सामान्य व्यक्ति यदि क्रोध में गाली देता है तो वह अपनी निजी दुर्बलता प्रकट करता है। परन्तु जब कोई प्रतिष्ठित लेखक, कवि या बुद्धिजीवी उसी गाली को वैचारिक औचित्य प्रदान करता है, तब वह केवल स्वयं नहीं बोल रहा होता; उसके पीछे उसकी अर्जित सांस्कृतिक पूँजी की अल्पता बोल रही होती है। साहित्यकार की सबसे बड़ी शक्ति उसकी भाषा पर समाज का विश्वास है। वह विश्वास वर्षों की साधना से अर्जित होता है। जब वही व्यक्ति कहता है कि अमुक परिस्थिति में गाली उचित है, तब वह केवल एक अपशब्द का समर्थन नहीं करता; वह भाषा के नैतिक संविधान में संशोधन कर देता है।
समाज अपने शब्दकोश केवल विद्यालयों से नहीं सीखता; वह उन्हें कवियों, उपन्यासकारों, नाटककारों और सार्वजनिक बुद्धिजीवियों से भी सीखता है। यदि साहित्यकार भाषा की मर्यादा का प्रहरी न रहकर उसकी सीमा-भंग का वैचारिक अधिवक्ता बन जाए, तब समाज में यह धारणा बनने लगती है कि नैतिकता भी दलगत है—जिसे हम अपना विरोधी मान लें, उसके लिए कोई भी शब्द वैध हो जाता है।
कोई समाज एक दिन अचानक असभ्य नहीं हो जाता। पहले एक अपशब्द को अपवाद कहा जाता है, फिर उसे प्रतिक्रिया कहा जाता है, फिर प्रतिरोध कहा जाता है, और अन्ततः उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पर्याय बना दिया जाता है। इस क्रम में सबसे खतरनाक वह चरण है जहाँ बुद्धिजीवी उसका औचित्य सिद्ध करने लगते हैं। क्योंकि बुद्धिजीवी किसी प्रवृत्ति को जन्म भले न दें, उसे वैधता अवश्य दे सकते हैं।
सोशल मीडिया ने भाषा को तत्क्षण प्रतिक्रिया का माध्यम बना दिया है। अब शब्द तपस्या से नहीं, आवेग से जन्म लेते हैं। एल्गोरिद्म संयम को नहीं, उत्तेजना को पुरस्कृत करते हैं। सबसे अधिक साझा वही वाक्य होता है जो सबसे अधिक अपमानजनक हो। परिणाम यह हुआ कि भाषा का बाज़ार बन गया, जहाँ शालीनता की नहीं, सनसनी की माँग है। इस बाज़ार में यदि साहित्यकार भी वही बेचने लगे जो भीड़ खरीदना चाहती है, तो साहित्य और ट्रोलिंग के बीच का अंतर मिटने लगता है।
साहित्यकार को सत्ता से असहमति का पूरा अधिकार है; बल्कि अनेक बार वही उसका नैतिक दायित्व भी है। परन्तु यदि वह प्रतिरोध की भाषा को गाली की भाषा बना देता है, तो वह सत्ता का प्रतिरोध नहीं करता—वह भाषा की पराजय का उत्सव मनाता है। तब समझ लीजिए कि लोकतंत्र का संकट चुनावों में नहीं, भाषा में प्रारम्भ हो चुका है।
गाली का सबसे बड़ा अपराध यह नहीं कि वह अशिष्ट है। अशिष्टता तो कभी-कभी केवल सामाजिक प्रशिक्षण का अभाव भी हो सकती है। उसका वास्तविक अपराध यह है कि वह सामने वाले को संवाद के योग्य व्यक्ति नहीं रहने देती। वह उसे एक विचारशील अस्तित्व से घटाकर एक अपमानित वस्तु में बदल देती है। दर्शनशास्त्री इमैनुएल लेविनास ने कहा था कि दूसरे मनुष्य का चेहरा हमें नैतिक उत्तरदायित्व का आह्वान देता है। गाली उस चेहरे को मिटा देती है। वह दूसरे को एक चेहरा नहीं, एक लक्ष्य (target) बना देती है। जिस क्षण किसी व्यक्ति का नाम उसके लिए प्रयुक्त अपशब्द से प्रतिस्थापित हो जाता है, उसी क्षण संवाद समाप्त हो जाता है और केवल आक्रमण शेष रह जाता है।
समाज में प्रत्येक व्यक्ति की विश्वसनीयता समान स्रोत से नहीं आती। सैनिक की विश्वसनीयता उसके साहस से जन्म लेती है, न्यायाधीश की उसके निष्पक्ष विवेक से, चिकित्सक की उसकी करुणा और कौशल से। उसी प्रकार साहित्यकार की वास्तविक पूँजी न उसकी प्रसिद्धि है, न पुरस्कार, न पाठकों की संख्या; उसकी सबसे बड़ी पूँजी है—उसकी भाषा की नैतिक विश्वसनीयता। जो साहित्यकार सत्ता-विरोध और सभ्यता-विरोध में फर्क ही नहीं पहचान सके, वह साहित्यकार नहीं प्रोपेगंडिस्ट है जिसकी मानसिकता यह है कि यदि विरोधी को पराजित करना है, तो उसके लिए कोई भी साधन उचित है। यही मनोविज्ञान भाषा में भी प्रवेश करता है कि यदि विरोधी को पराजित करना है, तो उसके लिए कोई भी शब्द उचित है।
लोकतंत्र केवल सत्ता बदलने की व्यवस्था नहीं है; वह भाषा को हिंसा से बचाने की भी व्यवस्था है। जिस शब्दावली में कोई आंदोलन बोलना सीखता है, वही उसके राजनीतिक संस्कार का स्थायी हिस्सा बन जाती है। यदि कोई आंदोलन केवल घृणा की भाषा सुनता और बोलता रहे, तो अंततः वह घृणा उसके नैतिक व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है। तब वह सत्ता बदलने के बाद भी उसी भाषा में शासन करता है।
अन्यथा वाक्लाव हैवेल ने चेकोस्लोवाकिया के दमनकारी शासन का कठोर विरोध किया, किंतु उनकी भाषा में प्रतिशोध नहीं, नैतिक स्पष्टता थी। अलेक्ज़ेंडर सोल्झेनित्सिन ने सोवियत अत्याचारों का भंडाफोड़ किया, पर उनकी शक्ति अपशब्दों से नहीं, साक्ष्य और नैतिक साहस से आई। मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने नस्लवाद के विरुद्ध ऐसी भाषा विकसित की जिसमें क्रोध था, किंतु घृणा नहीं; पीड़ा थी, किंतु अपमान नहीं। इसी कारण उनका शब्द इतिहास में टिक गया और उनके विरोधियों के नारे समय के साथ विलुप्त हो गए। यदि विश्व के सबसे सफल जनांदोलन—जहाँ दमन कहीं अधिक था, हिंसा कहीं अधिक थी, अन्याय कहीं अधिक था—अपनी भाषा को मर्यादित रख सकते थे, तो आज हम क्यों यह मान लें कि गाली प्रतिरोध की अपरिहार्य भाषा है? फिर इनकी भाषा अधिक हिंसक क्यों है? जिन आंदोलनों को अपने नैतिक बल पर विश्वास होता है, वे भाषा को गिराने की आवश्यकता नहीं समझते। जिन्हें अपने तर्क पर विश्वास होता है, वे गाली से परहेज़ करते हैं। गाली प्रायः वहाँ जन्म लेती है जहाँ व्यक्ति को लगता है कि उसके शब्द पर्याप्त प्रभावशाली नहीं रहे। वह अर्थ की कमी को तीव्रता से भरना चाहता है। इसलिए गाली अनेक बार शक्ति का नहीं, असुरक्षा का व्याकरण होती है।
यदि साहित्यकार, जिसे भाषा का ऋषि होना था, स्वयं भाषा की मर्यादा के विघटन का तर्कशास्त्री बन जाए, तो समाज किससे अपेक्षा करे? यदि प्रहरी ही द्वार खोल दे, तो आक्रमणकारी को परिश्रम नहीं करना पड़ता। इसलिए किसी साहित्यकार द्वारा गाली का औचित्यीकरण केवल एक व्यक्तिगत मत नहीं; वह भाषा की उस नैतिक परंपरा के विरुद्ध विद्रोह है जिसने साहित्य को सभ्यता का अंतःकरण बनाया था। सभ्यताएँ गालियों से नहीं टूटतीं।वे तब टूटती हैं जब उनके साहित्यकार गालियों को सांस्कृतिक वैधता (Cultural Legitimacy) देने लगते हैं।साधारण व्यक्ति गाली देता है, समाज उसे सुधार सकता है।राजनेता गाली देता है, चुनाव उसे दंडित कर सकता है।पर यदि साहित्यकार गाली को सिद्धांत बना दे, तब समाज के पास उसे सुधारने का कोई सहज साधन नहीं बचता।क्योंकि वह भाषा का न्यायाधीश माना जाता है।और जब न्यायाधीश ही अपराध को वैध घोषित कर दे, तब अपराधी को अपराध-बोध क्यों होगा? यहीं मुझे लगता है कि हमारे समय की वास्तविक त्रासदी केवल यह नहीं है कि सार्वजनिक जीवन में भाषा गिर रही है।
उससे कहीं बड़ी त्रासदी यह है कि भाषा के संरक्षक स्वयं उसके पतन के दार्शनिक बनने लगे हैं।यही वह क्षण है जहाँ सभ्यता भीतर से दरकने लगती है।क्योंकि किसी भी राष्ट्र की अंतिम रक्षा सेना नहीं करती।संविधान भी नहीं।उसकी अंतिम रक्षा उसकी भाषा करती है।
किसी सभ्यता का वास्तविक चरित्र इस बात से नहीं पहचाना जाता कि वह अपने मित्रों से कैसी भाषा बोलती है; बल्कि इस बात से पहचाना जाता है कि वह अपने विरोधियों से कैसी भाषा बोलती है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के दावे करने वाले अभिव्यक्ति की साधना को लगभग भूल गए हैं। ऐसे समय जुर्गेन हैबरमास की संवाद-नैतिकता (Discourse Ethics) अत्यंत प्रासंगिक हो उठती है। उनके अनुसार लोकतंत्र का वास्तविक आधार केवल मतदान नहीं, संवाद है। किंतु संवाद तभी संभव है जब प्रतिभागी एक-दूसरे को तर्क के योग्य मनुष्य मानते हों। जिस क्षण हम विरोधी को अपमान के योग्य प्राणी मानने लगते हैं, उसी क्षण संवाद की नैतिक पूर्वशर्त समाप्त हो जाती है।
लोकतंत्र केवल मतपत्रों से नहीं बचता।वह शब्दों से बचता है।संविधान केवल अधिकारों की रक्षा करता है। भाषा उन अधिकारों के योग्य मनुष्य की।
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