नारायणाष्टकम् पढ़ रहा था तो उसके सातवें छंद पर आँख अटक गई।
पित्रा भ्रातरमुत्तमासनगतं चौत्तानपादिर्ध्रुवो दृष्ट्वा तत्सममारुरुक्षुरधृतो मात्रावमानं गतः। यं गत्वा शरणं यदाप तपसा हेमाद्रिसिंहासनमार्त न्नार्तत्राणपरायणः स भगवान्नारायणो मे गतिः।।७।।
अपने भाई को पिता के साथ उत्तम राजसिंहासन पर बैठा देख उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव ने जब स्वयं ही उस पर चढ़ना चाहा तो पिता ने उसे अंक में नहीं लिया और विमाता ने भी उसका अनादर किया, उस समय जिनकी शरण जाकर उसने तप के द्वारा सुमेरुगिरि के राजसिंहासन की प्राप्ति की, वे ही दीनरक्षक भगवान् नारायण मेरी एकमात्र गति हैं ।
इस एक श्लोक में जितनी वेदना समाई हुई है, उतनी शायद किसी बड़े महाकाव्य के अनेक सर्गों में भी न हो। एक बालक है। उसके सामने उसका भाई पिता की गोद में बैठा है। वह भी उसी गोद की ओर बढ़ता है। वह भी उसी सिंहासन पर बैठना चाहता है। किंतु उसका हाथ पकड़कर रोक दिया जाता है। उसे बताया जाता है कि यह स्थान उसके लिए नहीं है।
ध्यान दीजिए, ध्रुव की पीड़ा सिंहासन न मिलने की नहीं थी; पीड़ा यह थी कि उसे यह अनुभव करा दिया गया कि "तुम्हारा होना पर्याप्त नहीं है।" किसी भी मनुष्य के लिए इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है कि उसके अस्तित्व को ही कमतर मान लिया जाए? इसीलिए ध्रुव की कथा पाँच हजार वर्ष पुरानी होकर भी आज के युवक की कथा प्रतीत होती है। युग बदलते हैं, पर मनुष्य के अनुभव नहीं बदलते। आज भी किसी युवक को कभी आर्थिक विषमता रोकती है, कभी संसाधनों का अभाव, कभी प्रतियोगिता की विषम शर्तें, कभी सामाजिक परिस्थितियाँ, कभी परिवार की सीमाएँ, तो कभी उसे लगता है कि अवसरों का वितरण उसके अनुकूल नहीं है। हर युग का अपना एक "सिंहासन" होता है—किसी युग में वह राजसिंहासन था, आज वह विश्वविद्यालय की सीट हो सकती है, किसी प्रतिष्ठित संस्था का प्रवेशद्वार हो सकता है, कोई शोधवृत्ति, कोई प्रशासनिक सेवा, कोई व्यवसाय, कोई प्रतिष्ठा, कोई उपलब्धि। और हर युग में कुछ युवक ऐसे होते हैं जिन्हें लगता है कि सिंहासन के समीप पहुँचकर भी उनके हाथ खाली रह गए।
यहीं पुराण आधुनिक मनुष्य के कान में एक अत्यंत धीमी, किंतु अत्यंत प्रखर बात कहता है—तुम्हारी सबसे बड़ी लड़ाई सिंहासन के लिए नहीं है; तुम्हारी सबसे बड़ी लड़ाई अपने भीतर ध्रुव बनने की है।
ध्रुव की कथा का सबसे बड़ा चमत्कार यह नहीं कि उसे भगवान् मिले। सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि उसने अपने अपमान को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। अधिकांश मनुष्य अपने जीवन की सबसे दुखद घटना का स्मारक बन जाते हैं। वे जीवन भर उसी घटना को ढोते रहते हैं। कोई कहता है—मुझे अवसर नहीं मिला; कोई कहता है—मेरे साथ पक्षपात हुआ; कोई कहता है—समय मेरे विरुद्ध था; कोई कहता है—व्यवस्था दोषपूर्ण थी। इनमें से बहुत-सी बातें सत्य भी हो सकती हैं। संसार कभी पूर्ण न्यायपूर्ण नहीं रहा। महाभारत से लेकर आधुनिक इतिहास तक, हर युग में असमानताएँ रही हैं। किंतु ध्रुव का प्रश्न यह नहीं था कि संसार न्यायपूर्ण है या नहीं। उसका प्रश्न था—मैं अपने भीतर क्या करूँ?
यही वह क्षण है जहाँ पुराण मनोविज्ञान का ग्रंथ बन जाता है।
ध्रुव यदि चाहता तो वह राजमहल में रहकर प्रतिदिन अपने अपमान की कथा दोहराता। वह अपने मित्रों को बताता कि उसके साथ कितना अन्याय हुआ। वह अपने पिता को दोष देता, विमाता को दोष देता, भाग्य को दोष देता। धीरे-धीरे उसका संपूर्ण व्यक्तित्व शिकायत का दूसरा नाम बन जाता। इतिहास में ऐसे असंख्य लोग हुए जिनकी पहचान उनकी पीड़ा बन गई। वे अपनी प्रतिभा से नहीं, अपने आक्रोश से पहचाने गए।
पर ध्रुव ने दूसरा मार्ग चुना।वह वन चला गया।
पुराण में वन केवल वृक्षों का समूह नहीं होता। भारतीय साहित्य में वन का अर्थ है—अपने भीतर लौट जाना। जहाँ शोर समाप्त हो जाता है और साधना आरंभ होती है। जहाँ संसार की आवाज़ें मंद पड़ जाती हैं और आत्मा की आवाज़ सुनाई देने लगती है। इसीलिए हमारे ऋषि वन में गए, वाल्मीकि वन में मिले, व्यास वन में रहे, पाण्डव वन में तपे, राम वन में गए और ध्रुव भी वन गया।
आज का युवक यदि इस वन को केवल जंगल समझेगा तो कथा का आधा अर्थ ही समझ पाएगा। आज वन कहाँ है? आज का वन पुस्तकालय है। प्रयोगशाला है। अध्ययन-कक्ष है। अभ्यास का मैदान है। कंप्यूटर के सामने बिताए गए वे अनगिनत घंटे हैं जहाँ कोई ताली नहीं बजाता, कोई कैमरा नहीं होता, कोई प्रशंसा नहीं होती—केवल साधना होती है। आधुनिक वन वह एकांत है जहाँ मनुष्य अपने भविष्य का निर्माण करता है।इसीलिए ध्रुव की कथा पलायन की कथा नहीं है; वह एकांत की शक्ति की कथा है। वह कहती है कि संसार से क्षणभर हट जाना संसार से हार जाना नहीं है। कभी-कभी पीछे हटना ही सबसे बड़ी छलाँग की तैयारी होता है। आज का युवक एक विचित्र युग में जी रहा है। उसे अपने संघर्ष से अधिक दूसरों की सफलताएँ दिखाई देती हैं। सामाजिक माध्यमों ने तुलना को जीवन का स्थायी रोग बना दिया है। किसी का चयन, किसी का पुरस्कार, किसी का वेतन, किसी की उपलब्धि—सब कुछ प्रतिदिन उसकी आँखों के सामने है। परिणाम यह कि उसका ध्यान अपने तप पर कम और दूसरों के सिंहासन पर अधिक रहने लगा है।
ध्रुव की कथा इस रोग का उपचार है।ध्रुव ने अपने भाई को देखना छोड़ दिया। उसने अपना ध्यान अपने भीतर केंद्रित कर लिया। जिस दिन मनुष्य की दृष्टि प्रतिस्पर्धी से हटकर साधना पर आ जाती है, उसी दिन उसका वास्तविक विकास प्रारंभ होता है। क्योंकि तुलना ऊर्जा को बाहर खर्च करती है, जबकि तप उसी ऊर्जा को भीतर संचित करता है।यही कारण है कि भारतीय परंपरा ने "तप" शब्द का प्रयोग किया, केवल "परिश्रम" का नहीं।परिश्रम शरीर करता है; तप संपूर्ण व्यक्तित्व करता है।परिश्रम घंटे गिनता है; तप जीवन बदल देता है।परिश्रम लक्ष्य तक पहुँचाता है; तप मनुष्य को लक्ष्य से भी बड़ा बना देता है।
ध्रुव ने सिंहासन पाने के लिए तप नहीं किया था। उसने स्वयं को इतना ऊँचा बना लिया कि सिंहासन उसकी उपलब्धि का अंतिम बिंदु ही नहीं रह गया। उसे ध्रुवपद मिला—ऐसा स्थान जहाँ से वह स्वयं दिशा का प्रतीक बन गया।
ध्रुव और उत्तानपाद की यह कहानी आधुनिक युग की भी है। सिंहासन को अपने कुछ बेटे सगे लगते हैं और कुछ सौतेले। कुछ के लिए आरक्षण है, कुछ के लिए नहीं है। कुछ को 90 परसेंटाइल पर भी प्रवेश नहीं है, कुछ को -40 पर भी है। कुछ को अपने ही किसी सहपाठी की तुलना में ज्यादा गिरी आर्थिक स्थिति पर भी दस गुना शुल्क देना है। तब उन प्रतिभाशाली बेटों के पास रास्ता क्या है? शिकायत का नहीं। तप का। तप यानी परिश्रम ही नहीं असाधारण परिश्रम। ताकि यदि आरक्षण 90% भी हो जैसा तमिलनाडु में है तब भी उस पतली सी छूट गई गली से रास्ता बना पाओ। तप यानी दूसरों पर दोषारोपण नहीं। स्वयं अपना आत्म-परिष्कार। तमिल ब्राह्मण बच्चे ध्रुव की ही तरह अलग जाकर अपनी असाधारण मेहनत से बिज़नेस से लेकर शतरंज तक अपनी पहचान बना सके।
ध्रुव और उत्तानपाद की कथा केवल पुराण की कथा नहीं है; वह हर युग में जन्म लेती है। हर युग में कुछ ध्रुव होते हैं जिन्हें लगता है कि सिंहासन की गोद में बैठने का अधिकार जन्म से नहीं, योग्यता से मिलना चाहिए; फिर भी वे स्वयं को उस सिंहासन से दूर पाते हैं। आज भी अनेक युवाओं को यह अनुभव होता है कि अवसर समान नहीं हैं। किसी को प्रवेश की दौड़ में अधिक अंक लाने पड़ते हैं, किसी को अधिक शुल्क देना पड़ता है, किसी को प्रतिस्पर्धा की शर्तें अपने विरुद्ध प्रतीत होती हैं। ऐसे क्षणों में ध्रुव की कथा उन्हें एक अलग ही शिक्षा देती है।
ध्रुव ने अपने अपमान को अपने व्यक्तित्व की अंतिम परिभाषा नहीं बनने दिया। उसने प्रतिशोध का मार्ग नहीं चुना, न ही अपने जीवन को केवल शिकायत का आख्यान बनाया। वह वन की ओर गया—और वन यहाँ पलायन का नहीं, तप का प्रतीक है। तप का अर्थ केवल परिश्रम नहीं, बल्कि ऐसा अनुशासित, दीर्घकालिक और असाधारण पुरुषार्थ, जो परिस्थितियों की कठोरता से भी बड़ा सिद्ध हो जाए। ध्रुव ने सिंहासन माँगने के बजाय स्वयं को इतना ऊँचा बनाया कि उसे ध्रुवपद प्राप्त हुआ—ऐसा पद जिसे कोई छीन नहीं सकता।
आधुनिक भारत में अवसरों और सामाजिक न्याय पर मतभेद स्वाभाविक हैं। आरक्षण के समर्थन में भी गंभीर ऐतिहासिक और संवैधानिक तर्क हैं, और उसके आलोचकों के पास भी अवसरों की समानता तथा प्रतिस्पर्धा को लेकर अपने प्रश्न हैं। इन बहसों का समाधान न्यायालयों, विधायिकाओं और लोकतांत्रिक विमर्श में खोजा जाना चाहिए। किंतु ध्रुव की कथा का संदेश इन बहसों से भी ऊपर उठकर एक सार्वकालिक सत्य कहता है—परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, अपने पुरुषार्थ का विकल्प किसी के पास नहीं है।
भारतीय समाज में ऐसे अनेक समुदाय और परिवार मिलते हैं जिन्होंने सीमित अवसरों, कठिन प्रतिस्पर्धा अथवा अपनी अनुभूत बाधाओं के बीच भी शिक्षा, विज्ञान, उद्योग, उद्यमिता, कला और खेल के क्षेत्र में असाधारण उपलब्धियाँ अर्जित की हैं। यह किसी एक जाति, प्रदेश या वर्ग की कहानी नहीं, बल्कि उस भारतीय परंपरा की कहानी है जिसमें तप को भाग्य से बड़ा माना गया है। जहाँ अवसर संकरे हों, वहाँ तप और अधिक विराट होना पड़ता है।
ध्रुव की कथा इसलिए आज भी प्रासंगिक है कि वह हमें यह नहीं सिखाती कि व्यवस्था पर कभी प्रश्न मत उठाओ; वह यह सिखाती है कि प्रश्न उठाते हुए भी अपने पुरुषार्थ को शिथिल मत पड़ने दो। यदि मार्ग चौड़ा न मिले, तो अपनी साधना से उस संकरी पगडंडी को ही राजमार्ग बना दो। शिकायत क्षणिक संतोष दे सकती है, पर तप स्थायी सामर्थ्य देता है। ध्रुव इसी कारण ध्रुव है—क्योंकि उसने अपमान को अपनी नियति नहीं, अपनी साधना का आरंभ बना दिया।
ध्रुव इसलिए महान नहीं हुआ कि उसके साथ अन्याय हुआ। ध्रुव इसलिए महान हुआ कि उसने अन्याय को अपने व्यक्तित्व का अंतिम अध्याय नहीं बनने दिया। उसने उसे अपने तप का प्रथम अध्याय बना दिया।
अन्य सितारे केवल चमकते हैं; ध्रुव दिशा देता है क्योंकि जो अपनी पीड़ा को तप में रूपांतरित कर लेता है, वह केवल सफल नहीं होता, वह दूसरों का पथप्रदर्शक बन जाता है।
मनोज श्रीवास्तव जी का आलेख
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