Thursday, 23 July 2026

आञ्जनेय हनुमान

आञ्जनेय
१. अञ्जना माता-आञ्जनेय का सामान्य अर्थ है अञ्जना माता के पुत्र हनुमान्। भारत के ९ स्थानों को अञ्जना का निवास कहा जाता है-(१) हरियाणा का कैथल (कपिस्थल), (२) अयोध्या का हनुमानगढ़ी, (३) राजस्थान का सुजानगढ़, (४) झारखण्ड के गुमला में अञ्जन गुफा, (५) गुजरात के डांग जिले में अञ्जनी गुफा, (६) महाराष्ट्र के नासिक के निकट अञ्जनेरी गांव, (७) कर्णाटक में हम्पी के निकट आञ्जनेयाद्रि, (८) तिरुपति में अञ्जनाद्रि, (९) ओड़िशा में खोर्धा के निकट जरीपुट (पुट का अर्थ पठार, या ऊंची समतल भूमि)।
तिरुपति से प्रकाशित पराशर संहिता के अनुसार मनुष्य रूप में हनुमान् के ९ अवतार थे।
२. हनुमान् के अर्थ-
(१) मनुष्य- पराशर संहिता के अनुसार उनके मनुष्य रूप में ९ अवतार हुये थे।
(२) योगी, विद्वान्-आध्यात्मिक अर्थ तैत्तिरीय उपनिषद् में दिया है-दोनों हनु के बीच का भाग ज्ञान और कर्म की ५-५ इन्द्रियों का मिलन विन्दु है। जो इन १० इन्द्रियों का उभयात्मक मन द्वारा समन्वय करता है, वह हनुमान् है।
तैत्तिरीय उपनिषद् शीक्षा वल्ली, अनुवाक् ३-अथाध्यात्मम्। अधरा हनुः पूर्वरूपं, उत्तरा हनुरुत्तर रूपम्। वाक् सन्धिः, जिह्वा सन्धानम्। इत्यध्यात्मम्।
(३) ब्रह्म रूप में गायत्री मन्त्र के ३ पादों के अनुसार ३ रूप हैं-स्रष्टा रूप में यथापूर्वं अकल्पयत् = पहले जैसी सृष्टि करने वाला वृषाकपि है। मूल तत्त्व के समुद्र से से विन्दु रूपों (द्रप्सः -ब्रह्माण्ड, तारा, ग्रह, -सभी विन्दु हैं) में वर्षा करता है वह वृषा है। पहले जैसा करता है अतः कपि है। अतः मनुष्य का अनुकरण करने वाले पशु को भी कपि कहते हैं। तेज का स्रोत विष्णु है, उसका अनुभव शिव है और तेज के स्तर में अन्तर के कारण गति मारुति = हनुमान् है। वर्गीकृत ज्ञान ब्रह्मा है या वेद आधारित है। चेतना विष्णु है, गुरु शिव है। उसकी शिक्षा के कारण जो उन्नति होती है वह मनोजव हनुमान् है। 
तत्र गत्वा जगन्नाथं वासुदेवं (देवदेवं) वृषाकपिं। 
पुरुषं पुरुष सूक्तेन उपतस्थे समाहिताः॥ (भागवत पुराण, १०/१/२०)
तद् यत् कम्पायमानो रेतो वर्षति तस्माद् वृषाकपिः, तद् वृषाकपेः वृषाकपित्वम्। (गोपथ ब्राह्मण उत्तर, ६/१२)
आदित्यो वै वृषाकपिः। ( गोपथ ब्राह्मण उत्तर, ६/१०), स्तोको वै द्रप्सः। (गोपथ ब्राह्मण उत्तर, २/१२)
पहले जैसी सृष्टि-सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वं अकल्पयत् (ऋक्, १०/१९०/३) 
(४) महावीर-वीर = जो शत्रु को दूर करे, विक्रमी। सीमा स्थान को भी वीर कहते हैं-जैसे मत्स्य राज्य की सीमा वीरमत्स्य जहां केकय से आते समय भरत रुके थे। रक्षा करने वाला पति, पुत्र, या यज्ञ रक्षक-अवीरा निष्पतिसुता (अमरकोष, २/६/११)। विष्णु का एक नाम-(विष्णु सहस्रनाम, ४०१, ६४३, ६५८)। ’वीरभोग्या वसुन्धरा’ अर्थ में राजा द्वारा दी गयी जागीर (ओड़िशा में) या सम्पत्ति का उत्तराधिकारी अर्थ में बड़ा भाई। महावीर का अर्थ है- विष्णु की सीमा, जैन मत में तीर्थंकर परम्परा की सीमा महावीर। अतः महावीर हनुमान् के हृदय में विष्णु अवतार श्रीराम हैं। ब्रह्माण्ड की सीमा पर ४९वां मरुत् है। ब्रह्माण्ड केन्द्र से सीमा तक गति क्षेत्रों का वर्गीकरण मरुतों के रूप में है। अन्तिम मरुत् की सीमा हनुमान् है। इसी प्रकार सूर्य (विष्णु) के रथ या चक्र की सीमा हनुमान् है। ब्रह्माण्ड विष्णु के परम-पद के रूप में महाविष्णु है। 
(५) हारियोजन -२ प्रकार की सीमाओं को हरि कहते हैं-पिण्ड या मूर्त्ति की सीमा ऋक् है,उसकी महिमा साम है-ऋक्-सामे वै हरी (शतपथ ब्राह्मण, ४/४/३/६)। पृथ्वी सतह पर हमारी सीमा क्षितिज है। उसमें २ प्रकार के हरि हैं-वास्तविक भूखण्ड जहां तक दृष्टि जाती है, ऋक् है। वह रेखा जहां राशिचक्र से मिलती है वह साम हरि है। इन दोनों का योजन शतपथ ब्राह्मण (४/४/३) में बताया है, अतः इसको हारियोजन ग्रह कहते हैं। हारियोजन से होराइजन हुआ है। हारियोजन या पूर्व क्षितिज रेखा पर जब सूर्य आता है, उसे बाल सूर्य कहते हैं। मध्याह्न का युवक और सायं का वृद्ध है। इसी प्रकार गायत्री के रूप हैं। जब सूर्य का उदय दीखता है, उस समय वास्तव में उसका कुछ भाग क्षितिज रेखा के नीचे रहता है और वायुमण्डल में प्रकाश के वलन के कारण दीखने लगता है। सूर्य सिद्धान्त में सूर्य का व्यास ६५०० योजन कहा है, यह भ-योजन = २७ भू-योजन = प्रायः २१४ किमी. है। इसे सूर्य व्यास १३,९२,००० किमी. से तुलना कर देख सकते हैं। वलन के कारण जब पूरा सूर्य बिम्ब उदित दीखता है तो इसका २००० योजन भाग (प्रायः ४,२८,००० किमी.) हारियोजन द्वारा ग्रस्त रहता है। इसी को कहा है-बाल समय रवि भक्षि लियो ...)। इसके कारण ३ लोकों पृथ्वी का क्षितिज, सौरमण्डल की सीमा तथा ब्रह्माण्ड की सीमा पर अन्धकार रहता है। यहां युग सहस्र का अर्थ युग्म-सहस्र = २००० योजन है जिसकी इकाई २१४ कि.मी. है।
अथ हारियोजनं गृह्णाति । छन्दांसि वै हारियोजनश्चन्दांस्येवैतत्संतर्पयति तस्माद्धारियोजनं गृह्णाति (शतपथ ब्राह्मण, ४/४/३/२) 
एवा ते हारियोजना सुवृक्ति (ऋक्, १/६१/१६, अथर्व, २०/३५/१६) 
(६) सुनर -मूल वैदिक शब्द सु-नर था जिससे लौकिक शब्द सुन्दर हुआ है। सु = अच्छा, समन्वय, मिला हुआ। दुः = अलग-अलग, असम्बद्ध। जैसे सुख-दुःख।
सु-नर = अच्छा नर, जो लोगों को मिलाये। जैसे इसाई विवाह में पति-पत्नी को मिलाने वाला सु-नर (Best man) कहलाता है।
वेद में सुनर वह है जो पति-पत्नी, भक्त भगवान् को मिला दे। वैदिक रूप-सूनर, सूनरी।
यो वाधते ददाति सूनरं वसु (ऋक्, १/४०/४), वि दाशुषे भजति सूनरं वसु (ऋक्, ५/३४/७)
आ घा योषेव सूनरी, उषा याति प्रमुञ्चती (ऋक्, १/४८/५), ज्योतिष्कृणोति सूनरी (ऋक्, ७/८१/१)
रामायण में हनुमानजी सीता-राम को मिलाने के लिए दूत बने, भक्त विभीषण या शत्रु पक्ष के व्यक्ति को भगवान् राम से मिलाया तथा परस्पर विरोधी सुग्रीव तथा अंगद को भी राम से मिलाया। 
सु-नर हनुमान का चरित्र वर्णन होने के कारण इस अध्याय को सुन्दर काण्ड कहते हैं।
३. सृष्टि क्रम- 
(१) सन्दर्भ-यह पं मधुसूदन ओझा और उनके शिष्य पं मोतीलाल शास्त्री की पुस्तकों के आधार पर है जिसका सारांश मेरी पुस्तक ’पुरुष सूक्त’ में है।
ब्रह्म सिद्धान्त-पं. मधुसूदन ओझा-सृष्टि के मूलतत्त्व रस का ६ स्तरों में विभाजन-अधिकरण २-३५
भारतीय हिन्दू मानव और उसकी भावुकता-पं मोतीलाल शास्त्री-पृ २५७-२७७
गीता विज्ञान भाष्य-बुद्धियोग परीक्षा, खण्ड १-पं मोतीलाल शास्त्री-प्रकरण १-स्तम्भ २-योगेश्वर का तात्त्विक स्वरूप-पृ. ३१-८७
https://archive.org/details/@madhusudanojha
https://shankarshikshayatan.org/
पुरुष सूक्त-अरुण कुमार उपाध्याय-अध्याय २-पारा ११-१५
https://archive.org/details/PurushaSukta_201311
(२) परात्पर से विविधता-परात्पर ब्रह्म को रस (द्रव के समान समरूप पदार्थ) कहा गया है, जो अविभाज्य है। इसके साषात से आनन्द होता है, अतः इसे आनन्द भी कहते हैं (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७/२)। रस के भीतर स्पन्दन या कम्पन होते रहते हैं, जिनको बल कहते हैं। बल के विभिन्न स्तरों के कारण इनके ३-३ वर्ग हैं-
१. अमृत-(क) शान्ति-बल की सुप्त या निष्क्रिय अवस्था।
   (ख) तृप्ति-स्वप्न के समान। यहआं रस और बल दोनों समान हैं। 
   (ग) प्रसाद (कृपा)-जाग्रत अवस्था-रस के साथ बल भी दीखता है।
२. अमृत-मृत्यु= (विश्व के १६ खण्ड)
   (क) माया (सीमा भाव)- आलम्बन या आधार पुरुष।
   (ख) कला- (मात्रा के स्तर)- स्थान मूल प्रकृत्।
   (ग) गुण (क्रिया या प्रभाव)-विभक्त प्रकृति- अलग-अलग स्थानों पर।
३. मृत्यु (विश्व की १६ प्रतिमा)-
    (क) विकार- २ पिण्डों के बीच का स्मबन्ध का कारण, कमी की पूर्ति।
   (ख) अञ्जन (रंग, दृश्य भेद)-बन्धन, पुरञ्जन- विराट् प्रजापति।
   (ग) आवरण (सीमा)-सुप्त स्थिति-पुर - विश्व प्रजापति।
प्रथम ३ रूपों का अनुभव नहीं हो सकता। अन्तिम २ वर्गों के ६ रूप परिवर्तन के ६ स्तर हैं। सभी ६ बल ६ प्रकार के परिग्रह (आवरण में बन्द करने वाले) हैं।
(३) परिग्रह-१. माया-माया २ प्रकार की है। मात्रा-बल (परिमाण का भेद) अनन्त प्रकार का है। कोष बल १६ प्रकार का है, जो वस्तुओं को अलग अलग करता है-विद्या, माया, जाया, धारा, आप्, हृदय, भूति, यज्ञ, सूत्र, सत्य, यक्ष, अभ्व, मोह, वय, वयोनाध, वयुन। (पं. मधुसूदन ओझा के ब्रह्म विज्ञान के निर्विशेष अनुवाक् से)
२. कला-बड़े छोटे का क्रम, वर्गीकरण।
३. गुण- तीन प्रकार की स्थिति। सत्त्व-एक सीमा के भीतर् रज - गति। तम-निष्क्रिय।
४. बिकार-अणुओं में परिवर्तन, यज्ञ द्वारा निर्माण।
५. अञ्जन-यह ३ प्रकार का है-विभूति-सत्त्व हुण का परिणाम। रजोगुण का परिणाम पाप्मा। तमोगुण का परिणाम-आवरण। इससेविराट् या दृश्य जगत् बनता है।, जो २ स्तरों का है-विश्व तथा व्यक्ति रूपों में।
६. आवरण- प्रति विश्व या व्यक्ति का ऊप एक आवरण में छिपा है। उसकी रचना पुर है। यह विश्व प्रजापति है।  
(४) महेश्वर से क्रम-
(क) महेश्वर- १. माया परिग्रह-मायी महेश्वर
   २. कला परिग्रह- सकल षोडशी
(ख) विश्वेश्वर- ३. गुण परिग्रह।
(ग) उपेश्वर- ४. विकार परिग्रह- सविकार यज्ञ।
(घ) ईश्वर- ५. अञ्जन परिग्रह-साञ्जन विराट्।
    ६. आवरण परिग्रह-सावरण विश्व या व्यक्ति रूप में वैश्वानर।
(५) अञ्जन, त्रिककुद्-अञ्जन रंग या गुण है। इसी अञ्जना से विराट् रूप उत्पन्न हुआ जो त्रिककुद् आवरण के भीतर व्यक्ति रूप में वैश्वानर है। यह विश्व रूप आञ्जनेय है।
भौतिक रूप में कैलास के निकट त्रिककुद् पर्वत कहा गया है। पर इस आकार का पर्वत कहीं नहीं है, न किसी पर्वत पर काले रंग का अञ्जन होता है। उपेश्वर रुद्र के बाद उसके अवतार रूप आञ्जनेय वैश्वानर हैं। अतः त्रिककुद् को कैलास के निकट अञ्जन गिरि कहा है। 
प्रकृति में काला रंग का कार्बन होता है, जिसके अणु त्रि-ककुद् (४ त्रिभुजों से घिरा) रूप के हैं। इन कार्बन परमाणुओं के संयोग से ही जैव सृष्टि होती है। आवरण से माप होने के कारण यजुर्वेद में ककुप् तथा त्रिककुप् छन्द कहा गया है (वाज. यजु, १५/४)। वृत्र का बन्धन इन्द्र वज्र से टूटने के बाद त्रिककुद् अणु अलग होते हैं।
 
(६) उद्धरण-कैलासात् पश्चिमोदीच्यां ककुद्मानौषधीगिरिः॥१४॥
ककुद्मति च रुद्रस्य उत्पत्तिश्च ककुद्मिनः। तदञ्जनं त्रैककुदं शैलं त्रिककुदं प्रति॥१५॥ (मत्स्य पुराण, १२१/१४-१५)
श्रेष्ठमाहुः त्रिककुदं अञ्जनं नित्यमेव च। (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/११/६७)
कैलासाद् दक्षिणे पार्श्वे क्रूर सत्त्वौषधं गिरिम्। वृत्रकायात् किलोत्पन्नं अञ्जनं त्रिककुं प्रति॥ (वायु पुराण, ४७/१३)
अथर्व वेद, सूक्त (५/९) का देवता त्रैककुदाञ्जन है। 
त्रयो दासा आञ्जनस्य तक्मा बलास आदहिः। वर्षिष्ठः पर्वतानां त्रिककुन्नाम ते पिता॥८॥
यदाञ्जनं त्रैककुदं जातं हिमवतस्परि। यातूंश्च सर्वाञ्जम्भयत् सर्वाश्च यातुधान्यः॥९॥
यदि वासि त्रैककुदं यदि यामुनमुच्यसे। उभे ते भद्रे नाम्नी ताभ्यां नः पाह्याञ्जन॥१०॥
(अथर्व, ४/९/८-१०)
आञ्जनं पृथिव्यां जातं भद्रं पुरुषजीवनम्। कृणोत्वप्रमायुकं रथजूतिमनागसम्॥३॥
देवाञ्जन त्रैककुदं परि मा पाहि विश्वतः। न त्वा तरन्त्योषधयो बाह्याः पर्वतीया उत॥६॥
(अथर्व सूक्त १९/४४-भैषज्यम्, देवता आञ्जनम्, वरुणः)
अथर्व सूक्त (१९/४५) आञ्जन सूक्त है।
अहन् अहिं पर्वते शिश्रियाणं त्वष्टास्मै वज्रं स्वयं ततक्ष।
वाश्रा इव धेनवः स्यन्दमाना अञ्जः समुद्रमव जग्मुरापः॥२॥
वृषायमाणोऽवृणीत सोमं त्रिकद्रुकेष्वपिबत् सुतस्य।
आ सायकं मगवादत्त वज्रमहन्नेनं प्रथमजा महीनाम्॥३॥
(ऋक्, १/३२/२-३)
यद्ध प्रसर्गे त्रिककुप् निवर्तत् अप द्रुहो मानुषस्य दुरो वः। (ऋक्, १/१२१/४)
इन्द्रं वै वृत्रं जघ्निवाँसं रक्षाँस्यसचन्त तानि अञ्जनगिरिणान्तरधत्त रक्षाँस्येतँ सचन्ते यो दीक्षते भवति हि यदाङ्क्ते रक्षसामन्तर्हित्या इन्द्रो वै वृत्रमहँस्तस्य चक्षुः परापतत् तत् त्रिककुभं प्राविशद् यदाङ्क्ते तस्यैव चक्षुषोऽवरुद्ध्यै द्विर्दक्षिणमाङ्क्ते सकृत् सव्यं चि (त्रि)वॄद् यज्ञो मुखत एव यज्ञं आलभते त्रिः दक्षिणमाङ्क्ते --- (काठक संहिता, २३/१)

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