Sunday, 26 July 2026

भारत की काल गणना आधुनिक नासा सॉफ्टवेयर से अधिक शुद्ध है।

भारत की ऐतिहासिक काल गणना अभी भी आधुनिक नासा सॉफ्टवेयर से अधिक शुद्ध है। १९२३ के मिलांकोविच सिद्धान्त की तुलना में भारतीय गणना के अनुसार जल प्रलय अधिक शुद्ध हैं। सृष्टि काल की गणना तथा दोलन की भी सूक्ष्म माप है। २०,००० वर्ष पुराना इतिहास आज भी परम्परा रूप में जीवित है।
(१) १७५०० ई.पू. में कश्यप के समय पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य प्रवेश से वर्ष गणना होती थी, जिसका देवता अदिति है। शान्ति पाठ में यही कहते हैं-अदितिर्जायम्, अदितिर्जनित्वम् = अदिति नक्षत्र से संवत्सर का अन्त होता है तथा नया संवत्सर आरम्भ होता है। आज भी जब सूर्य पुनर्वसु नक्षत्र में आता है को जगन्नाथ की रथ यात्रा होती है। आगे-पीछे दोनों संवत्सरों का रूप अदिति है, अतः ग्रीस में इसके प्रतीक जूनो देवी का मुंह आगे-पीछे दोनों तरफ होता है।
(२) पुष्कर द्वीप (दक्षिण अमेरिका) में आमेजन तट पर हिरण्याक्ष का राज्य था। वे लोग वराह रूप में विष्णु भगवान् की पूजा करते थे। अतः उनसे मैत्री दिखाने के लिए विष्णु अपने १८ साथियों सहित वराह का मुखौटा लगा कर उनके पास गये। मित्र रूप में उनका स्वागत हुआ। एक दिन धोखे से हिरण्याक्ष को मार कर वे लोग भाग निकले। यह वर्णन जेन्द अवेस्ता का है। पुराणों में भी लिखा है कि इन्द्र की सहायता के लिए वराह ने धोखे से हिरण्याक्ष को मारा था अतः उसके प्रतिशोध के लिए हिरण्यकशिपु ने तप किया। वराह अवतार द्वारा वध होने के बाद से सूअर का मांस वर्जित गो गया, जो आज तक इस्लाम में चल रहा है।
(२) राजा पृथु द्वारा खेती के लिए पर्वतों को धनुष की नोक से समतल बनाया गया। धनुषाकार समतल बनाई भूमिको टेरेस फार्मिंग कहते हैं, जिसके प्राचीन अवशेष आज भी पेरु में हैं।
(३) शतपथ ब्राह्मण के अनुसार प्रथम बृहस्पति चीन में थे, जिन्होंने हर शब्द के लिए चिह्न दिया था। बहां आज भी शब्द-लिपि प्रचलित है। बाद में इन्द्र ने मरुत की सहायता से शब्दों को ध्वनि खण्डों में विभाजन किया। ३३ देवों के चिहन् ३३ व्यञ्जन तथा ४९ मरुत् रूप ४९ अक्षर बने।, अतः निर्माता को मरुत् कहा। चिह्न रूप में देवों का नगर होने के कारण यह देव-नागरी लिपि है। आज भी यह लिपि पूर्व के लोकपाल इन्द्र के स्थान से उत्तर पश्चिम के लोकपाल मरुत् क्षेत्र तक प्रचलित है। यह इन्द्र की त्रिलोकी (भारत-रूस-चीन) में प्रचलित हुआ, किन्तु चीन के लोग अपनी मूल लिपि पर बने रहे। बॄहस्पति के लाल में ब्रह्मा पुष्कर में रहते थे जिसे इज्जैन से १२ अंस पश्चिम तथा ३५ अंश उत्तर अक्षांश पर कहा गया है (पुष्कर = बुखारा)। ब्रह्मा के स्थान से उत्तर-पूर्व चीन-जापान में लिपि ऊपर से नीचे लिखते थे, दक्षिण पूर्व में बायें से दाहिने, तथा दक्षिण पश्चिम में दाहिने से बांये लिखते थे, जो आज तक प्रचलित है।
(४) नरसिंह अवतार में नरसिंह छोटी सेना लेकर मिस्र गये थे और हिरण्याकशिपु को मार कर प्रह्लाद को गद्दी पर वैठाया। हिरण्यकशिपु की अधिकांश सेना सीमा पर थी। अतः नरसिंह को मनुष्यों में सिंह कहते है< जो आज तक राजाओं की उपाधि है। शत्रु रूप में निन्दा के लिए उसे मिस्र में पशु रूप बनाते हैं-स्फिंक्स।
(५) बलि के यज्ञ में इन्द्र ने वामन की सहायता से ३ लोक वापस लिए (रामायण के अनुसार भारत-चीन-रूस)। बलि के पुरोहित कवि उशना का स्थान काबा है। वहां बलि की बाल देवता के रूप में पूजा होती थी।
(६) राजा वरुण के उर नगर बनाया था (उरुं हि राजा वरुणश्चकार-ऋग्वेद, १/२४/८)। यह इराक का प्राचीनतम नगर है। इस वरुण तथा रोहित की जो कथा शतपथ ब्राह्मण, ब्रह्माण्ड पुराण आदि में है, वही कथा उर निवासी अब्राहम और उनके पुत्र इस्माइल के विषय में बाइबिल में है।
(७) बलि के समय ही समुद्र मन्थन हुआ था जिसमें देव-असुर ने परस्पर सहायता की थी। इसके संयोजक इन्द्र के मित्र वासुकि थे, जिनका निवास रसातल (दक्षिण अमेरिका) में था (ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/२० अध्याय)। खनिज कूर्म-पृष्ठ भूमि (ग्रेनाइट या अन्य कठिन भूमि) में ही मिलते हैं, अतः आयोजक को कूर्म कहा गया। खनन में असुर दक्ष थे अतः वे खनन के लिए अफ्रीका से भारत के खनिज क्षेत्र झारखण्ड आये। खान के नीचे गर्म होता है, अतः असुर कार्य वासुकि के मुंह की तरफ गर्म था। आज भी उनके वंशजों का चेहरा अफ्रीकियों से मिलता है। उसी भाषा क्षेत्र के यवनों को राजा सगर ने निष्कासित किया था, जो भाग कर ग्रीस चले गये, जिसे हेरोडोटस के अनुसार इयोनिआ कहने लगे। किन्तु आज भी अरबी चिकित्सा पद्धति को ही यूनानी कहते हैं। आज भी असुर वंशजों की वही उपाधि है जो ग्रीक भाषा में खनिजों के नाम हैं। देवता लोग विरल धातुओं के शोधन में दक्ष थे। अतः वे स्वर्ण के लिए जिम्बाबवे तथा चान्दी के लिए मेक्सिको गये। अतः जाम्बूनद स्वर्ण श्रेष्ठ कहते थे (दुर्गा स्तुति-जाम्बूनद स्वर्णाभां)। मेक्सिको के नाम पर चान्दी को माक्षिक कहते थे (आयुर्वेद का स्वर्ण-माक्षिक भस्म)। सिंहभूमि से भागलपुर में गंगा तट तक मन्दराचल (मन्दार) पर्वत है, जिसके छोर पर वासुकिनाथ मन्दिर है। 
(८) कार्त्तिकेय ने क्रौञ्च द्वीप (उत्तर अमेरिका) पर आक्रमण के लिए नौसेना गठित की थी। उसके पूर्व शक्ति द्वारा क्रौञ्च पर्वत पर प्रहार किया था (कुमारः क्रौञ्चदारणः)। जल और वायु में भी गति होने के कारण उनकी नौसेना को मयूर कहा गया। उसमें भारत के अतिरिक्त प्रशान्त क्षेत्र के भी सैनिक थे (वियतनाम-इण्डोनेसिया तक ९ खण्ड का भारत था)। आज भी मयूर सेना के मयूरी के वंशज (माओरी) हवाइ द्वीप, न्यूजीलैण्ड तथा आस्ट्रेलिया में एक ही भाषा कहते है। १८३३ में हवाई द्वीप से एक माओरी जेम्स कुक के साथ न्यूजीलैण्ड आया था तथा वहां की माओरी रानी के साथ सन्धि में दुभाषिया रूप में हस्ताक्षर किया था। जेम्स कुक को आश्चर्य हुआ कि इतने दूर क्षेत्र की एक ही भाषा कैसे है। उस दुभाषिये की प्रपौत्री श्रीमती युमा बोक्कासा ने मेरा लेख पढ़ कर मुझे लिखा कि उसके दादा ने वही कहानी बतायी थी।
(९) रामायण (४/४०/५४) के अनुसार पूर्व दिशा के अन्त का चिह्न देने के लिए ब्रह्मा ने एक द्वार बनवाया था। उज्जैन से १८० अंश पूर्व आज भी प्राचीन पिरामिड मेक्सिको में है जिसे प्रथम देवता का पिरामिड कहते हैं। प्राचीन समय क्षेत्रों की सीमा पर आज भी प्रायः ३० से अधिक क्षेत्र पुराने नामों से विश्व भर में फैले हुए हैं।
(१०) कार्त्तिकेय काल में अभिजित का पतन होने पर धनिष्ठा से वर्ष का आरम्भ हुआ (महाभारत, वन पर्व, २३०/८-१०)। यह प्रायः १५८०० ईपू. में था। मेगास्थनीज की मुल इण्डिका में था कि भारत अन्न और खनिज में स्वावलम्बी था अतः पिछले १५,००० वर्षों में किसी पर आक्रमण नहीं किया। सिकन्दर से प्रायः १५,५०० वर्ष पूर्व कार्तिकेय ने क्रौञ्च द्वीप पर आक्रमण किया था। इससे भारतीय सभ्यता अधिक प्राचीन लग रही थी, अतः बाद के संस्करण में इसे हटाया गया। मेगास्थनीज को इसलिए चुना क्योंकि उसकी पुस्तक उपलब्ध नहीं है तथा इच्छानुसार बार-बार परिवर्तन किया जा सकता है। कार्त्तिकेय के समय धनिष्ठा नक्षत्र से वर्षा होती थी, अतः संवत्सर को वर्ष कहा गया।
(११) कार्त्तिकेय का धनिष्ठा नक्षत्र से आरम्भ वर्ष वेदाङ्ग ज्योतिष में है, जिसमें १९ वर्ष का युग होता है। आज भी जगन्नाथ का नव कलेवर १९ वर्ष बाद होता है। उस समय ज्येष्ठ मास में शीत आरम्भ होता था, अतः पश्चिम ओड़िशा में ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी को शीतल षष्ठी कहते है, जिस दिन शिव पार्वती का विवाह होता है।
(१२) स्वातम्भुव मनु के समय २९१०१२ ईपू. से भारत में कई पञ्चाङ्ग आरम्भ हुए। भारत में युग तथा दिन का निर्णय ५-५ प्रकार से होता है (पञ्च संवत्सरमयं युगम्, पञ्चाङ्ग) जिसके द्वारा अशुद्धि दूर की जाती है। नासा के कैलेण्डर सॉफ्टवेयर में यह पद्धति नहीं है, अतः उससे गणना में महाभारत काल में ३ दिन तथा रामायन काल (४५०० ईपू) में ७ दिन की भूल होती है। पर आजकल नासा सॉफ्टवेयर द्वारा भारतीय तिथियों को बदलने का फैशन चला है।

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