FCRA और MI6 का खेल, जिसपर आपका ध्यान इसलिए नही जाता कि MI6 कभी किसी मोसाद-सीआईए की तरह शो ऑफ नही करती।
ब्रिटिश कब्जे के दौरान भारत में जो भी चर्च, स्कूल और छावनियाँ(Cantts) बनीं, वे सब 'चर्च ऑफ इंग्लैंड' के तहत आती थीं। 1947 में जब अंग्रेज गए, तो वे भारत में एक बहुत बड़ा कानूनी और अचल संपत्ति का ढांचा छोड़ गए।
भारत में चर्च ऑफ इंग्लैंड की सीधी दखल को समझने के लिए हमें इसके दो रूपों को देखना होगा।
पहली दखल है- CNI और CSI(चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया और चर्च ऑफ साउथ इंडिया)
अंग्रेजों के जाने के बाद, भारत में चर्च ऑफ इंग्लैंड की संपत्तियों और व्यवस्था को संभालने के लिए दो बड़े आधिकारिक संगठन बनाए गए... CNI उत्तर भारत के राज्यों में... CSI दक्षिण भारत के राज्यों में।
ये दोनों संगठन तकनीकी रूप से स्वतंत्र हैं, लेकिन ये वैश्विक 'एंग्लिकन कम्यूनियन'(लंदन) का हिस्सा हैं। इनका मुख्यालय आज भी भारत के सबसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक शहरों में है(जैसे दिल्ली में CNI का मुख्यालय संसद भवन और बड़े सरकारी दफ्तरों के बेहद करीब है)।
दूसरी और सबसे बड़ी दखल है- जमीनों का मालिकाना हक क्योंकि चर्च ऑफ इंग्लैंड की सबसे बड़ी ताकत कोई धार्मिक प्रचार नहीं, बल्कि "अथााह जमीन और संपत्ति" है।
भारत में रक्षा मंत्रालय के बाद चर्च ऑफ इंडिया(CNI/CSI) देश का दूसरा सबसे बड़ा जमीन का मालिक है।
देश के हर बड़े शहर के प्राइम लोकेशन(Civil Lines, Cantt इलाके, मॉल रोड) पर मौजूद ब्रिटिश कालीन चर्च, कब्रिस्तान, कॉन्वेंट स्कूल(जैसे सेंट स्टीफंस, सेंट जेवियर्स आदि) और विशाल बंगले इन्हीं के नियंत्रण में हैं।
इन जमीन की कीमत लाखों-करोड़ों में है और CNI और CSI के भीतर इन जमीनों को अवैध रूप से बेचने, लीज पर देने और लैंड-स्कैम के सैकड़ों मुकदमे चल रहे हैं।
ED और आर्थिक अपराध शाखा ने कई बार इनके बड़े बिशपों को करोड़ों के घोटाले और फॉरेन फंडिंग के हेरफेर में गिरफ्तार किया है।
सीआईए का खेल--
पंजाब में इस समय जो बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हो रहा है, वह वेटिकन या पारंपरिक CNI नहीं कर रहा।
वहां अमेरिकी इवेंजेलिकल "पास्टर" सक्रिय हैं जो 'चंगाई सभा' के नाम पर सिखों का धर्मांतरण करा रहे हैं। इन्हें सीधे अमेरिका और कनाडा के इवेंजेलिकल डायस्पोरा से फंडिंग आ रही है।
लेकिन इन्हें चर्च ऑफ इंग्लैंड का मौन समर्थन है क्योंकि इस खेल में CNI सीधे तौर पर फ्रंट में नहीं आती, लेकिन वह इन नए इवेंजेलिकल समूहों को एक लेजिमेट अम्ब्रेला और अपने पुराने कानूनी नेटवर्क का परोक्ष सहयोग प्रदान करती है ताकि भारतीय कानून(जैसे FCRA) की नजरों से बचा जा सके।
भारत में चर्च ऑफ इंग्लैंड(CNI/CSI) के पास जो लाखों एकड़ जमीन है, उसकी मलाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा 'ट्रस्ट' और 'शेल कंपनियों' के जरिए वैश्विक वित्तीय बाजारों(जैसे लंदन और केमैन आइलैंड्स) में घुमाया जाता है।
भारत सरकार का FCRA कानून इसी पैसे को रोकने के लिए बना है।
यह पैसा सीधे तौर पर अमेरिकी इवेंजेलिकल चर्चों को दान नहीं दिया जाता, बल्कि इसका इस्तेमाल वैश्विक लॉबिंग में ज्यादा होता है।
लंदन और यूरोप के ये पुराने ट्रस्ट उन अमेरिकी थिंक-टैंकों, एनजीओ और मीडिया घरानों को फंड करते हैं जो भारत में 'धर्मांतरण' और 'मानवाधिकार' के पक्ष में नैरेटिव बनाते हैं। शेष हिस्सा धर्मांतरण के लिए आता है।
इस तरह भारत की जमीन से कमाया गया पैसा घूम-फिरकर उसी अमेरिकी टूलकिट को मजबूत करता है जो भारत के खिलाफ इस्तेमाल होती है
साल 1999 में जब पोप जॉन पॉल द्वितीय भारत आया था, तो उसने दिल्ली में खड़े होकर आधिकारिक तौर पर यह बयान दिया था कि:
"पहली सहस्राब्दी में यूरोप को ईसाई बनाया गया, दूसरी में अमेरिका और अफ्रीका को और तीसरी सहस्राब्दी में एशिया में ईसाइयत की फसल काटी जाएगी।"
इसे ईसाई धर्मशास्त्र में "The Great Commission"(महान आदेश) कहा जाता है... यानी दुनिया के हर कोने तक ईसाइयत को पहुँचाना।
इस बड़े लक्ष्य के लिए ये सभी चर्च(वेटिकन, एंग्लिकन और इवेंजेलिकल) अंदर से एक हैं।
भारत में इन्होंने अपना काम आपस में बांट रखा है ताकि "सब मलाई खा सकें।
चर्च ऑफ इंग्लैंड(CNI/CSI) भारत का 'एलीट' और कानूनी चेहरा है।
इसके पास लुटियंस दिल्ली में जमीनें हैं, बड़े कॉन्वेंट स्कूल हैं और इसके लोग न्यायपालिका, ब्यूरोक्रेसी और मीडिया में बैठे हैं।
इनका काम है कानून और व्यवस्था को मैनेज करना।
वेटिकन(कैथोलिक) का काम है ट्राइबल इलाकों(झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा) और दक्षिण भारत में अस्पताल और चैरिटी के नाम पर पैर जमाना।
अमेरिकी इवेंजेलिकल(पास्टर्स) का काम है 'आक्रामक' फ्रंटलाइन वॉर... ये पंजाब के गांवों और आंध्र प्रदेश में 'चंगाई सभा' जैसी नौटंकी करके रातों-रात लाखों लोगों का धर्मांतरण कराते हैं।
असल मे धर्मांतरण एक बहुत बड़ा बिजनेस है।
हर कनवर्टेड ईसाई का मतलब होता है चर्च को मिलने वाला 'Tithe'(दशमांश - अपनी कमाई का 10% हिस्सा चर्च को देना)।
लेकिन दुनिया मे चीजें बदल भी रही है।
इस समय वेटिकन और चर्च ऑफ इंग्लैड एक दूसरे के भी शत्रु बन रखे हैं।
क्योंकि अमेरिकी इवेंजेलिकल चर्च बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं और इन्होंने लैटिन अमेरिका में वेटिकन के 'ग्राहकों'(कैथोलिकों) को तोड़कर अपने पाले में कर लिया।
भारत में भी, पंजाब और आंध्र प्रदेश में जो पारंपरिक कैथोलिक या सीएनआई चर्च थे, उनके लोग अब इन नए अमेरिकी पास्टर्स की तरफ भाग रहे हैं क्योंकि ये पास्टर्स "चमत्कार" का नाटक ज्यादा अच्छे से करते हैं।
इसलिए वेटिकन और एंग्लिकन चर्च को डर है कि उनका बिजनेस(मार्केट शेयर) अमेरिका छीन रहा है।
हालांकि इसका मतलब ये नही कि इनका गठबंधन भारत जैसे जगह नही है।
क्योंकि साउथ अमरीका में तो तेरा ईसाई बनाम मेरा ईसाई चल रहा है, जबकि भारत में इनका हिसाब किताब इस तरह है कि "पहले ईसाई तो बना लें, फिर तय कर लेंगे कौन से वाला रहेगा"।
इसलिए सिर्फ रटे रटाये.. सीआईए तक सीमित न रहें।
सीआईए भले ही अग्रेसिव फ्रंटलाइन वॉर करता है, पर उसके पीछे हमेशा से MI6 रहा है।
भूलें नही कि आपके 45 ट्रिलियन(आज के दाम में तो 60 ट्रिलियन) जो यहां से लूटकर ले गया था वो ब्रिटेन था।
और 1945 से पहले जो ब्रिटेन अपना पैसा सिटी ऑफ लण्डन(लण्डन सिटी नही) में रखता था, दुनिया का रियल बैंकिंग पावरहाउस.. उसी ने अपने निवेश को वाल स्ट्रीट में डालकर अमरीका को बड़ा बनाया।
वो अलग बात है कि अमरीका जब अपने बाप को ही आंखे दिखाने लगा तो आजकल इनके यहां भीषण अंदरूनी लड़ाई चल रही है।
ग्लोबलिस्ट बनाम इम्पीरियलिस्ट के अलावा, केथलिक और प्रोटेस्टेंट में भी तलवारें खींच चुकी हैं।
No comments:
Post a Comment