"#राजा_राममोहन_रॉय को 31वर्ष की उम्र में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने पेरोल (नौकरी) पर रखा। उसने अपना कैरियर क्लर्क के रूप में शुरू किया, और उत्तरी बंगाल के मुर्शिदाबाद अपीलेट कोर्ट के रजिस्ट्रार थॉमस वुडफोर्ड के प्राइवेट क्लर्क (मुंशी) के पद पर पदोन्नति पाया। अंततः उसे ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा दी गई "राजा" की उपाधि मिली। उसने विलियम केरी से सांठगांठ किया, और उसको ब्रिटिश द्वारा ब्रिटिश भारत में "भारतीयों" के लिए शिक्षा तंत्र के सुधारक के रूप में प्रचारित किया गया। बौद्धिक वेश्याएं प्रत्येक स्थान पर हैं। इस तरह "बंगाल माफिया" ब्रिटिश इंडिया में सांठगांठ करने वाले अन्य लोगों से बाजी मार लिया"।
: प्रदोष अईच
यह लेख उद्धृत है प्रदोष aich द्वारा 2015 में लिखी गई एक रिसर्च पुस्तक "TRUTHS" में। पेज 407
इसलिए लिखा गया है कि लोगों को आज भी भ्रम है कि राम मोहन राय कोई राजा थे।
समाज सुधारक थे।
पुस्तक की स्नैप शॉट भी है।
इस पुस्तक ने विलियम जोन्स, मैक्समूलर मैकाले आदि समस्त फ्रॉडेस्टर का भांडा फोड़ किया है।
राजा राम मोहन राय कोई राजा नहीं थे। मुंशी थे कचहरी में।
यह टाइटल अंग्रेजों ने उन्हें अपना पिट्ठू बनाने के लिए और अपना हित साधने के लिए उन्हें दिया था।
लेकिन इतिहास में उन्हें समाज सुधारक बताया गया है।
किस समाज का सुधारक?
जो समाज अनंतकाल से ईसाई लुटेरों के आने के पूर्व तक विश्व की 25% जीडीपी का उत्पादक था।
क्या सुधार करता वो व्यक्ति?
आज लोग जीडीपी से परिचित हैं।
आज चीन की जीडीपी भारत की तुलना में पांच गुना है। अमेरिका से थोड़ा पीछे।
वहां किसी सुधारक की आवश्यकता अनुभव नहीं करता कोई?
न चीनी, और न कोई ईसाई।
क्यों?
यही है #इति_हास्य का #इतिहास।
आप उपरोक्त हैशटैग को दबाइए तो आपको ऐसे ऐसे लेख मिलेंगे कि आपको भ्रम हो जाएगा कि इस नाम का कोई देवदूत अवतरित हुआ था भारत की धरती पर।
यही होती है नरेटिव बनाने की कला। पढ़े लिखे लोग इन्हीं अफवाहों के शिकार हैं।
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