष अत्यंत खतरनाक है। किसी भी सभ्यता की स्थिरता केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि कुछ साझा मर्यादाओं से भी निर्मित होती है। लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि किसी के प्रति श्रद्धा असंभव हो जाए; लोकतंत्र का अर्थ केवल इतना है कि श्रद्धा आलोचना से ऊपर नहीं है। आलोचना आवश्यक है, परन्तु आलोचना और अवमानना समानार्थी नहीं हैं।
वास्तव में किसी भी लोकतांत्रिक संस्कृति की परिपक्वता इस बात से नहीं मापी जाती कि वह कितनी निर्भीक गालियाँ दे सकती है, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह कितनी तीखी असहमति को भी भाषा की गरिमा के भीतर व्यक्त कर सकती है। भाषा केवल विचारों का वाहन नहीं होती; वह समाज के संस्कारों का भी दर्पण होती है। जिस दिन राजनीति का सबसे प्रभावी अस्त्र तर्क के स्थान पर गाली बन जाए, उस दिन केवल भाषा ही नहीं, लोकतंत्र भी निर्धन हो जाता है।
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