Friday, 24 July 2026

गाली और नाम

कभी आपको लगता है कि ऋग्वेद के वाक्-सूक्त, भर्तृहरि के शब्द-ब्रह्म, तांत्रिक परंपरा की परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाक् का देश किस स्तर तक के कीचड़ में लोटने में किसी पशु की तरह आनंदित युवाओं को देखेगा? वाक् के साधकों की चेतना विकास की दिशा में बढ़ती है—आवेग से विवेक की ओर, प्रतिक्रिया से उत्तरदायित्व की ओर, हिंसा से संवाद की ओर। गाली इस विकास-यात्रा का उलटा मार्ग है। वह चेतना को पुनः आदिम प्रतिक्रियाओं की ओर ले जाती है। ये गालियाँ भारतीय चेतना के अवरोह (Regression of Consciousness) का संकेत हैं।

भारतीय दर्शन में नाम और रूप केवल पहचान नहीं हैं; वे अस्तित्व के आयाम हैं। किसी का नाम लेना उसकी सत्ता को स्वीकार करना है। इसीलिए भारतीय परंपरा में नामकरण संस्कार है। नाम व्यक्ति को समाज में प्रतिष्ठित करता है। इसके विपरीत गाली नाम का अपहरण करती है। वह व्यक्ति को उसके वास्तविक नाम से नहीं पुकारती; उसे एक अपमानजनक संकेत में बदल देती है।

गाली का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि उसे केवल अशिष्ट भाषा समझ लिया जाता है। वस्तुतः गाली भाषा का नहीं, चेतना का विषय है। शब्द केवल उसका माध्यम हैं; उसका वास्तविक निवास मनुष्य की मानसिक संरचना में है। किसी व्यक्ति की गालियाँ केवल उसके शब्दकोश का परिचय नहीं देतीं; वे उसके भावनात्मक संगठन, उसकी असुरक्षाओं, उसकी आक्रामकता, उसके आत्म-नियंत्रण और उसके सांस्कृतिक संस्कारों का भी परिचय देती हैं। गालियाँ प्रायः उस व्यक्ति के अचेतन का दर्पण होती हैं जो उन्हें उच्चार रहा है। वे विरोधी की वास्तविकता से अधिक वक्ता की भीतरी संरचना को उद्घाटित करती हैं।

गाली और तर्क का मूलभूत अंतर स्पष्ट है। जब मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स सक्रिय रहता है, तब मनुष्य कारण देता है, प्रमाण प्रस्तुत करता है, तर्क करता है और स्वयं को नियंत्रित रखता है। परंतु जब वह निष्क्रिय हो तो उसकी अमिग्डाला खतरे या अपमान का अनुभव करती है और नियंत्रण अपने हाथ में ले लेती है, तब भाषा का स्वरूप बदल जाता है। तर्क की जगह विस्फोट आ जाता है। आधुनिक मनोविज्ञान इसे Emotional Hijacking कहता है—एक ऐसी स्थिति जिसमें भावनाएँ संज्ञानात्मक नियंत्रण पर अस्थायी विजय प्राप्त कर लेती हैं। इस दृष्टि से गाली विवेकपूर्ण संप्रेषण नहीं, भावनात्मक अपहरण की भाषाई अभिव्यक्ति है।

गालियों का अध्ययन करें तो स्पष्ट होगा कि लगभग प्रत्येक गाली किसी-न-किसी सांस्कृतिक पवित्रता पर आघात करती है। कहीं मातृत्व को अपवित्र किया जाता है, कहीं स्त्री-देह को, कहीं धर्म को, कहीं जातीय पहचान को। यह कोई संयोग नहीं है। गाली वहीं प्रहार करती है जहाँ समाज ने सबसे अधिक पवित्रता स्थापित की होती है। इसलिए गाली का वास्तविक कार्य सूचना देना नहीं, पवित्र का अपवित्रीकरण करना है। इन गालियों का आश्चर्यजनक विरोधाभास यह है कि वे लगभग कभी भी यौन सुख (sexual pleasure) के बारे में नहीं होतीं; वे यौन सत्ता (sexual power) के बारे में होती हैं। वे कामुकता की भाषा नहीं, प्रभुत्व (domination), अपमान (humiliation) और अधिकार-हरण (violation) की भाषा हैं। इसलिए यदि कोई व्यक्ति यह मानता है कि यौन गालियाँ केवल काम-वासना का भाषिक रूप हैं, तो वह उनके वास्तविक मनोविज्ञान को नहीं समझ रहा। वे इच्छा की नहीं, हिंसा की भाषा हैं। उस स्थान पर अभिव्यक्त हो रही वे गालियाँ केवल अश्लील नहीं हैं; वे सांस्कृतिक अपवित्रीकरण (cultural profanation) का अनुभव कराने की नई वामपंथी स्ट्रेटेजी हैं।

विकासवादी मनोविज्ञान गालियों को प्रभुत्व-प्रदर्शन (Dominance Display) के रूप में भी देखता है। गाली का उद्देश्य सामने वाले को कोई नई सूचना देना नहीं होता; उसका उद्देश्य उसे मनोवैज्ञानिक रूप से दबाना होता है। इस प्रकार गाली संवाद की नहीं, शक्ति-प्रदर्शन की भाषा बन जाती है।

सोशल मीडिया पर गाली केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं रहती; वह सामाजिक पुरस्कार (social reward) प्राप्त करने का साधन भी बन जाती है। यदि किसी अपमानजनक टिप्पणी पर हजारों लाइक, शेयर और प्रशंसा मिलती है, तो मस्तिष्क का डोपामिन तंत्र उसे सफलता के रूप में दर्ज करता है। धीरे-धीरे व्यक्ति सीख जाता है कि संयमित तर्क की अपेक्षा उत्तेजक अपमान अधिक लोकप्रिय है। यही वह प्रक्रिया है जिसे आज कई विचारक "Outrage Economy" कहते हैं—एक ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें ध्यान (attention) सबसे मूल्यवान वस्तु है और गाली उसे प्राप्त करने का सबसे सस्ता साधन।

गाली का प्रयोजन तर्क को परास्त करना नहीं, प्रतिद्वंद्वी की आत्म-प्रतिष्ठा को आहत करना है। यही कारण है कि गाली मूलतः degradation ritual है—एक ऐसा भाषिक अनुष्ठान जिसके माध्यम से बोलने वाला दूसरे व्यक्ति को उसके मानवीय स्तर से नीचे धकेलना चाहता है।

और वह भी इसलिए कि वह स्वयं नीचा महसूस करता है। एरिख फ्रॉम ने अपनी प्रसिद्ध कृति The Anatomy of Human Destructiveness में विनाशकारी प्रवृत्ति और जीवनोन्मुख प्रवृत्ति का अंतर किया है। फ्रॉम के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति अपनी शक्ति का अनुभव सृजन द्वारा करता है, जबकि असुरक्षित व्यक्ति अपनी शक्ति का अनुभव दूसरे को छोटा करके करता है। इस दृष्टि से गाली कई बार शक्ति का प्रदर्शन नहीं, शक्ति के अभाव की क्षतिपूर्ति (Compensation) होती है। जिस व्यक्ति को अपने तर्क, अपने व्यक्तित्व या अपनी नैतिक ऊँचाई पर विश्वास नहीं होता, वह शब्दों की तीव्रता से उस रिक्ति को भरने का प्रयास करता है। इसलिए गाली अनेक बार साहस की नहीं, सृजनशक्ति के अभाव की भाषा होती है।

फ्रायड का कहना था कि गाली हिंसा का स्थानापन्न ( substitute) है। मैं उससे असहमत हूँ। मेरे विचार से गाली हिंसा की भूमिका है। प्रत्येक समाज अपनी हिंसा को वैध ठहराने से पहले अपने शिकार का नैतिक अवमूल्यन करता है। किसी व्यक्ति को सीधे नष्ट करना कठिन है; पहले उसे सम्मान के योग्य न रहने वाला सिद्ध करना पड़ता है। इतिहास के प्रत्येक बड़े नरसंहार से पहले भाषा बदलती है। लोग व्यक्तियों को नाम से नहीं, अपमानसूचक विशेषणों से पुकारना प्रारम्भ करते हैं। यह हिंसा की पूर्वपीठिका होती है । यानी गाली हिंसा का विकल्प नहीं, अनेक बार उसकी प्रस्तावना होती है। गाली संवाद को समाप्त नहीं करती; वह संवाद की संभावना को ही समाप्त कर देती है।

लेकिन यह तो गाली देने वालों का मनोविज्ञान है, उन साहित्यकारों का मनोविज्ञान भी पढ़िए जो इन गालियों की Moral Licensing कर रहे हैं। यानी ये वे हैं जो यह विश्वास कर लेते हैं कि इनके उद्देश्य इतने पवित्र हैं कि उसके लिए सामान्य नैतिक नियम लागू नहीं होते। जब वे गालियों के इन क्षणों को अपवाद मानने के बजाय आदर्श या सामान्य घोषित करने लगते हैं, तब समस्या केवल भाषा की नहीं रहती; तब हमारी सामूहिक मनोसंरचना बदलने लगती है। उसी दिन गालियाँ शब्दकोश से निकलकर संस्कृति का हिस्सा बन जाती हैं। साहित्यकार जब गाली को नैतिक वैधता देता है, तब वह समाज के सामूहिक विवेक का पुनर्लेखन कर रहा होता है। वह केवल यह नहीं कह रहा कि "गाली दी गई"; वह यह कह रहा है कि "गाली उचित थी।"जबकि ऐसे माहौल में साहित्यकार का दायित्व सबसे अधिक बढ़ जाता है। क्योंकि साहित्य का संपूर्ण प्रयोजन मनुष्य को पुनः नाम देना है। उपन्यास, कविता, नाटक और कथा—ये सभी हमें याद दिलाते हैं कि प्रत्येक मनुष्य किसी विशेषण से बड़ा है। साहित्य व्यक्ति को उसकी जटिलता लौटाता है; गाली उसे उसकी जटिलता से वंचित कर देती है। साहित्य कहता है—"उसे समझो।" गाली कहती है—"उसे समाप्त करो।" साहित्य व्यक्ति के भीतर की कहानी खोजता है; गाली व्यक्ति को कहानी बनने से पहले ही एक निर्णय में बदल देती है।तो होना तो यह चाहिए था कि सभी साहित्यकार एक साथ एक संयुक्त ज्ञापन निकालते कि भाषा का सम्मान रखें पर होता यह देखा कि कुछ स्वनामधन्य उसी को जस्टिफ़ाई करने में लग गए। वे साहित्य को हमेशा चार खेमे और चौंसठ खूँटों में बांटे रहे तो यहाँ भी वे एक ingroup moral immunity की स्थिति से—अपने समूह को नैतिक छूट देने से- मुतमईन हैं। 

यौन-आधारित गालियों के समर्थन में एक और सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया कार्य करती है—प्रतीकात्मक दूरी (Symbolic Distance)। साहित्यकार स्वयं गाली नहीं देता; वह कहता है कि "यह जनता का क्रोध है", "यह प्रतिरोध की भाषा है", या "यह दमन के विरुद्ध स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।" इस प्रकार वह अपने और गाली के बीच एक बौद्धिक दूरी निर्मित कर लेता है। परिणाम यह होता है कि वह स्वयं को अशिष्ट नहीं, बल्कि अशिष्टता का व्याख्याकार समझने लगता है। किंतु सामाजिक प्रभाव की दृष्टि से यह दूरी बहुत कम मायने रखती है। सार्वजनिक संस्कृति यह संदेश ग्रहण करती है कि यदि प्रतिष्ठित लेखक इसे उचित कह रहा है, तो यह नैतिक रूप से स्वीकार्य है। आधुनिक बौद्धिक संसार प्रायः लैंगिक समानता, स्त्री-अस्मिता और गरिमा की वकालत करता है। किंतु यदि वही बौद्धिक वर्ग ऐसी गालियों का समर्थन करे जिनकी संरचना स्त्री-देह, मातृत्व या पारिवारिक स्त्री-संबंधों को अपमान के औज़ार के रूप में प्रयोग करती है, तो वह अनजाने में उसी पितृसत्तात्मक भाषा को वैधता दे रहा होता है जिसकी वैचारिक आलोचना वह अन्यत्र करता है। यहाँ सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि सिद्धांत में स्त्री की गरिमा का समर्थन और व्यवहार में स्त्री-आधारित अपमान की स्वीकृति एक साथ उपस्थित हो जाती है।

क्या उन्हें अहसास है कि वे शब्दों की सीमा नहीं बदल रहे हैं ; वे समाज की नैतिक संवेदनशीलता की सीमा भी बदल दे रहे हैं?

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